आज पढ़िए ऐन कार्सन की पाँच कविताएँ। इस बीच आप अनेक अलग अलग लोगों द्वारा किए गए अनुवादों को पढ़ चुके हैं। लेकिन यह अनुवाद विशेष इसलिए है क्योंकि इसे किया है विनय कुमार ने, जो अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मनोचिकित्सक हैं। कवि भी हैं और उनकी कविताओं में विधाओं का संक्रमण दिखाई देता है, जिस तरह का संक्रमण ऐन कार्सन के साहित्य में दिखाई देता है। आइये अनूदित कविताएँ पढ़ते हैं- मॉडरेटर
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पिता का पुराना नीला कार्डिगन
रसोईघर की उस कुर्सी के पीछे टँगता है यह
जहाँ मैं हमेशा बैठती हूँ, ठीक वैसे ही
जैसे यह उस रसोईघर की कुर्सी के पीछे टँगता था
जहाँ वे हमेशा बैठते थे।
मैं जब भी अंदर आती हूँ, इसे पहन लेती हूँ,
जैसे वे पहन लिया करते थे, अपने बूटों से
बर्फ झाड़ते हुए।
मैं इसे पहनती हूँ और अँधेरे में बैठ जाती हूँ।
वे ऐसा कभी नहीं करते।
आसमान में टँगे मूनबोन से पैनी ठंड उतरती है।
उनके नियम एक रहस्य थे।
लेकिन मुझे वो लम्हा याद है जब मुझे एहसास हुआ था
कि वे अपने ही नियमों के भीतर बिखर रहे।
ड्राइववे के मोड़ पर खड़े थे कि मैं पहुँची
वे वही नीला कार्डिगन पहने थे, बटन ऊपर तक बंद
मुझे अजीब लगा इसलिए नहीं
कि वह जुलाई की एक गर्म दोपहर थी,
बल्कि उनके चेहरे का भाव भी वही,
मानो कोई छोटा बच्चा,
जिसे किसी आंटी ने सुबह-सुबह
लंबी यात्रा के लिए तैयार किया हो
कि वह ठंडी ट्रेनों और तेज़ हवाओं वाले प्लेटफ़ॉर्मों पर
अपनी सीट के किनारे सीधा तनकर बैठा रहेगा,
जबकि लंबी उँगलियों जैसी परछाइयाँ,
घास के ढेरों पर तेज़ी से गुज़रकर
उसे बार-बार चौंकाती रहेंगी—
क्योंकि वह उलटी दिशा में सफ़र कर रहा है।
देवदूत का नगर
तुम्हारी मौत के बाद।
हवाएँ चलती रहीं हर दिन।
दीवार की तरह हमें रोकती हुईं
हर दिन।
हम चलते रहे।
अलग-अलग सड़क के किनारे-किनारे
चीख़ते-चिल्लाते।
सब बेकार था।
हमारे बीच का फासला।
सख़्त होता चला गया।
ख़ाली जगहें मगर
ठोस और स्याह, और मातमी ।
किसी बूढ़ी औरत के
टूटे हुए दाँतों के बीच की जगह की तरह
जिसे तुम जानते थे बरसों पहले
जब वह बेहद ख़ूबसूरत हुआ करती थी,
और उसके वजूद में नसें
किसी शाही महल की आग छिड़कती थी !
मुहब्बत की एक छोटी सी उदास एक्सटेसी
आँखें बंद किए
रात भर तुम्हारे साथ होना
अच्छा लगता है,
मेरी क़िस्मत
कि तुम चले आ रहे
सितारों की राह
मैं अपने दिल और दिमाग़ की
तमाम सड़कों से गुज़री
तुम वहीं थे
सड़क के किनारे
घुटनों के बल बैठे
सँभाले अपनी छोटी सी टूलकिट
कुछ बिगड़ी बनाते
अब एक नई दुनिया दो मुझे
कि जो मैं थी उसे उसे तुम ले चुके !
ब्रुकलिन का कमरा
यह
धीमा
दिन
गुज़र रहा है
कमरे से
होकर
मैं सुनती हूँ
इसकी
धुरियों की
आवाज़
छत पर
एक जगमगाहट
आहिस्ता- आहिस्ता
मुझमें
जगाती है
वही
जीवन्त
नीली-पीली अनुभूति
जैसे-जैसे
घड़ियाँ
बहती-बिखरती जातीं
मेरी
ढलती दोपहर में।
बसन्त का नगर : एक बार फिर
‘बसन्त हमेशा वैसा ही जैसा सदा’
एक बूढ़े चीनी आदमी ने कहा।
बंद खिड़कियों पर बारिश की
मद्धिम आवाज़ और
दूर देस की हसरतें
हम तक पहुँच गईं।
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विनय कुमार
पटना मेडिकल कॉलेज, पटना से एमबीबीएस और एमडी ( साइकाएट्री)। ‘मनोवेद माइंड हॉस्पिटल’, पटना में परामर्शी मनोचिकित्सक। दो दशकों से राष्ट्रीय तथा तीन वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनोचिकित्सा जगत में नेतृत्व।
कविता संग्रह : ‘क़र्ज़ ए तहज़ीब एक दुनिया है’, ‘आम्रपाली और अन्य कविताएँ’, ‘मॉल में कबूतर’ और ‘पानी जैसा देस’। कविता शृंखला: ‘यक्षिणी’ ‘श्रेयसी’। काव्य नाटक: ‘आत्मज’। गद्य : ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ और ‘मनोचिकित्सा संवाद’। सम्पादन: साइकाएट्री की सात किताबें, कुछ समय तक एक पत्रिका मनोवेद डाइजेस्ट।
सम्मान : इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा ‘डॉ. रामचन्द्र एन. मूर्ति सम्मान’ (2007), अमेरिकन साइकाएट्रिक एसोसिएशन का ‘डिस्टिंगग्विश्ड फेलो सम्मान’ (2025), ‘एक मनोचिकित्सक के नोट्स’ पुस्तक के लिए ‘अयोध्या प्रसाद खत्री स्मृति सम्मान’ (2015) तथा कविता में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘बनारसी दास भोजपुरी सम्मान’ (2019।



