‘समास’ आत्मसजग श्रेष्ठ साहित्य की वाहक बनेगी

कल ‘समास’ का लोकार्पण है. गहन वैचारिकता की अपने ढंग की शायद अकेली पत्रिका ‘समास’ की यह दूसरी पारी है. एक दशक से भी अधिक समय हो गया जब इस पत्रिका के सुरुचिपूर्ण प्रकाशित चार अंकों ने साहित्य की दूसरी परंपरा की वैचारिकता को मजबूती के साथ सामने रखा था. अब परिदृश्य बदल चुका है. पहले जैसा वैचारिक ध्रुवीकरण अब नहीं रहा. लेखकों की एक नई पीढ़ी आ चुकी है. ऐसे में ‘समास’ की क्या भूमिका होगी, क्या सरोकार होंगे- हमने कुछ सवालों को लेकर ‘समास’ के संपादक, कवि-विचारक उदयन वाजपेयी से बात की. प्रस्तुत है आपके लिए- जानकी पुल.
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मैं पहले भी  अन्य संपादकों के साथ समास का संपादन किया करता था, तब भी हम यह समझते थे कि हिंदी साहित्य को आत्मचेतस बनाने के लिए कार्य किया जाना चाहिए. हिंदी साहित्य में हम पिछले कई वर्षों से अपने चिंतन और सृजन में यूरोप और आजकल लातिन अमरीका  का मुंह जोहते रहे हैं. अपनी परम्पराओं के प्रति एक तरह का अवहेलना का भाव हमारे साहित्य  में आता गया है. इसे दूर करने की ज़रुरत है. हमें यह महसूस करना बहुत ज़रूरी है कि हम एक बड़ी और सृजनशील परंपरा के वारिस हैं. हमें अपनी तरह से दुनिया को देखने की ज़रुरत है न कि पश्चिम की दृष्टि से खुद को देखने की.  मैं समास के संपादक की तरह अपनी ज़िम्मेदारी यह मानता हूँ कि यह पत्रिका आत्मसजग श्रेष्ठ साहित्य की वाहक बने , इसके पाठक न सिर्फ अच्छी कविताओं या कहानियों या उपन्यासों या निबंधों  का आनंद लें बल्कि वे यह करते हुए साहित्य और संस्कृति और होने‘  के बुनियादी किस्म के प्रश्नों को भी अपने मन में उठा हुआ पायें. 
समास में गहराई  से पढ़ा जा सकने वाला सृजनशील और चिंतनपरक लेखन प्रकाशित  होगा. हम चाहेंगे कि समास हिंदी की एक ऐसी पत्रिका बन सके जो बेहतर लेखन का निकष हो सके और साथ ही हिंदी साहित्य में व्याप्त तरह तरह के विचारधारात्मक भ्रमों  को दूर कर सके.या कि कम से कम उन पर सवाल उठा सके. हम यह कोशिश करना चाहते हैं कि हिंदी में साहित्य के अपने निकष उत्पन्न हो, वह  किसी समाजशास्त्री  प्रमाण की मोहताज न रहें और खुले मन से अपनी परंपरा और वैश्विक साहित्य से सम्बन्ध बनाये.
हम चाहेंगे कि समास में मौलिक किस्म का चिंतन प्रकाशित हो. हम अगर अब तक भी पश्चिम की नक़ल करने से थके नहीं हैं तो फिर हमें अपने साहित्य से कोई भी उम्मीद करना बंद करना होगी. 
विदेशी साहित्य के प्रति  आकर्षण का कारण यह है कि पिछले कई दशकों से हमारी भाषा की आलोचना और किसी हद तक लेखन भी विदेशी साहित्यों से प्रेरित होता रहा है, यह इसलिए हो पाया है क्योंकि हमें अपनी परंपरा के विषय में गहरी ग्लानि है. हमने अपनी परम्पराओं की औपनिवेशिक समझ को अंगीकार कर रखा है. इससे हमें खुद अपने आप से जुड़ने में मुश्किल आ  रही है, समास यह मानता है कि अब समय है जब हमें अपनी परम्पराओं की तरफ बिना किसी औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों के देखना शुरू करना चाहिए. इसकी शुरुआत हम इसी अंक से कर रहे हैं. इसमें हम  हिंदी के विलक्षण पर चर्चा से दूर रखे गये महान कवि कमलेश से  लम्बी बातचीत प्रकाशित कर रहे हैं. इसमें उन्होंने हमारी बौद्धिक और सृजनात्मक विपन्नता  के कारणों को बड़ी बेबाकी से उद्घाटित  किया है. हम चाहते  हैं कि हिंदी की बोलियों में भी एक बार फिर सृजन चेतना आये और वे अपने को खडी  बोली का गरीब बिरादर समझने के स्थान पर अपने भीतर समकालीन सृजन की संभावना का आत्मविश्वास जगाएं. इस अंक में इसीलिए हम एक मालवी उपन्यास के  अंश छाप रहे हैं. इसी तरह हम चाहते हैं कि हिंदी का पाठक अन्य कलाओं के बारे में हुए गहन चिंतन में भी भागीदारी करे इसलिए हम बी एन गोस्वामी जैसे भारत के अन्यतम कला इतिहासकार को भी प्रकाशित कर रहे हैं. दरसल समास की दिलचस्पी हमारी अपनी सभ्यता को विभिन्न कोणों से समझने और परखने और रचने में होगी.
मैं यह सोचता हूँ कि हिंदी साहित्य को बहुत समय तक कूपमंडूक बना कर रखा गया है. हमने लगभग हमेशा ही औरों की शर्तों पर अपने को देखने कि कोशिश की है. हम पश्चिम की तरह तरह की शब्दावली का बिना परीक्षण के वरण करते रहें हैं. इस कारण हम खुद को पश्चिम  का द्वितीयक मानने लगे  हैं. हमें अपनी स्थिति को  अपनी निगाहों से देखने की कोशिश करने होगी, समास इस यात्रा में सहयोगी होना चाहेगा. 
उदयन वाजपेयी     

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