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  • लिख दूँगा दीवार पर तुम्हारा नाम

    अज्ञेय के जन्म-शताब्दी वर्ष में प्रोफ़ेसर हरीश त्रिवेदी ने यह याद दिलाया है कि १९४६ में अज्ञेय की अंग्रेजी कविताओं का संकलन प्रकाशित हुआ था ‘प्रिजन डेज एंड अदर पोयम्स’. जिसकी भूमिका जवाहरलाल नेहरु ने लिखी थी. लेकिन बाद अज्ञेय-विमर्श में इस पुस्तक को भुला दिया गया. इनकी कविताओं का खुद अज्ञेय ने भी कभी हिंदी-अनुवाद नहीं किया. समकालीन भारतीय साहित्य के अंक १५४ में प्रकाशित अपने लेख में उन्होंने इस पुस्तक की विस्तार से चर्चा की है. और पहली बार उस संकलन की कुछ कविताओं का हिंदी-अनुवाद भी किया है. यहाँ हरीश त्रिवेदी द्वारा अनूदित अज्ञेय की कविताएँ प्रस्तुत हैं- जानकी पुल.
    १.
    दीवार पर नाम
    लिख दूँगा दीवार पर तुम्हारा नाम
    ताकि तुम मुझे देखती रह सको दिन भर,
    बस तुम्हारा नाम, बिना किसी प्रेम-संबोधन के
    और पड़ा रहूँगा उसकी छांह में थका-हारा
    पिसता-पीसता, पिसता-पीसता
    ऐसे कटेंगे मेरे दिन, महीन पीसते
    गेंहू के दानों के साथ
    कुछ गाढ़ी बूँदें अपनी धूसरित पराजय की
    फिर आएगी शाम और मैं उठूँगा कोसता बडबडाता
    पर तुम्हारी करुण दीठ पिघला देगी मेरे भीतर कहीं कुछ
    ऊंचा उमड़ेगा जीवन-रस
    फिर अगले दिन वैसे ही रिस जाने को.
    लिख दूँगा दीवार पर तुम्हारा नाम
    ताकि तुम मुझे देखती रह सको दिन भर.
    और विकराल रात में बसा लूँगा तीन तारे-
    तुम,
    तुम्हारा ख्याल
    और मेरे सामने दीवार पर तुम्हारा नाम :
    तो जब अँधेरे में गश्त लगाता आएगा चौकीदार
    सुन्न हाथों से सलाखें और ताले खडखडाता-
    ज्यों कोई पिशाच फाड़ता हो जर्जर कफ़न
    मेरे दीवार पर लिखे टोने से तुम
    फिर भी देख लोगी मुझे
    और जान लोगी उस निबिड़ अन्धकार में
    कि मेरा कटु कोसना तो बस तुम्हें पाने का सपना है.
    लिख दूँगा दीवार पर तुम्हारा नाम, बिना प्रेम-संबोधनों के
    और पड़ा रहूँगा उसकी छांह में थका-हारा रात भर.
    २.
    दो बातें
    दो बातें मुझे द्रवित करती हैं
    और दोनों वही एक हैं
    चीड़ों में बहता पहाड़ी सोता :
    एक लड़की की प्रथम प्रेम से जगमगाती हँसी-
    दो बातें मुझे द्रवित करती हैं
    और दोनों वही एक हैं.
    दो बातें मुझे कष्ट देती हैं
    और दोनों वही एक हैं-
    लम्पट होंठों पर नाम प्यार का :
    विजय दर्प से मदमाते राष्ट्र
    बनवाते स्मारक स्वतंत्रता के.
    दो बातें मुझे कष्ट देती हैं
    और दोनों वही एक हैं.
    ३.
    मत आना दिन में
    मत आना दिन में
    जब होंठ मेरे दुखते हों
    और आँखें हो गई हों लाल रोते-रोते :
    मत आना जब मेरी कामना अपरूप कर दे मुझे
    अपने ही निष्फल आवेग से.
    आना भयावह रात में
    जब कामना सो जाती है और आंसू छिप जाते हैं
    लाल-लाल आँखों पर मरहम लग जाता है
    भारी पलकों के श्लथ स्पर्श का.
    यही नहीं, आना सुनसान रात में
    जब मेरी आत्मा खड़ी हो असहाय और नंगी-उघड़ी
    जैसे उषा-वस्त्रा वधु जिसे सखियाँ छोड़ गई हैं.
    आना, रात छिपा लेती है, परिमार्जित करती है :
    रात में मैं भी सुन्दर हो जाता हूँ
    वैसे जो कठोर हूँ!
    अज्ञेय का चित्र दीपचंद सांखला के सौजन्य से.

    14 thoughts on “लिख दूँगा दीवार पर तुम्हारा नाम

    1. 'ज्यों कोई पिशाच फाड़ता हो जर्जर कफ़न'—अभिनव बिम्ब ….

    2. सुन्दर प्रस्तुति के लिए धन्यवाद.हरीश त्रिवेदी ने अज्ञेय की शब्दावली का खासा ध्यान रखा है.इन कविताओं को पढकर हमारा अनुभव-संसार समृद्ध होता है.

    3. इन कविताओं से अज्ञेय की प्रारंभिक काव्य चेतना से परिचय हुआ ! सुन्दर कविताओं का उतना ही सुन्दर अनुवाद ! बधाई त्रिवेदी जी को औए प्रभात रंजन जी को इस बहुमूल्य सामग्री को साझा करने के लिए धन्यवाद !

    4. दो बातें मुझे कष्ट देती हैं
      और दोनों वही एक हैं-
      लम्पट होंठों पर नाम प्यार का :
      विजय दर्प से मदमाते राष्ट्र
      बनवाते स्मारक स्वतंत्रता के.
      दो बातें मुझे कष्ट देती हैं
      और दोनों वही एक हैं.

      agyeyaji ke bare me kya kahun??bas shraddhaa….

    5. सुन्दर कविताओं का सुन्दर अनुवाद!अमितेश जी से सहमत ;;अब क्या कोई राजनेता साहित्य या साहित्यकार के इतना करीब होगा…….!
      हरीश जी को बधाई !धन्यवाद प्रभात जी पढवाने के लिए !

    6. 'भूल' को 'भूला' कर दें..तीनों प्रेम की कवितायें हैं…अगर नेहरू जी की भूमिका भी पढने को मिले तो अच्छा हो. वैसे अब क्या कोई राजनेता साहित्य या साहित्यकार के इतने करीब होगा जितने नेहरु जी थे ?

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    अज्ञेय के जन्म-शताब्दी वर्ष में प्रोफ़ेसर हरीश त्रिवेदी ने यह याद दिलाया है कि १९४६ में अज्ञेय की अंग्रेजी कविताओं का संकलन प्रकाशित हुआ था ‘प्रिजन डेज एंड अदर पोयम्स’. जिसकी भूमिका जवाहरलाल नेहरु ने लिखी थी. लेकिन बाद अज्ञेय-विमर्श में इस पुस्तक को भुला दिया गया. इनकी कविताओं का खुद अज्ञेय ने भी कभी हिंदी-अनुवाद नहीं किया. समकालीन भारतीय साहित्य के अंक १५४ में प्रकाशित अपने लेख में उन्होंने इस पुस्तक की विस्तार से चर्चा की है. और पहली बार उस संकलन की कुछ कविताओं का हिंदी-अनुवाद भी किया है. यहाँ हरीश त्रिवेदी द्वारा अनूदित अज्ञेय की कविताएँ प्रस्तुत हैं- जानकी पुल.
    १.
    दीवार पर नाम
    लिख दूँगा दीवार पर तुम्हारा नाम
    ताकि तुम मुझे देखती रह सको दिन भर,
    बस तुम्हारा नाम, बिना किसी प्रेम-संबोधन के
    और पड़ा रहूँगा उसकी छांह में थका-हारा
    पिसता-पीसता, पिसता-पीसता
    ऐसे कटेंगे मेरे दिन, महीन पीसते
    गेंहू के दानों के साथ
    कुछ गाढ़ी बूँदें अपनी धूसरित पराजय की
    फिर आएगी शाम और मैं उठूँगा कोसता बडबडाता
    पर तुम्हारी करुण दीठ पिघला देगी मेरे भीतर कहीं कुछ
    ऊंचा उमड़ेगा जीवन-रस
    फिर अगले दिन वैसे ही रिस जाने को.
    लिख दूँगा दीवार पर तुम्हारा नाम
    ताकि तुम मुझे देखती रह सको दिन भर.
    और विकराल रात में बसा लूँगा तीन तारे-
    तुम,
    तुम्हारा ख्याल
    और मेरे सामने दीवार पर तुम्हारा नाम :
    तो जब अँधेरे में गश्त लगाता आएगा चौकीदार
    सुन्न हाथों से सलाखें और ताले खडखडाता-
    ज्यों कोई पिशाच फाड़ता हो जर्जर कफ़न
    मेरे दीवार पर लिखे टोने से तुम
    फिर भी देख लोगी मुझे
    और जान लोगी उस निबिड़ अन्धकार में
    कि मेरा कटु कोसना तो बस तुम्हें पाने का सपना है.
    लिख दूँगा दीवार पर तुम्हारा नाम, बिना प्रेम-संबोधनों के
    और पड़ा रहूँगा उसकी छांह में थका-हारा रात भर.
    २.
    दो बातें
    दो बातें मुझे द्रवित करती हैं
    और दोनों वही एक हैं
    चीड़ों में बहता पहाड़ी सोता :
    एक लड़की की प्रथम प्रेम से जगमगाती हँसी-
    दो बातें मुझे द्रवित करती हैं
    और दोनों वही एक हैं.
    दो बातें मुझे कष्ट देती हैं
    और दोनों वही एक हैं-
    लम्पट होंठों पर नाम प्यार का :
    विजय दर्प से मदमाते राष्ट्र
    बनवाते स्मारक स्वतंत्रता के.
    दो बातें मुझे कष्ट देती हैं
    और दोनों वही एक हैं.
    ३.
    मत आना दिन में
    मत आना दिन में
    जब होंठ मेरे दुखते हों
    और आँखें हो गई हों लाल रोते-रोते :
    मत आना जब मेरी कामना अपरूप कर दे मुझे
    अपने ही निष्फल आवेग से.
    आना भयावह रात में
    जब कामना सो जाती है और आंसू छिप जाते हैं
    लाल-लाल आँखों पर मरहम लग जाता है
    भारी पलकों के श्लथ स्पर्श का.
    यही नहीं, आना सुनसान रात में
    जब मेरी आत्मा खड़ी हो असहाय और नंगी-उघड़ी
    जैसे उषा-वस्त्रा वधु जिसे सखियाँ छोड़ गई हैं.
    आना, रात छिपा लेती है, परिमार्जित करती है :
    रात में मैं भी सुन्दर हो जाता हूँ
    वैसे जो कठोर हूँ!
    अज्ञेय का चित्र दीपचंद सांखला के सौजन्य से.

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