अखोनी- दिल्ली में पूर्वोत्तर की गाढ़ी खुशबू वाली फिल्म

12 जनवरी को नेटफ़्लिक्स पर एक फ़िल्म रिलीज हुई ‘अखोनी’। यह फ़िल्म एक संवेदनशील और अछूते विषय पर है, पूर्वोत्तर के लोगों के साथ उत्तर भारत में बर्ताव पर। इस फ़िल्म की समीक्षा लिखी है प्रीति प्रकाश ने। प्रीति असम के तेज़पुर विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य में पीएचडी कर रही हैं और पत्र-पत्रिकाओं में लिखती रहती हैं- जानकी पुल।

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जनवरी 2014 को अरुणाचल प्रदेश के ‘निदो तानियम’ को उसके बालों के सुनहरे रंग की वजह से मजाक उड़ाने के कारण हुए विवाद में  दिल्ली के ‘दिल’ लाजपत नगर में कुछ दुकानदारों ने बुरी तरह पीटा जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। देश की राजधानी दिल्ली में पूर्वोत्तर के लोगो पर ना तो यह पहला हमला था और ना ही आखिरी। हाल ही में ‘कोरोना-कोरोना’ कहकर पूर्वोत्तर के स्टूडेंट्स के साथ बदसलूकी का वाकया भी काफी चर्चित हुआ था। पूर्वोत्तर से देश के अलग-अलग हिस्सों में पढाई और जॉब के लिए आये लोगो ऐसे कई कटु अनुभवों से गुजरना होता है। ऐसे ही कटु अनुभवों को बेहद संजीदगी से लेकिन मनोरंजक ढंग से सामने लाती है फिल्म “अखोनी”।

अखोनी शब्द शिनो-तिब्बतन भाषा का शब्द है और ‘अखो’ और ‘नी’ दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘अखो’ का अर्थ होता है अरोमा यानि खुशबू और नी का अर्थ होता है ‘डीप’। यानि गाढी खुशबू। अक्खोनी, गाढी खुशबू वाली पूर्वोतार भारत की एक डिश है जो फर्मिनेटेड सोयाबीन से बनाई जाती है। पूरी फिल्म इसे ‘अखोनी’ के इर्द गिर्द घूमती है। नई दिल्ली के हुमांयूपूर ( जिसे पूर्वोत्तर के लोगो के कारण बैंकॉक रोड के नाम से भी जाना जाता है, क्या मजाक है न?) में रहने वाले कुछ पूर्वोत्तर के युवाओं की कहानी है जो अपनी दोस्त मिनामी को उसकी शादी के दिन ‘अखोनी’ बना कर सरप्राइज देना चाहते हैं। लेकिन उस समाज में जहाँ पूर्वोत्तर को लेकर पहले से ही कई पूर्वाग्रह है वहां सबकी नाक से छुपाकर यह डिश बनेगी कैसे? अब इस मसले का हल जानना है तो फिल्म देखनी होगी। दिल्ली की गलियों से गुजरते हुए इस फिल्म की कहानी जीवन के कुछ तल्ख़ और कुछ मीठे लम्हों से रूबरू कराती है। ‘अखोनी’ इस फिल्म में एक रूपक की तरह है जो पूर्वोत्तर की सांस्कृतिक पहचान को बताती है। एक ऐसी पहचान जो किसी के लिए अस्मिता है तो किसी के लिए नाकाबिले बर्दाश्त है।

‘नस्लभेद’ जैसे गंभीर विषय पर बने इस फिल्म की सबसे बड़ी विशिष्टता यह है कि तमाम संवेदनशीलता के बावजूद फिल्म कभी भी बोझिल नहीं लगती। कुछ दृश्यों में यह फिल्म हंसाती है तो कई बार बेहद अहम सवाल भी खड़े करती है।

‘तुम सब तो एक जैसे ही दिखते हो।’

‘तुम्हारी छोटी आँखों से क्या ये बड़ी दीवार नज़र आती है?’

‘मलाई’ (गाली के अर्थ में)

‘छोटे कपड़े पहन कर हमारे मर्दों को बिगाड़ती है।’

‘इसकी तो अब तक आँखे भी नहीं खुली।’

‘हिंदी-चीनी भाई भाई’ जैसी नस्लभेदी टिप्पणियां फिल्म के किरदारों के लिए रोजमर्रा की बातें हैं। लेकिन तमाम परेशानियों के बीच भी मुस्कान के लम्हे इक्कट्ठा करना ही तो इंसानी जज्बे की मिसाल है। उपासना और चान्बी, मीनामि के लिए ‘अखोनी’ बना रही है और इस काम में उनकी सहायता कर रहे हैं ज़ोरेम, बेन्डांग और बलामों। हर किरदार पूर्वोत्तर के एक अलग राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहा है। चान्बी का किरदार ‘लिन- लैशराम’ ने निभाया है। वह मुखर है, बोल्ड है लेकिन रोज के इन लफड़ों से परेशान भी है। सब्जियां खरीदते वक्त उस पर नस्लभेदी अश्लील टिप्पणियाँ होती हैं और विवाद बढ़ने पर टिप्पणियां करने वाला उसे सबके सामने एक थप्पड़ मार देता है। इसे लेकर उसके और बेनडैंग के बीच झगड़ा होता है क्योंकि बेनडैंग उसकी कोई मदद नहीं करता। ‘बेनडैंग’ खुद भी नस्लीय हमलों का शिकार हुआ है। इसलिए उसके भीतर एक अनजाना सा डर बैठ गया है। उसका गुस्सा, उसकी शर्मिंदगी, उसकी घुटन, उसकी नफरत परदे पर साफ़ नजर आती है। ‘उपासना’, चान्बी के साथ फ्लैट शेयर करती है। वह नेपाली है और इसलिए उतनी ‘तथाकथित’ पूर्वोत्तर की नहीं लगती। ‘सयानी गुप्ता’ ने उपासना का किरदार निभाया है। वह इस फिल्म में एकलौती ऐसी एक्टर है जिसने पूर्वोत्तर का ना होने के बावजूद, पूर्वोत्तर की लडकी का रोल किया है। इस रोल के लिए उन्होंने काफी मेहनत की है और उपासना की मासूमियत और चुलबुलेपन को परदे पर ठीक तरीके से दिखाया है। ‘उपासना’ जेरोम की दुकान में काम करती है। ‘जोरेम’ की भूमिका में तेनजिन दाल्हा हैं। वो काफी आकर्षक और अच्छे दिखते हैं।

 ‘आदिल हुसैन’ ने फिल्म में गेस्ट रोल किया है। जाट की भूमिका में वह बस किरदारों को आते जाते घूरते रहते हैं और देश की उस बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं जो ताकझाँक को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता हैं। नजर आती है।  फिर भी इस किरदार को और अधिक विस्तार दिया जा सकता था। पंजाबी मकान मालिक के रूप में डौली अहलुवालिया और विनय पाठक हंसाते हैं तो ‘शिव’ की भूमिका में रोहन जोशी ‘टिपिकल दिल्ली वाले लौंडे’ के किरदार में जान डाल देते हैं। पात्रों के बीच दिलचस्प संवाद हैं और फिल्म अपने मूल कथ्य ‘पूर्वोत्तर के प्रति नस्लीय भेदभाव’ को सामने लाने में सफल होती है।

लेकिन क्या यह फिल्म सिर्फ एक पक्ष की बाते करती है? नहीं। फिल्म के एक दृश्य में बेनडेंग, दिल्ली के लड़के ‘शिव’ को कहता है – ‘यू फकिंग इंडियन’। शिव थोड़ी देर खामोश रहता है फिर पूछता है- ‘तुम लोग खुद को इंडियन क्यों नहीं मानते?’ । एक और दृश्य में चान्बी, बेन्ड़ेंग से पूछती  है कि इतने दिनों में उसने किसी दिल्ली वाले से दोस्ती क्यों नहीं की? जाहिर है निर्देशक निकोलस खारकोंझार फिल्म में सभी पहलूओं पर बात करना चाहते हैं। और भी कई बारीक सी बातें हैं जिनपर निर्देशक ने ध्यान दिया है। पूर्वोत्तर के राज्यों के बीच आपसी विविधता और मतभेद की भी हल्की सी झलक मिलती है। कई भाषाओं और विभिन्न गीतों ने फिल्म को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध किया है। फिल्म के आखिरी दृश्य में जब सभी किरदार अपने पारंपरिक परिधान में घर से निकलते हैं तो ‘फैंसी ड्रेस कॉम्पटीशन में जा रहे हो क्या?’ जैसी टिप्पणियां उन्हें सुनने को मिलती है। लेकिन किरदारों का मूड ऐसा है – ‘कुछ तो लोग कहेंगे’। फिल्म हसांती है, रुलाती है लेकिन सबसे अधिक आईना दिखाती है कि अपनी महान भारतीय संस्कृति की बात करने वाले हम लोग भारत की ही संस्कृति के लिए कितने अधिक असहिष्णु हैं। पूर्वोत्तर की इस समस्या पर ध्यान दिलाने वाली यह अपने तरह की पहली फिल्म है। किसी हिंदी फिल्म में एक साथ पूर्वोत्तर के इतने कलाकारों को लाने के लिए भी इस फिल्म को श्रेय जाता है। कुल मिलाकर एक बेहद संवेदनशील मसले पर बनी यह जरूरी फिल्म है। इस फिल्म का पहला प्रीमियर 2 अक्टूबर 2019 को लन्दन फिल्म फेस्टिवल में हुआ और फिर 19 अक्टूबर को मुंबई फिल्म फेस्टिवल में। 12 जून 2020 को इसे नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ किया गया है और यह वही देखी जा सकती है।

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लेखिका संपर्क-preeti281192prakash@gmail.com

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