अभी हाल में ही ‘कथाक्रम’ सम्मान की घोषणा हुई है। इस बार यह सम्मान हृषीकेश सुलभ को दिए जाने की घोषणा हुई है। उनके नए उपन्यास ‘दाता पीर’ पर यह टिप्पणी लिखी है युवा शोधार्थी महेश कुमार ने। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास की समीक्षा आप भी पढ़ सकते हैं-
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हृषीकेश सुलभ का यह उपन्यास 2022में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। इधर एक दशक में जितने उपन्यास आए हैं उनमें ज्यादातर मुद्दे(issue) आधारित हैं। इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द जीवन और पात्र का सृजन होता है। ‘दातापीर’ में जीवन केंद्र में है और इस जीवन के आंतरिक हलचल और अतीत के स्मृतयों से मुद्दे प्रकट होते हैं। केंद्र में पीरमोहानी की झुग्गी और मुजाविर का परिवार है। बिहार के किसी झुग्गी पर लिखा गया यह पहला उपन्यास है जिसके केंद्र में वंचित मुस्लिम समुदाय है।
इस उपन्यास में उत्प्रवास, सूफ़ियाना प्रेम, संगीत की विफलता,साम्प्रदायिकता का बसाहट पर प्रभाव और मुस्लिम समुदाय में व्याप्त असमानता ऐसे तत्व हैं जिससे पीरमुहानीऔर मुजाविर के परिवार का जीवन वृत बुना गया है।
उपन्यास में प्रवेश करने का माध्यम भाषा है। इसी में औपन्यासिकता की सघनता निहित है। इस दृष्टि से अवलोकन करें तो यह उपन्यास पहली पंक्ति में ही सफल है। उपन्यास शुरू होता है इस पंक्ति से “सबकुक धुआँ-धुआँ था।” बिहार और भारत के किसी भी स्लम में सुबह प्रवेश लीजिये वह धुआँ से आच्छादित मिलेगा। बिहार में गया और पटना में कई स्लम हैं और वहाँ यह नजारा सुबह-शाम आम है। भाषा के स्तर पर स्लम का इससे बेहतर परिचय शायद ही हो। उपन्यास में जैसे-जैसे पाठक स्लम के विभिन्न पात्रों से परिचित होता जाता है उसे वहाँ जीवन के कई रंग देखने को मिलते हैं। सत्तार मियाँ धूर्त,कामी और लोलुप है तो राधे सहृदय और रसीदन के परिवार को अपना मानने वाला हिन्दू है।
यह उपन्यास उत्प्रवासियों के जीवन संघर्ष की तरह भी पढ़ना जरूरी है। झुग्गी बस्तियाँ उत्प्रवास के ही उत्पाद हैं। मेट्रोपोलिटन में उत्प्रवासी मजदूर ही तो रहते हैं झुग्गियों में। उत्प्रवास और झुग्गियों में गहरा आंतरिक संबंध है। इसलिए उपन्यासकार पीरमुहानी के हर मुस्लिम पात्र और स्त्री पात्र के उत्प्रवास की कहानी कहता है। रसीदन का खानदान मुमताज की खानदान से है। साबिर मशहूर शहनाई वादक के खानदान से है। बबिता एक अच्छे घर से है लेकिन पुरुषों के हवस के शिकार होती हुई यहाँ राधे के पास शरण पाती है। दरअसल इस उपन्यास में ‘इतिहास’ और ‘इतिहास में मौजूद फाल्ट लाइन्स’ केंद्र में है। पारिवारिक इतिहास में ‘प्रेम और विद्रोह’ केंद्र में है। दातापीर की अपनी प्रेम कहानी है। रसीदन की भी प्रेम कहानी है। उसके भाई की भी प्रेम कहानी है। यह प्रेम कहानी एकदम नई पीढ़ी अमीना और चुन्नी तक मौजूद है। जिनका प्रेम अधूरा रहा, असमानता और ऑनर किलिंग का शिकार हुआ वो प्रेम में पीर हो गए और सूफियों का रास्ता अपनाया।
अलीबख्श को मदीहा बानो का परिवार अपना नहीं सका क्योंकि वह ऊँचे खानदान का नहीं था। खानदान और घराना का संबंध इतना गहरा है कि मदीहा बानो के घर से निष्कासित होते ही उसकी शहनाई को कोई नहीं पूछता। संगीत की तरलता भी उन्हें पूरा मनुष्य नहीं बना सका। अलीबख्श का बेटा साबिर अमीना से प्यार करता है। अमीना एक मुजाविर है। साबिर भी अंततः अमीना से दूर चला जाता है। समद और ज़ूबी के प्रेम में भी खानदान बीच में आया। जूबी के पिता अपनी पत्नी से कहते हैं कि तुम बहेलिया के खानदान से हो तो तुम चुप रहो। उसके पिता अपनी इज्ज़त के नाम पर अपनी बेटी को गला दबाकर मार देते हैं। प्रेम की असफलता के बाद सूफियों के दरगाहों पर भटकना इस उपन्यास में बहुत विस्तार से आया है। समद और जूबी के प्रसंग तक आते-आते लगने लगता है कि यह पीरमोहानी के स्लम की कहानी से ज्यादा अलग-अलग व्यक्तियों का सूफ़ियाना प्रेम कहानी है। ऐसा लगता है कि उपन्यास भटक गया है। लेकिन ऐसा है नहीं। उपन्यास में प्रेम,सूफी दरगाह और उत्प्रवास आपस में गूंथे हुए हैं जिनका अंतिम शरणस्थली ‘पीरमोहानी का कब्रिस्तान’ है। प्रेम में उजड़े हुए लोगों का अंतिम बसाहट यही स्लम है और दातापीर का कब्र है। लेखक ने इन कहानियों को इतना विस्तार इसलिए दिया है कि इतिहास के उन फाल्ट लाइन्स(इज्जत,खानदान, आर्थिक ऊंच-नीच,संगीत में वर्चस्ववादी विचार आदि) को सामने लाया जा सके। इन फाल्ट लाइन्स की वजहों से किसी की हँसती खेलती जिंदगी तबाह हो जाती है और वो गरीबी और जहालत की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाते हैं। ऐसे में सूफीवाद ही वह रास्ता है जहाँ हारा हुआ व्यक्ति शांति पाता है और असमानता से संघर्ष के लिए ऊर्जा अर्जित करता है।
इतिहास का दूसरा सिरा परिवार के बाहर की घटनाओं से जुड़ता है जिसका सीधा असर रसीदन,चुन्नी, साबिर के वर्तमान जीवन पर पड़ता है। साबिर का बचपन 1992 के दंगे देखते हुए गुजरा है। उसका असर उसके व्यक्तिव पर है। रसीदन को पता है कि सारे मुसलमान मुस्लिम आबादी वाले मुहल्ले में क्यों बस रहे हैं। अतीत के दंगों से जो अविश्वास और सामाजिक दूरी बनी है उससे वह खूब परिचित है। इसलिए जब राधे उसे खस्सी खिलाने को कहता है तो वह कहती है “खिला तो दें, पर तेरा धरम चला जावेगा। पतोहू घर में घुसने न देगी।” यह इतिहास का वह फाल्ट लाइन है जिसका असर वर्तमान के हिन्दू-मुस्लिम रिश्ते पर बहुत गहरा है। राधे और रसीदन के परिवार का या मुहल्ले के साथ रसीदन का रिश्ता इतना गहरा है कि सारा मुहल्ला उसके पति को दामाद ही मानता रहा। कभी किसी ने ‘नसीरवा’ नहीं कहा। इसके बाद भी एक अप्रत्यक्ष अलगाव बना रहा जिसे रसीदन और मुहल्ले वाले सहज मानकर प्रेमिल रिश्ता निभाते रहे। लेकिन,यह रिश्ता नई पीढ़ी तक आते-आते दरक रहा है। इसलिए तो राधे को बबलू और चुन्नी के रिश्ते को लेकर नाराजगी है और वह कहता है कि आजकल हिन्दू-मुस्लिम तुरंत हो जाता है चुन्नी इसको समझ नहीं रही है। सत्तार मियाँ को चमड़े का गोदाम इसलिए भी हटाना पड़ता है क्योंकि हिंदुओं को उसका गन्ध बर्दाश्त नहीं है। गंध और मजहब का यह रिश्ता बड़ी महीन है जो उपन्यास में कहीं न कहीं इतिहास में व्यापार,धर्म और गन्ध के फाल्ट लाइन की ओर पाठक को ध्यान दिलाता है। इस तरह यह उपन्यास इतिहास के कई जटिल संस्तर को समेटे हुए चलता है जिसके लिए लेखक ने पीरमोहानी का पाठ करना चुना है। यह उपन्यास इस बात की ओर इशारा करता है कि इतिहास एकदम रैखिक और सात्यता(continuity) में नहीं होता। उसकी कई धाराएँ होती हैं (fault lines)। पीरमुहानी का यह साहित्यिक पाठ बिहार और पटना के सूफी दरगाहों और वंचित मुस्लिमों के इतिहास के अध्ययन की जरूरतों की ओर ध्यान दिलाता है।
ऐसा सिर्फ लेखक चरित्रों के माध्यम से ही नहीं भाषा के माध्यम से भी करता है।
पीरमुहानी की भाषा उसके परिवेश के अनुसार है। इसका उदाहरण साबिर के उत्प्रवास संबंधित विचार में देखा जा सकता है जब वह सोचता है कि प्रवासी पक्षी अपने समूह से बिछड़कर “चैत-वैशाख-जेठ की तपन में तड़पना और अपनी लंबी गरदन पटक-पटक कर किसी दिन मर जाना ही इसका नसीब था।” साबिर भी सोचता है वह भी अपने मूल परिवार से कटकर यहाँ जी रहा है और उसका भी यही हाल होना है। अमीना और साबिर जब कब्रिस्तान के पास एकदूसरे के करीब होते हैं उस समय की भाषा है कि दोनों के मिलने से और होंठों पर चूमने से बसंत की शुरुआत हो रही है। पीरमुहानी अशिक्षित लोगों का बसाहट है। इसलिए भाषा में जो दृश्य है,तुलना है वह वास्तविक जीवन से है। जो प्रत्यक्ष दिख रहा है उससे है। समद और जूबी शिक्षित हैं। वहाँ के परिवेश में कॉलेज,लाइब्रेरी और शायरी-ग़ज़ल की पूरी साहित्यिक दुनिया है। इसलिए उस परिवेश में मीर छाए हुए हैं। मीर की शायरी पढ़कर ही जूबी काजी के सामने विवाह करने से इनकार करती है। आज के समय में यह दिखाना भावनाओं को आहत करने जैसा है। इसे पढ़कर हो सकता है इस्लाम मानने वालों की भावनाएँ आहत हो जाए। लेखक ने मुस्लिम समाज के भेदभाव को जिस तरह दिखाया है उनपर ‘पॉलिटिकली इन करेक्ट’ होने का दोषारोपण हो सकता है। आज जब उस समुदाय पर भयानक सांस्कृतिक हमले हो रहे हैं, ऐसे में उस समाज की रूढ़ियों पर लिखना लेखकीय जोखिम है। यहाँ लेखक ‘पॉलिटिकली इन करेक्ट’ होने का जोखिम उठाते हुए ‘करेक्ट’ बात कहने की कोशिश कर रहा है। समद और जूबी के प्रेम प्रसंग में जितने लाइब्रेरी और हॉल का जिक्र है वह अनायास नहीं है। यह भूल गए इतिहास को फिर से याद दिलाने की कोशिश है। लेखक ने इसे प्रेम प्रसंग की भाषा में दर्ज किया है। लेखक यहाँ अपनी भाषा में जो उदाहरण लेता है वह साहित्य और ग़ज़ल की दुनिया से है। इसका कारण प्रेमी-प्रेमिका का शिक्षित परिवेश है।
उपन्यास में स्त्री पात्र ज्यादा जीवंत और संघर्षरत हैं। उपन्यास को पढ़ते हुए चुन्नी और बबिता ज्यादा सशक्त पात्र लगते हैं। दोनों प्रेम में विद्रोहिणी हैं,दुनिया की परवाह नहीं करती और अपने प्रेमी के साथ घर भी बसाती हैं। अमीना का चरित्र इस लिहाज से कमजोर लग सकता है। उसके चरित्र से उसके लिए पाठक के मन में दया और करुणा भर जाता है। लेकिन यदि उपन्यास के शुरुआत से उपन्यास के अंत तक ‘अमीना’ के चरित्र विकासक्रम को देखने पर सबसे ज्यादा क्रांतिकारी वही लगती है। अमीना बड़ी है,जिम्मेदार है, परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने वाली है और इन सबसे बढ़कर वह संघर्षों में जीने वाली है। वह चुन्नी की तरह माँ और भाई की जिम्मेदारी से भागकर केवल स्वयं के सुख के लिए नहीं जीना चाहती है। वह समद की तरह प्रेम में असफल होने पर पलायनवादी रास्ता भी नहीं अपनाती है। स्त्रियों के पास सूफी होने का वैसे भी कोई ज्यादा विकल्प नहीं है। पुरुष तो सूफी होकर वंदनीय हो जाता है। अमीना अपने व्यवहार में सूफी होकर जीवन के उठापटक को स्वीकार करती है। वह अपने प्रेमी को पूरी स्वतंत्रता देते हुए उसे उसकी दुनिया में जाने देती है। इस उपन्यास में वही एकमात्र चरित्र है जिसमें सूफ़ीवाद का विचार पूरी तरह विकसित हुआ है। साबिर से यह कहना कि “यह कब्रगाह है साबिर। यहाँ आने वाले सिर्फ मुरदे रुक जाते हैं। दूसरे लोग रुकने नहीं आते,वे लौट जाने के लिए ही आते हैं।” अमीना और उसकी माँ ही तो बच जाते हैं। दोनों मुर्दों की तरह ही जी रहे हैं। पीरमुहानी से हर कोई चला जाना चाहता है सिवाय माँ-बेटी के। अमीना ने मुर्दा होकर अपने चरित्र में सूफ़ियाना होती गयी। उसका चरित्र त्यागपत्र के ‘मृणाल बुआ’ की याद दिलाती है। दोनों का विद्रोह प्रत्यक्ष नहीं दिखता पर वह होता है।
साबिर इस उपन्यास का दूसरा पात्र जो इसके समानांतर है। साबिर अमीना से बिल्कुल उलट है। वह जैसे ही अपने परिवार से मिलता है,अपने प्रेम के प्रति कमजोर होता जाता है। उसके माता-पिता ने विद्रोह करके शादी किया था। संगीत ने उन्हें मनुष्य बनाया,प्रेम के लिए जीना-मरना सिखाया। साबिर उसी संगीत की दुनिया में जाकर प्रेम से दूर होता गया और वर्चस्ववादी विचार का शिकार हुए। उसका आत्मसंघर्ष उसे विद्रोही नहीं बना सका। वह जैसे-जैसे स्लम की सामूहिकता (जो बबिता में है) से दूर होता गया वैसे-वैसे उसके चरित्र का पतन होता गया। वह साबिर से साबिर अलीबख्श होकर मशहूर शहनाई वादक तो हो गया पर प्रेमी न हो सका।
उपन्यासकार ने इस पूरी प्रक्रिया को जिस भाषा में व्यक्त किया है देखिए “फजलू की साँस साबिर अलीबख्श की शहनाई से निकलते तिलक कामोद के सुर लहरियों के रुकने से पहले ही थम गई।” साबिर जो फजलू का प्रिय मित्र है। वह साबिर ‘अलीबख्श’ होते ही
दोस्त के प्रति जिम्मेदारी, प्रेमिका के प्रति समर्पण और समूह के प्रति सामूहिकता भूल गया। यहाँ साबिर के साथ ‘अलीबख्श’ उपनाम व्यक्तित्वान्तरण को दिखाने के लिए लाया गया है। यह क्रूर व्यंग्य की तरह है। यह कलाकार होने की कीमत है। दरअसल यह कला की विफलता है।
यह उपन्यास ऐसे ही उजड़ते हुए लोगों की कथा है। कोई प्रेम में उजड़कर उत्प्रवासी होकर जिया और कोई मशहूर तो हुआ पर प्रेम न पा सका। वह भूल गया कि उसे भी अंततः इसी मुजाविर के पास इसी कब्रिस्तान में आना है। यह उपन्यास इस मायने में त्रासदी से गुजर रहे मनुष्यों की कथा है,हो भी क्यों न? स्लम अपने आप में त्रासदी है।
महेश कुमार, शोधार्थी
काशी हिंदू विश्वविद्यालय, बनारस


