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  • कुछ कविताएँ कुमार अनुपम की

    कुमार अनुपम की कविताएँ समकालीन कविता में अपना एक अलग स्पेस रचती है- ‘अपने समय की शर्ट में एक्स्ट्रा बटन की तरह’. हिंदी कविताओं की अनेक धाराओं के स्वर उनकी कविताओं में दिखाई देते हैं जो उनकी एक अलग आवाज बनाते हैं. यहं उनकी कुछ कविताएँ- जानकी पुल.
    =============================================================

    अशीर्षक

    बेहया उदासी मेरी नागरिकता की रखैल
    मुझसे बेसाख्ता मज़ाक करती है
    मुझे घिन आती है और यह छद्म है
    मुझे दया आती है और यह परोपकार का भ्रम
    मुझे नशा है आदमी होने का
    यही पश्चात्ताप
    अपने समय का ज़ाहिर खिलवाड़ हूँ
    आइस-पाइस, एक्ख्खट-दुख्खट, पोशम्पा और खो-खो
    मुझे ढूँढना आसान नहीं मेरे लिए भी इतना गर्त में हूँ
    एक रेखा मुझे जला नहीं पायेगी
    मुझे कोई धकेल कर नहीं दौड़ा पायेगा चोर के ऐन पीछे
    मेरा खेल मुझे खत्म करता है
    और एक चीख़
    गूँगा बनाती है मेरे शब्दों को
    एक आत्महत्या और एक अनशन अनवरत
    मेरी सारी उम्र माँगता है
    कहाँ है मेरी ख़ुद्दारी
    मेरी इज़्ज़त मेरी वफ़ादारी
    मैं बाँकी भवों की कश्मीरियत में
    जातीयता ढूँढता हुआ अंततः मरता हूँ
    मेरी खाक़ उड़ेगी और
    संविधान की कोई इबारत
    न बनेगी
    न मिटेगी
    रंगरूट मेरे शब्दों से ज़्यादा खटकायेंगे अपने बूट
    मेरी उँगलियाँ उनकी बंदूक की नालियाँ
    साफ़ करने के
    कब तक काम आएँगी
    कुछ नहीं खाऊँगा 
    कुछ न पीयूँगा
    कुछ भी नहीं बोलूँगा
    लेकिन तब
    जब वे हमें खामोश करना बंद कर दें
    अपने समय की शर्ट के एक्स्ट्रा बटन
    से अधिक
    चाहता भी नहीं अपना उपयोग जब कि जानता हूँ
    जो टूट गया उसका कत्तई विकल्प नहीं …
    जन गण मन
    (अरुण कमल के लिए)
    एक ज़रा सी ठेस
    विध्वस्त कर सकती है
    ऐसी भुरभुरी मिट्टी की मेरी भीत
    मेरे कंधों पर गिर आया किसी
    चिड़िया का एक कातर पंख
    कई रातों की नींद उड़ा देने को काफी है
    एक आँसू भर नहीं मेरा मूल्य
    इतना क्षुद्र
    इतना एकाकी
    कि
    बँटवारे की भी नहीं बची गुंजाइश ऐसा दरिद्र
    कोई भला क्या पायेगा मुझसे
    मैं भला किसके काम आऊँगा
    चुल्लू भर पानी और प्रेम भर आशा
    गले तो गल जाय
    हक़ और न्याय के हित हड्डी और चाम
    सह लूँगा हर एक कचहरी
                                     घाम … 
    रात
    रात में ही क्यों होती है रात …क …क …कविजी
    इस प्रश्न में प्रचलित उक्ति सा उजाला है
    जितना कि  रात में होता है
    उतना ही विश्वास
    जितना कि लोक का बचा है लोकतंत्र में
    उतना ही संतोष
    जितना कि सुरक्षित है
    एक मछली की आँख में सूखती जाती नदी का स्वप्न भर
    होना तो यही चाहिए था
    कि होने की तरह ही हो होना
                                         ख़ालिश जायज़
    लेकिन शब्दों की शोभायात्रा में
    छूट ही जाता है अनचाहा अंतराल
    जिनके बीच एक नहींमुट्ठियाँ भींचे चलता दीखता है
    देख कर भी अनदेखा कर जाना
    सही बोलने की जगह चुप रह जाना
    अन्याय को देनी थी जब गाली
    कहना धन्यवाद धन्यवाद—
    घरेलू सामाजिकता का संविधान बन गया है
    हम ढाँप लेते हैं ढेरों अँधेरों पर से आँख
    हाँलाकि अँधेरा
    तब भी हमारी पलकों और दृष्टि में
    कर ही लेता है घुसपैठ
    कभी कभी
    एकांत के अपने अँधरे में
    हम देखते हैं बहुत साफ़
    कि हमने खुद को छला है अक्सर हमारी आत्मा पर
    उभर आई हैं कलंक की बहुत सारी दरारें
    तब हमारी कोई घुटती हुई हिचकी
    स्वीकारती है कि
    निष्प्रभ दिन दरअस्ल रात का अनुवाद होता गया है
    जिसकी रचना में
    हम प्राण-पण से संलग्न हैं लेकिन सार्वजनिक करते हुए
    हम छुपा लेते हैं रचनाकार का वास्तविक नाम
    और एक छद्म के शरणार्थी हो जाते हैं
    एक धिक्कार अब अक्सर
    हमारे ग़ुरूर से छिटक कर
    थोड़ा आगे चलने लगता है
    जैसे नया जूता
    कदमों से ज़रा आगे आगे चलता है

    20 thoughts on “कुछ कविताएँ कुमार अनुपम की

    1. हमेशा की तरह लाजवाब कर देने वाली कवितायेँ …….बधाई

    2. एक ज़रा सी ठेस
      विध्वस्त कर सकती है
      ऐसी भुरभुरी मिट्टी की मेरी भीत

      मेरे कंधों पर गिर आया किसी
      चिड़िया का एक कातर पंख
      कई रातों की नींद उड़ा देने को काफी है

      मेरा खेल मुझे खत्म करता है
      और एक चीख़
      गूँगा बनाती है मेरे शब्दों को

      कुमार अनुपम की ये अच्छी कवितायेँ बेहद सही वक्त पर सामने आई हैं.ये कवि के इतने भीतर से आई मालूम पड़ती हैं कि कोई छद्म इनके सामने खड़ा हो नहीं सकता. एक विश्वसनीय और लगातार बेहतर होते जा रहे कवि को पढना सुखद है. प्रकाशन के लिए आपका आभार कवि को ह्रदय से बधाई.

    3. भीतर तक धंस जाते हैं इन कविताओं के शब्द. जो बेचैनी, जो खलिश और अपने होने की जो बेकल तलाश इन कविताओं में अनुपम ने ज़ाहिर की हैं, उनकी मिलीजुली छाया में आप सुस्ता कर सांस भी ले सकते हैं, और यह सोच भी सकते हैं कि आखिर कहाँ है हमारी वाजिब जगह…

      "मैं बाँकी भवों की कश्मीरियत में
      जातीयता ढूँढता हुआ अंततः मरता हूँ
      मेरी खाक़ उड़ेगी और
      संविधान की कोई इबारत
      न बनेगी
      न मिटेगी
      रंगरूट मेरे शब्दों से ज़्यादा खटकायेंगे अपने बूट
      मेरी उँगलियाँ उनकी बंदूक की नालियाँ
      साफ़ करने के
      कब तक काम आएँगी"

      लिखते रहो अनुपम …..

    4. सुंदर कविताएं, सराहनीय प्रस्तुति………. बधाई अनुपम और प्रभात जी दोनों को।

    5. अनुपम जी, वाकई अच्छी कविताएं हैं। आपका और प्रभात रंजन का धन्यवाद सुबह अच्छी करने के लिए।

    6. सभी कविताएँ अच्छी लगीं पर मेहंदीरत्ता के लिए(पर्यन्त ) ,कहानी और जन गण मन,सूत्र कमाल की हैं .कवि को बहुत दिनों बाद इधर अंतरजाल पर पढ़ा .शुभकामनाएँ .

    7. Pingback: Bubble Tea

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    कुमार अनुपम की कविताएँ समकालीन कविता में अपना एक अलग स्पेस रचती है- \’अपने समय की शर्ट में एक्स्ट्रा बटन की तरह\’. हिंदी कविताओं की अनेक धाराओं के स्वर उनकी कविताओं में दिखाई देते हैं जो उनकी एक अलग आवाज बनाते हैं. यहं उनकी कुछ कविताएँ- जानकी पुल.
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    अशीर्षक

    बेहया उदासी मेरी नागरिकता की रखैल
    मुझसे बेसाख्ता मज़ाक करती है
    मुझे घिन आती है और यह छद्म है
    मुझे दया आती है और यह परोपकार का भ्रम
    मुझे नशा है आदमी होने का
    यही पश्चात्ताप
    अपने समय का ज़ाहिर खिलवाड़ हूँ
    आइस-पाइस, एक्ख्खट-दुख्खट, पोशम्पा और खो-खो
    मुझे ढूँढना आसान नहीं मेरे लिए भी इतना गर्त में हूँ
    एक रेखा मुझे जला नहीं पायेगी
    मुझे कोई धकेल कर नहीं दौड़ा पायेगा चोर के ऐन पीछे
    मेरा खेल मुझे खत्म करता है
    और एक चीख़
    गूँगा बनाती है मेरे शब्दों को
    एक आत्महत्या और एक अनशन अनवरत
    मेरी सारी उम्र माँगता है
    कहाँ है मेरी ख़ुद्दारी
    मेरी इज़्ज़त मेरी वफ़ादारी
    मैं बाँकी भवों की कश्मीरियत में
    जातीयता ढूँढता हुआ अंततः मरता हूँ
    मेरी खाक़ उड़ेगी और
    संविधान की कोई इबारत
    न बनेगी
    न मिटेगी
    रंगरूट मेरे शब्दों से ज़्यादा खटकायेंगे अपने बूट
    मेरी उँगलियाँ उनकी बंदूक की नालियाँ
    साफ़ करने के
    कब तक काम आएँगी
    कुछ नहीं खाऊँगा 
    कुछ न पीयूँगा
    कुछ भी नहीं बोलूँगा
    लेकिन तब
    जब वे हमें खामोश करना बंद कर दें
    अपने समय की शर्ट के एक्स्ट्रा बटन < o:p>
    से अधिक
    चाहता भी नहीं अपना उपयोग जब कि जानता हूँ
    जो टूट गया उसका कत्तई विकल्प नहीं …
    जन गण मन
    (अरुण कमल के लिए)
    एक ज़रा सी ठेस
    विध्वस्त कर सकती है
    ऐसी भुरभुरी मिट्टी की मेरी भीत
    मेरे कंधों पर गिर आया किसी
    चिड़िया का एक कातर पंख
    कई रातों की नींद उड़ा देने को काफी है
    एक आँसू भर नहीं मेरा मूल्य
    इतना क्षुद्र
    इतना एकाकी
    कि
    बँटवारे की भी नहीं बची गुंजाइश ऐसा दरिद्र
    कोई भला क्या पायेगा मुझसे
    मैं भला किसके काम आऊँगा
    चुल्लू भर पानी और प्रेम भर आशा
    गले तो गल जाय
    हक़ और न्याय के हित हड्डी और चाम
    सह लूँगा हर एक कचहरी
                                     घाम … 
    रात
    रात में ही क्यों होती है रात …क …क …कविजी
    इस प्रश्न में प्रचलित उक्ति सा उजाला है
    जितना कि  रात में होता है
    उतना ही विश्वास
    जितना कि लोक का बचा है लोकतंत्र में
    उतना ही संतोष
    जितना कि सुरक्षित है
    एक मछली की आँख में सूखती जाती नदी का स्वप्न भर
    होना तो यही चाहिए था
    कि होने की तरह ही हो होना
                                         ख़ालिश जायज़
    लेकिन शब्दों की शोभायात्रा में
    छूट ही जाता है अनचाहा अंतराल
    जिनके बीच एक \’नहीं\’ मुट्ठियाँ भींचे चलता दीखता है
    देख कर भी अनदेखा कर जाना
    सही बोलने की जगह चुप रह जाना
    अन्याय को देनी थी जब गाली
    कहना धन्यवाद धन्यवाद—
    घरेलू सामाजिकता का संविधान बन गया है
    हम ढाँप लेते हैं ढेरों अँधेरों पर से आँख
    हाँलाकि अँधेरा
    तब भी हमारी पलकों और दृष्टि में
    कर ही लेता है घुसपैठ
    कभी कभी
    एकांत के अपने अँधरे में
    हम देखते हैं बहुत साफ़
    कि हमने खुद को छला है अक्सर हमारी आत्मा पर
    उभर आई हैं कलंक की बहुत सारी दरारें
    तब हमारी कोई घुटती हुई हिचकी
    स्वीकारती है कि
    निष्प्रभ दिन दरअस्ल रात का अनुवाद होता गया है
    जिसकी रचना में
    हम प्राण-पण से संलग्न हैं लेकिन सार्वजनिक करते हुए
    हम छुपा लेते हैं रचनाकार का वास्तविक नाम
    और एक छद्म के शरणार्थी हो जाते हैं
    एक धिक्कार अब अक्सर
    हमारे ग़ुरूर से छिटक कर
    थोड़ा आगे चलने लगता है
    जैसे नया जूता
    कदमों से ज़रा आगे आगे चलता है

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    कुमार अनुपम की कविताएँ समकालीन कविता में अपना एक अलग स्पेस रचती है- \’अपने समय की शर्ट में एक्स्ट्रा बटन की तरह\’. हिंदी कविताओं की अनेक धाराओं के स्वर उनकी कविताओं में दिखाई देते हैं जो उनकी एक अलग आवाज बनाते हैं. यहं उनकी कुछ कविताएँ- जानकी पुल.
    =============================================================

    अशीर्षक

    बेहया उदासी मेरी नागरिकता की रखैल
    मुझसे बेसाख्ता मज़ाक करती है
    मुझे घिन आती है और यह छद्म है
    मुझे दया आती है और यह परोपकार का भ्रम
    मुझे नशा है आदमी होने का
    यही पश्चात्ताप
    अपने समय का ज़ाहिर खिलवाड़ हूँ
    आइस-पाइस, एक्ख्खट-दुख्खट, पोशम्पा और खो-खो
    मुझे ढूँढना आसान नहीं मेरे लिए भी इतना गर्त में हूँ
    एक रेखा मुझे जला नहीं पायेगी
    मुझे कोई धकेल कर नहीं दौड़ा पायेगा चोर के ऐन पीछे
    मेरा खेल मुझे खत्म करता है
    और एक चीख़
    गूँगा बनाती है मेरे शब्दों को
    एक आत्महत्या और एक अनशन अनवरत
    मेरी सारी उम्र माँगता है
    कहाँ है मेरी ख़ुद्दारी
    मेरी इज़्ज़त मेरी वफ़ादारी
    मैं बाँकी भवों की कश्मीरियत में
    जातीयता ढूँढता हुआ अंततः मरता हूँ
    मेरी खाक़ उड़ेगी और
    संविधान की कोई इबारत
    न बनेगी
    न मिटेगी
    रंगरूट मेरे शब्दों से ज़्यादा खटकायेंगे अपने बूट
    मेरी उँगलियाँ उनकी बंदूक की नालियाँ
    साफ़ करने के
    कब तक काम आएँगी
    कुछ नहीं खाऊँगा 
    कुछ न पीयूँगा
    कुछ भी नहीं बोलूँगा
    लेकिन तब
    जब वे हमें खामोश करना बंद कर दें
    अपने समय की शर्ट के एक्स्ट्रा बटन < o:p>
    से अधिक
    चाहता भी नहीं अपना उपयोग जब कि जानता हूँ
    जो टूट गया उसका कत्तई विकल्प नहीं …
    जन गण मन
    (अरुण कमल के लिए)
    एक ज़रा सी ठेस
    विध्वस्त कर सकती है
    ऐसी भुरभुरी मिट्टी की मेरी भीत
    मेरे कंधों पर गिर आया किसी
    चिड़िया का एक कातर पंख
    कई रातों की नींद उड़ा देने को काफी है
    एक आँसू भर नहीं मेरा मूल्य
    इतना क्षुद्र
    इतना एकाकी
    कि
    बँटवारे की भी नहीं बची गुंजाइश ऐसा दरिद्र
    कोई भला क्या पायेगा मुझसे
    मैं भला किसके काम आऊँगा
    चुल्लू भर पानी और प्रेम भर आशा
    गले तो गल जाय
    हक़ और न्याय के हित हड्डी और चाम
    सह लूँगा हर एक कचहरी
                                     घाम … 
    रात
    रात में ही क्यों होती है रात …क …क …कविजी
    इस प्रश्न में प्रचलित उक्ति सा उजाला है
    जितना कि  रात में होता है
    उतना ही विश्वास
    जितना कि लोक का बचा है लोकतंत्र में
    उतना ही संतोष
    जितना कि सुरक्षित है
    एक मछली की आँख में सूखती जाती नदी का स्वप्न भर
    होना तो यही चाहिए था
    कि होने की तरह ही हो होना
                                         ख़ालिश जायज़
    लेकिन शब्दों की शोभायात्रा में
    छूट ही जाता है अनचाहा अंतराल
    जिनके बीच एक \’नहीं\’ मुट्ठियाँ भींचे चलता दीखता है
    देख कर भी अनदेखा कर जाना
    सही बोलने की जगह चुप रह जाना
    अन्याय को देनी थी जब गाली
    कहना धन्यवाद धन्यवाद—
    घरेलू सामाजिकता का संविधान बन गया है
    हम ढाँप लेते हैं ढेरों अँधेरों पर से आँख
    हाँलाकि अँधेरा
    तब भी हमारी पलकों और दृष्टि में
    कर ही लेता है घुसपैठ
    कभी कभी
    एकांत के अपने अँधरे में
    हम देखते हैं बहुत साफ़
    कि हमने खुद को छला है अक्सर हमारी आत्मा पर
    उभर आई हैं कलंक की बहुत सारी दरारें
    तब हमारी कोई घुटती हुई हिचकी
    स्वीकारती है कि
    निष्प्रभ दिन दरअस्ल रात का अनुवाद होता गया है
    जिसकी रचना में
    हम प्राण-पण से संलग्न हैं लेकिन सार्वजनिक करते हुए
    हम छुपा लेते हैं रचनाकार का वास्तविक नाम
    और एक छद्म के शरणार्थी हो जाते हैं
    एक धिक्कार अब अक्सर
    हमारे ग़ुरूर से छिटक कर
    थोड़ा आगे चलने लगता है
    जैसे नया जूता
    कदमों से ज़रा आगे आगे चलता है

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