हिंदी व्यंग्य में ताजा हवा का झोंका है ‘मदारीपुर जंक्शन’

बालेन्दु द्विवेदी के उपन्यास ‘मदारीपुर जंक्शन’ की आजकल बहुत चर्चा है. वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास की एक सुघड़ समीक्षा लिखी है युवा लेखक पंकज कौरव ने- मॉडरेटर

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व्यंग्य पढ़ने सुनने में कितना भी आसान क्यों न लगे पर उसे साधना इतना भी आसान नहीं. ज्यादातर व्यंग्य रचनाओं में सार्काज़म् कब दबे पांव आकर सटायर के सिर पर सवार हो जाता है पता ही नहीं चलता. शायद यही वजह है कि पत्र-पत्रिकाओं में भरभर के व्यंग्य छपते जाने के बावजूद हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल और मनोहर श्याम जोशी जैसे कई दिग्गज नामों वाली व्यंग्य लेखन की परंपरा में पिछले कुछ वर्षों में न ढंग की व्यंग्य रचनाएं दर्ज हुई हैं और न ही कुछ ख़ास व्यंग्यकार. दरअसल व्यंग्य की प्रचुरता का आभास देने वाले समय में इस विधा की हालत ‘मदारीपुर जंक्शन’ में चित्रित एक चबूतरे जैसी हो चली है. उपन्यास में उसका वर्णन कुछ इस तरह है-

‘वृक्ष के इर्द-गिर्द ईंट के टुकड़ों से कुछ अस्थायी चबूतरे भी बनाए गये थे, जो संभवत: एक विशेष मास में आयोजित होने वाले त्योहार के समय छठ-पूजने और बाक़ी के महीनों में आवारा देशी कुत्तों द्वारा टांग उठाकर मूतने के काम आते होंगे.’

खैर व्यंग्य विधा की हालत जो है सो है. इसकी एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि पन्ने दो पन्ने के लेख से भला किसी व्यंग्यकार का कोई मूल्यांकन हो भी कैसे सकता है? तो तकरीबन ढाई सौ पेज के अपने पहले ही उपन्यास ‘मदारीपुर जंक्शन’ के साथ बालेन्दु द्विवेदी पाठकों के सामने हैं. व्यंग्य की वर्तमान स्थिति से साम्य बनाए रखते हुए बगैर किसी ज्यादा अपेक्षा के ‘मदारीपुर जंक्शन’ का पाठ शुरू किया था. लेकिन अनुभव चौकाने वाले रहे.

पहले पहल तो यह विश्वास कर पाना कठिन हो जाता है कि ‘मदारीपुर जंक्शन’ बालेन्दु द्विवेदी का पहला ही उपन्यास है. भाषा, प्रवाह और कथाशिल्प में वे नये लेखक कहीं से भी नहीं लगते. उन्होंने एक काल्पनिक कस्बेनुमा हो चले गांव का ऐसा चित्रण किया है जो पूरे भारत में कहीं भी महसूस किया जा सकता है. हर उस जगह जहां जातीय और वर्ग भेद की अदृश्य रेखाएं समाज के बीच खाई बनाती आयी हैं. पढ़ने वाला अगर उत्तर भारत के किसी गांव से परिचित रहा हो तब तो कहने ही क्या, उपन्यास सीधे और सहज ढंग से मन की गहराइयों में उतरता चला जाता है.

मूलत: यह उपन्यास मदारीपुर के प्रधान पद के दो दावेदार, छेदी बाबू और बैरागी बाबू के टसल की थोड़ी जटिल लेकिन मज़ेदार कथा है. जाहिर है प्रतिद्वंदी हैं तो दोनों के बीच बैर भी होगा. शत्रुता है भी पर सहज नहीं. छेदी बाबू और बैरागी बाबू दूर के रिश्ते में काका-भतीजा और बचपन के लंगोटिया यार रहे हैं. एक चवन्नी पट्टी से आते हैं तो दूसरे अठन्नी पट्टी के सबसे कद्दावर नेता हैं. अपनी-अपनी बखरी के ख़ास बंगले में दोनों के अपने अपने स्थायी दरबार हैं और दरबारी भी. कुछ एक थाली के बैंगन भी हैं जो दोनों दरबारों में वक्त-बेवक्त जरूरत पड़ने पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहते हैं. इन दो महाशक्तियों के अलावा और समानांतर ‘मदारीपुर जंक्शन’ में एक तीसरी दुनिया भी है. जो सचमुच की तीसरी दुनिया की तरह उपेक्षित और शोषित है. कुछ महाशक्तियों की ही तरह अगर चवन्नी और अठन्नी पट्टी को पृथ्वी का केन्द्र मान लिया जाये तो हरिजन टोली और केवटोली तीसरी और चौथी दुनिया के देशों के तरह मदारीपुर के किनारों पर छितरे पड़े नज़र आते हैं.

छेदी बाबू और बैरागी बाबू के बीच पुश्तैनी दुश्मनी वाले टकराव की कहानी में असली अंतर्विरोध तब पैदा होता है जब छेदी बाबू हरिजन टोली से चइता को अपना संरक्षण देकर प्रधान पद के लिए चुनाव के मैदान में उतार देते हैं. पहले चइता और बाद में उसकी बीवी मेघिया के विद्रोही स्वर ही इस उपन्यास की केन्द्रीय विषयवस्तु हैं.

उपन्यास की शुरूआत भालू बाबा के एक रसिया प्रसंग से होती है. छेदी बाबू के संरक्षण वाला शिवालय भालू बाबा का ठियां है और पास के तालाब में स्नान करती महिलाओं को नित्य देखना उनकी दिनचर्या का ज़रूरी हिस्सा. इसी क्रम में भालू बाबा से एक ऐसी भूल हो जाती है जो कहानी को एक दिशा दे जाती है. अगले प्रसंग में मदारीपुर में आयी मीडिया की टीम को शुरूआत में नसबंदी करने वाली टीम समझने की गफलत भी आजकल के अफवाह कल्चर पर सटीक कटाक्ष है. एक के बाद एक कई रोचक प्रसंग और बालेन्दु की दिलचस्प किस्सागोई इस उपन्यास को रोचक बनाती चलती है. नतीजा पाठक मदारीपुर जंक्शन की विराट और सर्वथा प्रासंगिक कथा यात्रा में अचानक खुदको जकड़ा हुआ पाता है. इसके अलावा शुरूआत में ही लेखक की खुद एक ब्राह्मण होने की घोषणा उपन्यास पढ़ते हुए बार बार मुंह चिढ़ाती है.

आत्मकथ्य में लेखक की ब्राह्मण कुल में जन्म लेने की स्वीकारोक्ति भले किसी को गैर-जरूरी लगे लेकिन इस उपन्यास में बालेन्दु द्विवेदी ने जिस तरह ब्राह्मणवाद की ख़बर ली है, उस वजह से खुद को शुरूआत में ही ब्राह्मण बताकर चेताना न सिर्फ जरूरी हो जाता है बल्कि अब उपन्यास पढ़ने के बाद यह कहना ज्यादा सही लग रहा है कि अगर लेखक ने ब्राह्मण कुल में जन्म न लिया होता और हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर की पढ़ाई से भी पहले दर्शनशात्र के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम को घोंटकर न पिया होता तो शायद ब्राह्मणवाद की खोखली जड़ों की ऐसी सटीक पहचान कभी नहीं हो पाती. तब यह उपन्यास वाकई काफी कुछ अधूरापन लिये छूट जाता. कहा जा सकता है कि ‘मदारीपुर जंक्शन’ व्यंग्य विधा में लंबे समय से अपेक्षित उपन्यास है. इसे पढ़ते हुए पाठक न सिर्फ हिन्दी साहित्य की समृद्ध व्यंग्य लेखन परंपरा से जुड़ा हुआ महसूस करेंगे बल्कि भारतीय समाज की मूल अवधारणा, जो अब भी गांवों में ही बसती है, उसका अता पता भी उन्हें मिल पाएगा. हालांकि उपन्यास का अंत पाठकों को चौंका सकता है क्योंकि थोड़ी-थोड़ी देर में गुदगुदाती जाती यह सुखांत कथा आखिर में एक नाटकीय लेकिन मार्मिक अंत के साथ पाठक को स्तब्ध कर जाती है.

अंत में सिर्फ इतना ही कि ‘मदारीपुर जंक्शन’ के माथे पर अशोक चक्रधर ने यह जो ‘अत्यंत पठनीय उपन्यास’ का लेबल लगा दिया है, वह किसी स्वदेशी प्रचारक बाबा के उत्पादों की तरह भ्रामक नहीं है. आप अशोक चक्रधर के इस कथन पर भरोसा कर सकते हैं…

उपन्यास – मदारीपुर जंक्शन

विधा – व्यंग्य

प्रकाशक – वाणी प्रकाशन, दरियागंज, दिल्ली

मूल्य – 250 रूपये (पेपरबैक) 495 (सजिल्द)

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