रितुपर्णो घोष की फ़िल्म ‘शुभो मुहूर्त’ पर विजय शर्मा का लेख

रितुपर्णो घोष की फ़िल्में उपन्यास की तरह होती हैं। किसी क्लासिक उपन्यास की तरह बार बार थोड़ा-बहुत देखने लायक़। ‘शुभो मुहूर्त’ तो अगाथा क्रिश्टी के उपन्यास पर आधारित है और रितुपर्णो द्वारा निर्देशित एकमात्र मर्डर मिस्ट्री है। इस फ़िल्म पर विजय शर्मा का लेख पढ़िए। यह उनकी आगामी किताब का हिस्सा है- मॉडरेटर

======================

शुभ मुहूर्त: मर्डर मिस्ट्री

विजय शर्मा

मर्डर मिस्ट्री ऋतुपर्ण घोष का क्षेत्र नहीं था लेकिन उन्होंने सदा अपने कम्फ़र्ट ज़ोन से बाहर निकल कर काम किया है। वैसे वे अपने कम्फ़र्ट ज़ोन से पूरी तरह बाहर गए भी नहीं हैं, क्योंकि इस फ़िल्म में भी वे स्त्रियों को केंद्र में रख कर फ़िल्म बना रहे हैं और इस विषय में वे निष्णात हैं। स्त्री और उसके दूसरे लोगों से रिश्तों को परिभाषित करने में फ़िल्म निर्देशक ऋतुपर्ण घोष कुशल हैं। अपनी 2003 की फ़िल्म ‘शुभ मुहूर्त’ में भी वे यही कर रहे हैं। हालाँकि इस फ़िल्म की कहानी उन्होंने किसी भारतीय साहित्य से नहीं ली है। न ही उनकी अपनी लिखी कहानी है। हाँ, उन्होंने कहानी का पुनर्लेखन किया है और इसमें वे पूरी तरह सफ़ल भी रहे हैं। इसमें उन्होंने कहानी उठाई है, एक समय की प्रसिद्ध मर्डर मिस्ट्री लेखिका अगाथा क्रिस्टी की और उसे पूरी तरह से भारतीय या यूँ कहें बंगाली जामा पहना दिया है। हालाँकि वे अगाथा क्रिस्टी का नाम कहीं नहीं देते हैं, लेकिन फ़िल्म को उनके गढ़े एक चरित्र ‘मिस मेपल’ को समर्पित करते हैं। अगाथा क्रिस्टी की कहानी पर स्क्रिप्ट तैयार करना आसान काम नहीं है, मगर यह काम घोष ने बड़े सलीके से किया है।

अब जिन्होंने अगाथा क्रिस्टी को पढ़ा या उनके काम पर बनी फ़िल्में देखी हैं उन्हें तो ‘शुभ मुहूर्त’ का पूरा रहस्य और हत्यारा फ़िल्म की शुरुआत में ही मिल जाएगा क्योंकि यह फ़िल्म अगाथा के ‘द मिरर क्रैक्ड फ़्रॉम साइड टू साइड’ का बाँग्ला संस्करण है। फ़िर भी फ़िल्म देखने का मजा किरकिरा नहीं होता है क्योंकि एक तो खूबसूरत लोगों ने इसमें अभिनय किया है, दूसरे इसके डॉयलॉग आपको बाँधे रखते हैं। जब पूछा जाता है, ‘क्या हम एक साथ दो लोगों को प्यार नहीं कर सकते हैं?’ तो दर्शक सोचने-विचारने पर मजबूर हो जाता है। और इस फ़िल्म में आकर्षित करता है बंगाल के उच्च-मध्यम वर्ग का रहन-सहन, उनका पहनावा, उनका शृंगार, केश-विन्यास, वैसे यह ऋतुपर्ण का हॉलमार्क है। फ़िल्म किसने हत्या की है, से अधिक हत्या क्यों की गई है, पर केंद्रित रहती है। अपराध को मनोवैज्ञानिक रुख दिया गया है, जो अगाथा क्रिस्टी की भी विशेषता है।

ऋतुपर्ण घोष की अभिनेत्रियाँ बंगाल की खूबसूरत साडियाँ बड़े सलीके से पहनती हैं और यहाँ तो टॉप ग्रेड की हिरोइने हैं। एक ओर राखी गुलजार है तो दूसरी ओर शर्मिला टैगोर। दोनों बाँग्ला और बॉलीवुड की खूब प्रसिद्ध और मंजी हुई अभिनेत्रियाँ हैं। और तीसरी युवती है मल्लिका सेन (नंदिता दास) मगर वह बंगाली स्टाइल के नहीं आधुनिक लड़की, बिंदास पत्रकार के कपड़े पहनती है, यानि जीन्स-टॉप पहनती है और हाँ, सिगरेट भी फ़ूँकती है। शुरु में बाथरूम में छिप कर लेकिन अपनी रंगापीसीमाँ (राखी गुलजार) की नजरों से नहीं बच पाती है। मिस मैपल की भूमिका में पीसीमाँ अपनी पत्रकार भतीजी से कहती हैं, ‘बाथरूम के बाहर सिगरेट पीयो लेकिन कम और हाँ, मुझे भी एकाध पकड़ा दिया करो।’ फ़िल्म में पीसीमाँ को विधवा, कोमल, मधुर बोलने वाली लेकिन कुशाग्र बुद्धि दिखाया गया है, जो अपनी सफ़ेद साड़ी में भव्य लगती है और अपनी ढ़ेर सारी बिल्लियों के साथ रहती है। वह टिपिकल बंगाली विधवा लाचार बुआ नहीं है। उसके आँख-कान-नाक खूब सजग हैं। भतीजी अपनी बुआ से अपने पत्रकार जीवन की बातें बताती है और उन्हीं से टुकड़े-टुकड़े जोड़ कर बुआ हत्या के रहस्य का पर्दाफ़ाश करती है।

दूसरी ओर उम्र दराज, एक समय की नामी-गिरामी अभिनेत्री है। आधुनिक उच्च वर्ग की, विदेश पलट पद्मिनी चौधुरी (शर्मिला टैगोर)। वह काफ़ी समय बाद विदेश से लौटी है, एक फ़िल्म को प्रड्यूस करने के लिए। पद्मिनी यह फ़िल्म अपने पति संबित राय (सुमंत मुखर्जी) से निर्देशित करवा रही है। पति जो प्रतिभाशाली है मगर कभी सफ़ल नहीं हो सका है। पद्मिनी खूबसूरत है, घर-बाहर दोनों स्थानो पर सुरूचिपूर्ण कपड़े पहनती है। उसकी बाकी साज-सज्जा कपड़ों और मौके के अनुरूप होती है।

अधिकाँश लोगों का जीवन बड़ा विचित्र होता है। सफ़लता के साथ संतोष नहीं आता है, महत्वाकांक्षाएँ पीछा नहीं छोड़ती हैं। जीवन में संत्रास बना ही रहता है। ‘शुभ मुहूर्त’ इन्हीं बातों से जुड़ी फ़िल्म है। ऊँचाई पर पहुँची अभिनेत्री पद्मिनी परिवार में रह रही थी मगर परिवार से उसे वह कुछ नहीं मिल रहा है जो वह चाहती थी। जब वह ‘प्राणेर प्रदीप’ फ़िल्म में कार्य कर रही थी उसका झुकाव फ़िल्म के युवा निर्देशक संबित राय की ओर हो जाता है और वह उससे विवाह करती है। गर्भवती होती है, गर्भावस्था में उसका संसर्ग एक संक्रामक रोगी से होता है, फ़लस्वरूप उसका बच्चा मानसिक रूप से विकलांग पैदा होता है, जो 16 साल जीवित रह कर मर जाता है। बेटे की मृत्यु से व्यथित पद्मिनी तलाक ले कर विदेश चली जाती है और अब कई वर्षों के बाद वह फ़िल्म प्रड्यूस करने भारत लौटी है। क्या वह सिर्फ़ फ़िल्म प्रड्यूस करने लौटी है या उसका कोई हिडेन एजेंडा भी है?

फ़िल्म शूटिंग के प्रारंभ में जो शॉट लिया जाता है वह मुहूर्त शॉट कहा जाता है और इसे ही बाँग्ला में ‘शुभ मुहूर्त’ नाम से फ़िल्माया गया है। अधिकतर यह पहला शॉट खूब उत्सव, ताम-झाम और समारोह के साथ किया जाता है। फ़िल्म में ऋतुपर्ण घोष भी इसे बड़े फ़ैन-फ़ेयर के साथ फ़िल्माते हैं। इस दृश्य में सेट पर अभिनेता सौमित्र चैटर्जी, शुभेंदु चैटर्जी, माधबी मुखर्जी, निर्देशक गौतम घोष जैसी हस्तियाँ सशरीर मौजूद  हैं, खूब फ़ोटो क्लिक किए जा रहे हैं। इस समारोह की स्टिल फ़ोटोग्राफ़ी को मुख्य रूप से शुभंकर चौधुरी (अनिन्द्य चैटर्जी) अंजाम दे रहा है, बीच में प्रमुख लोगों का एक फ़ोटो लेने गौतम घोष भी आ जाते हैं। पत्रिका की ओर से इवेंट कवर करने मल्लिका भी आई हुई है। खूब हँसी-खुशी के बीच मुहूर्त सम्पन्न होता है। पद्मिनी ने इस फ़िल्म के लिए स्वयं अभिनेत्री चुनी है। इस फ़िल्म की होरोइन है, काकोली सिन्हा (कल्याणी मंडल)। हालाँकि अभिनेत्री बहुत नर्वस है, बाद में पता चलता है कि वह ड्रग एडिक्ट है। मल्लिका काकोली का इंटरव्यू लेना चाहती है। काकोली की तबियत खराब है, अत: काकोली मल्लिका को अपने साथ कार में अपने घर ले आती है।

कार में प्रारंभ हुआ इंटरव्यू हिरोइन के घर में भी जारी रहता है, लेकिन अचानक मुँह से झाग फ़ेंकती हुई काकोली मर जाती है। वह ड्रग से नहीं मरी है। उसकी हत्या हुई है। चूँकि उस समय काकोली के पास केवल मल्लिका ही थी अत: वह भी हत्या की जाँच-पड़ताल की चपेट में आ जाती है। एक ओर फ़िल्मी दुनिया के लोग, दूसरी ओर पुलिस, बीच में मौत और इन सबके बीच युवा पत्रकार। फ़िल्म दिखाती है अतीत में कई लोगों के कई लोगों के साथ प्रेम प्रसंग हैं, लेकिन वर्तमान में इसी बीच मल्लिका को दो लोग अपना दिल दे बैठते हैं। फ़्रीलांस फ़ोटोग्राफ़र शुभंकर चौधुरी और पड़ताल कर रहे आईपीएस ऑफ़ीसर अरिंदम चैटर्जी (तोता राय चौधुरी) दोनों को मल्लिका भा जाती है। मल्लिका का झुकाव भी आईपीएस ऑफ़ीसर अरिंदम चैटर्जी की ओर हो जाता है, जबकि इंट्रोवर्ट शुभंकर उसका प्रेम पाने के अपने तई बहुत उपाय करता है। शुभंकर पद्मिनी का रिश्तेदार भी है। रंगापीसीमाँ शुभंकर की खूब आवभगत करती है लेकिन स्वार्थवश। रंगापीसीमाँ भतीजी से उसकी शादी के लिए उसका लाड़-प्यार नहीं करती है, वह उससे हत्या का रहस्य सुलझाने के लिए सूत्र प्राप्त करने के लिए ऐसा करती है। और वह इसमें सफ़ल रहती भी है।

‘शुभ मुहूर्त’ फ़िल्म है प्रेम, प्रतिकार, ब्लैकमेलिंग, श्याम-अतीत, पश्चाताप, रहस्य और हत्या की गुत्थियाँ हैं। यह फ़िल्म है स्मृतियों की, रिश्तों की, रिश्तों के उलझाव की, उन्हें सुलझाने की। स्मृतियाँ सदैव मधुर नहीं होती हैं। कटु स्मृतियाँ प्रतिकार के लिए उकसाती हैं, अपराध करवाती हैं। कटु स्मृतियों और प्रतिकार के लिए किए गए अपराध की फ़िल्म है, ‘शुभ मुहूर्त’।

फ़िल्म में हत्या, रहस्य, प्रेम के समानांतर एक प्रेम कथा और चलती है, हेयर ड्रेसर तथा असिस्टेंट कैमरामैन के बीच। एक समय इनके बीच प्रेम था मगर अब हेयरड्रेसर मुसीबत में है और वह कैमरामैन से रुपए ऐंठती रहती है। अभिनेत्री की हत्या की सुई कई पात्रों पर घूमती रहती है। फ़िल्म निर्देशक संबित का भी अतीत है, इस अतीत का गवाह एक अभिनेता है, जिसे फ़िल्म से निकाल दिया गया था और आजकल वह फ़िल्म युनिट के लिए कैटरिंग सर्विस का काम करता है। क्या वह राज का भंडाफ़ोड़ करेगा? शक के घेरे में काकोली का पति भी है। हत्या किसने की है यह रहस्य खोल लर मैं आपका नुकसान नहीं करना चाहती हूँ। उत्तर के लिए फ़िल्म खुद देखनी होगी।

ऋतुपर्ण घोष ने यह फ़िल्म बना कर उन स्त्रियों को अपनी आदरांजलि दी है, जो घर के भीतर रह कर दिन-रात परिवार की देखभाल करती हैं। उन्हीं की कर्तव्यपरायणता के फ़लस्वरूप घर के सदस्यों को समय पर भोजन मिलता है। असल में ऐसी स्त्रियाँ समाज को मजबूती प्रदान करती हैं। अक्सर उनकी लगन, उनके कार्य, कर्तव्य परायणता, बुद्धिमता, उनके बलिदान की चर्चा नहीं होती है।

ऋतुपर्ण घोष की कई अन्य फ़िल्मों के भाँति इस फ़िल्म में भी रबींद्र संगीत है। इस फ़िल्म में कवि के एक गीत को अनिन्द्य चट्टोपाध्याय ने भी गाया है। अनिन्द्य बाँग्ला रॉक बैंड ‘चंद्रबिंदु’ के गायक हैं। इतना ही नहीं उन्होंने फ़िल्म में अभिनय भी किया है। इस फ़िल्म का म्युजिक देबज्योति मिश्र का है।

इस फ़िल्म का स्क्रीनप्ले ऋतुपर्ण घोष ने देबब्रत दत्ता के साथ मिल कर तैयार किया है। कहानी का इंग्लिश ट्रान्सलेशन सुदेशना बंधोपाध्याय का है। फ़िल्म के संवाद चुस्त-दुरुस्त हैं, बिना बड़बोलेपन के। हास्य-व्यंग्य, कटाक्ष, हल्के-फ़ुल्के संवाद दर्शक को भाते हैं। एडीटिंग अर्घ कमल मित्रा ने की है। अवीक मुखोपाध्याय का कैमरा बारीकी से घटनाओं तथा अभिनेताओं के मनोभावों को पकड़ता है। कौशिक सरकार का आर्ट डेकोरेशन कहानी के अनुरूप है। 150 मिनट की इस फ़िल्म को 2003 का सर्वोत्तम बंगाली फ़ीचर फ़िल्म का नेशनल अवार्ड मिला था। साथ ही राखी गुलजार को सर्वोत्तम सहायक अभिनेत्री का नेशनल अवार्ड मिला भी था। फ़िल्म ‘शुभ मुहुर्त’ को देखा जाना चाहिए।

000

डॉ विजय शर्मा, 326, न्यू सीताराम डेरा, एग्रीको, जमशेदपुर – 831009

Mo. 8789001919, 9430381718  Email : vijshain@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 mins
WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify Master Slider jQuery Slider Plugin WPBookit – Group Booking (Addon) Ninja Forms Google Spreadsheet Addon Discount by Total Cart Value for WooCommerce Infobox for WPBakery Page Builder (Formerly Visual Composer) Social Wall Addon for UserPro AI ChatBot for Automated Live Chat Support Christmas Rain – WordPress Plugin BBOOTS – Mini CMS system for phpBB MP3 Sticky Player WordPress & WooCommerce Plugin