अनघ शर्मा की कहानी ‘हिज्र के दोनों ओर खड़ा है एक पेड़ हरा’

युवा लेखक अनघ शर्मा किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनका कहानी संग्रह ‘धूप की मुँडेर’ राजकमल से प्रकाशित हुआ है और उसकी अच्छी चर्चा हुई है। यह उनकी नई कहानी है-

=====

1

जाने किन अनदेखे, अदृश्य बंजारों के रेवड़ धूल उड़ाते हुए उसके सामने से ऐसे गुज़रे कि आसमान में धूल का रेला देर तक ठहरा रहा। दिन भर की उमस में उसे इंतज़ार था कि शाम तक कुछ बूंद बरस जायें तो धरती की फटी एड़ियों में नमी उतर जाएगी साथ साथ उसके रूखे मन में भी। देर तक रुकी हुई धूल ने उसके खुले सर में उतर कर बालों में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी। दिन मिट्टी से सना हुआ कब का पार उतरा उसे पता ही नहीं चला। मन्ना ने गर्दन घुमा के देखा दूर तक रात की छाँव अपनी सज-धज में पेड़ों की शाखों में सोने के लिए अपना घोंसला डालने लगी थी। एक थरथरी सी उसके कंधे पर से फिसल कर पैरों के पास जा गिरी। मन्ना ने दूध की बाल्टी सरकाई, गाय के घुटने से धोती का फेंटा खोल नाँद के पास ले जा कर खूंटे से बांध दिया। मन्ना ने एक नज़र उठा कर आकाश की तरफ देखा। भटकते भटकते अब जा कर भूरे बादल रुके थे। देर की थमी हुई आस पर अब जा कर दो बूंद बरसी थीं। गाय रम्भाई, कुछ बूंदें दूध की बाल्टी में जा गिरीं। मन्ना ने छप्पर से हाथ निकाल हथेलियों के चुल्लू में बरसते पानी को भरा और मुंह पर मार लिया, चेहरे पर जमी रेत की परत धीरे धीरे पिघल कर बहने लगी थी। उदास हवायें उसको सहला कर अपने-अपने ठिकाने पर लौटने लगी थीं। मन्ना का मन बार-बार पीछे उसी तरफ़ पलटने लगा था उसी रेखा पर जहाँ से एक तरफ़ वह आगे बढ़ गया था और वो पीछे लौट आई थी। घेर से लग कर ही तो था लाल कमरा। घर की चारदीवारी में घुसने से पहले घेर से लगे इसी लाल कमरे को पार करना पड़ता था। इस कमरे को हर दो तीन महीने बाद खोला जाता, इसके कच्चे फ़र्श को लीप कर इसे वापस बंद कर दिया जाता था। पहले इसे बीसू की माँ लीपती थीं और अब कई सालों से वह। इस कमरे के फ़र्श की रूखाई अब मन्ना के हथेलियों में उतर आई है। ये कमरा कभी चौका बना कभी भंडारघर तो कभी बरसातों में गैया के बंधने की जगह तक बन गया पर गिरहस्ती में जुड़ नहीं पाया। इसी कमरे में बियाह के बाद बीसू की माँ ने उसे पहली बार देखा था। घी भरा दिया जिसके ऊपर सोने की चीज़ रखी जाती है, ऐसे दिये में नयी बहू का मुँह देखा जाता था। बीसू की माँ के हाथ में दिया था जिसके मुहाने पर सोने के पतले तार से बनी नथ थी। बीसू की माँ ने उसकी छाया देखी और उसने डोकरी के चेहरे का बदलता रंग देख लिया पल भर में ही। उसका हाथ तुरंत ही उल्टे गाल पर चला गया। ठुड्डी से ले कर कान तक एक भूरा निशान था। माई कहा करती थी कि……

“लहसुनिया खिल गया है। किसी किसी के पीठ पर, कमर पर खिलता है तेरे गाल पर निकल आया है लड़की। चिंता मत कर बाजदफे हल्का पड़ जाए।”

हल्का तो क्या पड़ता उल्टे धीरे-धीरे गहरा होता गया। साथ साथ मन्ना के मन पर एक लकीर खींचता गया ठीक वैसे ही जैसे नदिया के तट पर खड़े पेड की छाया पानी पर झलक जाए बार-बार। ऐसे ही मन्ना इस निशान को हर पल आँखों के सामने देखती रही। घर भर में सब ताईयों-चाचियों की बेटियां चौदह-पन्द्रह की उमर तक ब्याह के चली गयी, बहुओं ने आ कर अपने-अपने आँगन, घेर, चौके संभाल लिए। एक वही रह गयी उमर के कांटे पर बंधी घिसटने को। उन्नीस बीतने तक माँ को लगने लगा थी कि मन्ना भी गाँव की रामदेई बुआ की तरह बिन बियाह के  अकेली रह जायेगी और फिर तीस लगते लगते उन्हीं की तरह मर-खप भी जाएगी । वो तो जाने कैसे कहाँ से बीसू का रिश्ता आ टकराया उससे। वो बेचारा भी उसी की तरह उमर लांघ रहा था तो भाग्य ने सोचा कि अगर लगंड़ी टांग खेलनी ही है तो क्यूँ न दोनों अकेले खिलाडियों को एक पाले में डाल दिया जाये।

मन्ना ने जा कर तखत पर दूध की बाल्टी रख दी। तखत के दूसरे कोने पर बीसू की माँ लेटी-लेटी बरसते पानी को पेड़ों पर गिरते हुए देख रही थी।

“आज दूध कम दिया है गैया ने।” मन्ना ने कहा।

“बारिस के मारे चढ़ा गई होगी।

“डोकरी जे बताओ रोटी क्या बनेगी। बत्ती न आनी अब और संजा को देर से बनाने पर कीरे झरेंगे।

“जो चाहे वो बना ले। मुझे तो बस दो रोटी दूध में मींड कर दे दिओ। वह वैसे ही लेटे हुए बोलीं।

मन्ना ने देखा कि बूँदें तो हल्की हुईं पर बादल और गहरा गए।

“अच्छा हुआ अबके जल्दी ही उठऊवल चूल्हा बना लिया वरना कित्ती दिक्कत होती ऐसी लौंद की बरसात में।”

बादल बरसात की रात यूँ भी जल्दी गहरा जाती है और इस घर में तो रात सालों से पसरी हुई है। सांझ से झिरझिर बरसते पानी के बाद भी अंदर कमरों में उमस थी। उजाले पाक की बरसती रातें अँधेरी हो कर भी सुहावनी लगती है। मन्ना ने लोई खोल कर तखत पर लेटी बीसू की माँ को ओढाई और ख़ुद खाट पर लेट अपनी मोटे सूत की धोती का पल्ला सर तक खींच लिया। अगल बगल लेटी इन औरतों को देख कर कोई नहीं जान सकता कि उनके मन में क्या चल रहा होगा। आँखों में कौन से सपने होंगे।

ऐसे अंधेरों में आँखों में सिवा अतीत के कुछ और आ कर अपनी जगह बना भी नहीं सकता, पैठ नहीं सकता।

2

मन्ना का मन चकरी पर बंधा कितने साल पीछे लौट गया था वह ख़ुद भी नहीं जान पाई। नींद में उसे लगा जैसे चौधरी की ठार वाले मंदिर से किसी ने आवाज़ लगाई हो। आँखों में एक नक्शा उभर कर सामने खड़ा हो गया था। ठार अपने बड़े दिनों में असल में अमरुद का बगीचा थी। जिसके कम ऊंचाई के कोई सवा सौ-डेढ़ सौ पेड़ साल भर अमरुद से लदे रहते थे। इस बगीचे में अंदर को जाने पर बेर के झुरमुटों के पास शिव का मंदिर था। एक बड़े ऊंचे चबूतरे की चारदीवारी के भीतर घिरा हुआ मंदिर। कमर- कमर की उंचाई के चांदनी के पौधे जिन पर सफ़ेद फूल खिले रहते थे उन से चिपक के घिसी ईंटों की आठ सीढियां खड़ी थीं जिन्हें फलांग कर ही मंदिर के अहाते में जाया जाता था। भीतर एक ईंटों वाला बहुत बड़ा आँगन था जिसके उल्टे हाथ पर चार कमरे बने हुए थे और आगे बढ़ने पर छत को जाने के लिए सीढियाँ। आँगन में सामने एक कुआँ था जिस पर पीली सी एक रस्सी से बंधी एक लोहे की बाल्टी रहती थी, जिसमें बाद में मोटर लगवा के पाट दिया था। उसे याद है कितनी ही बार उसने चक्के पर बंधी रस्सी को ढील दे कर कुएं से पानी निकाला था। सर्र से हवा को काटती बाल्टी कुएं में झूमती हुई जाती और छप से पानी की सतह को चूम लेती। इसी कुएं के सामने था चिकने फर्श वाला एक बड़ा कमरा जिसके बाहरी आधे हिस्से में छोटा चौकौर बरामदा निकाल रखा था और जिसकी छत में लोहे की ज़ंजीर से बंधा एक पीतल का घंटा टंगा हुआ था। इस बरामदे के बाद कमरे के बाक़ी बचे हिस्से में अँधेरे में डूबा मंदिर था जिसके चीकट फर्श में बीचोंबीच काले पत्थर का शिवलिंग था, उसके चारों ओर पार्वती, कार्तिक और गणेश की सफ़ेद पत्थर से बनी मूर्तियाँ थीं और दीवार के आलों में दूसरे देवी- देवता विराजे हुए थे। इस ठन्डे फ़र्श पर जेठ की दुपहरों में कई बार मन्ना और हेमलता यूँ ही घंटों पड़े रहते। मंदिर के पीछे एक मिट्टी से ढकी कच्ची सड़क दिखाई देती थी जिसके दोनों तरफ़ तलैया थी। इस तलैया में आधे साल जाने कौन सा पौधा खिला रहता था जिसके चौड़े पत्ते पानी को अपने अंदर छुपाये रहते थे। बाक़ी के आधे साल हरे रंग की काई जिसकी छोटी छोटी बिंदी के आकार की ढब उसका मन ललचा देती थीं। मन्ना का मन बार-बार करता की वो उस गंदे पानी में हाथ डाल काई की एक हरी बिंदी निकाल अपने माथे पर लगा ले, पर माई के डर के से चाह कर भी उसकी और हेमलता की कभी हिम्मत नहीं पड़ी की तलैया के पानी को छू भी सकें। अब तो माथा कितने सालों से ख़ाली पड़ा है।

बीसू के जाने के बाद यूँ भी उसकी नींद कम हो गयी थी पर पिछले कुछ सालों से उमर के पचासवें बसर में आ कर बची खुची नींद की जगह जाने कौन सा इंतजार बैठ गया है। अम्मा के सभी इंतज़ार बीसू के जाने के बाद काले पड़ गए थे। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि उसके इंतज़ार का रंग कौन सा है। इंतजार का कोई साफ़ साफ़ सा रंग नहीं होता। ये मौसम की तरह नहीं कि कभी हरा, कभी धूसर। इंतज़ार की डाली हरी और पत्ता पीला होता है। पीला हो कर भी ये पत्ता टूटता नहीं है बल्कि लम्बे वक्त तक डाली से टंका रहता है। इंतज़ार की गर्दन में कठपुतलियों की तरह हमेशा दर्द बना रहता है, जिनके कंधे लगातार उठते-गिरते रहते हैं। ठीक इसी तरह इंतज़ार कभी रात को आँखों में तो दिन में हाथों में आ कर ठहर जाता है। टीस का एक झटका उसकी गर्दन में उठा और शांत हो गया। उसे ऐसा लगा कि उसकी याद में से कहीं योगेन्द्र का हाथ निकला उसे सहलाया और फिर उसी खोह में वापस चला गया। रात जाने कितनी बीती कितनी बची पता ही नहीं चल रहा था। चौके के सहारे खड़े अमरुद के पेड़ से गिरती बूंदों की आवाज़ उसके कानों से टकराती रही फिर अचानक वह आवाज़ उसकी शादी में गीत गाती हेमलता की आवाज़ में बदल गयी।

“छोरा मोहे दे तीर-कमान/ अटे पर बुलबुल बैठी है।

सास मेरी सो गई, ससुर मेरे सो गए

मेरी लग गई आँख, बलम को बुलबुल ले गई रे।

सास मेरी ढूंढे,ससुर मेरे ढूंढे।

मेरा ढूंढे ठेंगा रे, सुबह को और करुँगी रे।

छोरा मोहे दे तीर-कमान…………….।”

3

 “अटे पर बैठी बुलबुल तो कब कि उड़ गयी थी। ख़ाली कमान थामे छोरा धारासार बरसात में उसी अटरिया के नीचे खड़ा था जिस पर सालों पहले बुलबुल बैठी थी और अब जिसका पलस्तर हवा के झोंकों के संग उस लड़के के सर पर गिर रहा था। ये तीर जाने कितने सालों बाद आ कर बुलबुल को बींध गया था।” उसने सोचा।

पुरवा का एक झोंका हड्डी के भीतर तक उसकी हड्डी को झिंझोड़ गया। उसकी खुली पीठ पर जहाँ-तहाँ खटिया की निवाड के निशान पड़े हुए थे। उसने सर के नीचे से सरहाने की तरह लगाई लोई निकाली, झटक कर बदन पर डाली और उनींदी सी बडबड़ाई ……..

“ ऐ डोकरी ज़िन्दा हो की निकल लईं?”

“ अभियाल न मर रही।” बीसू की माँ ने पलट कर जवाब दिया।

दूर मंदिर से घंटियों की गूँज हवा पर बैठ वहाँ तक चली आई थी। दिन निकलने लगा था पर अँधेरा अभी भी तना हुआ था। उसने देखा की आँगन के दूसरे कोने में गीली कच्ची मिट्टी पर खड़ी गाय उसकी ओर बेचैनी से देख रही थी।

“डोकरी उठो साढ़े छ बज गए। मंदिर के पट खुल गए। गैया सारी रात खड़ी रही है, बारिश से ज़मीन गीली हो गई तो शायद बैठी ही नहीं। तुम नहा के मंदिर हो आओ तब तक में सानी लगा कर चाय चढ़ा दूंगी। आते में हनुमंतनी से बोलती आना शाम को चीका मिट्टी पहुँचा जाए। चूल्हा लिपा ही नहीं कितने दिन से।” उसने बीसू की माँ से कहा।

वह उठी सानी लगाई, चूल्हा बरामदे के कोने से बाहर खींच कर सुलगा दिया। सीले कंडों में आंच फफक के बढ़ती और धम्म से बुझ जाती। हवा में नमी के साथ अब चूल्हे के धुएँ की महक घुल गयी थी। उसे एकाएक माई के हाथ की गुड़ डली चाय याद आ गई जिसमें गुड़ के साथ साथ कंडों के धुएँ की गंध भी मिली रहती थी। मन दौड़ता हुआ वापस उसी वक़्त में लौटने को बेचैन हो गया। याद के खडंजे पर तेजी से दौड़ने पर मन के तलुए कैसे कट फट जाते हैं क्या उसे मालूम नहीं था। मालूम था, ख़ूब मालूम था कि हर बार वापसी पर कैसे जी सालता रहता है। फिर भी ललचाया हुआ जी हुन्डेली बछिया सा खूंटा उखाड़ बार बार पीछे भागता रहता और आँखों में धूल भर जाती।

“सुना लड़का थोड़ा लंगड़ा के चलता है, चाची?” हेमलता ने पूछा।

वह चाय का कटोरा हाथ में लिए बैठी रही। उडती भाप चेहरे को छू कर उसे तमतमा रही थी। वह कुछ कहती उससे पहले माई बोल बैठीं।

“तुम्हाए बहुत पेट में मरोड़ उठती हेमा। बिन बात की बात बनाये दे रहीं। कहीं लंगड़ा न है लड़का। सुबह से संजा तक फैक्ट्री में मशीन पर पेडल मार कांच गलाता है सो वाई से जरा लहक है। और ये न दिख रही तुम सब को कि हमाई मौड़ी के घर गैया, भैंसे हैं। दूध-दही, फल-फलारी सब है। ऊपर से गुजर बसर को अपना डेढ़ बीघा खेत है।

“रांड के पाँव सुहागन लागी, है जा बहना मोसी।” तुम्हारा यही हिसाब है चाची। डेढ़ टांग के आदमी के डेढ़ बिलांद खेत में काम कर कर के एक दिन ये ख़ुद भी डेढ़ टांग की हो जाएगी। हेमलता माई से बोली।

“अच्छा अब चुप करो तुम। चौक पर ले जा कर बिठाओ इसे। तेल चढ़ेगा अभी और फिर हरदी, देर मत करो।” बर्तन समेटते हुए माई ने झुंझला कर कहा।

बीता हुआ समय कैसे सालों बाद भी जगमग-जगमग करके आँखों से चल के यूँ ही गुज़र जाता है। मन्ना बैठे बैठे यही सब सोचती रहती अगर बीसू की माँ की आवाज़ उसे चेता नहीं देती।

“अरे! कंडा में गिर रही चाय।”

उसने चौंक कर चूल्हा देखा। पल्ले से पकड़ चाय का हत्ता नीचे उतारा और चिमटे से राख कुरेद उस पर दूध की हांड़ी रख दी। पेड़ से एक अमरुद चौके की टीन पर गिर हवा से सरकता हुआ उसके पैरों में आ गिरा। फल पंछियों की चोंच से कटा-फटा था।

“नासपीटे हर चीज का सत्यानास कर देते हैं।” उसने फल को कूड़े में फेंकते हुए कहा।

4

गेंदे के फूलों की लाल-पीली सी चादर ढलते दिन के उजाले में खेत में बुझती आंच की लपट सी दिख रही थी। मन्ना ने देखा एक पेड़ के सहारे पीठ टिकाये योगेंदर माली से बात कर रहा था। एक पल को उसे लगा कि पेड़ के सहारे बीसू खड़ा है जिसने मन्ना को देखा और फिर मुँह फेर लिया। कितनी साफ़ झलक थी उसकी जैसे योगेंदर में कम उमर का बीसू ही उतर आया हो मानो। वह वहीं से वापस मुड़ गयी। जाने वह उसे देख पाया या नहीं। जब से बीसू की माँ ने उसे घेर की जगह यहाँ खेत वाले कमरे में रहने भेज दिया है तब से घर उसके लिए सांय-सांय करता है। एक वक़्त की रोटी देने के बहाने वह रोज़ उससे मिलने आ जाती है। पर आज ऐसे यूँ ही बिना मिले लौट जाएगी तो क्या वह सारी रात इंतज़ार करेगा या थक हार कर सो जायेगा? उसे ख़ुद का ही प्रश्न उलझन में डाल गया।

जब वह घर में घुसी तो बीसू की माँ छोटे बरामदे में मोरी के सहारे बैठी-बैठी कपड़े धो रही थी। मन्ना ने देखा कि उसे देख कर बीसू की माँ का चेहरा तमतमा गया था।

“डोकरी छोड़ दो कपडे। सर्दी बैठ जाएगी जो जाड़े-पाले रात में कपड़े धोओगी।” मेरी तबियत सही नहीं लग रही भियाल घंटे भर में उठ कर धो दूंगी। कह कर वह आंगन से होती हुई चौके की तरफ़ चल दी।

“मिल आई?? बीसू की माँ की आवाज़ उसके कानों में छन्न से बज कर उसके मन में उतर गई।

मन्ना ने देखा बल्ब की पीली रोशनी में उनका चेहरा कितना रूखा, रंग उड़ा लग रहा था। उसने पलट कर कुछ भी नहीं कहा। इनदिनों उसने एक चुप्पी सी साध ली थी जिसे अब कुछ भी कोंच कर नहीं जाता था।

……………………………………….

जेठ की लहकती लू में सारा घर खरबूजे और ताज़े लीपने की गंध से गुंथा पड़ा था। चौके के एक कोने में बैठी माई चूल्हा कुरेद रहीं थीं और बाबू वहीं खड़े थे। बाबू के  माथे से पसीना इतना नहीं ढरक रहा था जितनी कि आँखों से बेचैनी। बाबू चौके की चौखट से लगे लगे आँगन लीपती भगवानदेई जीजी को देख रहे थे। तीन बेटियों में सबसे बड़ी भगवानदेई अपने दोनों बच्चों सहित मायके लौट आई थी। दूसरी महादेई गौने कि राह तकती अभी भी उन्हीं के चौका-बासन से जूझ रही थी। सबसे छोटी मानदेई (मन्ना) बिन बियाह के बिरानी हवा सी सांय-सांय दिन भर घर में घुमती-फिरती अपनी उमर लाँघ रही थी। उसने दूर से देखा कि बाबू ने माई से कुछ कहा और माई के चेहरे को हल्की हँसी ने ज़रा देर के लिए उजाले से भर दिया। पिछले कई साल में जब से भगवानदेई जीजी वापस आई हैं आज पहली बार माई ज़रा खुल के हँसी थीं। उसी रात माई उसे अपने हंसने का कारण बता गयीं थी।

“हिरनगाँव से एक सम्बन्ध आया है। बाबू बोल रहे तुम्हाये की परसों जा कर देख के आयेंगे लड़का। एटा वाले भाई साहब ने बताया है तो वह भी जायेंगे साथ। यहीं उसायनी में फैक्ट्री में काम करता। पर????”

“पर क्या??” उसने पूछा था।

“भाई साहब बता रहे थे तुम्हाये बाबू को कि ज़रा लहक है लड़के के एक पाँव में वैसे शक्ल- सूरत अच्छी है और घर मकान भी ठीक ही है। सब सही रहा तो देवठान पर देखा जायेगा।”

“पाँव में लहक में??” उसने पूछा था।

“मौड़ी तुम्हाए भी तो चेहरा पर दाग है।”

माई अपनी किसी औलाद पर मौका बे-मौका मार करने से चूकती नहीं थीं।

5

समय जिनकी भी गाथायें सुनता है उन्हीं के हिस्से में सबसे ज़्यादा बेईमानी करता है। पेड़ों को पानी दे कर अक्सर उन्हीं के माथे सूखा मढ़ देता है। रेगिस्तान के तपते रेत को ठंडा करता है, और ठंडे होते ही सूरज उलीच देता है। मिट्टी के देवता बनाता है और फिर उन्हें ताल-पोखर में बहा देता है। माई-बाबू ने उसे पलट कर कभी नहीं देखा। उसे पता था कि बाबू के चाहने के बाद भी माई ने कभी भी उन्हें मिलने के लिए आने नहीं दिया होगा। भगवानदेई जीजी के वापस लौटने के बाद माई कभी भी नहीं चाहती होंगी कि वह भी उनके पास वहीं लौट आये। बीसू के होते-हवाते ही वह लोग कभी नहीं झांके थे। उसके बाद तो रही सही आस भी छूट गयी थी।

“ऐ डोकरी सोच रहा हूँ कि अब काम छोड़ दूं, पैर से काम बनता नहीं अब।” बीसू ने अपनी माँ से कहा।

“घर का कैसे चलेगा?” माँ ने पूछा।

मन्ना जानती थी कि उन्हें बीसू से ऐसे पूछने में कितनी तकलीफ़ हुई होगी। उसके फैक्ट्री से लौटने के बाद डोकरी घंटों उसके सूजे हुए पैर पर गरम ईंट की सिकाई करती थीं। घर धीरे-धीरे कर्ज़ की बेड़ियों में बंधने लगा था और बीसू के कमज़ोर पैर उन्हें झटका मार तोड़ भी नहीं सकते थे।

“घर तो चलेगा ही डोकरी, खेत पर काम करूँगा अब।”

“खेत में काम करने से कित्ता वजन पड़ेगा पैर पर पता भी है।

“सब सोच रखा है मैंने, आध बंटाई पर देंगे खेत और मैं खाद-पानी देखूंगा।” वह बोला।

तवे पर रोटी पचाते-पचाते उसने बीसू को देखा। आज दो बरस की गृहस्थी में पहली बार मन्ना ने उसे मुस्काते हुए देखा था। वह जी भर देख भी नहीं पाई और मुस्कान की लकीर जाने किस आकाश में खो गयी। जीवन सम पर आने से पहले ही अपने चक्के से पलट गया। उतरते सावन की एक रात वह सब को छोड़ जाने कहाँ चला गया। तारीख़ उसके भीतर ऐसे उतर गई थी जैसे किसी ने मन पर कील रख हथोड़ा मार दिया हो। बीस अगस्त की रात जब रेल का हादसा हुआ तो डोकरी ने सब से कह दिया कि बीसू उसी में चल बसा। वह किसी से कह भी कैसे सकती थीं कि लड़का जोंन-जवान बहू को छोड़ जाने कहाँ निकल गया। उसके बाद न उसके लिए दिन हुए न रात। माई- बाबू उससे मिलने अब भी नहीं आये।

धीरे-धीरे मन्ना ने बीसू की माँ के जीवन में उसके हिस्से के ख़ाली कोने अपने हाथों में थाम लिए। मन्ना ने उस खेत की दरारों तक को सींच डाला था जिसे बीसू यूँ ही छोड़ के भाग गया था। पिछले पच्चीस सालों से वह कील की तरह जिंदगी के चक्के में लगी लगी उम्र का लोहा घिसती रही और ये पहिया कहीं घडी भर को रुकता ही नहीं। बरसा-बरस बाद अब छूटे हुए मायके से कोई आ कर उससे टकराया था।        हेमलता ने जाने कैसे उसे ढूंढ निकला था। उसकी आँखें बार बार लौट कर उसी दिन की ओर जा रही थीं, जिस दिन हेमलता उससे मिलने उसके खेत पर आई थी। सत्ताईस साल बाद देख रही थी वह उसे। चेहरा भर के गोल हो गया था और देह पर जरा लुनाई ठहर गई थी। बढ़े हुए वजन और आँखों के काले घेरों के अलावा हेमलता में कुछ भी नहीं बदला था।

हेमलता ने उसके हाथ थाम रखे थे। पीहर की बिसराई हुई गर्मी उसके हाथों में उतर रही थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि इतने सालों बाद पीहर से कोई उससे मिलने आया है, वह भी हेमलता।

“पता है भगवानदेई जीजी के बेटे की फ़ौज में भर्ती हो गयी है। देवठान का बियाह भी निकला है।” हेमलता ने कहा।

“देवठान के शादी-बियाह अच्छे नहीं बैठते उस घर में अब तक नहीं समझे वह लोग।” वह बोली।

“तू अब तक नाराज़ है उन लोगों से। पीहर से कहीं मुँह मुड़ता है।”

“पीहर जैसा अब कुछ रहा कहाँ? तू अपनी बता एक दम भी सालों बाद कैसे।” मन्ना ने पूछा।

“एक मदद कर दे बहना।” हेमलता ने कहा।

“कैसी मदद?” उसने पूछा।

“अंतराम भाई साहब को जानती है न तू।”

“हाँ, जानती हूँ।”

मन्ना की यादों में दो जवान लड़कों की एक तस्वीर उभरी और धुंधली पड़ गयी।

“पिछले साल करू भाई ने गोली मार के भाईसाहब का क़त्ल कर दिया और फिर फरार हो गए। अभी कुछ दिन पहले छुपते- छुपाते अपने घर पहुंचे तो अंतराम भाईसाहब के बड़े लड़के योगेंद्र को जाने कैसे पता चल गया। तीन गोली सीने में उतार आया लड़का। अब भागा-भागा फिर रहा है। बत्तीस का है, न शादी-बियाह हुआ अभी, न घर-बार ही है कुछ। तू अपने यहाँ रख ले कुछ महीने।”

“मेरे यहाँ??”

“हाँ तेरे यहाँ रहेगा तो बचा रहेगा। मेरे यहाँ या रिस्तेदारी में कहीं और गया तो तुरंत पकड़ा जायेगा। तुझ से कोई सीधा सम्बन्ध भी नहीं उसका और सालों से तेरा घर से कोई वास्ता ही नहीं रहा।”

“मैं डोकरी से क्या कहूँगी?”

“देख लियो बहन।” हेमलता ने उसके हाथ थाम लिए।

6

“आओ डोकरी तेल मल दें तुम्हाये पैरन पर।”

“आज बड़ी चिंता हो रही तुम्हें। इतै-उतै मत घुमाओ बात को सीधे सीधे कहो।”

“मुझे लाल कमरे की चाबी दे दो। कल मेरे गाँव से एक दूर का भतीजा आएगा। कुछ दिन यहीं रुकेगा तो उसके लिए साफ़ सफ़ाई कर देंगे।”

‘पास क्या, दूर क्या मन्ना तुम्हारे मायके से पिछले पच्चीस सालों में अब तक एक भुस की बुग्गी आयी है बस यहां, इंसान कोई नहीं।” बुढ़िया ने आँचल के ठोक में बंधे गुच्छे में से चाबी निकालते हुए कहा।

“और ये भतीजा कौन हुआ?”

“हेमलता का भतीजा है। बाप मर गए थे पार साल। काम धाम का कोई हिल्ला नहीं तो हमहीं बोले थे हेमलता को चाहे तो यहाँ आ कर आध-बंटाई पर खेत देख ले। वाई के काजे आ रहा है।”

वह आया तो उसे ऐसा लगा मानो बीसू ही लौट के दरवाजे पर आ खड़ा हो। बस बाल थोड़े बड़े थे, देह थोड़ी भरी हुई और सतर थी। पर आँखें वैसी ही जगार की मारी जैसे महीनों से नींद ने उन्हें छुआ तक न हो।

“लाओ हमें कट्टा दे दो। इसे रख दें कहीं तब चल के डोकरी से मिलना। वह बोली।

मन्ना ने एक लाल अंगोछे में लिपटी थैली उसके हाथ से ली और भुस की कोठरी में जा के रख आई। वह देखता रहा कैसी औरत है जिसके रूखे चौड़े हाथ हथियार को थामते हुए पल भर भी न काँपे।

“तुम्हारे रहने के लिए घेर में बने कमरे को साफ़ कर दिया है। कमरे में सड़क की ओर जो खिड़की है उसे मत खोलना हफ़्ते आठ दिन। एक बार थोड़ा घुलमिल जाओ उसके बाद देखी जायेगी तब तक घेर वाली छोटी खिड़की ही खोलना। तांड पर दो बीजने रखे हैं ज़रूरत पड़े तो उतार लेना। चौमासे में उमस हो जाती है इस कमरे में।”

कुछ दिन के लिए आये मेहमान ने धीरे-धीरे मन्ना के हाथों से बोझ की सारी रस्सियाँ अपने हाथों में थाम लीं और धीमे से चौमासे की पहली बूँद सा उसके मन की तपती रेत में रल गया। प्रेम के बीज अंखुआने तो लगे थे पर उमर की अलग-अलग देहरियों पर ठिठक के रुक गए थे। वह आवेग में उमर की चार दीवारियों को लाँघ जाना चाहता था और वो लाँघी हुई उमर के मुहाने से वापसी को सकुचा रही थी।

“ये कितने दिन और रहेगा यहाँ?” बीसू की माँ ने पूछा था।

“जब तक रह सकता है रहने दो डोकरी। देखो खेत कितना बढ़िया हो गया। आधी-आधी क्यारियां बना कर आलू-शकरकंद कितना बढ़िया उगा लिया इसने। और गैया भी ब्यानहार है तो कितनी भागदौड़ हो जाएगी।”

“गैया, खेत, घेर बाज़ार तो पहले भी देख लेती थी तू तो अब क्या?”

“अब उमर हो रही मेरी डोकरी।”

“तो फिर उसे खेत वाले कमरे में बोल दे रहने को। रोटी-पानी यहाँ से जाता रहेगा।” बीसू की माँ ने कहा।

मन्ना का जी धक् से धड़क के रह गया। क्या डोकरी ने सब भांप लिया। इतना ढका-छुपा कैसे उघड़ गया उसे समझ ही नहीं आ रहा था।

7

“तुम चलो मेरे साथ।” वह बोला

“कहाँ?”

“वो देख लिया जायेगा। कुछ न कुछ इंतजाम तो हो ही जायेगा। रहने दो डोकरी को इस मकान और खेत के सहारे। कोई न कोई देखभाल कर ही लेगा इन चीज़ों के लिए उनकी।”

“ख़ुद तो मारे-मारे छुपे हुए फिर रहे। कल को पुलिस के हत्थे चढ़ गए तो जाने कितने सालों तक जेल में रहना पड़ेगा। और मानो ये सब भी न हो तो भी चौदह बरस छोटे हो मुझसे। सेंतालिस लग गया मुझे। कुछ सालों में बुढ़ापा भी आ ही जायेगा। तब क्या होगा मेरा?”

वह चुप रहा। क्या कहे कुछ सूझ ही नहीं रहा था उसे।

“अब जाती हूँ जा के सानी-पानी भी देखना है।” मन्ना ने खुले बाल लपेटते हुए कहा।

गैया के राम्हाने की आवाज़ उसे दूर ही से सुनाई दे गयी थी। वह घेर में पहुंची तो देखा कि डोकरी नांद में कुट्टी डाल रही थीं।

“रुको डोकरी कुट्टी मत डालो मैं सानी लगा रही हूँ अभियाल ही।”

बीसू की माँ ने उसे पैनी नज़र से ऊपर से नीचे तक देखा। जाने क्या खोज रहीं थीं वह उसमें।

“ये धोती कैसे चिर गयी तुम्हाई?”

“कहाँ?”

“घौटुन के पास।”

मन्ना ने देखा की छुटने के पास धोती एक तरफ़ से चिर गई थी।

“पार साल ली थी डोकरी ये धोती। पुरानी हो गई है। कोई खोंता लग गया होगा सो चिर गयी होगी।”

“साल भर पुरानी धोतियाँ ऐसे कहीं नहीं फटती जब तक जाँघों का ज़ोर न लगे।”

“जब जानती हो तो पूछती क्यूँ हो डोकरी।” उसने खिसिया के कहा।

“सुन मेरी तो खुली मुसलमानी है। उसके संग जाना है तो जा तेरी इच्छा पर फिर इस घेर, मकान, खेत में से धेला भी नहीं मिलेगा। कल को मेरा लड़का लौट के आया तो उसे क्या दूँगी। ये सब चाहिये तो मेरे संग रह।”

“तुम्हारे लड़के को अगर लौटना होता तो कर्ज़े में मुंह छुपा भागता ही क्यूँ। वह लौटेगा जिसके भागने से तुम्हारी उमर पटक के आधी रह गयी। और अगर होगा भी तो लौट के कैसे आएगा। तुम भूल गई डोकरी, तुम्हीं ने कहा था कि रेलगाड़ी के हादसे में मर गया बीसू। तुम्हीं ने उसकी पहचान की। तुम्हीं ने सरकार से मुआवज़ा लिया। उसी पैसे से कर्ज़ा चुकाया था तुमने। उसी पैसे से इस घेर की चारदीवारी खड़ी की थी। याद रखन ये सब डोकरी।” मन्ना जाने किस हौंक में आ के बोले जा रही थी।

“ये सब मुझे नहीं मालूम बस तू उसे जाने को बोल।”

“बोल दूँगी।” कह के मन्ना लाल कमरे में घुस गई।

…………………………………

बीसू की माँ दिन भर में उससे ये बीसियों बार पूछ कर भी नहीं थकी थीं कि

‘वह कब जा रहा है?’

‘डोकरी कल जायेगा संजा से पहले’। बीसू की माँ को जवाब दे उसने एक हाथ वापस हौद में डाल कुट्टी मिलाना शुरू कर दिया और दूसरा हाल ही ब्याई गाय के मुँह पर फेरने लगी।

‘गुड़ कब देना है गैया को?’ उसने पूछा

‘अब दे दो एक दिन हुआ बियाये, खल भी देना चालू कर दो, परसों बछिया को खूब नमक की एक रोटी भी देना और बाल्टी भर पानी, ऐसे पानी पीना सीख जायेगी जल्दी।’ बीसू की माँ खाट पर करवट बदलते हुए बोलीं।

इस करवट बीसू की माँ को उसका चेहरा साफ़ दिख रहा था। आधी उमर से ऊपर का धूप में तमतमाया, झुर्रियों वाला,गर्मी से झुलसा हुआ चेहरा जो यूँ तो मुहल्ले की किसी भी अधेड़ औरत जैसा है। फिर भी उसे इसमें क्या दिखा की वह इधर का ही हो कर रहा गया।

‘इस जेठ की एकादसी को दो घल्लियां ले अइयो मंसने को। अबके दो जोड़े दूंगी।’ बीसू की माँ ने कहा।

उसने गर्दन घुमा कर उनकी ओर देखा और वापस गैया की तरफ़ मुड़ गई।

‘अबके सावन बीसू को गए पच्चीस बरस हो जाएंगे न।’ उन्होंने उससे पूछा।

‘पच्चीस नहीं छब्बीस।’ ‘डोकरी सीधे सीधे कहो न क्या कहने का मन कर रहा, घुमा फिरा के क्यूँ कह रहीं बात को।’उसने कहा।

‘कल जब वह जाए तो उसके टीका कर दियो और हाथ पर कुछ रुपये भी रख दियो। उसका टीका लगा माथा देख लोग कम बात बनाएंगे।’ बीसू की माँ ने उससे कहा।

उसने देखा कि गाय के चाटने से उसके हाथ पर लाल दाने उभर आये हैं। ऐसे ही लाल फफोले उसके भीतर उठ पड़े हैं पर वह किसे, कैसे दिखेंगे। हठात रुक कर जेठ की लू खाई गरम हवा को सुनना अक्सर अपने मन की गूँज को सुनने के बराबर होता है। जिसमें से सिवाय ताप के कुछ और अनुभव नहीं किया जा सकता। उसने उनकी तरफ़ एक चोर नज़र से देखा और उठ कर अंदर चली गयी।

8

वह चला गया था लौट के। उदास मौसम के झरे हुए फूल की तरह मन्ना के मन  पर पीला रंग चढ़ने लगा था। उसे हेमलता से ही मालूम पड़ा कि योगेन्द्र को पुलिस ने पकड तो लिया पर हथियार न होने की वजह से कुछ साबित नहीं हो पाया, फिर भी उसे तीन साल की सज़ा सुनाई गयी है। हथियार तो अभी भी एक अंगोछे और थैली में लिपटा मन्ना की भुस की कोठरी में पड़ा है। अच्छा ही हुआ जो जाते वक़्त उसने हथियार देने से मना कर दिया था, वरना क्या का क्या हो जाता।

बरस बीतने के लिए ही बने है। दिन-दिन कर के गुज़र ही जाते हैं। अब उसका सारा समय घेर और खेत पर बीतता है। घर सोने भर या डोकरी की ज़रूरत भर ही रहती है अब। आषाड़ के गरम आकाश पर बादलों के नन्हे-नन्हे झुरमुट उग आये थे। मन्ना ने सर उठा आकाश को देखा दूध की डोलची उठाई और घर को चल दी। डोकरी बरामदे में पड़े तखत पे लेती हुई थीं।

“नैक मेरे सर में तेल मल दियो मन्ना।”उन्होंने कहा।

“ह्म्म्म, चाय के बाद मल दूँगी।”

“तुम से कही थी लौटते में थोड़ा चन्दन और कपूर लेती आना पूजा के लिए। लाईं  क्या?

“सर में मलने के लिए कपूर तो ले आई हूँ पर चन्दन नहीं मिला दुकान पर।” वह बोली।

“ अब कल पूजा में क्या करुँगी में?”

“डोकरी ईश्वर के लिलार पर तो हल्दी-रोली माल्टा ही रहता है आदमी। उंगलियाँ भर-भर के पोतता है। आड़ी-टेढ़ी, उल्टी-सीधी किसम-किसम की लकीरें खींचता ही रहता है। असल बात तो तब बने डोकरी जब आदमी को अपने माथे, अपने लिलार का पसीना पोंछने की मोहलत मिल पाये। उसकी उँगलियों को कभी चाक घुमाने का हुनर आये या ये चीका मिट्टी से अपना चूल्हा लीपने का शऊर या खेत की मिट्टी को अपने पैरों से खूंदने की ताकत पाये वरना अल्ल-बल्ल तो मरने तक बकता ही है आदमी।” उसकी तेल लगी उंगलियाँ बीसू की माँ के उलझे बालों में अटक के रह गई थीं।

बादलों के झुरमुट घने होते जा रहे थे। बीसू की माँ ने पलट के उसके हाथ थाम लिए।

“मैंने उसे बुला लिया है मन्ना।” उन्होंने कहा।

“किसे?”

“योगेन्दर को यहीं रहने के लिए, अपने पास। मेरा क्या कल रहूँ या नहीं पर तेरा ठौर-ठिकाना तो कोई बना ही रहना चाहिए। मुझे क्या पता नहीं इन सालों में कैसे बदल तू।” बीसू की माँ ने कहा।

पहली बूंद ढरक के मन्ना के सपनों के मंदिर में बैठे शिव के ऊपर गिरी, दूसरी उसके मन की रूखी ज़मीन पर और उसके बाद आषाड़ की पूरी शाम उस धारासार बरसात में डूब गयी। पानी के कोहरे में बस गली के दोनों तरफ़ खड़े दो हरे पेड़ ही लहक रहे थे। बीसू की माँ ने उसके घुटने पर सर टिका दिया। हवा में कपूर पड़े तेल की गंध महक रही थी और एक गाने की गूँज जिसे डोकरी गा रही थीं।

“छोरा मोहे दे तीर-कमान/ अटे पर बुलबुल बैठी है।

========

Anagh Sharma

+968-94534056

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 mins
WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify BWD Map Masking addon for elementor eClassify – Classified ads Buy and Sell Marketplace Flutter App with Laravel Admin Panel Mentor Icon Pack for Codestar Framework Google Meet for LatePoint Lifeline Donation Pro – WordPress plugin to get donations WP Guard – WordPress Security, Firewall & Anti-Spam WP Setup Wizard WordPress NFT Creator Universal – Full Multi-Purpose Android App EasyOrder – B2B Plugin for WooCommerce