आश्चर्य का संगीत रचने वाला एक संगीतकार

 

आज प्रख्यात सितारवादक पंडित रविशंकर की सौवीं जयंती है। युवा कवि निर्वाण योगऋत ने उनकी संगीत यात्रा के कुछ महत्वपूर्ण पड़ावों की चर्चा इस लेख में की है-

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महान सिने-मास्टर सत्यजित राय ने जब ‘पाथेर-पांचाली’ की कल्पना की थी-दृश्यों के रूप में तब कोई और भी था जिसने इस कालजयी कृति को सुरों में सोचा था। जितना जीवंत इस फ़िल्म का रंग और दृश्य है उतना ही गहरा इसका संगीत भी! ‘राॅय’ के दृश्यों की इस कल्पना को अपने सुरों के साथ ट्यून करके पंडित रविशंकर ने दु:ख और आनंद का ऐसा संगम रचा कि विश्व का संपूर्ण संगीत-जगत अचंभित रह गया। बंगाल के माटी का यह करूण उद्गार पूरे जगत के हृदय को आंदोलित कर गया।

         कहते हैं कि ‘पाथेर-पांचाली’ का यह थीम-संगीत, रविशंकर ने महज़ चौबीस घंटे में ही तैयार कर लिया था़। हुआ ऐसा था कि किसी प्रोग्राम के सिलसिले में रवि जी कलकत्ता आए थे दो दिनों के लिए। पहले दिन की सांझ सत्यजित राय ने उनके सामने इस फिल्म के थीम-संगीत को बनाने का प्रस्ताव रखा और अगले दिन की शाम तक यह श्रेष्ठतम संगीत तैयार था। जितना अद्भूत यह संगीत है उतना ही अद्भूत इसका सहज अवतरित हो जाना है। बांसुरी और सितार की यह अद्भूत जुगलबंदी, लियोनार्दो के मोनालिसा जैसी ही है जिसे जिस मनोदशा में देखो वैसी ही दिखती है। इस संगीत को भी जिस मनोभाव में हम सुनते हैं, वैसा ही सुनाई देता है।

      पंडित रविशंकर विश्व-संगीत के शिखर हैं। सीमाओं से पार-संगीत के गौरीशंकर! उनका संगीत हमें अस्तित्व का संदेश देता है। सुरों का यह शृंगार हमारी अंतरात्मा का परिष्कार कर देता है।

      विश्व-प्रसिद्ध नर्तक मास्टर उदय शंकर के छोटे भाई के रूप में जन्मा सितार का भावी शिखर पुरूष रविशंकर, उम्र के अठारवें साल तक  उदय शंकर के डांस-ग्रुप में पूरे योरोप में नाचता रहा। किसे पता था कि एक दिन यह लड़का अपने सितार के तारों पर समस्त संसार के मन को थिरकने पर मज़बूर कर देगा।

       1935 का वो साल रवि के जीवन का अहम् साल था। कह सकते हैं कि आज जिस पंडित रविशंकर को हम जानते हैं उसका जन्म तभी हुआ। मैहर के बाबा अल्लाउद्दीन ख़ान जैसी विभूति के सानिध्य में रवि इसी वर्ष गए थे। पूरा ‘मैहर-घराना’ इस बच्चे पर बरसने वाला था। बाबा जैसा गुरू और रवि जैसा शिष्य हो तो नि:संदेह, सगीत के आसमान से सुरों का स्वर्ण बरसता है।

      वर्षों तक बाबा अलाउद्दीन, रवि को तराशते रहे, निखारते रहे। डांटते रहे, दुलारते रहे। खदान से निकले सोने को गहना जो बनाना था।

     एकबार की बात है। बाबा की फटकार पर रविशंकर बहुत नाराज़ हो गए। बोरिया-बिस्तर बांधकर उनके घर से जाने लगे। गुरू-शिष्य परंपरा में शिष्यों को काफ़ी कुछ चुपचाप सहना पड़ता है। आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत में यह परंपरा जस की तस बची हुई है। तो रवि नाराज़ हो गए। रूठकर चले गए। जब बाबा को इसका पता चला तो उनको बहुत दु:ख हुआ। बाबा थे भी तो बहुत कोमल-हृदय! भागते हुए गए और रवि को मनाकर वापस लेकर आया। उनका गुरू बीच में नहीं आया। सच्चा गुरू सच में एक पिता ही होता है। उस दिन रवि को गुरू के रूप में एक पिता मिल गया था जिसे वे जीवन भर नहीं भूल पाए। वो जब बाबा की बात करते थे उनका संपूर्ण व्यक्तित्व श्रद्धा से झुक जाता था।सच में बाबा के बिना संगीत के इस संस्थान की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

      अलाउद्दीन ख़ान जैसे ज़ौहरी के यहां से जब यह सोना निखर कर निकला तो इसने अपनी चमक से पूरी दुनिया को रौशन कर दिया। सितार में ‘तंत्रकारी’ को माध्यम बनाकर प्रकृति के सबसे अनछुए गीतों को गाया।

     भारतीय शास्त्रीय संगीत को विश्व-पटल पर सर्वप्रथम प्रदर्शित करने का श्रेय इसी व्यक्ति को जाता है। रविशंकर विदेशों में अपना कंसर्ट बजाने से पहले कहते थे-‘किसी भी तरह के पूर्वाग्रह को भूल जाएं, खाली मन से सुनें आपको बहुत अानंद आएगा’।उनके ये शब्द भारतीय संगीत की आत्मा है़। इस संगीत  बुद्धि से समझा नहीं जा सकता बल्कि इसको हृदय के भोलेपन में उतारना होता है।

       रविशंकर ने पूरे विश्व को भारतीय संगीत से परिचित कराया-बिल्कुल उसके शुद्धतम रूप में। उन्होंने कभी इसकी शुद्धता से खिलवाड़ नहीं किया। वो इसकी आत्मा को पहचानते थे।

      रवि पूरे विश्व के चहेते हैं। पूरी दुनिया उन्हें प्यार करती थी। प्रसिद्धि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस ‘बीटल्स’ के पीछे पूरी दुनिया पागल थी उस बैंड के जाॅर्ज हैरिसन रवि से संगीत सीखते थे। वो भारत आए। एक तरह से रवि के शागिर्द रहे। रवि ने भी उनके साथ कई रिकार्डिंग में काम किया। अल्बम बनाए साथ-साथ। पूरब और पश्चिम के संगीत को जोड़ा लेकिन कभी भी किसी पश्चिम के संगीतकार के साथ मंच साझा नहीं किया। वो शास्त्रीय संगीत के आत्मा के साथ कोई समझौता नहीं कर सकते थे।

       पूरी दुनिया में घूमते हुए वो भारतीय रागों के पुरातनता से नवीनता की स्वरमाला रचते रहे।

       ओशो रजनीश ने अपने प्रवचनों में कई बार एक घटना का जिक्र किया है कि एक बार पश्चिमी के किसी यूनिवर्सिटी में कुछ पौधों पर संगीत के प्रभाव को लेकर प्रयोग किया गया। हफ़्ते भर तक कुछ पौधों को रविशंकर का संगीत सुनाया गया और कुछ पौधों को दूर ले जाकर रोपा गया। दोनों को एक सी मिट्टी में रोपा गया था, समान खाद-पानी और सूर्य का प्रकाश दिया गया था। हफ़्ते भर बाद का परिणाम आश्चर्यचकित करने वाला था। जो पौधे रविशंकर का संगीत सुन कर बड़े हो रहे थे वो उन पौधों के मुकाबले ज्यादा स्वस्थ और विकसित थे  जो अलग रोपे गए थे। और जो पौधे संगीत सुन रहे थे उनमें एक और अजीब घटना घटी कि वो उस दिशा में थोड़ा झुके हुए थे जिधर बैठकर रविशंकर रोज़ सितार बजाते थे। यह पश्चिमी विज्ञान-जगत के लिए गहरे आश्चर्य का विषय था।

      हिंदी फ़िल्मों में भी पंडित जी ने अपनी एक अलग ही छाप छोड़ी। फ़िल्म अनुराधा का गीत-‘हाय रे वो दिन…’ कितनी गहरी संवेदनाओं से उपजा है। कितने गहरे भावों से निर्मित हुआ है यह गीत! जैसे सदियों की पीड़ा इस तीन-चार मिनट में पूरी तरह सघन हो गयी हो। रवि जी ने जितना भी फ़िल्म-संगीत रचा वो सभी अद्भूत हैं। वो फ़िल्म-संगीत के माध्यम को करीब से समझते थे। भारत का फ़िल्म-संगीत भी अपने आप में एक स्कूल है। ऐसा पूरी दुनिया में और कहीं नहीं है। रवि जी इस स्कूल के भी मास्टर थे। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वो इकलौते ऐसे शास्त्रीय संगीतकार थे जिसने इतना श्रेष्ठ फ़िल्म-संगीत रचा। यह आश्चर्य ही है कि अब तक कोई दूसरा शास्त्रीय संगीतकार, फ़िल्म-संगीत को ठीक से समझ भी नहीं सका। रविशंकर इसके अपवाद जैसे ही हैं। वो जितने बड़े शास्त्रीय संगीतकार थे उतने ही बड़े फ़िल्म-संगीतकार भी। दोनों कभी एक दूसरे पर हावी नहीं हुए बल्कि परस्पर एक-दूसरे का सहयोग ही करते रहे।

     आज पंडित रविशंकर को याद करते हुए लगता है कि सभी वर्जनाओं को तोड़ते हुए भी हम अपनी आत्मा को शुद्धतम रूप में बचा सकते हैं। आज संगीत  जिस तरह से अधोगामी और फूहड़ हो गया है, ऐसे समय में  क्लासिकल संगीत के लोगों को अपनी खोल से बाहर आकर इसका परिष्कार करना चाहिए। इसे संवारना चाहिए। तभी तो हमारे संगीत की आत्मा दुनिया में प्रेम के नए पुष्प रोप पाएगी।

 

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