मूर्ख, महामूर्ख और वज्रमूर्खों की कथा:  मृणाल पाण्डे 

बच्चों को न सुनाने लायक बाल कथाओं की यह सत्रहवीं कड़ी है। वरिष्ठ लेखिका मृणाल पाण्डे लोक कथाओं की पोटली खोलती हैं और सदियों की संचित कथाओं में हमें अपने समकालीन राजनीतिक प्रसंग समझ में आने लगते हैं। समकालीन राजनीति का प्रहसन खुलने लगता है। जैसे मूर्खता की यह कथा पढ़िए-

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बहुत दिन हुए, एक गाँव था जिसके सभी लोग मूर्ख थे। जोतवाले किसान मूर्ख, खेत मजूर मूर्ख, बटाईदार मूर्ख, बढई, कुम्हार, सुतार, लोहार, तेली, मंडी में कर्ज़ के लेनदेनदार और यहाँ तक, कि ग्राम पंचायत के सदस्य और सरपंच तक सब मूर्ख थे। अब जब कि सभी लोग मूर्ख थे, तो उनके बीच लंबी बहस और विवाद भी कम होते थे। सभी अपनी मूर्खता के बीच शांत संतुष्ट रहते। अपवाद था बस एक घर। उस घर में दो मूर्ख भाई रहते थे। उनके बीच इस बात पर दिन रात झगड़ा  होता रहता था कि उन दोनों में ज़्यादा बडा मूर्ख कौन है?

एक बार उस गांव में आंखमार बाबा विज़िट पर आये। गांव में, खासकर महिलाओं में खुशी की लहर दौड़ गई। वह इस कर के, कि आंखमार बाबा जिस भी बाँझ या निपूती को आंख मार दे, उसे दसेक महीने के भीतर पुत्र हो जाता था। बाबा ने एक सप्ताह गांव में बिताया। कई बाँझों निपूतियों को माँ बनने का कल्प कराया। जब बाबा डेरा उठा कर चलने को थे, तो उनको एक घर से झगड़ने॰ की आवाज़ आई।

‘ये?’ उन्होंने गांववालों से पूछा?

‘अरे हैंगे दो झगडालू भाई। कोई उनका मुख बंद नहीं करा सकता।’

किसी ने कहा।

‘हम देख कर आते हैं।’ दयालु बाबा बोले।

जहाँ से झगड़े की आवाज़ें आती थीं उधर जा कर उनने घर के भीतर भाइयों को जम कर झगड़ते सुना। बडा भाई कहता, ‘मैं इतना बडा मूर्ख हूं कि पूस के जाड़ों की दुपहरी में दिनभर यह सोच कर आम के पेड के नीचे लेटा रहा कि अब ऊपर से सीधे मेरे मुंह में पका आम टपकेगा।’ इस पर छोटे ने तुरुप जड़ी कि ‘मैं तो उस दिन काले बिल्ले को दूध के पतीले की रखवाली को बिठा कर सो गया। जागा तो पाया कि चौकीदार चोर था और उसी ने सारा दूध पी लिया। अब कह, क्या इससे मेरी मूर्खता तेरी वाली से कहीं बड़ी साबित नहीं होती?’

बड़ा बोला, ‘जा जा, उस दिन जब तूने खाना खा कर मुंह नहीं धोया था तो मैंने देखा किस तरह तूने चुपचाप चौकीदार बिल्ले को बुला कर उससे अपना मुंह साफ करा लिया था। चंट कहीं का!’

चंट पर चांटे की आवाज़ आई, फिर दूसरे चांटे की। अब बाबे से रहा न गया। तुरत भीतर जा कर बोला, ‘देखो, तुम अपनी अपनी मूर्खता पर इतना अभिमान न करो। बाहर की दुनिया बहुत बड़ी है जहाँ तुम दोनो से कहीं धाकड किसम के मूर्ख बसते हैं। जाओ, चंद दिन को बाहर गांव हो कर आओ। असल मूर्खता देखोगे तो खुद जान जाओगे कि कितने बीसी सैकड़े होते हैं।’

मूर्खों का क्या? तुरत दोनो ने भीतर जा कर चप्पलें डालीं और चल पड़े।

चलते चलते दोनो भाई एक ऐसे गाँव में जा पहुंचे जहाँ सारे गांव के लोग पीठ पर टोकरे लादे लादे चारों तरफ घूम घूम कर कोई अदृश्य चीज़ अपनी मुट्ठियों से कुछ पकड़ते हुए उसे टोकरों में डाल रहे थे। फिर कुछ देर बाद वे अपने घर के भीतर जा कर खाली टोकरा उलीच कर बाहर आ जाते और दोबारा वही करने लगते। उनको कुछ देर तक देखने के बाद बड़े मूर्ख भाई ने उनसे पूछा, ‘भाई, हम तो ठहरे मूरख। यह बताओ कि यह क्या अदृश्य चीज़ है जिसे तुम इतनी देर से अपने अपने हाथों से पकड़ पकड़ कर टोकरों में भरते हो?’

‘और फिर घर के भीतर जा कर काहे उलीच आते हो?’ छोटा मूर्ख बोला।

आदमी ने उनको ऊपर से नीचे तक घूरा और बोला, ‘अरे गांव में मच्छर बहुत हो रहे थे सो हम आँखमार बाबा से सलाह लेने गये। बाबा ने कहा मच्छरों की आवक बंद करने के लिये तालाब पाट दो, घरों को कस कर बंद रखो। उनके आदेश के अनुसार हम दिन भर बाहर ही रहते हैं।

‘लेकिन हम खाली नहीं बैठते। खेती पानी के बाद बाहर से दिन भर धूप और उजाला जमा कर कर के अपने घरों के भीतर उलीचते हैं।पर हमसे पिछले जलम में कौनो गलती हुई होगी सो दिन रात की मेहनत के बाद भी हमारे घरों के भीतर घुप्प अंधेरा भरा रहता है।’

मूर्ख भाइयों ने दो चार घरों के भीतर झांक कर देखा सचमुच हर घर में गहरा अंधकार छाया हुआ था। पर थोडी देर में उनको एक घर के भीतर किसी क्षीण सी फाँक से आती रोशनी में दिखाई दिया, कि यहां के घरों के भीतर खिडकियाँ और रोशनदान तो हैं, पर वे कस कर बंद हैं।

उनने बाहर आ कर गाँव के प्रधान को धीमी गति से एक खाली टोकरा लिये उजाला बटोरते देखा। ढीला कुरता-पाजामा, चेहरे पर लंबी दाढी और आधे चेहरे पर लपेटे गमछे तले भी उनकी मनहूसियत छिपाये न छिपती थी।

मूर्खों ने उनसे बात शुरू की तो अपनी नक्की आवाज़ में उन्होने मूर्खों को बताया कि ताल पाटने के बाद पानी की भी गांव में भारी किल्लत है। लिहाज़ा गांव में घरों का खाना-पखाना सब खुले में ही होता था। शाम गये जब बाहर भी अंधेरा हो जाता तभी वे लोग पेड़ की छाल या तेल में भीगी मशालों से थोडी देर को उजाला करते थे।

उजाला न होने से गांव की पाठशाला बंद पडी थी। बच्चे दिन भर मिट्टी धूल में टापू खेलते थे, पर बाबा का आदेश सर आंखों पर! बच्चे तो पंछी हुए पढें न पढें। प्रधान ने फिर बताया कि किस तरह बाबा की सलाह से एक ग्राम विकास की सरकारी निधि की तहत ‘उज्वल गृह योजना’ बनी थी। गांव में सबसीडी पर दिन के टैम उजाला बटोरने के हेतु प्राकृतिक उज्वलता पूरक टोकरियाँ वितरित कर दी गई हैं। अब  विकास का पैसा तो जमा होता जा रहा है। अब जब पहले उज्वला योजना सफलीभूत हो, तब रसोड़े-शौचालय वगैरा बनेंगे।

बडा मूर्ख बोला, ‘नेताजी हमको आप अगर एकमुश्त अभी के अभी अपने गांव की वह सारी ग्राम विकास निधि का पैसा दिलवा दें तो हम आपके गांव में नई क्रांतिकारी घर घर उजाला योजना से सब घरों का अंधेरा ऐसे मिटा देंगे जैसे गधे के सर से सींग! दीवारें भी बोल पड़ेंगी।’

यह तुरत किया गया। चार तगड़े आदमी और कुछ औज़ार साथ ले कर दोनों मूर्ख भाई घरों में घुसे और उन्होने धक्के मार मार कर एक एक कर सब बंद खिडकियाँ खुलवा दीं। सचमुच उजाला ही उजाला। दीवारें बोल पडीं। गांव नाच उठा। जिन कुछ बहुत पिछड़े घरों में खिड़कियाँ या झरोखे रोशनदान तक नहीं थे, उनकी दीवारों में भी सब्बल से सूराख बनवा कर मूर्ख भाइयों ने उनमें उजाला भर दिया।

गांववालों का शत शत नमन स्वीकार कर विकास निधि का पैसा अंटी में संभालते दोनो भाई आगे चले। ‘महामूर्ख लोग’ बडा भाई बोला।

इस बार उनको एक गाँव मिला जहां एक औरत अपनी दो भैंसों को जबरन अपने घर की छत से टिकी दो नसेनियों की तरफ खींचे जा रही थी।घर की छत शायद कभी साफ नहीं की गई होगी इसलिये वहाँ काफी रेता मिट्टी जमा हो गई थी और उस पर काफी हरी घास भी उग आई थी।

मूर्खों ने उस औरत से पूछा कि वह काहे पूंछ मरोड़ मरोड़ कर इतनी भारी जिसम वाली भैंसों को नसेनी पर चढवाने को हुश हुश कर रही है?

औरत बोली, ‘क्या बताऊं भाई, बडी ज़िद्दन हैंगी दोनों मरी।इब सारा चारा तो छत पर उगो है, पर भूखी नीचे खडी हैंगी।दोनों के लिये दू दू नसेनी लगा दीं फिर भी टस से मस नहीं हो रहीं। मुझे बडी फिकर है। मेरी दुधारू भैंसियां बिन हरा भरा ताज़ा चारा खाये मर गईं तो क्या होगा?’

मूर्खों को अब तक महामूर्खों की दुनिया की बाबत कुछ कुछ समझ आ चली थी। बडा भाई बोला, ‘बहन जी, अगर चार पैसे दो तो हम इनको यहीं खडी खडी रख कर भरपेट ताज़ा चारा खिलवा दूं।’

औरत राज़ी हो गई। बडे मूर्ख ने उससे एक दरांती ली और छोटे मूर्ख से बोला कि सीढी चढ कर वह खूब सारा हरा चारा काट कर नीचे फेंक दे। उसने यह कर दिया और उतर आया तो दोनो मूर्खों ने चारा नांद के पास धर कर दिया।सूखी नांद भर दी। बस, औरत की भैंसें तुरत हुमक कर खाने पीने लगीं।

मूर्खों ने औरत को कहा बस इसी तरह तू छत से चारा काट के इनको खिलाया कर। खूब दूध देंगी। भैंसों को चैन से पगुराते देख प्रसन्न औरत ने दोनो मूर्खों को भर हाथ पैसा ही नहीं दिया, अपनी भैंसिया के दूध की बनी स्वादिष्ट गाढी खीर भी खिलाई।

हंसते हुए मूर्ख भाई अब और आगे चले।

अगले गांव में एक जगह से खूब हल्ला गुल्ला ‘जोर लगा के हइशा!’ की आवाज़ें आती सुन कर भाई उधर लपके तो क्या देखते हैं, कि एक बडे परिवार के कई लोग पेड का एक बहुत बडा तना छोटे से दरवाज़े से जबरन अपने घर के भीतर ले जाने की कोशिश में पसीना पसीना हुए जा रहे हैं।

मूर्ख पास जा कर बोले, ‘भैया तुम लोग इतना बडा लक्कड किस लिये इस तरह भीतर ले जाना चाहते हो?’

परिवारवाले एक दूजे का चेहरा ताकने लगे। फिर एक बोला, ‘भैया बात जे है के कल रात आँधी में यह पेड़ घर के पास के जंगल में गिर पडा था। इससे साल भर की जलावन की लकडी जमा हो जावेगी हमारे कने। सोई हम उठा लाये। पण अब यह घर के भीतर ही नहीं घुस रहा। क्या करें? हम ठहरे महामूरख। तुम दोनों कुछ कमतर लगते हो तुम्हीं कोई जुगत बताओ।’

छोटा मूर्ख बोला, ‘जुगत तो हम बता दें पर पहले तुम हमको एक थैली चाँदी के रुपये दो फिर एक बढिया आरी और कुल्हाडे लाओ। बात की बात में ये सारा पेड़ भीतर पहुंच जायेगा।’

रुपयों और आरी का प्रबंध हो गया। दोनो भाइयों ने कुछ ही घंटों में सारे तने को चीर डाला और गांव वालों को समझाया कि वे टुकड़ा टुकड़ा काट कर लकड़ी को घर के भीतर ले जायें। उन्होने खुशी खुशी यह कर डाला। सारा लक्कड़ घर भीतर पहुंचा देख कर गांव में दोनो मूर्खों की जै जैकार होने लगी।

वज्रमूर्ख गांव! इस बार छोटा भाई बुदबुदाया।

अपने चारों तरफ के महामूर्खों और वज्रमूर्खों को देख कर घर की तरफ कदम बढाते मूर्ख भाइयों को लगने लगा कि वे नाहक ही खुद को बडा मूरख साबित करने के लिये इतने बरस झगड़ते रहे।

अरे इस दुनिया में महामूर्खों वज्रमूर्खों की कोई कमी है क्या? हर जगह एक से बढ कर एक नमूने हैं।

दोनो ने तय किया कि अब वे नहीं लड़ेंगे। वे घर जाकर अपनी एक नई नकोर  महावज्रमूर्ख पाल्टी (मवमूपा)बना कर पांच गांवों में पंचायत चुनाव लडेंगे। चंदे का क्या? इस यात्रा से भरपूर कमाई हो ही गई थी। तिस पर उन्ने ये भी पाया था कि इलाके में हर कहीं आंखमार बाबा के चेले आंख के अंधे और गाँठ के पूरे महामूर्ख लोग मौजूद हैं।

बाबा और भाग्य साथ दें, तो अगली बार वे बडा चुनाव भी जीत लेंगे और फिर सारे इलाके के मालिक हो जायेंगे। क्यों?

भाइयों ने यही किया। महावज्रमूर्ख दल यानी मवमूपाद बना। देखते देखते दोनो भाई पांच गांवों की पंचायत में पूर्ण बहुमत से मुखिया और उपमुखिया बन गये।

फिर जब दो साल बाद जब बड़े चुनाव आये, तो भाई बाबा से मिले। बाबा बोले  कि मूर्खों के देश में जहाँ सौ से ऊपर की गिनती जाननेवाला कोई न था, मतपत्र से नहीं, ध्वनि मत से चुनाव क्यों न कराया जाये? दोनो भाइयों ने इसका समर्थन करके बाबा ने-आदेश-दिया- है, सुन कर एकमत एकमत हुए महामूर्खों की सभा से यह प्रस्ताव भी पारित करा लिया।

चुनाव के दिन आंखमार बाबा को सर्वसम्मति से पर्यवेक्षक बना कर न्योता गया।

जब शोर शराबा हो रहा था तो बाबा का इशारा पा कर टीले पर चढ कर छोटा भाई जोर से चीखा, ‘बाबा पूछेंगे कि तुममें अपने असल बाप का जाया कौन? इस पर जो भी असल बाप का जाया हो, वह हाथ उठा कर तुरत कहे, ‘हाँ मैं हूं!’

बाबा ने आंख मारते हुए हंस कर पूछा: ‘असल बाप का जाया कौन?’

सारे मूर्ख और महामूर्ख और वज्रमूर्ख पार्टी के प्रचारक एक सुर में चिल्लाये, ‘हम हूं बाबा हम हूं!’

चुनाव संपन्न हुए।

बाबा ने दोनो भाइयों को गेंदे के हार पहना कर बडा नेता और छोटा नेता घोषित कर दिया और खुद हंसते आंख मार कर अंतर्ध्यान हो गये!

तो बच्चो, कुछ देखा, कुछ अनदेखा, कुछ यूं ही बातों की बात।

कानों सुना पुराना सा कुछ, पढने में कुछ आया हाथ।

कान की कलसी में भर लो बस रस। अब बस। महावज्रमूर्ख पार्टी की कहानी हुई खतम और महामूर्खों का पैसा हुआ हजम!

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