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  • कविता शुक्रवार 16: ध्रुव शुक्ल की कविताएँ विनय अम्बर के चित्र

    गांधी जयंती पर आज प्रस्तुत हैं ध्रुव शुक्ल की कविताएं और विनय अंबर के गांधी केंद्रित कुछ चित्र। कवि-कथाकार ध्रुव शुक्ल का जन्म वर्ष 1953 में सागर, मध्यप्रदेश में हुआ था। उनके अब तक तीन उपन्यास- ‘उसी शहर में’, ‘अमर टाकीज’ और ‘कचरा बाजार’ प्रकाशित हुए हैं। पाँच कविता संग्रह- ‘खोजो तो बेटी पापा कहाँ हैं’, ‘फिर वह कविता फिर वही कहानी’, ‘एक बूंद का बादल’, ‘सुनो भारत’ और ‘हम ही हम से खेलें’ (बच्चों के लिए) आए हैं। उन्होंने महात्मा गांधी की पुस्तक ‘हिन्द-स्वराज’ पर केंद्रित पुस्तक ‘पूज्य पिता के सहज सत्य पर’ लिखी है और स्मृति-लेख की पुस्तक ‘हम जो समझा किए’ भी है। सामाजिक विषयों पर उनके निबंध संग्रह ‘एक नागरिक की डायरी’ और ‘जनता की आलोचना’ प्रकाशित है।
    मध्यप्रदेश की लोक बोलियों पर उनके आख्यान हैं और आदिवासी संस्कृति और भीलों के मदनोत्सव ‘भगोरिया’ पर मोनोग्राफ प्रकाशित है। महाकवि तुलसीदास के रामचरित मानस में जलचरित खोजकर जल-सत्याग्रह का प्रस्ताव करते हुए एक लंबी कहानी ‘हनुमान की जुबानी – छोटी राम कहानी’ की रचना की। ‘होना शुरू होना’, ‘मेरा शहर’ और ‘उसी शहर में उसका घर’ के अतिरिक्त अनेक सम्पादित पुस्तकों में उनकी कविताएं, कहानियाँ और निबंध प्रकाशित हैं।
    उन्होंने कवि पिता माधव शुक्ल मनोज की चुनी हुई कविताओं के संकलन ‘बेला फूले आधी रात’ और कवि त्रिलोचन के काव्य और लेखन पर केंद्रित संचयिता का सम्पादन भी किया है। वे ‘पूर्वग्रह’ में आठ वर्षों तक सह सम्पादक रहे हैं। मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के सचिव और वही की पत्रिका ‘साक्षात्कार’ के सम्पादक भी रहे। उन्हें भारत के राष्ट्पति द्वारा कथा अवार्ड, मध्यप्रदेश कला परिषद का रजा पुरस्कार, गांधी पीस अवार्ड फ़ॉर लिटरेचर, राष्ट्रीय वैद सम्मान सहित कई पुरस्कार मिले हैं।
    आइए, विनय अंबर के चित्रों के साथ पढ़ते हैं ध्रुव शुक्ल की कुछ कविताएं-
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    (महात्मा गांधी के प्रति)
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    मृत्यु का स्वीकार
     
     
    जीती जागती मृत्यु में रह कर
    कोई उदाहरण चाहिए जीने का
    मृत्यु को स्वीकार किये बिना
    नहीं सँवारा जा सकता जीवन
     
    बढ़ता जाता अन्याय
    मृत्यु के स्वीकार बिना
    जीवन होता निरुपाय
    कहाँ होते न्याय के नियम
    वह होता अपने आप
     
    अपना-अपना ताप
    कौन किसे दे शाप
    केवल पश्चाताप
     
    सँवरता जाता है जब शोक
    रचा जाता कोई श्लोक
    अर्थ पा जाती गहरी आह
    निकलती महाकाव्य की राह
    जहाँ जीती जागती मृत्यु
    उदाहरण बन जाती जीने का
     
    जब जीवन के लिए
    कोई अकेला मन रोता है
    क्या रह जाता उसका
    वह पूरे जीवन का होता है
     
     
     
    तुलसीदास की याद
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    बीती सदियाँ पाँच
    साँच को कैसे आये आँच
    कह गये महाकवि–
    दूसरों की कविता सुनकर
    जो होते हैं हर्षित
    कम होते हैं जग में ऐसे कवि
    निज कवित्त ही लगता नीका
    सरस होय अथवा अति फीका
    जैसे नारी किसी नारि के
    मोहित होती नहीं रूप पर
    कवि अपनी कविता पर रीझें
    कवि मित्रों की कविताओं पर
    कवि ही नहीं पसीजें
     
    फँसे हुए कवि
    विश्व तरंग जाल में
    क्षीण हुई कविता की धारा
    हृदय ताल में
     
    श्रोता वक्ता ग्याननिधि
    हुए सब इंटरनेटी
    बिसर गये सब छंद-बंध
    केवल रह गयी चैटी
     
     
    (रवीन्द्रनाथ टैगोर की स्मृति में)
    ओ मेरे भारत के जन
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    भटक गये हैं देश के बादल
    सूख रहा है देश का जल
    बाँझ हो रही देश की धरती
    पशु-पंछी सब यहाँ विकल
    बदल गये हैं बीज देश के
    बिलख रहे हैं यहाँ किसान
    हुनरमंद असहाय देश के
    दो रोटी में अटकी जान
    बिखर गया है देश का आँगन
    और मर रहे देश के गाँव
    भूल गये अपनी पगडण्डी
    ठिठक गये हैं देश के पाँव
    बिगड़ गयी है देश की बानी
    डूब रहा है देश का मन
    जहरीली है हवा देश की
    टूट रहे हैं देश के तन
    अकड़ रहे हैं देश के नेता
    पकड़े परदेसी का हाथ
    देश बँट गया जात-पाँत में
    कोई नहीं है सबके साथ
    बेच रहे जो देश के साधन
    लूट रहे जो देश का धन
    उनको कब तक क्षमा करोगे
    ओ मेरे भारत के जन
     
     
     
    मन क्यों अशान्त
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    गगन शान्त
    भोर तरैया शान्त
    उगती बिरिया शान्त
    चुगती चिरिया शान्त
    काल शान्त
    शान्त ताल में
    मेघों के प्रतिबिम्ब शान्त
    धूप शान्त
    मंथर-मंथर वायु शान्त
    वृक्षों की छाया शान्त
    वृन्त पर पुष्प शान्त
    पुष्प पर तितली कितनी शान्त
    दूर्वांकुर पर जल-बिन्दु शान्त
    लिपा हुआ यह आँगन
    कितना शान्त
     
    साँवरी साँझ शान्त
    अकेला दीप शान्त
    नयनों से बहता दुख
    कितना शान्त
    नभ में शब्द शान्त
    शब्द में अर्थ शान्त
     
    तन क्यों अशान्त
    मन क्यों अशान्त
    जन क्यों अशान्त
     
     
     
     
     
     
    जन-गण मंगलदायक भरे बाज़ार में
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    बने-बनाये घर मिलते बाज़ार में
    बने-बनाये डर मिलते बाज़ार में
    बने-बनाये पर मिलते बाज़ार में
    नहीं मिलती है
    अपने मन की उड़ान भरे बाज़ार में!
     
    बने-बनाये प्रेम मिलें बाज़ार में
    बने-बनाये फ्रेम मिलें बाज़ार में
    बने-बनाये गेम मिलें बाज़ार में
    नहीं मिलता है
    अपने मन का खेल भरे बाज़ार में!
     
    बने-बनाये मुख मिलते बाज़ार में
    बने-बनाये रुख़ मिलते बाज़ार में
    बनी-बनायी तुक मिलती बाज़ार में
    नहीं मिलती है
    अपने मन की बात भरे बाज़ार में!
     
    बने-बनाये नेता मिलें बाज़ार में
    बने-बनाये अभिनेता मिलें बाज़ार में
    बने-बनाये विक्रेता मिलें बाज़ार में
    कहाँ मिलते हैं
    जन-गण मंगलदायक भरे बाज़ार में!
     
    बने-बनाये स्वाद मिलें बाज़ार में
    बने-बनाये वाद मिलें बाज़ार में
    बने-बनाये विवाद मिलें बाज़ार में
    नहीं मिलता है
    जीवन का संवाद भरे बाज़ार में!
     
    होता रहता प्रकट, रटा-रटाया दुख
    बने-बनाये सुख, पटे पड़े बाज़ार में
    कहाँ ज़रूरत कुछ रचने की
    सब मिलता है बना-बनाया भरे बाज़ार में!
     
     
     
     
    भौंका चैनल भौंक रहे...
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    सूनी सड़कें घर में बच्चे चौंक रहे
    मौन नागरिक,भौंका चेनल भौंक रहे
    वे सरकारी ढोल बजाते रहते हैं
    वे दरकारी बोल छिपाते रहते हैं
    जनता लड़ती नहीं किसी से
    हर चेनल पर भौंका पेनल लड़ते हैं
     
    इस चेनल पर चार भौंक देते कोई
    उस चेनल पर चार भौंक देते कोई
    कुछ पूँछ उठा कर भौंक रहे
    कुछ पूँछ दबा कर भौंक रहे
    सब बाँध इलाका भौंक रहे
    बदअमनी की आग लगाकर
    देश भाड़ में झौंक रहे
     
    इस दल-बल के भौंका चेनल भौंक रहे
    उस छल-बल के भौंका चेनल भौंक रहे
     
    जनता की तबियत ढिल्ली-सी
    नेतागिरी शेख चिल्ली-सी
    लोकतंत्र का खम्बा नोंचे
    एंकर खिसियानी बिल्ली-सी
     
     
     
     
    इबादत रह जाती है शेष
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    स्वार्थरहित जीवन की
    कविता में बसी अयोध्या
    परमार्थ की प्रेमकथा में
    बसी हुई है मथुरा
    मृत्यु का मार्ग प्रकाशित करती
    कई जन्मों से काशी
     
    हृदय की गहराई में सरजू
    नयनों में यमुना नहीं सूखती
    मस्तक से उतरी गंगा में
    आज तक नहीं मिटा प्रतिबिम्ब
    जलती हुई चिताओं का
     
    नहीं सूखती किसी देह में
    भागवत इतिहासों की धारा
    स्मृति में नहीं उजड़ते नगर
    बसते रहते हैं कई बार
    सदियाँ बीतीं थक गये सितमगर
    ढोते अपनी लूट-मार का इतिहास
     
    इबादत रह जाती है शेष
    सुबह-शाम की रौशनियों में
    किस का देश, कहाँ परदेस
    कौन पराजित कौन विजेता
    प्रत्येक दिशा में काशी-काबा
    प्रकाश पर किस का दावा
    आग सभी ने तापी
    खुली ज्ञान की वापी
    हम पाये राम रहीम
     
    मेरी प्रार्थना में राम जैसे हिन्द के इमाम
    घनश्याम के गेसू जैसे फ़ारसी की लाम
    ख़ाक-सी यह ज़िन्दगी जैसे काशी धाम
     
    जीते-जी सब हों उदार
    किसी एक पर क्यों हो यह भार
    कोई कब तक रोता रहे अकेले में
    किस से माँगे और किसे दे सन्मति
     
    किसी की सुनता नहीं आसमान
    जहाँ खो जाता है कीर्तन
    वहीं ढूँढे न मिले अजान
     
     
     
     
     
    शब्द-घन छाये
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    नाम-नीर की बूँद झरी
    हम रूप-रंग रस पाये
    शब्द-घन छाये
     
    नाम-नदी में रंग बरसे
    हम तन-मन खूब रँगाये
    शब्द-घन छाये
     
    नाम-नेह की देह धरे
    पुलकित लोचन भर आये
    शब्द-घन छाये
     
    अँसुवा झर-झर गगन उड़े
    बादल बन फिर गहराये
    शब्द-घन छाये
     
    नाम-रूप रंग राम रँगे
    ध्रुव राम-नाम गुन गाये
    शब्द-घन छाये
     
     
    आगे राम-नाम चलत…
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    आगे राम-नाम चलत पीछे रघुरैया
     
    अगुनन में सगुन सगुन
    सगुनन में अगुन अगुन
    करमन में करुन करुन
    रमत हैं रमैया
     
    साँसन में गान-तान
    बातन में भाव-भान
    नरतन में एक प्रान
    नाच के नचैया
     
    भुवनन को धारे राम
    ध्रुवनन को तारे राम
    तन-मन-धन वारे राम
    मनन के हरैया
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    विनय अंबर : कला से बड़ी मनुष्यता
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                   — राकेश श्रीमाल
             आज एक ऐसे चित्रकार के बारे में लिख रहा हूँ, जिन्हें केवल चित्रकार कहना या मान लेना सरासर अन्याय ही होगा। वाकई वह ऐसा विरला व्यक्तित्व है, जो कला के किसी भी अनुशासन में एक पीढ़ी में इक्का-दुक्का ही सम्भव हो पाते हैं। विनय अंबर नामक यह शख्स यूँ तो विनयशीलता का अंबर हमेशा ही अपने साथ लिए चलता है, लेकिन उसकी इस भलमनसाहत का नाजायज फायदा उठाने वाले बीते समय में धीरे-धीरे यह भलीभांति समझ गए हैं कि सदाशयता और परहित के लिए सोचने-करने वाला यह व्यक्ति डराने वाली आँखें और आग उगलने वाली जुबान भी रखता है। सरलता, सहजता और ईमानदारी से टूटकर प्रेम करने वाला यह व्यक्ति बेईमानी, घटियापन और क्षुद्रता से निपटने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
           पाब्लो नेरुदा की इस कविता में वह खुद अपने आप को हमेशा खड़ा पाते हैं–
    यह हूँ मैं तुम्हारी दुनिया के रंग के सामने
    पीली सी मरी हुई तुम्हारी तलवारों के सामने
    फिर से एक हुए तुम्हारे दिलों के सामने
    तुम्हारी खामोश भीड के सामने
    में हूँ पतझड़ और
    प्रतिरोध में लिपटी
    तुम्हारी मरणासन्न गंधों की लहर के सामने
    मैं शायद
    असंभव विकल्पों की तलाश में
    इस जमीन पर आया हूँ
           विनय ने कोई युद्ध नहीं देखा। हाँ, भारत पाकिस्तान का युद्ध, जो 1971 में हुआ था, उसका साया उनकी याद में है। उसका अंधेरा याद है, शाम का सायरन याद है जो घर की बिजलियाँ बंद करने के लिए बजाया जाता था। घर में काँच की खिड़कियों पर कालिख पोतना याद है। विनय ने कुछ सांप्रदायिक दंगे देखे हैं नजदीक से, बहुत ज्यादा नजदीक से। बारीक सुराख से साफ साफ। मनुष्य द्वारा मनुष्य से घृणा-द्वेष फैलाने, मनुष्य द्वारा मनुष्य की हत्या का षडयंत्र देखा।
    देखा तो बहुत कुछ। पर विनय को गुस्सा यह देखकर आता है कि कोई युद्ध इस तरह से भी लड़ा जायेगा, जिसमें कोई हथियार नहीं होगा, यह विश्व युद्ध अपने ही नागरिकों के खिलाफ हर देश की सरकार लड़ रही है। सच तो यही है कि युद्ध कहीं भी किसी के भी बीच हो, मारा मनुष्य ही जाता है। ऐसा होगा कभी सोचा नहीं था । यह इक्कीसवीं सदी का सच है । और विनय तो बीसवीं सदी (साठ के दशक) में जाती हुई फरवरी की सर्दियों में माँ की कोख से बाहर आये थे। उनके लिए यह जीवन भी युद्ध ही है। यह जमीन युद्ध भूमि और सब युद्ध शरणार्थी। वे कहते हैं– “हम उन्हीं जैसे लोग हैं जो शरणार्थी कैंपों में एक डबल रोटी और एक कप दूध के लिये संघर्ष करते हैं। पैदा होते ही दूध के लिए अपना भी संघर्ष शुरु हो गया था। मेरी माँ के स्तनों में दूध कम उतरता था। यह मेरी माँ ने ही मुझे बताया था। मुझे कोई रोता हुआ नहीं देख सकता था। सो मेरी बड़ी बुआ मुझे अपने आँचल में ढ़ाक लिया करती थी और कभी कभी अम्मा (दादी )भी मुझे अपनी गोदी में लेटा लेती और अपने स्तनों से लगा लेती। बाबा (दादा) पुलिस की नौकरी में थे। घर में गाय और बकरियाँ दोनों थी। बाबा का प्यार उस कहावत की तरह था जिसमें मूल और उसके ब्याज का जिक्र किया गया है। वे शाम को आते और मुझे  गाय के पास ले जाकर उसके थन धोकर  मेरा मुंह उसके थन में दे देते । इस तरह आप मेरे बचपन से ही मेरे संघर्ष की कल्पना कर सकते हैं। संघर्ष यहीं विराम नहीं लेता। यह कमबख्त मुझे बचपन से ही वरदान के रुप में मिला था। थोड़ा सा बड़े हुए तो पिता द्वारा सीमेंट में बनाई गई एक स्त्री की आदमकद प्रतिमा के स्तनों में दूध की तलाश में उन्हें चुसने लगा। मुँह की लार जब सूखी सीमेंट पर लगती तो एक सौंधापन इन्द्रियों में प्रवेश करता जो और मोहित करता। मैंने देखा था उस प्रतिमा के स्तन मेरे हाथों के  बार-बार छूने से कुछ काले से हो गए थे। जैसे कामातुर पुरुषों द्वारा पाषाण यक्षणियों के स्तनों को सहलाने से वे काले हो जाते हैं। पर इस पाषाण स्त्री के स्तन तो वात्सल्य में काले हुए थे। वह प्रतिमा मेरी स्मृति में अभी भी जस की तस है। उसे सहजने की जब समझ पैदा हुई तब तक वह मुहल्ले पड़ोस वालों की क्रूरता की शिकार हो चुकी थी। आपको जानकर हैरत होगी कि मैं आठवीं कक्षा तक अपनी अम्मा (दादी) का स्तनपान करता रहा। स्कूल से आता और सीधे अपनी अम्मा की गोद में। उनका वात्सल्य था कि वे भी मेरा इंतजार करती थीं। मैंने बचपन से ही असंभव विकल्पों को तलाशना शुरु कर दिया था ऐसा मुझे अब लगता है। आप ही देखें कि पिता के पढ़ाने और सिखाने की चप्पल से धुनाई पद्धति वाली चोटों और टीभन को भुलाने के लिए सभ्रांत घर का कोई बच्चा, वो भी दूसरी कक्षा का छात्र, बीड़ी पी सकता है क्या ? एक छः साल के बालक के दिमाग में यह समझ पैदा हो सकती है क्या ? जीवन में बड़ी जल्दी जल्दी बहुत कुछ हो गया । वे सारी बातें , घटनाएँ जो जवानी के समय शुरु होती हैं अपन ने बचपन में ही निपटा दी थीं और अनुभवी हो गए थे। मसलन गाँव में एक वैवाहिक समारोह में रात सोने के लिये जगह तलाशते हुए एक आवाज कानों में आई -‘यहाँ आ जा ‘ मैं गया और लेट गया। नींद में था मुझे लगा कोई मेरा हाथ उठा रहा है। कसमसाया पर यकायक मेरा हाथ कुछ बालों वाली जगह में दोनों पैरों के बीच दबा लिया गया था। मैं थोड़ी देर ठहरा और ढील मिलते ही अंधेरे में ही उठ कर भाग लिया।”
                     राखी, रेखा, जया, ज़ीनत, डिम्पल, नीतू और परवीन के जमाने में  विनय वयस्क हो रहे थे। राजेश, धर्मेन्द्र, अमिताभ, विनोद, शशि, राकेश रौशन, मिथुन और ऋषि कपूर की मध्यम वर्गीय नायकों वाली छवियों के साथ सामाजिक चेतना विकसित हो रही थी। हालांकि विनय फिल्मों से बहुत दूर थे। उस समय लुगदी पेपर पर छपने वाले तीन सैकड़ा पृष्ठीय  गुलशन नंदा जैसे लेखकों के उपन्यास पढ़ना और फिल्म देखना अपराध की तरह ही माना जाता था। बच्चे गलत बातें इन्हीं से सीखते है, ये आम धारणा थी। तो कुल मिलाकर विनय ने सबसे पहली फिल्म मेटनी शो में इस्टमेन कलर में देखी ‘बॉबी ‘ और गुलशन नंदा के किसी उपन्यास के चार पन्ने पढें जिसका नाम अब उन्हें याद नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि बॉबी फिल्म का जंगल और शेर के साथ न्यूड वाला सीन उन्हें आज भी याद है और उपन्यास के चार पन्नों में से एक यह लाइन कि ‘जिससे आप प्रेम करते हो वह आपको मिल जाए तो स्वार्थ बन जाता है और न मिले तो वह प्रेम अमर हो जाता है’ याद है।
             ग्वालियर के जिवाजी क्लब में विनय क्रिकेट खेलने जाने लगे थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्व. माधव राव सिंधिया वहाँ उनके कोच हुआ करते थे। रोहित  तलवार का नाम उन्हें अच्छे से याद है वह सीनियर था और लेफ्टी था। जबरदस्त बल्लेबाजी करता था। ये सब होशियारी देखकर उनके बाबा (दादा) ने पिता को जबलपुर पत्र लिखा कि आपकी संतान हाथ से निकले इससे पहले आप उसे यहाँ से ले जाएँ। विनय के पिता ग्वालियर से सिमको की नौकरी और कला कर्म छोड़कर जबलपुर में नई स्थापित हुई ग्रे आयरन फैक्ट्री में सरकारी मुलाजिम हो गए थे।
                 विनय अंबर पिता के एक मित्र के साथ राज्य परिवहन की बस से जबलपुर आ गए। वे गर्मी की छुट्टियाँ थी। पिता का भय उनके पुराने अनुभवों के आधार पर विनय में घबराहट पैदा कर रहा था। जबलपुर की बोली भाषा व्यवहार और शहर उन्हें रास नहीं आ रहे थे। उन्होंने खाना बंद कर दिया था। यह बात पिता को पता लगी। उन्होंने तत्काल निर्णय लिया कि हम आपको बस में बैठा देते है चले जाना। हम तो छोडने जा नहीं पायेंगे, छुट्टी नहीं है। बगैर सोचे समझे विनय ने तत्काल हाँ भर दी। दूसरे दिन पिता राज्य परिवहन की बस में पहचान के ड्राइवर कंडक्टर को मय सामान के हवाले कर निकल गए। 480 किलो मीटर का सफर। बस शाम 7 बजे ग्वालियर के लिए निकली। ड्राइवर साहेब गुलाम अली की गज़लें गाते सुनाते चले जा रहे थे।
                    सबसे आगे वाली सीट पर मस्त लेटे थे विनय। बस रात को एक गंभीर हादसे का शिकार हो गई। दस आदमी घायल और दो की मौत। विनय ने पूरा एक्सीडेंट देखा। ड्राइवर वाली साइड पर ट्रक ने टक्कर मारी थी जिसमें बस के बीच से लेकर पीछे तक के यात्री चोटिल हुए थे। विनय चुपचाप आखें बंद करके अपने आप को हालात के हवाले किये रहे।
            जनाब विनय बाबू वापस ग्वालियर आ गए। और पढ़ाव वाले मिसहिल स्कूल में फिर से पढ़ने लगे कक्षा सातवीं में। फिर वही हाल, पर इस बार विनय बाबू के जीवन में एक नया एडिशन यह हुआ कि वे मार धाड़ में भी शामिल होने लगे। अमिताभ बच्चन का जमाना था। छीनू और विजय की गेंग हर मोहल्ले में होती थी। विनय बाबू विजय की गेंग के छोटे मेम्बर बन गए थे। यानि अपने मोहल्ले के अमिताभ बच्चन। अशोक अग्रवाल की गेंग के वे छोटे बच्चन कहलाने लगे थे। यह सब चलता रहा और वे तानसेन कला वीथिका में अप्रत्यक्ष कला शिक्षा भी लेते रहे। क्रिमनल और क्रियेटिव एक्टिविटी एक साथ चलती रही। आठवीं की बोर्ड परीक्षा में फैल करार दे दिए गए। पानी सर से ऊपर गुजर गया। चारों तरफ हाथीचाल वाली स्थिति थी।सिर्फ उपाय के तौर पर सीधे जबलपुर पिता के पास पार्सल करने की तैयारी शुरु हो गई।
           विनय बोरिया बिस्तर लेकर जबलपुर आ गए। वर्ष 1978 था। एक छोटा शहर इकहरी सर्पीली सड़क पर बसा शहर , तालाबों का शहर , पत्थरों का शहर : शान्त सा ठहरा हुआ सा शहर। तांगों वाले शहर से रिक्शे वाले शहर में आ गए थे। बुन्देली के बीच खतरनाक अंग्रेजी बोलने वाला शहर। उस दौर के बारे में विनय कहते हैं– “हमें सेठ गोविन्द दास के परिवार की शिक्षण संस्था हितकारणी के एक स्कूल में दाखिला मिल गया जो घर के पास ही था। यहाँ मुझे मजेदार बात यह लगी कि स्कूल यूनीफार्म के नाम पर केवल पेंट शर्ट ,न जूता न मोजा ….. बस्ते के नाम पर आप पीरियड के हिसाब से आप किताब कॉपी ले जा सकते थे। दो रिशस होती थी , एक में आप घर जाकर खाना खा कर वापस आ सकते है । अंग्रेजो वाले अनुशासनी  कैद से आज़ाद हो गया था । अब जब सोचता हूँ तो जीवन की व्याख्या ही अनोखी लगती है । ऐसी ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं और आप बड़ी सहजता से उसमें शामिल हो  जाते है और आपको पता ही नहीं चलता। जीवन के इसी तारतम्य में मुझ बिगड़े नबाब को व्यस्त कर कसे रहने के तरीके सोचे जा रहे थे। क्योंकि हम जिस मोहल्ले में रह रहे थे वह भी जबलपुर का ख्यातनाम मोहल्ला था और अपनी गेंग वार गुण्डागर्दी के लिए जाना जाता था। तो हुआ यूँ कि हमारे घर के पीछे से रोज़ सुबह सारेगमपधनिसा की मधुर ध्वनियाँ हमारे घर तक पूरी तान के साथ आती थीं । माता श्री ने पता किया .. पता लगा कि पीछे उमा नाम की एक लड़की शास्त्रीय गायन एवं सितार सीखती हैं। पता किया गया कि कहाँ सीखती हैं .. और हम तीनों भाई बहिनों को संगीत महाविद्यालय का रास्ता बता दिया गया । हम अपनी उमा बुआ जी के साथ एक के पीछे हर रोज शाम पाँच बजे संगीत महाविघालय चले जाते। मैंने वॉयलिन सीखा ,बी . म्यूज किया । एम. म्यूज पूरा नहीं कर पाया । छोटी बहिन ने तो सितार में एम . म्यूज किया और सारंगी पर पी.एच . डी. कर डाली यह सारंगी जैसे वाद्य यंत्र पर अब तक की पहली पी.एच डी है । अब वह संगीत में सितार की प्राध्यापक है, मैहर घराने से ताल्लुक रखती है। सबसे छोटी बहिन का मन नहीं लगा सो पहले ही छोड दिया था। इस गतिविधी ने मुझे स्कूल , मोहल्ले और घर से बाहर का जबलपुर दिखाया । इस बाहर ने मुझे कब अन्दर कर लिया समझ ही नहीं आया ।  कब जबलपुरिया बना लिया पता ही नहीं चला।”
           ऐसा नहीं है कि बुरे लोगों की संगत ही आपको बिगाड़ती है । कई बार अच्छे लोगों की संगत भी आपको अच्छे से बिगाड़ देती है फिर तमाम उम्र आप नहीं सुधर सकते । विनय को भी कुछ अच्छे लोगों की संगत ने अच्छे से बिगाड़ा और कुछ किताबों ने , जिसमें सोवियत भूमि , सोवियत नारी में छपने वाले सुन्दर फोटोग्राफ के आकर्षण ने भी अपना रोल अदा किया। एक पत्रिका जो घर आती थी वह थी धर्मयुग इस पत्रिका में छ्पे एक लेख और फोटो ने उन जैसे उल्टे दिमाग मनुष्य का और बेड़ा गर्क कर दिया इसमें जो लेख छ्पा उसमें जाने-माने छायाकार एस .पॉल को देखा और उनके बारे में पढ़ा दिमाग फिर गया और फिर एक असंभव विकल्प को चुनने की ठान ली …. वह थी फोटोग्राफी ।
              विनय के जीवन में यह एक तरह का टर्निंग पॉइंट था। आगे की कहानी उनके एक कलाकार बनने की है। फ़ोटो पत्रकारिता करते हुए फाइन आर्ट्स कॉलेज में जाना और फिर  फ्रीलांस कलाकार की तरह अपनी शर्तो पर जीना। इस कहानी में भी बहुतेरे मौड़ है। उनकी यह घुमावदार लेकिन रस से भरी कथा फिर कभी। फिलहाल नीचे दिए लिंक पर आप संगीत के बीच चित्र बनाते हुए विनय अंबर को देख सकते हैं।

    https://youtu.be/_WoPe7ZM5yg 

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    राकेश श्रीमाल (सम्पादक, कविता शुक्रवार)
    कवि और कला समीक्षक। कई कला-पत्रिकाओं का सम्पादन, जिनमें ‘कलावार्ता’, ‘क’ और ‘ताना-बाना’ प्रमुख हैं। पुस्तक समीक्षा की पत्रिका ‘पुस्तक-वार्ता’ के संस्थापक सम्पादक।
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