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  • प्रमोद द्विवेदी की कहानी ‘गीता बाली तेरी याद में’

     

    प्रमोद द्विवेदी पत्रकार रहे हैं। जनसत्ता अख़बार में फ़ीचर संपादक। कहानियाँ कम लिखते हैं लेकिन अपने ग़ज़ब की पठनीय कहानियाँ लिखते हैं। उनके किरदार याद रह जाते हैं। यह कहानी पढ़िए-

    ==================

    जनवरी की सर्दी में सुबह-सुबह पांच बजे घमंडी यादव का घबराया हुआ फोन आया, ‘गुरु गीता बाली के कउनो कैसेट रखे हो।’

    मेरी खोपड़ी घूम गई। पहले लगा रात वाली जिन का असर है। मैंने आलस्य भाव से भुनभुनाकर कहा, ‘अबे, गीता बाली कोई सिंगर थोड़ी थीं। काहे, अचानक क्या हो गया सुबह-सुबह भंगिया चढ़ा लिए क्या।’

     ‘अरे नहीं गुरुवर, कवि जी प्राणै नहीं छोड़ रहे हैं। एक घंटा से भुईंलोटन किए हैं…बड़बड़ा रहे हैः ‘स्साले सम्मी कपुरवा तुम्हारे कारन सब हुआ…। हम समझ नहीं पा रहे हैं। अब जाकर बोले हैः घमंडी गंगाजल मुंह में ढार दो…पर बउवा रे, कम से कम एक बार हमरी गीता बाली की आवाज सुनवा दो…हरे राम क्या आवाज, क्या अदा रही- सुन बैरी बलम सच बोल रे इब क्या होगा…। हाय, तुम्हारे सितमगर इब ने जान ही निकाल ली थी गीता रानी।’

     ‘भइया, हमरे तो समझै में नहीं आ रहा है कि मरती बिरिया ना तो राम याद आए, ना पुरखा, ना भाई भौजाई…। याद आई तो पुराने जमाने की गीता बाली। दइया रे कौन जमाने की हीरोइन। लग रहा है, बुढ़ऊ जूड़ी के मारे सन्निपात में बरबरा रहे हैं।’ घमंडी अब कुछ परेशान था।

    मेरी समझ में आ गया कि कवि बस कुछ पलों के मेहमान हैं। अंतिम क्षणों में उन्हें गीता बाली इसलिए याद आ रही है कि उसके चक्कर में जवानी से लेकर बुढौती तक कुरबान कर दिए। बेचारे ब्याह तक नहीं किए। घाटमपुर के कछवाहा राजपूत होने के कारण शादी के लिए बुढ़ौती तक प्रस्ताव आए, पर कुंवर साहब अड़े थे, ‘ हमने तो उन शोख आंखियों को सब अर्पित कर दिया। हाय रे क्या अदा थी उन आंखों में…इब क्या होगा…ससुरा फांस की तरह करेजे में ऐसा धंसा यह इब कि निकारे नहीं निकसत…!’

     विजया महरानी की तरंग में कवि जी ने एक बार हमें सगर्व बताया था कि सन इक्यावन में उन्होंने गीता बाली के गाए इस गाने को सुनने के लिए पच्चीस बार ‘बावरे नैन’ देखी। राजकपूर ना सुहाया रत्ती भर उन्हें। हालांकि कभी-कभी वे राजकपूर की तरह गुनगुनाया करते थे- खयालों में किसी के इस तरह इस तरह आया नहीं करते….। ‘हम तभी तय कर लिए थे कि एक बार बंबई जाकर गीता बाली को देखेंगे जरूर।’ मैंने एक बार बताया कि ‘इब’ वाला गाना तो राजकुमारी ने गाया था। आप गीता बाली से काहे जोड़ देते हो? वे तो बमक गए, ‘अरे राजकुमारी और राजकुमार गए चूल्हे में। हम तो फिलिम वाली गायिका को जानते हैं-इब क्या होगा।’ इब उनके अंदर ऐसा समाहित हुआ कि आज भी मौका पड़ते ही कह डालते- ‘इब क्या होगा।’ ट्रांसफार्मर में धमाका हो जाए तो वे कह बैठते, ‘अबे घमंडी इब क्या होगा, रात भर की हो गई फुरसत।’

    लेकिन सुविज्ञों की महफिल में वे गीता बाली की चर्चा अलग मस्ती में करते थे- हम हुए तुम हुए कि मीर हुए, उनकी जुल्फों के सब असीर हुए। मतलब यह कि गीता बाली कवि के जीवन का पहला प्यार था। ऐसा प्यार, समझो वे मर्दों की दुनिया के राधेराजा थे। पंद्रह साल बंबई और इधर-उधर रहकर जब कानपुर लौटे तो उनकी लोहे की बकसिया में चार जोड़ी कपड़ों के अलावा गीता बाली के दिए कुछ सिल्की रुमाल, एक सुनहरा पेन, एक विलायती पाउडर का डिब्बा और कुछ कथित पत्र, कुछ फोटो थे। इस पूंजी को उन्होंने सीने से लगा कर रखा। जब भी कोई कवि, पत्रकार या रसिक मित्र आता, वे जरूर दिखाते कि ‘ये गीता की निशानी हैं…।’ बताकर वे सपनों में खो जाते। कुछ ज्यादा ही खिल्लीबाज बूढ़े दोस्त यह जरूर पूछते कि ‘गुरुवर यह बताओ…कभी एकाध चुम्मा-वुम्मा भी लिए कि ऐसनै लुलुहाते रहे।’ वे नाराज हो जाते, ‘ मोहब्बत इन चीजों से ऊपर की शै है…ऊ मरदूद सम्मी कपूरवा बीच में घुस गया। खैर हम तो अफलातूनी इश्क कर रहे थे।’ फिर निराश होकर गुनगुनाते-‘ किस्मत पर भरोसा हो तो दांव लगा ले।’ ‘ फिल्म बाजी में देवानंद के साथ किस अदा से गाया था…हमारी गीता ने।’

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    बहरहाल घमंडी से मिली सूचना पर भड़भड़ाकर मैं उठा और अपने कैसेट भंडार से एचएमवी वाला वह कैसेट तलाश लिया जिसमें गीता बाली पर फिल्माए गाने थे। बावरे नैन, बाजी, अफसर, अलबेला, आनंदमठ, जाल, दुलारी जैसी फिल्मों के गीत थे। मैंने अपना फिलिप्स वाला टू इन वन उठाया और कवि के घर की ओर चल पड़ा। उनका घर पास में ही था। एक खाली प्लाट में बने दो कमरे वाला घर ही उनका आखिरी बसेरा था। सेवा के लिए उन्होंने वन विभाग में काम करने वाले एक लड़के को रख लिया था जिसका नाम था घमंडी सिंह यादव। एकदम सरल और अथक सेवाभाव वाला। पता नहीं कैसे यह नाम पड़ गया। वह कवि जी के गांव तिवारीपुर का था। उस पर भरोसा कर उन्होंने साथ रख लिया। उसका रहना फ्री। बदले में वह कवि की भोजन व्यवस्था करता। शाम को ठेके से भांग की एक गोली ले आता। यही कवि का जीवन था। संपत्ति के नाम पर उनके चार पांच गीत संग्रह, अंग्रेजी-हिंदी की दो-तीन सौ किताबें और एक सोनी का टेप रिकार्डर था, जो उन्हें इंदीवर ने नेपाल से मंगवाकर दिया था। टीवी उन्हें माल रोड के एक जनवादी बुकसेलर रमते राम सिंघल ने दिलवा दिया था। उनके कमरे में किसी भगवान की तस्वीर नहीं थी। एक श्वेत-श्याम तस्वीर में वे गीता बाली, केदार शर्मा, साहिर लुधियानवी और भगवान दादा के साथ दिख रहे थे। वे एकदम गीताबाली के कंधे से लगे खड़े थे। और यह तस्वीर उन्होंने इस प्रमाण के लिए लगा रखी थी कि देखो हम गीता बाली के कितने करीब थे…। तस्वीर में गीता बाली बहुत सुंदर लग रही थी। वही गोल, नूरानी चेहरा, स्कूली लड़कियों जैसी दो चोटियांl उन्मुक्त हंसी के कारण पूरे दिखते सुंदर दांत।

     हमने इस तस्वीर के बारे में पूछा तो कवि जी ने व्याख्या सहित बताया, ‘यह तस्वीर फिल्म बाज की शूटिंग के दौरान फोटोग्राफर राजू राय ने खींची थी।’ बताते-बताते कवि यह जरूर कह डालते कि ‘अभी-अभी तो हम दिल के कोने में बित्ता भर जगह बनाए थे। जब भी यूनिट का खाना आता, वह हमे बुलाकर खाती। कहती- राइटर साब तुम्हारे गीत एक दिन जमाने को मुतासिर करेंगे।’ वह दुलार या प्यार से उन्हें राइटर साब कहती थी। पर हाय री बदबख्ती! एक दिन देखा, बेहद गोरे गाल वाला मुस्टंडा पंजाबी उसके गले में हाथ डाले घूम रहा है। कवि का दिल बैठ गया। फिल्म के एक सहायक निर्देशक से पूछा, ‘अबे ये ललमुंहा कौन है, यह तो गीताजी के गले पड़ गया।’ वह हंसा, ‘अमां कविराज अपनी नादान मुहब्बत की बत्ती बनाकर अंदर डाल ले…ये नया हीरो शम्मी कपूर है। इसका ताजा आशिक। अबे ये सोंणी सरदारनी है, इसकी वेटिंग लिस्ट से अपना नाम हटा ले। यह देव साहब को गच्चा दे गई। राज कपूर छू-छाकर इससे अलग हो गया। गुरुदत्त तरसता रहा। भगवान दादा सीटी बजाता रह गया। अब इस दिलजले की गोदी का आनंद ले रही है। देखना, शादी कर लेंगे….।’

     भावों से भरा कवि शैल आगे नहीं सुन सका। उसे लगा, इंकलाब की कविताओं के बाद उसके दिल से विरह और बेवफाई के गीत फूटने वाले हैं।

     ये शायद 1950 के आसपास की बात रही होगी। नारी-कृपा को तरसते कवि की उम्र पैंतीस साल की हो गई होगी। अच्छा खासा वे हरिवंश राय बच्चन और पंडित प्रदीप के साथ मंच पर कविता पढ़ते। लखनऊ-इलाहाबाद से सागर तक उनके श्रोता थे। पता नहीं देवास में खयाल गायक कुमार शंकर की बैठक में किसी अशुभचिंतक ने कह दिया कि कविवर एक बार बंबई में हुनर दिखाओ। कवि की किस्मत देखिए, जिस ट्रेन में वे बंबई जा रहे थे, उसी में नैना बोस नाम की एक छोटी कलाकार थी। ऊपर की बर्थ पर वह, नीचे कवि। उसने मीठी बांग्ला आवाज में कहा, आप ऊपर आ सकते हैं। पहले तो कवि घबराए- क्या मादक पेशकश है। थोड़ी देर में समझ में आया। वह नीचे आ गई। फिर यह हुआ कि जब तक मन करे बतियाते हैं। दोनों की दोस्ती हो गई और उसने कवि को बता दिया कि अंधेरी ईस्ट के जेबीनगर में उसका दो कमरों का फ्लैट है। जब तक उसका ठिकाना ना बने, वहां रहे। कवि की तो मुराद ही पूरी हो गई। भाग्य पर भरोसा होने लगा।

     उसने सब कुछ तो बता दिया, पर यह नहीं बताया कि वह कुंवारी है। कवि ने उसकी हिम्मत को दाद दी और वादा किया कि इस भरोसे को वह कायम रखेगा। हालांकि हकीकत कवि को बाद में समझ में आई। पता चला कि यह फ्लैट तो उसे टीटू ढोलकिया नामक सट्टेबाज सेठ ने दे रखा है और वह एक तरह से उसकी रखैल है।

     कवि ने बिना उसे छुए-छाए एक दिन राम-राम कही। बंगालन ने कहा भी कि क्या बाबा फुटपाथ में सोएगा। बंबई में छोकरी भी आराम से मिल जाता है, पर ठिकाना नहीं मिलता। पर चरित्रवान कवि नहीं माना। उन्होंने याद किया, उनका एक भतीजा टाइम्स आफ इंडिया की फिल्मी पत्रिका में है। ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वे टाइम्स पहुंच गए और भतीजे राजन सिंह राजपूत को ढूंढ़ निकाला। तसल्ली हुई कि भतीजे ने बंबइया तेवर नहीं दिखाए। अकेला था, इसलिए अपनापन कुछ ज्यादा ही दिखाया। अपने घर ले गया। कवि ने जैसे ही बताया कि वे फिल्मों में गीत लिखने आए हैं, उसने कहा कि केदार शर्मा, मजरूह, गीताबाली जिससे कहो मिलवा देंगे। कवि को जैसे रास्ता मिल गया।

     वे दिन वाकई हरकीर्तन कौर उर्फ गीता बाली के थे। उसकी शान-शौकत के किस्से पत्रिकाओं-रिसालों में छपते थे। अमृतसर से आए एक जट्ट आशिक ने उसका गाल छू लिया तो उसने सेट पर रखी नकली तलवार लेकर दौड़ा लिया। वह घुड़सवारी करती थी। सुंदरता से ज्यादा उसकी दिलफरेब शोखी प्रख्यात थी। उसके निगाहे-नाज के दीवानों में उस जमाने का हर अदाकार था। उसका गाया ‘किस्मत पर भरोसा है तो दांव लगा ले ’ जैसे जुआरियों का राष्ट्रगीत बन गया था।

     भतीजे ने बस इतनी कृपा की कि एक दिन उसे नौशाद साहब के पास छोड़ गया, बस इतना परिचय देकर कि हमारे चाचा हैं गीत-कविता लिखते हैं। एकाध लिखवाइए। इतना काफी था। नौशाद ने इतना ही पूछा, ‘उर्दू लिख लेते हो।’ कवि ने कहा, ‘नहीं बोल लेता हूं।’ वे हंसे, ‘बोल तो हम सब लेते हैं, पर हमे एक असिस्टेंट चाहिए जो उर्दू स्क्रिप्ट जानता हो।’

    खैर, कवि जी ने ‘एक माह में उर्दू सीखें’ वाली किताब से सीखना शुरू किया। इसी दौरान केदार शर्मा ने नई फिल्म के लिए संवाद लेखकों की टोली में उन्हें जगह दिला दी। उनका काम था, फिल्मों में इस्तेमाल होने वाली देहाती, खासकर अवधी डायलॉग लिखना-सुधारना। इस काम में उनका कुछ दिन तो मन लगा, लेकिन वे चाहते थे उनका कोई गीत फिल्मों में आ जाए। पर यह आसान नहीं था। वे कोई पंडित प्रदीप जैसे गीतकार तो थे नहीं। उनका काम डायरेक्टरों को जमा नहीं।

     वे हताश होकर लौटना ही चाहते थे कि एक दिन नटराज स्टूडियो में उन्हें पंडित केदार शर्मा के पास बैठी गीता बाली नई जिंदगी, नई आस की तरह मिल गई। नई फिल्म की शूटिंग चल रही थी। कवि जी को मनमाफिक काम मिल गया गीता बाली की बोली सुधारने का। ज्यादा फुरसत होती तो लखनऊ-कानपुर की बोली भी सिखाते। बात-बात में पता चला कि यह तो सरदारनी है। इलाहाबाद को ऐलाबाद, दिल्ली को डेल्ही कहने वाली। उन्होंने पूरा रस लेकर उसके तलफ्फुज़ सुधारे। बेगम अख्तर और मलिका पुखराज की गाई ग़ज़लों के अर्थ समझाए। हफीज जलंधरी और आरजू लखनऊ से वाकिफ कराया। एक दिन रसभीने लम्हे में गीता बाली ने कवि जी का हाथ अपने हाथ में लेकर कह दिया, आपने इत्ती देर क्यों कर दी मिलने में राइटर साब। शैल जी का जियरा बैठ गया। नाजुक हाथों का अप्रत्याशित स्पर्श उनके जीवन में जो ठप्पा लगा गया, उसे मुहब्बत कहने लगे थे कवि जी। इस मुहब्बत में उन्होंने गीता के साथ दो तीन-बार टिफिन शेयर किया। अक्सर बच्चों जैसे उतावलेपन के साथ स्टूडियो के बाहर बिकने वाली भेलपुरी भागकर ले आते। वह मुस्करा कर कहती, ओह माई गॉड आप कमाल कर देत्ते हो जी!

     यह कवि के प्रेमिल जीवन का स्वर्णकाल था। लेकिन दीवानों को नजर तो लगती ही है। गीता बाली के जीवन में नवोदित हीरो शम्मी कपूर का दाखिला इस रफ्तार से हुआ कि कि कवि का प्रेम बीच राह में शहादत को प्राप्त हो गया। शादीशुदा गीता बाली में उनका दिलचस्पी नहीं रही। इसके बाद ही वे दिल्ली में अंसारी रोड के एक प्रकाशक के पास आ गए। दो साल बाद ही मंचीय गीतकार बनकर फिर कानपुर आ गए। नीरज के साथ मंच साझा करने लगे। गीता बाली को लेकर उन्होंने ‘गीत शतक’ रच डाला। लेकिन इसके प्रकाशन के कुछ दिनों बाद उन्हें अखबारों के जरिए खबर मिली कि चेचक ने गीताबाली की जान ले ली। उन्होंने खाना नहीं खाया। प्रतिज्ञा कर डाली कि ताजिंदगी गीता बाली की यादें लेकर ही जिएंगे। पड़ोसियों-मित्रों ने कहा, कवि आधे सिर्री होते हैं…। कवि ने अपनी भीष्म-प्रतिज्ञा पूरी की। कभी मंदिर का घंटा नहीं बजाया, पर गीता बाली के नाम की माला जपना नहीं छोड़ा।

     ———————————————–

    ऐसे दीवाने ने अगर अंतिम इच्छा के तौर पर गीताबाली को सुनने की तड़प दिखाई हो तो अचरज नही होना चाहिए। दीवानों, खासतौर पर एकमार्गी प्रीत के पतंगों का यही हाल होता है।

    छंटते अंधरे और मातमी चुप्पी के बीच मैं जब पहुंचा तो घमंडी थोड़ा घबड़ाया हुआ स्पीड में काम करने में लगा था। हांफते हुए बोला, ‘इनके भाई-भतीजों को फोन कर दिया है। दो तीन घंटे में आ ही जाएंगे। लग रहा है, अपने गुरुदेव चलइयां हैं…गाड़ी आखिरी स्टेशन के करीब है…।’ मैंने इशारा किया, ‘धीरे से बोलो, बच गए तो बुरा मान जाएंगे।’

    कवि जी मुझे देखकर थोड़ा उत्साह से भरे। बोलना चाहते थे कि मैंने

    कहा, ‘गुरुजी कौन सा गाना सुनेंगे?’ वे बोलने में असमर्थ लगे..। मैंने कहा- ‘इब क्या होगा…’ उनकी बेदम सी मुस्कान लौटी आंखों को ‘हां’ की भाषा में झपकाया।

    मैंने थोड़ा फारवर्ड और रिवाइंड कर चलाया- ‘बैरी बलम सच बोल रे इब क्या होगा…।’

    कवि जैसे व्याकुल हो उठे, ‘हाय-हाय…देखो हम भी जा रहे हैं गीता…। अलविदा…।’

    माहौल गमगीन हो चला था। गाना आगे बढ़ा- ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तकदीर बना ले….शाम ढले खिड़की तले…’

      पर अब लगा वह महान श्रोता मौन हो गया था। मैंने नाक के पास हाथ रखा। सांस लापता थी। नाड़ी गुम। उनका आधे दांतों वाला मुंह खुलकर बाईं तरफ मुड़ गया था। मैंने घमंडी की ओर इशारा किया, गुरुजी शांतियात्रा पर चले गए। वह थोड़ा फुसका, ‘हमारे लिए भगवान थे।’

    मैंने तसल्ली दी, ‘तुमने बहुत सेवा की। उनकी अंतिम इच्छा पूरी करो।’

    ‘अरे, कोई अंतिम इच्छा थी ही नहीं, हम बोले, दादा कहो तो गऊ दान वगैरह करवा दें। कहने लगे, पगलैटी वाले काम मत करना। हो सके तो हमारी अर्थी के साथ राम नाम सत्य की जगह गीता बाली के गाने बजवा देना। अब ये सब उनके घर वाले जाने। उनकी बिरादरी वाले जाने।’

    घमंडी ने आठ-दस अगरबत्ती जला दीं। मैने टू इन वन को कवि जी के शव से दूर रखकर गाना चला दिया-‘सुन बैरी बलम सच बोल रे इब क्या  होगा।’  एक पंडित टाइप के आदमी ने आपत्ति जताई, ‘ अरे भाई इससे बढ़िया गीता का कैसेट चला देते…। ’

    सुधबिसरा हो चुका घमंडी यादव बोला, ‘चाचा वही लगाए हैं…गीता बाली का कैसेट…।’

    पंडित थोड़ा नाराज हुआ, ‘कैसा निखद्री अहिर है। भागवतगीता कह रहे हैं, समझ रहा है कुछ और…।’

    ———————————————

     दिवंगत कवि जी के पास ऐसा कुछ नहीं था कि दस-बीस लोग जुट जाते। किस्मत से गांव पास था, इसलिए भाई-भौजाई, दो भतीजे आ गए। जनवादी नेता अपाला सेनगुप्ता और कुछ थियेटरबाज टाइप के लड़के जरूर आ गए। मुत्यु आज सुबह ही हुई थी, इसलिए अखबार में खबर एक दिन के बाद ही आती। एक लड़का घूम-घूमकर शैलजी का परिचय पूछ रहा था। उनके भतीजे से उनके महान गीतों के बारे में पूछ रहा था। उसने मघइया स्टाइल में इतना ही कहा, ‘हमें नहीं कुछ पता। बस इत्ता पता कि बंबई में किसी हीरोइन के चक्कर में फंसकर कुंवारे बैठे रहे।’

     कवि जी की किस्मत देखिए। उसी दिन घर से एक फलांग दूर विधायक फूलचंद त्रिवेदी की अम्मा की तेरही में शामिल होने के लिए सांसद जी पधारे थे। किसी ने उनके कान में फूंक दिया कि कोई बड़ा कवि गुजर गया है, हो लीजिए दो मिनट के लिए।

    सांसद के लिए तो यह एक पंथ दो काज था। उनका काफिला दस कारों के साथ शैल जी के द्वारे पहुंच गया। बमबम टाइम्स से लेकर अमर उजाला के पत्रकार भी जाग्रत हो गए। मोहल्ले वालों को पहली बार पता चला कि उनके पड़ोस में कोई कवि महाशय वास करते थे। अब सांसद होंगे तो पार्षद, पार्टी के कार्यकर्ता अपने आप आ जाएंगे।

    शानदार माहौल बन गया। भतीजे, भाई भी खुश थे। उनके बीच खबर यह दी गई कि दिल्ली से सीधे आ रहे हैं एमपी साहब।

    सांसद ने फटाफट रेफरेंस जुटाकर भीड़ को बताया कि कवि जी उनके शहर की शान थे। उनकी कविताओं में समाज का सम्यक चित्रण हुआ है। वे बंबई की शानदार जिंदगी छोड़कर कानपुर के मजदूरों के बीच रह रहे थे।

     सांसद फटाफट गेंदे की एक सिकुड़ी माला शव पर चढ़ाकर निकल लिए। वहां खड़े चौकी इंचार्ज प्रजापति को बोल गए कि कुछ इनकी मदद कर देना। कुर्सियां लगवा कर सबको चाय पिलवाओ। पार्षद के कान में कह गए कि अखबार वालों को खबर कर देना कि कवि शैल को श्रद्धांजलि देने के लिए सांसद दिनेश  जायसवाल भी आए थे।

      दोपहर दो बजे कवि जी की अर्थी निकली। दो जनवादी युवा कवि चिल्लाए- शैल बिहारी को लाल सलाम, लाल सलाम…अमर रहे अमर रहें…। गांव वाले आगे थे। वे पारंपरिक भाव के साथ बुदबुदाए- रामनाम सत्य है…हरि का नाम सत्य है। एक विपल्वी गीतकार ने उनका महान ग्राम्य-गीत भी सुर में गाया और फुसक पड़ा।

     पर कवि की अंतिम इच्छानुसार उनका सेवक घमंडी यादव फिलिप्स के टू इन वन पर मेरा वही कैसेट लगाए था। गाना फुल स्पीड पर कर रखा था- गीता बाली गा रही थीः सुन बैरी बलम सच बोल रे इब क्या होगा…।

     प्रमोद द्विवेदी

    (पूर्व फीचर संपादक जनसत्ता)

    मो-9667310319, 9891804441

     पता- 305, एमरल्ड एपार्टमेंट रामप्रस्थ ग्रीन्स, पाकेट-1 वैशाली, सेक्टर 7,         गाजियाबाद-201010

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