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  • उषाकिरण खान की कहानी ‘मुझे ले चलो: भूखी हॅूं’

     

    आज वरिष्ठ लेखिका उषाकिरण खान की कहानी. उषाकिरण जी का कथा संसार बहुत विस्तृत है, इतिहास से वर्तमान तक उनकी कलम से कुछ भी नहीं बचा है. वह लोक और शास्त्र दोनों की सिद्धहस्त लेखिका हैं- मॉडरेटर

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    बेहद नर्म सॉझ! कास के नर्म फूलों से आच्छादित खेत खलिहान। प्रेमियों का स्वर्ग। कई जोड़े छुप छुपकर मिलते, योजनायें बनाते आगामी जीवन के। सुभग यादव बड़े सम्पन्न और रसूखबार घर का चश्मे – चिरान तथा जगतारिणी उसी गॉंव के विपन्न पंडित की बेटी। दोनों का प्रेम उनके हमउम्रों को पता था, क्योंकि स्कूल जाने आने के बीच यह पनपा था। बात पंख लगा कर घर घर पहॅुंंच गई। सुभग को उसके दादा जी ने दालान पर सभी चाचाओं, भाई बहनों के सामने डॉटा –
    ‘‘सुभगा, तुम्हारी शादी पूरब पार के लखेन्दर मंडल के घर तय कर दिया है, जादे हाथ पैर न निकाल । पता है लखेन्दर बाबू केतना बड़े नेता हैं, पूरा परिवार पढ़ा लिखा जिमिदार है।’’ – हाथ उठाकर कहा
    ‘‘तोरो से बड़ा नेता बाबा जी?’’ – टिमकी ने ऑंखे फैलाकर पूछा। मंझले बेटे की बेटी को बचपन में ममरखा बीमारी हो गई थी सो कोइ तीन चार साल तक उसके हाथ पैर सींक सलाइ से और पेट खासा बड़ा हॉंड़ी सा रहा। तभी उसके असली नाम निर्मला को भ्ूल कर लोग टिमकी कहने लगे, सिर्फ उसकी दादी उसे नीरो कहकर बुलाती। वह दादी दादा की मुॅंह लगी थी।
    ‘‘हम तो उसके सामने कुछ नहीं हैं, ऊ हाथी तो हम चुट्टी।’’
    ‘‘हाथी? बाप रे बड़का अरना भैंसा जैसा तुम ही हो, ऊ और मोटा?’’
    टिमकी की बात पर दादा जी हॅंस पडे़े थे, पास खींच कर सर सहलाने लगे थे। सोच रहे थे बड़ी भोली है। तभी तो उसने अपने साथ पढ़ने वाली जगतारिणी और सुभग भैया की प्रेम कहानी बयान कर डाली।
    ‘‘बाबा हो, सुभग भैया और जगिया राधा किसुन जैसा लगते हैं।’’ – बाबा हरिचन यादव का माथा ठनका। अरे, यह क्या सारा खेल चौपट्ट। सुभग होनहार लड़का है; मैट्रिक पास अच्छे नं0 से किया है। देखने में राजकुमार जैसा रूप है। उसकी राधा मंडल जी के घर से आयगी। हरिचन यादव ने बात को मोड़ा। लेट गये चौकी पर। यह उनका विशाल दालान था जिसमें एक कोने में बड़ी सी चौकी बिछी थी। उस पर पुआल बिछा था, पुआल के ऊपर मोथा घास की बुनी हुई गद्देदार चटाई, चटाई के ऊपर दुसुत्री खादी को चादर बिछी थी। चादर फूलदार था चटक रंगों का। दो मसनद थे बड़े, मोटे, गोलाकार। हरिचन यादव उसी पर सर रखकर सोते । दूसरे कोने पर कुछ नीचे मचान थे बॉंस की खपच्चियों के जिस पर शाम ढलते ही लोग जुट जाते। दो और चौकियॉं अपेक्षाकृत छोटी बिछी थी, उस पर चटाई मोड़कर रखी रहती। कोई आता तो बिछा दिया जाता।
    हरिचण बाबा लम्बलेट हो गये और बच्चों से उंगली चटकाने से लेकर मुक्की मारने हाथ पॉंच दबाने की फरमाईश कर दी। बच्चों का यह आनन्दी काम था। सुभग, रमन दो चचेरे भाई हमउम्र थे और एक ही कक्षा में पढ़ते थे। रागिनी की शादी हो गई थी गौना न हुआ था, टिमकी तो छोटी थी, बंकू और टिमकी हम उम्र थे और साथ ही एक कक्षा में पढ़ते। इस तरह इस घर से हाइ स्कूल में 3 लड़के और सिर्फ एक लड़की टिमकी स्कूल जाती । दो साईकिल घर से मिले थे जिसका पर लद कर पॉंच लोग जाते। गांव के कम ही बच्चों के पास यह साइकिल थी। बाकी बच्चे कूदते फांदते स्कूल पहुॅंचते। अक्सर सुभग साइकिल छोड़कर चलता क्योंकि उसे जगतारिणी उर्फ जागो उर्फ राधा से बातें करनी होती। गॉंव के सभी बच्चे जागो को राधा कहते और सुभग को कृष्ण। अभी इन बालक बालिका को इल्म नहीं था कि जात पॉंत आड़े आयेगा। शादी ब्याह की बात बाबा के कहने पर दिमाग में आया वरना पता ही न था । पके पकाये खेती किसानी करने वाले मुखिया कोटि के बाबा नगर-नगर घूमते, राजनीतिक गलियारों में पैठ बनाते अपनी राह बना रहे थे। वैसे भी जातीय वर्गीकरण को जानने वाले इस प्रकार की प्रेमी जोड़ी का हस्र खूब समझते। परन्तु यहॉं सबसे बड़ा सवाल था हरिचन यादव का ऊॅंचे रसूखदार घर से जुड़ने का। सुभग प्रतिमा सम्पन्न पोता ही इन्हें कामनाओं का भवसागर पार करायेगा यह क्या हो रहा है । नः यह सब होने न देंगे।
    पैर, पिंडली और सर दबाते बच्चों को बरहकेसी रानी की कथा रचरच कर सुनाने लगे । – ‘‘टिमकी, कभी बरह केसी रानी को देखी हो?’’
    ‘‘उहुॅंक’’ – टिमकी ने सर डोलाया, साथ में सभी छोटे-बडे़ बच्चों ने सर ना में हिलाया।
    ‘‘हम देखे हैं। पुरबिया लखेन्दर बाबू की पोती ही बरहकेसी है।’’
    ‘‘ऐं?’’ – सभी बच्चे चौंक उठे। सुभग और रमन कथा से इतरभी कुछ समझ रहे थे । इनकी मसें भीग रही थी, ये जवानी की दहलीज पर खड़े थे। कथा टिमकी और छोटे बच्चों के लिए नहीं, सुभग और रमण के लिए कही जा रही थी। तभी गांव के कुछ लोग आ गये। बच्चे छुट्टी पाकर फुर्र हो गये। बारहवीं में पढ़ने वाला रमन सुभग ने देखा ग्यारहवीं में पढ़ने वाली जगतारिणी कुमारी तीन दिनों से स्कूल नहीं आ रही है। उसके घर के पास की लड़कियों ने कहा कि
    ‘‘जागो को स्कूल आने की मनाही हो गई है।’’
    ‘‘क्यों,’’ पूछा सुभग ने।
    ‘‘तुम्हारे बाबा ने पुरहित काका को धमकाया। कहा कि इस गॉंव से उजाड़ देंगे । बेटी को स्कूल भेजना बंद करो।’’- सुभग सब समझ गया। पर कुछ बोल नहीं सकता। उसकी ऑंखों के सामने जगतारिणी की बड़ी-बड़ी काली ऑंखें प्रश्न करती सी दीखीं। जुगाड़कर वह मिला उससे। उसके पिता ने बड़ी बेरहमी से उसे मारा कि यह लड़की पगड़ी धूलधूसरित कर गई। पहले तो उस कुजात ग्वाला के बेटे से लागडाट कर बैठी फिर समझाने पर कहती है कि प्रेम करती है। अभी प्रेम का भूत उतर जायेगा । दोनों तरफ से रोक हो गई, इन्हें कुछ न सूझा, एक दूसरे के प्रेम में डूबे दोनों मृग छौने से प्रेमी भाग खड़े हुए। पुरोहित और उसकी पत्नी ने सर ठोका-
    ‘‘हमारे लिए मर गई छोकरी, हम उसका श्राद्धकर देंगे।’’- क्रोध से पैर पटकते बोले।
    ‘‘यह तो भला है कि दूर-दूर में कोई घर अपनी जात का नहीं है, सो इज्जत थोड़ी तो बची। ए जी, सिमरिया वल के श्राद्ध कर आवे।’’- यह सब हो ही रहा था कि हरिचन यादव ने निकटवर्ती थाना में केस कर दिया। सुभग और जगतारिणी पकड़े गये। नाबालिग थे, दोनों दो रिमांड होम में रखे गये। भागे हुए दोनों किशोर लुकते छिपते एक दूसरे से जनम जनम का साथ निभाने का वादा करते न थकते। जगतारिणी को अपने पागल प्रेमी पर पूरा भरोसा था, सुभग को अपने आप पर विश्वास कि हम फिर मिलेंगे । अलग अलग सुधारगृह में जाते जाते इन्होंने ऑंखों ही ऑंखों में एक दूसरे को परस्पर आश्वस्त किया। बिना किसी रीति रिवाज में बंधे ये एक दूसरे के हो चुके थे।
    रिमांड होम का जीवन जगतारिणी का मानो नरक था। घबराई सकुचाई सी प्रवेश करते ही उसे संचालिका का सामना करना पड़ा। पतली दुबली सी सॉंवली काया बाली, कीमती कपड़ों और गहनों से लदी मैडम ने कड़क पर पूछा –
    ‘‘बड़ी आग लगी थी शरीर में कि इसी उमर में यार के साथ भाग आई? बढ़िया जगह पहुॅंची, हो सारी आग बुझ जायेगी।’’- टेढ़ी मुस्कान थी। जगतारिणी ने उसकी बात समझी ही नहीं। पर जाने क्यों, तीर सी बेध तो गई। लहजा और चेहरे की तिर्थक मुस्कान। फिर कुर्सी पर बैठ गई रजिस्टर लेकर।
    ‘‘नाम क्या लिखें?
    ‘‘जी जगतारिणी’’
    ‘‘यहॉं यह नाम नहीं चलेगा, आज से तुम्हारा नाम हुआ नीतू, समझी?’’
    ‘‘जी’’ – इसका हलक सूख रहा था। एक स्टाफ इसे अन्दर ले गई। अन्दर, पन्द्रह बीस हर उम्र की औरतें थीं। कुछ इसकी उमर की भी थीं, कुछ बड़ी, लेकिन किसी के बदन पर पूरा कपड़ा नहीं था स्टाफ ने इसे धकेल कर कहा – जा बैठ, जरूरत होगी तो बुलायी जायेगी। जाते जाते बरामदे की किवाड़ बंद करती गई। अब अनायास इसकी ऑंखे भर आई, यह रोने लगी। छोटी लड़कियॉं पास सिमट आई। बड़ी औरतों ने डपटा – ‘‘क्या रोना धोना मचा रही है, चुप रह।’’
    ‘‘जिन्दगी भर रोना ही है, अभी सारा ऑंसू बहा देगी?’’ – दूसरी थी इनमें से एकाध को छोड़कर सभी प्रेमी के साथ भागी हुई औरतें थीं दूसरे ही दिन नीतू बनी जगतारिणी तथा दो अन्य युवतियों को साबुन साफ-चमकीले कपड़े और श्रृंगार के सामान संचालिका ने भेजे । खाना भी खाने को दिया गया । नीतू हैरत में थी पर साथी लड़कियों ने ऑंखों में ऑंसू भर कर खाया। उम्रदार औरतों को अपने भोजन में से ऑंख बचाकर युवतियों ने दिया क्योंकि उन्हें वही पानी जैसी कंकड़ वाली खिचड़ी दी गई थी। उम्रदार औरतों ने नीतू को समझाया कि उसे कहॉं जाना है। किसी रसूखदार अमीर या नेता के यहॉं जाना है। नीतू घबड़ा कर रोने लगी। उनमें से एक औरत ने डपट कर कहा – ‘‘यार के साथ जो कर चुकी है वही सब तो होगा, चुप रह।’’
    ‘‘ऐसा था तो घरसे भागी क्यों थी?’’ – दूसरी थी। रोने कलपने से क्या होता, नीतू तो पहले ही प्यार में फिसल कर बियाबान में खड़ी थी। अब उसकी देह अपनी न रही। रोज बिकने लगी। बिना किसी कैलेंडर वाले रिमांड होम में रहते उसे कई साल गुजर गये। वह मात्र तीन महीनों के लिए आई थी। कोई लेने न आया। पिता ने सचमुच सिमरिया घाट जाकर श्राद्ध कर डाला। प्रेमी के बाबा तीन माह पूरा होते ही उसे छुड़ा ले गये। घर जाकर अपने हमउम्र भाई से पूछा कि क्या जगतारिणी का कोई अता-पता है? भाई ने बताया कि पुरोहित जी का परिवार अब गॉंव में नहीं रहता। उसे छुड़ाकर वे ले गये होंगे। एक आह भरने के सिवा वह क्या कर सकता था। कड़ी निगरानी में पढ़ाई और परीक्षा में लग गया।
    हरिचन बाबा का राजनीति में कद बढ़ने लगा। अपने इलाके के सर्वमान्य नेता जो थे। इनका खपरैल कच्चा दालान अब पक्का हो गया था। एक कोठरी निकाल दी गई थी जिसमें नये काट का पलंग और सोफासेट सजा था खुले में कुर्सियॉं और बेंचे लगी थीं। एक बार मंडल जी इलाका घूमने आये थे। तब जेनरेटर से रोशनी का प्रबंध किया गया था। कबीर की बंदगी के बहाने इलाके भर के कबिरहे इकट्ठे हो गये थे। मंडल जी के सामने यह यादव जी का शक्ति प्रदर्शन ही था। बड़े-बड़े खेतों के किते और तबेले में गाय भैंसे, बैल इत्यादि देख सम्पन्नता का अहसास हो गया था। मंडल जी अपने मंझले बेटे की सॉंवनी नकचढ़ी नातिन का रिश्ता सुभग के साथ तय कर दिया। सुभग ने बी0ए0 पास कर लिया था, बाबा के साथ आज्ञाकारी बन रहाता। लखेन्दर मंडल को लड़का अपनी काली माई नातिन के लिए उपयुक्त लगा। अपने गले से मोटा सोने का चेन निकालकर पहना दिया गले में और गांव घर की औरत मर्दों के सामने छेका कर दिया ।
    ‘‘समय रहता तो पुरोहित को आमगॉंव से बुलस लेते प्रभु।’’- हरिचन ने मंडल जी से कहा हाथ जोड़ कर।
    ‘‘इतने लोगों के सामने हम दोनों परिवार एक दूसरे से संबंध जोड़ने का संकल्प ले रहे हैं, यह बहुत है यादव जी। ये ही गवाह हैं। बाकी पुरोहित पंडित का काम शादी में।’’
    ‘‘हम भी आते हैं मंडल जी, पतोह के लिए कुछ फर्ज है कि नहीं?’’ – यादव जी की बात पर मंडल जी हॅंस पड़े। विदा हो रहे थें तब याद दिलाने पर सुभग ने लखेन्दर मंडल के चरण घुए। बडे़े लावलश्कर के साथ हरिचन यादव लड़की छेकने पहुॅंचे। एक सौ एक दही, चूड़ा, खाजा लड्डू का भार लेकर । शादी भी उतने ही लाव लश्कर के साथ हुई। चानन नदी के पूरब पश्चिम लोगों का कुटुम्ब का रिश्ता पक्का हो गया । एक दूसरे को मीठी गाली देने का सर्टिफिकेट मानो मिल गया। अगले चुनाव में इस संबंध में मंडल जी को पहली बार लोकसभा भिजवा दिया। हरिचन फूले न समाते। अब इनके दालान पर अफसर नेता बैठने लगे। बेटे को सड़क की पुल की ठेकेदारी मिल गई। सुभग के दिल का हाल तो कोई नहीं जानता था, हॉं वह चालाक ठीकेदार हो गया था । खादी का कुरता पाजामा और जैकेट उसके भरे-भरे-भरे मूॅंछों वाले व्यक्तित्व पर खूब फबता । राजधानी में मकान पर मकान बन गये। बाजार बन गया । मॉल की योजना बन गई। पर गॉंव का घर खेत, बगान और तबेला नहीं छूटा। पहले दूध से क्रीम निकालने के लिए दो मशीनें चलती थीं अब दर्जन भर चलती है। सारे चचेरे भाई खटाल और मशीन देखते। वह आमदनी का बढ़िया जरिया था। नये नये मशीन भी आने लग गये थे। बाबा हरिचन के गुजर जाने के बाद सुभग सपरिवार राजधानी में रह गये। पिता सखीचन यादव हाई स्कूल के हेडमास्टर बन कर रहे। रिटायरमेंट के बाद गांव में ही रह गये। उनकी रूचि राजनीति में नहीं थी। उन्होंने गांव में ही पुस्तकालय वाचनालय बना लिया वहीं कुछ युवाओं को साइन्स पढ़ा देते, अधेड़ बैठकर सतसंग करते। कभी कभी कबीर वाणी भी गूंजती सरकारें बदलती रहीं सुभग यादव की किस्मत वैसी ही चमकदार रहीं। हरिचन बाबा के सिखाये पर चलते रहे तो कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। बड़े से बड़े पुल का ठेका मिल जाता। इनकी ओर से भी मुॅंह मांगी व्यवस्था हो जाती। सरकारें बदलतीं पर व्यवहार नहीं बदलता। दस्तूर वहीं रहता जो गुलाम भारत में था। सो इन लड़कियों के खाने पीने का प्रबंध होता रहता। नीतू रानी, गुलाब नामधारी ये लड़कियॉं जीवित हैं यह अन्दर पता भी नहीं चलता। छोटे छोटे चिथड़े मात्र कोई एक अंग ढॅंक सकता। एक दिन किसी ने कहा – ‘‘थोड़ा बड़ा कपड़ा दे दो’’ – कर्मचारी औरत ने डपटकर कहा – ‘‘क्यों? भागने का इरादा है क्या? शरम है सो बाहर नंगी तो जा नहीं सकती।’’ – राक्षसी हॅंसी हॅंसती रही थी। यह लगता ही नहीं कि वह भी औरत है। एक दिन रानी ने बिसूरती गुलाब सेकहा कि वह खुद नंगी रह लेगी दो टुकड़े लेकर गुलाब भाग जाये। बाहर जाकर कोई उपाय करे, पढ़ी लिखी है। पर बड़ी अधेड़ औरतों ने मना किया। बाहर अगर मनुष्य हो तो जाओ वरना सब तरफ हिंस्र जानवर हैं। ये दीवार से सर पटकती विवश थीं। नीतू बनी जगतारिणी सोचती कि क्या कभी सुभग इसके बारे में नहीं सोचता होगा? वह जरूर छुड़ा लिया गया होगा। वह इसे ढूंढता नहीं होगा? उसकी मुलायम छुअन इसके कोमल तन मन को स्मृति में ही सहला जाती। माता-पिता कभी इसे याद नहीं करते होंगे? कितने निर्मम हैं। अपनी संतान का जीते जी श्राद्ध कर दिया। अच्छा तो है, श्राद्ध तो हुआ वरना पिछले साल मरी फूलकुमारी चाची की तरह घसीट कर कुत्ते की लाश की तरह गंगा किनारे फेंक दी जाती। न अग्नि संस्कार, न कब्र नसीब, कौन करता? श्राद्ध के बाद यह नरक भोग रही है। किस पाप का फल है, प्रेम करने के पाप का, नहीं औरत होने के पाप का। यह समझ गई है नीतू। बाद में आने वाली लड़कियों को देखती तब इसकी रूलाई फूट जाती।
    एक दिन तीन युवतियॉं साथ जिस गाड़ी में जा रही थीं, उसके आगे वाली गाड़ी में जो बैठा था वह सुभग यादव से कितना मिलता था, क्या वहीं है? जब एक विशाल परिसर में उतरीं और एक हॉल में पहुॅंची तब भी उसे कुछ कहते सुन रही थी। सभी इन्द्रियॉं कान में इकट्ठी हो गई थीं। यह तो सुभग की आवाज है । चलकर सुभग की ओर आई। उसने इसे देखा तो देखता रह गया; तभी एक स्त्री आकर इन्हें पकड़कर ले गयी। तीनों को तीन सजे धजे कमरों में पहुॅंचाया नीतू ने सुभग की ऑंखों में पहचान की एक कौंध तो देखी जो पल भर में बिला गई। उन सूखी पथरीली ऑंखों में पानी नहीं था। नीतू के मन में जो एक झूठी ही सही छवि थी वह खंड खंड हो गई । अब वह अधिक निर्लिप्त भाव से अपना देह दान करती। वह मनुष्य नहीं है, प्रेत है, ये सारे कामुक लोग प्रेतसमागम करते हैं। यह सोचकर संतोष कर लेती।
    जाने क्या हुआ एक दिन सभी स्त्रियों को तेल साबुन और कपड़े दिये गये। नहा धोकर पहनने का हुक्म हुआ। फिर संचालिका ने बुलाकर एक-एक को समझाया कि आनेवाली अधिकारियों के बीच मुॅंह न खोलना, कहना सब ठीक है वरना वो गई और तुम सबकी शामत आई। तेजाब से नहला दॅुंगी।’’ – वही हुआ किसी ने कुछ न कहा। अधिकारी ने पूछा – ‘‘तुमलोगों में से कोई पढ़ी लिखी है? और कुछ हुनर जानती है?’’
    ‘‘मैं ग्यारहवीं पास हॅूं।’’- नीतू ने कहा।
    ‘‘गुड, बेटी गुड’’ – बाकी सब भी कुछ न कुछ पढी लिखी थीं और अन्य काम जानती थीं। कुछ दिन वहॉं कोई वर्कशॉप चला फिर बंद हो गया। उस महिला अधिकारी का तबादला कर दिया गया ।
    सुभग ने नीतू को पहचान लिया था, मन के अंदरखाने में कुछ खलबली हुई। फिर सधे हुए खिलाड़ी ने सब पर राख डाल दी। वह एक सम्मानित व्यक्ति है और जगतारिणी बेभाव ही बिक जाने वाली नगण्य जीव। कभी खिले थे प्यार के पुष्प जिसकी पंखुड़ियॉं झड़ गई, अब उसमें कीड़े कुलबुला रहे हैं । झटक कर फेक देना ही श्रेयष्कर है। सीढ़ियॉं ऐसे ही चढ़ी जाती हैं । यह राजभवन तक जाता है, गॉंव में दुर्गामंदिर के उद्घाटन के अवसर पर राज्यपाल को ले गया था, इलाके में देवी भक्त होने का श्रेय इसे ही मिला है । अपनी वक्तृता से सबों को मंत्रमुग्ध किये देता है –
    यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते
    रमन्ते तत्र देवता!
    ‘‘मैं इसी पर विश्वास करता हॅूं। आप भी करें।’’ लाल सिंदूर का बड़ा सा टीका लगाये लाल वस्त्र धारण किये दुर्गा मॉं की प्रतिमा के आगे बैठा कितना पवित्र लगता सुभग यादव। अहा, एकदम अपने बाबा हरिचन बाबू पर गये हैं, समाज को मंदिर बनाकर समर्पित किया। पिताजी सखीचन तो अपने मिजाज के अपने मालिक हैं। शरीर अशस्त हो गया था नीतू का रंग झॉंवर हो गया, ऑंखें कोटर में धॅंस गई थी। कई दिनों से मॉंउ पर थी, अंतड़ी ऐंठ रही थी। मैली कुचैली फटी साड़ी में वह झाडू़ लगा रही थी कि तीन किशोरियॉं सजकर बाहर निकली, वे गाड़ी में बैठ गई। नीतू तेजी से निकली और आगे सीट पर बैठे अधेड़ आदमी का कुर्त्ता पकड़ लिया – ‘‘सुभग बाबू, मुझे भी ले चलो न, मैं कई दिनों की भूखी हॅूं।’’ – साथ में बैठा स्टाफ लपक कर आया छुड़ाने, रिमांड होम की दीदी दौड़ी आईं। गाड़ी निकल गई। अंदर आकर उस पर ताल घूंसों की बरसात होने लगी। वह अचेत होने तक चीखती रही – ‘‘सुभग बाबू मुझे ले चलेगा, मुझे खाना मिलेगा। लाओ नये कपड़े मुझे दो।’’
    -‘‘दिमाग चल गया है बुढ़िया का, अब पागलखाना भेजना होगा। नीतू उर्फ जगतारिणी निश्चेष्ट थी। कास के फूल की कोमल छुअन बिला गई थी, अब उसकी पत्तियों की धार से छलनी यह नीतू थी।

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