अश्नीर ग्रोवर भारत में स्टार्ट अप को साफल वनाने वाले सफल चेहरों में एक हैं। ग्रोफ़र इंडिया के सीएफ़ओ की किताब ‘दोगलापन: ज़िंदगी और स्टार्ट अप्स का खरा सच’ का एक दिलचस्प अंश पढ़िए। किताब पेंगुइन हिंद पॉकेट बुक्स से प्रकाशित है-
=========================
25 जनवरी, 2022, शाम 4 बजे
जनवरी की उस ठिठुरती शाम में मैंने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को जो मेल भेजा था, उसके सब्जेक्ट लाईन में लिखा था, ‘ज्वॉइनिंग बैक ऑन फर्स्ट फेव।’ उस महीने में कुछ दिन पहले तीन अरब अमेरिकी डॉलर (20,000 करोड़ रुपये से अधिक) वाली कंपनी भारतपे से मुझे स्वैच्छिक अवकाश पर जाने के लिए मज़बूर किया गया था। इस कंपनी को मैंने पिछले साढ़े तीन साल में बतौर फाउंडर और मैनेजिंग डाइरेक्टर अभूतपूर्व रफ्तार से खड़ा किया था। जनवरी का पूरा महीना धुँधलके में बीता था—मैं एक के बाद एक विवादों में घिरता चला गया था। इसकी शुरुआत तब हुई जब फिरौती के लिए आए एक कॉल का ऑडियो लीक हो गया और उसके बाद कानूनी नोटिस लीक हो गए और उसके बाद कोटक बैंक ने मनमाने किस्म के बयान जारी कर दिए। जिस वक्त पूरा देश शार्क टैंक इंडिया का मज़ा ले रहा था और हफ्ते में रोज़ाना रात के 9-10 बजे लाखों-करोड़ों टीवी स्क्रीन पर आंत्रेप्रेन्योरशिप की नई लहर का जश्न मनाया जा रहा था, मैं निजी तौर पर एक भयानक कार्पोरेट बोर्ड वार में उलझा था, जिसके ज़रिए भारतपे का नियंत्रण मुझसे छीनने की कोशिश की जा रही थी। महीने के आख़िरी हफ्ते में मैं अपने को-फाउंडर, कंपनी के कामकाज को देखने के लिए रखे गए मैनेजमेंट और भारतपे में नाशुकरे निवेशकों के छल, विश्वासघात और राजनीति से निबटने में व्यस्त था।
फिर जब मैं अपने तथाकथित स्वैच्छिक अवकाश पर गया, तो मैंने देखा कि भारतपे के मालवीय नगर के दफ़्तर का हुलिया ही बदल गया, सीसीटीवी कैमरे स्विच-ऑफ कर दिए गए, मेरे ऑफिस और मेरे डेस्कटॉप को खंगाला गया था और वहाँ बाउंसर्स तैनात कर दिए गए। ये सारी घटनाएँ न सिर्फ पूरी तरह से अजीब थीं, बल्कि इस बहुत बड़ी अनियमितता पर जब मैंने पत्र लिखकर बोर्ड से स्पष्टीकरण माँगा, तो उस पर भी पूरी तरह चुप्पी साध ली गई।
ज़ाहिर है, मुझे बहुत सारी चीजों से निपटना था। लेकिन कुछ समय के लिए, मुझे इस बात से राहत मिली कि कोटक के साथ विवाद आगे नहीं बढ़ा था और ऐसी बातों का भयानक ढंग से पीछा करने वाले प्रेस ने इसमें दिलचस्पी खो दी थी।
अब मेरे लिए वक्त आ गया था कि मैं ऑफिस लौट आऊँ और बिज़नेस के अगले चरण की ओर अपना ध्यान लगाऊँ या कुछ ऐसा ही सोचते हुए मैंने ऑफिस फिर से ज्वॉइन करने का वह मेल भेजा था।
25 जनवरी, 2022। शाम 4.52 बजे
मैं घर पर अपनी डेस्क पर बैठा था और जनवरी की मद्धम धूप मेरे कंधों पर पड़ रही थी, और मैं सोच रहा था कि मेरी अनगिनत समस्याओं को सुलझाने की ज़रूरी शुरुआत कहाँ से की जाए। असल में, हालिया हासिल किए गए यूनिटी एसएफबी के बैंकिंग लाइसेंस पर कामकाज शुरू करना था। ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी भारतीय फिन-टेक कंपनी को भारतीय रिज़र्व बैंक ने यह लाइसेंस दिया था, और इसके साथ ही हमें संकट में पड़े पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव (पीएमसी) बैंक के अधिग्रहण का बकाया काम भी निपटाना था। लेकिन किसी फिन-टेककं पनी को बैंकिंग लाइसेंस मिलने की उपलब्धि अश्नीर ग्रोवर के खाते आई थी, किसी वीएसएस या सचिन बंसल के नहीं और यह कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं थी। मुझे इस बात का पूरा यकीन था कि मैं कंपनी को कहीं और अधिक ऊँचाई तक ले जाऊँगा। लेकिन इसके साथ ही यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी भी थी, क्योंकि हमें पहले उन दस लाख खाताधारकों को उनके पैसे तक पहुँच देनी थी, जो पिछले करीब दो साल से पीएमसी बैंक के खातों में अटके हुए थे।
अचानक, मेरे इनबॉक्स में आए एक मेल के नोटिफिकेशन ने मेरी विचार प्रक्रिया को बाधित किया। मेल के सब्जेक्ट लाइन में लिखा था, ‘ग्यारहवीं बोर्ड मीटिंग के लिए शॉर्टर नोटिस।’ मैं हैरान रह गया कि एक घंटे से भी कम समय के भीतर जब मैंने बोर्ड को यह सूचना दी थी कि मैं ऑफिस लौटने की योजना बना रहा हूँ, तो मुझे भारतपे के कंपनी सेक्रेटरी की तरफ से अचानक मेल भेजकर सूचना दी जा रही थी कि एक बोर्ड मीटिंग बुलाई गई है, वह भी महज़ तीन घंटे के भीतर। हम लोग उसी रोज़ शाम 8 बजे जूम पर मीटिंग करने वाले थे। लेकिन जब मैंने ‘एजेंडा’ नाम के फाइल को क्लिक किया तो एक बड़ा आश्चर्य मेरा इंतज़ार कर रहा था। इसमें आइटम नंबर 5 तो मानो मुझे घूर रहा था। इसमें लिखा था, ‘मिस्टर अश्नीर ग्रोवर को 31 मार्च, 2022 तक छुट्टी पर भेजे जाने के रिव्यू कमेटी के अनुमोदन पर विचार करना और उसे स्वीकार करना।’
26 जनवरी, 2022
एक और ई-मेल आया—जो 25 जनवरी की बैठक का नतीजा था! इस बार, मुझे 31 मार्च, 2022 तक अनिवार्य छुट्टी पर जाने का निर्देश दिया गया था और मुझे दफ़्तर नहीं आने और प्रेस, कर्मचारियों और शेयरहोल्डरों, कारोबारी साझीदारों, ग्राहकों, वेंडरों या कंपनी से जुड़े किसी भी व्यक्ति से बातचीत न करने की ताकीद की गई, जब तक कि गवर्नेंस रिपोर्ट पेंडिंग थी।
इसके साथ ही, मुझे अपना लैपटॉप वापस करने का भी निर्देश दिया गया था। इस तरह से, नए ज़माने के एक सबसे सफल यूनिकॉर्न के संस्थापक के रूप में शोहरत पाने वाले इंसान को, जो अपने विचार खुले तौर पर रखता था, जो शार्कटैंक इंडिया के ज़रिए स्टार्ट-अप और आंत्रेप्रेन्योरशिप पर बातचीत को मुख्यधारा में ले आया था, जिसने अपने निवेशकों और कर्मचारियों के लिए करोड़ों डॉलर कमाकर दिए थे, उस व्यक्ति को यानी मुझे महत्वहीन शख़्सियत बना दिया गया था। हालाँकि, इस कंपनी को बनाने में मुश्किलों से भरे बयालीस महीने लगे थे, लेकिन मुझे एक पूर्व नियोजित योजना के तहत कुछेक घंटों में बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

