80 के दशक में दिल्ली विश्वविद्यालय कैम्पस में ‘जेन एंड द आर्ट ऑफ़ मोटरसाइकिल मेंटेनेंस’ को पढना जैसे मस्ट माना जाता था. जो नहीं भी पढ़ते थे वे भी उसको हाथ में लिए घूमते रहते थे. उसके लेखक रॉबर्ट एम पिर्सिग का निधन हो गया. उनके ऊपर और उनकी उस धमाकेदार किताब के ऊपर दिव्या विजय का लेख- मॉडरेटर
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मशहूर लेखक रॉबर्ट एम पिर्सिग का निधन 24 अप्रैल को अमेरिका के यॉर्क काउंटी में हो गया. गिरती सेहत उनका साथ और न दे पाई. रॉबर्ट हमेशा जानेे जायेंगे अपने बेमिसाल उपन्यास ‘ज़ेन एंड द आर्ट ऑफ़ मोटरसाइकिल मेंटेनेंस: एन इन्क्वायरी इनटू वेल्यूज़’ के लिए . रिकॉर्ड 122 बार यह उपन्यास प्रकाशकों द्वारा नकारा जा चुका था पर जब 1974 में यह छपा तो पाठकों ने इसे हाथों-हाथ लिया. लाखों प्रतियाँ बिकीं और यह अपनी अन्यतम फ़िलॉसफ़ी के कारण आज भी उतना ही मौज़ूँ है जितना तब था.
पश्चिमी हो या पूर्वी, हर सभ्यता अब बस औद्योगिक और मशीनी प्रगति को ही मानवीय उन्नति का निकष मानती है. ख़ासकर क्वालिटी ऑफ़ लिविंग का पैमाना तो यही है, इसमें ख़ुशी भरी ज़िंदगी का कोई सूचकांक नहीं बनाया या देखा जाता और जो देखा भी जाए तो उसमें अव्वल आने की होड़ किसी में नहीं. रॉबर्ट ने मोटरसाइकिल के रखरखाव की मार्फ़त ही मशीनों से भरी आत्माहीन, दौड़ती-भागती ज़िंदगी की सोच पर चोट कर उसे सुलझाने की कोशिश की. यह मशीनों और मानवों में एक तरह के पुनर्मिलाप जैसा था जिसमें ज़िंदगी के लिए एक नये नज़रिए को परिचित कराया गया.
1974 में रॉबर्ट ने जैसे मानव को मशीनों के विरुद्ध एक भड़ास को इस उपन्यास से शब्द दे दिए. बहुत ही चतुरता से उन्होंने मोटरसाइकिल के रूपक द्वारा जीवन की गुणवत्ता और मूल्यों की पड़ताल की तथा अपने जीवन दर्शन को समझाया. कुछ यात्रा-वर्णन, कुछ प्रबंधात्मक तो कुछ युवाओं के लिए सीख भरे पत्रों का मिला-जुला रूप रॉबर्ट ने इस किताब के लेखन में अपनाया और यही इसकी ख्याति का भी कारण है. 1968 में अपने पुत्र और दो मित्रों के साथ 17 दिन की देशांतर यात्राओं का एक काल्पनिक लेखा-जोखा इस उपन्यास की मूल विषयवस्तु में है. न तो यह ज़ेन के बारे में ही है और न ही मोटरसाइकिल के बारे में. यह है केवल जीवन और उसमें समाविष्ट मूल्यों और गुणवत्ता के बारे में.
रॉबर्ट की फ़िलासफ़ी दरअसल प्लेटो, अरस्तू आदि प्रारंभिक दर्शनशास्त्रियों की उस थिअरी के बिल्कुल उलट सफ़र करती है जिसके अनुसार जीवन के सामान्य और विशिष्ट अनुभव अलग-अलग होते हैं. रॉबर्ट के अनुसार कि वे एक ही हैं बस उन्हें हमारा देखने का नज़रिया ही उन्हें ख़ास-ओ-आम बनाता है.
उपन्यास में सूत्रधार और उसके मित्र के पास मोटसाइकिल हैं. जहाँ एक ओर मित्र अपनी महँगी मोटरसाइकिल की रिपेयरिंग के लिए दूसरों पर निर्भर है और उसे ले ज़िंदगी में फ़्रस्ट्रेटिड हो जाता है वहीं दूसरी ओर सूत्रधार अपनी ज़िंदगी और पुरानी मोटरसाइकिल दोनों के लिए स्वयं ही समस्या के समाधान खोजने के रवैये को अपनाकर ख़ुश रहता है. बाद में वह दोनों रास्तों में से बीच के रास्ते को चुनता है और मानता है कि ज़िंदगी के लिए रोमेंटिक हो रहना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है. आज हम अनगिन मशीनों से घिरे हैं इसलिए टेक्नोलॉजी से बेहतर मिसाल क्या होगी अपने जीवन को समझने और आनंद को प्राप्त करने की.
बकौल रॉबर्ट उनका अपना जीवन बचपन से ही दूसरों की ज़िद का सामना करने से भरा रहा. अपने सहपाठियों द्वारा उन्हें परेशान किया जाना रहा हो या शिक्षकों द्वारा उन्हें लेफ़्ट की बजाय राइट हैंड से लिखने के लिए मजबूर किया जाना. बाद में 15 वर्ष की अवस्था ही उनकी बुद्धिलब्धि 170 पाई गयी और उन्होंने यूनिवर्सिटी में क्लास लेना शुरू कर दिया था. एक वर्ष भारत में रह रॉबर्ट ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में भी पढ़ाई की थी.
रॉबर्ट के कुछ सूक्ति वाक्य –
1.दुनिया में कोई भी बदलाव सबसे पहले हमारे दिल, दिमाग़ और हाथों से होकर ही गुज़रना चाहिए.
2.जब कोई एक भ्रम से पीड़ित हो तो उसे पागल कहा जाता है परंतु जब बहुत-से लोग इससे पीड़ित हों तो वह धर्म कहलाता है.
3.कभी-कभी मंज़िल पर पहुँचने की बजाय सफ़र ज़्यादा ज़रूरी होता है.
4. किसी को अकृतज्ञ कहने से कोई समस्या नहीं सुलझती.
- हमारे नैतिक कर्त्तव्यों में से एक जीवन के आगे बढ़ने के लिए जगह बनाना है.

