आदम हुआ न आदम, हव्वा हुई न हव्वा — बाबुषा की कविताएँ

तुमने खेल-खेल में मेरा बनाया बालू का घर तोड़ दिया था, तुम इस बार फिर से बनाओ, मैं इस बार नहीं तोड़ूँगी। ग़लती थी मेरी, मैंने तोड़े थे। मैं तुम बनती जा रही थी। तुम धूप ही रहो, मैं छाँव ही रहूँ। तुम कठोर ही रहो, मैं कोमल ही रहूँ। यही हमारी धरती को पूरा करती है। शायद कुछ ऐसा ही कह रही हैं बाबुषा अपने आदम से कुछ उलाहने के साथ — अपने बा-बु-षा अंदाज़ में।

मशहूर कवयित्री बाबुषा की तीसरी शॉर्ट फ़िल्म “आदम हुआ न आदम, हव्वा हुई न हव्वा” में इस्तेमाल हो रही ये उनकी नयी कविताएँ हैं। इन कविताओं को थियेटर-कलाकार और ‘पञ्चकवल’ प्रोडक्शन की समर्थ नायिका मनुश्री मिश्र द्वारा अभिनीत किया जाएगा- अमृत रंजन 


प्रस्तावना

हमारी मैत्री से शत्रुता तक की सुदीर्घ यात्रा में
सूर्य समान रूप से बाँटता रहा उजाला
ऋतुओं ने कभी न किया भेदभाव
नदियाँ देती रहीं बराबरी से जल
मृत्यु ने भी किया एक-सा व्यवहार

इस यात्रा के अंत में हमें होना था एक;
हम एक-से होने में जुट गए.

एक दूसरे से कमतर नहीं बनाया था प्रकृति ने हमें
किंतु एक-सा भी तो न बनाया था, आदम !

ईश्वर के बाग़ से बाहर आते हुए हमें दिखाना था ठेंगा उसे
सेब की मिठास-सी ही एक दुनिया मीठी बना लेनी थी
हमें मनाना था अपनी विविधता का उत्सव, आदम !
एक-दूजे को पाना था-पूरना था.

हम समान होने की जद्दोज़हद में आन्दोलित होकर रह गए ?

तुम अपने पौरुष से मुझे परास्त तो करते ?
मैं पूर सकती थी तुम्हें अपने स्त्रीत्व से.
हम बचाते धरती के पर्यावरण को
मनुष्यता के गौरव को अपने वैविध्य की दक्षता से.

एक पुरुष होना, देह का सबल होना भर नहीं है
न मुक्त स्त्री होना, स्वर का प्रबल भर होना.

मुझे होना था रात का रहस्यमय अँधेरा
तुम्हें मुर्गे की भोर खोलती बाँग होना था.
मुझे यिन की लचक तुम्हें सुदृढ़ यांग होना था
हमें होना था धूप और छाँव का खेल
रेवा और शोणभद्र का अविश्वसनीय मेल होना था.

एक न हुए हम
एक-से होने की गफ़लत में
दो विरोधी सेनाओं में बँट कर रह गए.

न हम समान हैं,
हमारे ग्रह की जो दुर्गति हुई जाती है;
न उसका आरोप ही समान.

क्या तुम करोगे विचार कि चूक कहाँ हुई, आदम ?

हमें नहीं लौटना वापस उस खूसट परमपिता के बाग़ में
हमारे बच्चे उसे ओ ! टिली-लिली कर के चिढ़ाएँगे
उसकी झाड़ूदार दाढ़ी खींच कर भागेंगे
किंतु पहले;
करो यह विचार तुम कि भूल कहाँ हो रही है.

कोमल हूँ,
चली हूँ और थकी भी बहुत;
मैं अब हवा में उड़ती हव्वा होना चाहती हूँ, आदम !

1.
मैत्री

अब;
जबकि मुझे यह ज्ञात है
कि स्त्री-पुरुष के मध्य मैत्री-सा भाव
अत्यंत क्षणभंगुर है
प्रायः असंभव ही.

पुरुष
मित्रता की आड़ में
बहुत जल्दी कर देता है अपनी साथिन को निर्वस्त्र
किंतु स्त्री जब उघाड़ना शुरू करती अपना मन
पुरुष उड़ जाता खुल चुके इत्र-दान की
सुगंध की तरह.

इस पृथ्वी पर प्रेम करती स्त्रियाँ हो जातीं निर्वस्त्र
इस पृथ्वी पर मैत्री करते ही नंगा क्यों हो जाता है पुरुष ?

बोलो आदम !

2.
अभिनय

जिस तरह कुछ पुरुष प्रेम का सुंदर अभिनय प्रस्तुत करते हैं,
उसी तरह मैं जीवन का अभिनय सीख पाती;
तो बहुत सरल हो सकती थी जीने की विधि.

मेरी माँ
यानी कि बड़ी हव्वा कहती हैं
तुम सदा रही आयी इतनी सहज
कि संभव ही नहीं था
तुम्हारे जीवन का सरल होना.

3.
निर्लज्जता

आँखों के जल से रगड़ कर छुटाना होगा
पृथ्वी के दामन पर
लगे दाग़-धब्बे
किंतु शेष नहीं किसी की भी आँखों में
इतनी पवित्रता

इन दिनों स्वप्न भर से हो जा रही
आँखें मैली, आदम !

4.
कोफ़्त

मुझे इस बात का रंज नहीं
कि चोर द्वार से दबे पाँव निकल कर कोई आदम
किस तहख़ाने में छुप जाता है.

ऐसा इस अभागिन धरती पर इतनी अधिक बार हो चुका है
कि इस पर चौंक उठना;
डिजिटल पीढ़ी के दुधमुँहों के सामने अपनी हँसी उड़वाना है.

मेरी कोफ़्त बहुत अलग है.
मुझे टीसती है केवल यह बात कि कोई आदम
किसी हव्वा के प्रेम करने की क़ाबिलियत पर किस हौसले से
छुप कर करता है वार.

और किस कलेजे से, आदम ?

5.
अन्तः प्रेरणा

बावजूद इसके मुझे करना है प्रेम.
बहुत प्रेम.

ढूँढ़नी होगी अन्तः प्रेरणा, पुनर्जीवित करना होगा प्रेम
जाना होगा बूढ़े वृक्षों, युवा नदियों और टूटते सितारों की शरण में
जगाना होगा पवन की निश्छलता पर  पुनः भरोसा
उनींदे शिशुओं का माथा चूमना होगा.

मुझे करना होगा सूर्य से,
दढ़ियल खूसट परमपिता से;
और आदि महायोगी से प्रेम-

नहीं तो नष्ट हो सकती है पृथ्वी !

छींकते हुए मुँद जाती हैं आँखें;
हृदय की एक धड़कन थम भी जाती है

प्रेम करना;
छींकते हुए आँखों के खुले रहने का अभ्यास करना भी है.
प्रेम करना;
छींकते हुए हृदयगति के अबाध चलते रहने की कला सीखना भी है.
( मानती हूँ, मुझसे न सध सका. )

मुझे साधना है छींक
करना है ब्रह्मपुत्र से; शोणभद्र से प्रेम
नहीं तो नष्ट हो सकती है यह पृथ्वी

कि मेरी एक लापता धड़क का नाम है
शिव.

वह औघड़ –
विनाश का देवता भी तो है, आदम !

6.
शत्रुता

और अब;
जबकि हम दोनों परम शत्रु हैं
तुम्हारे पास भाषा की दक्षता भी है
भुजाओं का वैभव भी;

मैं एकदम नग्न हूँ अपने सत्य के साथ

मेरा सत्य-
मेरी प्रेम करने की क्षमता है, आदम !

संभव है कि तुम बचाते दिखो पृथ्वी
अपने बाहुबल और विद्वता के दम पर
मैं पृथ्वी को अपने प्रेम से बचा ले जाऊँगी.

ब्रह्मांड में धुँधलाता कार्ल सेगन का यह छोटा-सा नीला बिंदु
अपनी बेटी के माथे पर लगाऊँगी, आदम !

सच तो यह है कि हम दोनों नहीं हैं शत्रु
(हम नाचीज़ तो पुतले भर है हाड़-माँस के, जिन्हें कल धू-धू कर भस्म हो जाना है.)
तुम भी यह जान लो, प्रिय आदम !
कि ऐसा दिख भर रहा है कि हम शत्रु हैं.
हम नहीं शत्रु
हम तो केवल प्रतीक हैं नन्हे-नन्हे

आओ प्रिय, आदम !
अपने किसी किरदार में ईमानदारी से समाओ
और निभाओ.
तुम जानो कि यह युद्ध  मेरे और तुम्हारे मध्य नहीं,
यह युद्ध है धर्म और कर्म के मध्य.

(धर्म वह; जो धारण किये जाने के योग्य हो.
कर्म वह; जो धारण किये हुए को सत्यापित करने हेतु बाध्य हो जाए.

जैसे मेरा धर्म प्रेम है.

और प्रेम से ही इस दुनिया के सारे कर्म संचालित होने चाहिए थे किंतु
तुम हो कि भयभीत हुए जाते हो संसार के सबसे अहिंसक धर्म से ही, आदम ? )

यह युद्ध है हृदय की कोमलता और भुजाओं के बल के मध्य
तुम कोमलता से इतने भयभीत क्यों हुए जाते हो, आदम ?

यह युद्ध है भय और निर्भय के मध्य
यह युद्ध छद्म और सत्य के मध्य है
यह युद्ध है तुम्हारे व्यवहार के वस्त्र और मेरी स्वाभाविक नग्नता के मध्य.

मैं सारथी भी हूँ,
मेरे काँधे पर तरकश भी;
मेरे हाथों में कंपन होगा तुम्हारे असत को बेधने से पहले
किंतु प्रकट हो जाएगा मेरे देह-रथ को खींचने वाला सारथी मेरे ही भीतर
काल और स्थान से परे घटित होगी गीता-

“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहती पावकः
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः”

तुम बचाना चाहते हो केवल स्वयं को
तुम हव्वा को भी आदम बना रहे हो, आदम ?
आदम ही आदम
हव्वा के भेस में भी आदम !

हे छद्म !
उतर जाने दूँगी अपने भीतर निर्मोह का अलौकिक उजास
तुम्हें बेध दूँगी

कि मुझे बचाना है पृथ्वी यह
बेटी के माथे पर लगानी है सत्य की तरह उजली
निर्मल नीली बिंदी.

7.
सीख

अकेलेपन के दुःख बड़े हैं
साथ के संकट बड़े.

उत्तर और दक्षिणी ध्रुव एक-दूसरे के विपरीत हैं
विरोधी नहीं;
हमें इतना ही तो सीखना था प्रकृति से, आदम !

~ बाबुषा कोहली

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