फरहत एहसास की शायरी

उर्दू के युवा शायरों में फरहत एहसास का नाम ऐसे शायरों में शुमार किया जाता है जिनको पढ़ने-लिखने वालों के तबके में भी सराहा जाता है। अहसास की शिद्दत और बेचैनमिजाजी के इस शायर के शेर जुबान पर भी चढ़ते हैं और ठहरकर सोचने को भी मजबूर कर देते हैं। हिन्दी में पहली बार उनकी दो गजलें-
(1)
मैं रोना चाहता हूं खूब रोना चाहता हूँ मैं
और उसके बाद गहरी नींद में सोना चाहता हूं
मैं
तेरे होंठों के सहरा में तेरि आंखों के जंगल में
जो अब तक पा चुका हूं उसको खोना चाहता हूं मैं
ये कच्ची मिट्टियों का ढेर अपने चाक पर रख ले
तेरी रफ्तार के हम-रक्स होना चाहता हूं मैं
तेरी साहिल नजर आने से पहले इस समंदर में
हवस के सब सफीनों को डुबोना चाहता हूं मैं।
कभी तो फस्ल आएगी जहां में मेरे होने की
तेरी खाक-ए-बदन में खुद को बोना चाहता हूं मैं
मेरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है
तुम्हारे साथ मिलकर खुद को धोना चाहता हूं मैं।

(2)
मेरे सुबूत बहे जा रहे हैं पानी में
किसे गवाह बनाऊँ सराए-फानी(1) में
1.नाशवान सराय
जो आंसुओं में नहाते रहे वो पाक रहे
नमाज़ वर्ना किसे मिल सकी जवानी में
भड़क उठे हैं फिर आंखों में आंसुओं के चिराग
फिर आज आग लगा दी गई है पानी में
हमीं थे ऐसे कहां के कि अपने घर जाते
बड़े-बड़ों ने गुजारी है बे-मकानी में
ये बेकनार(1) बदन कौन पार कर पाया 1. जिसका कोई किनारा न हो
बहे चले गए सब लोग इस रवानी में
विसालो-हिज्र के ही एक चिराग थे दोनों
सियाह होके रहे शब की बेकरानी(1) में 1. दूर तक फैला हुआ
कहानी खत्म हुई तब मुझे खयाल आया
तेरे सिवा भी तो किरदार थे कहानी में।

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4 thoughts on “फरहत एहसास की शायरी”

  1. ये कच्ची मिट्टियों का ढेर अपने चाक पर रख ले
    तेरी रफ्तार के हम-रक्स होना चाहता हूं मैं
    bahut dinon baad mitti se ru-ba-ru hua. Shukriya Prabhat ji
    Ranjan Anand

  2. Pingback: gun shop

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फरहत एहसास की शायरी

उर्दू के युवा शायरों में फरहत एहसास का नाम ऐसे शायरों में शुमार किया जाता है जिनको पढ़ने-लिखने वालों के तबके में भी सराहा जाता है। अहसास की शिद्दत और बेचैनमिजाजी के इस शायर के शेर जुबान पर भी चढ़ते हैं और ठहरकर सोचने को भी मजबूर कर देते हैं। हिन्दी में पहली बार उनकी दो गजलें-
(1)
मैं रोना चाहता हूं खूब रोना चाहता हूँ मैं
और उसके बाद गहरी नींद में सोना चाहता हूं
मैं
तेरे होंठों के सहरा में तेरि आंखों के जंगल में
जो अब तक पा चुका हूं उसको खोना चाहता हूं मैं
ये कच्ची मिट्टियों का ढेर अपने चाक पर रख ले
तेरी रफ्तार के हम-रक्स होना चाहता हूं मैं
तेरी साहिल नजर आने से पहले इस समंदर में
हवस के सब सफीनों को डुबोना चाहता हूं मैं।
कभी तो फस्ल आएगी जहां में मेरे होने की
तेरी खाक-ए-बदन में खुद को बोना चाहता हूं मैं
मेरे सारे बदन पर दूरियों की ख़ाक बिखरी है
तुम्हारे साथ मिलकर खुद को धोना चाहता हूं मैं।

(2)
मेरे सुबूत बहे जा रहे हैं पानी में
किसे गवाह बनाऊँ सराए-फानी(1) में
1.नाशवान सराय
जो आंसुओं में नहाते रहे वो पाक रहे
नमाज़ वर्ना किसे मिल सकी जवानी में
भड़क उठे हैं फिर आंखों में आंसुओं के चिराग
फिर आज आग लगा दी गई है पानी में
हमीं थे ऐसे कहां के कि अपने घर जाते
बड़े-बड़ों ने गुजारी है बे-मकानी में
ये बेकनार(1) बदन कौन पार कर पाया 1. जिसका कोई किनारा न हो
बहे चले गए सब लोग इस रवानी में
विसालो-हिज्र के ही एक चिराग थे दोनों
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