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  • फेसबुक पर फर्जी काशीनाथ सिंह


    कल दोपहर बाद हम युवा लेखकों को बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ जब हमने वरिष्ठ लेखक काशीनाथ सिंह का फेसबुक पर दोस्ती का रिक्वेस्ट देखा। यही नहीं हिन्दी में फेसबुक पर टाइप करने के संबंध में उन्होंने सुझाव भी मांगे थे। शायद ही कोई युवा लेखक रहा हो जिसकी तरफ उन्होंने दोस्ती का हाथ न बढ़ाया हो। मैं तो फूला नहीं समा रहा था और खुशी के मारे मैंने अनेक समवयस्कों को इस संदर्भ में फोन भी किया। अनेक युवा लेखकों ने उनका फेसबुक पर स्वागत किया और उनसे आशीर्वाद भी मांगा। लेकिन इस प्रकरण का दिलचस्प पहलू रात में उनसे बातचीत करने पर खुला। उन्होंने बताया कि वे कम्प्यूटर प्रेमी नहीं हैं तथा अपना अधिकतर समय वे लिखने-पढ़ने में बिताना ही पसंद करते हैं बजाय फेसबुक पर समय बर्बाद करने के। यह बात मेरे लिए चौंकाने वाली थी। असल में उनका फेसबुक खात फर्जी है।
    दरअरसल, काशीनाथ जी ने पिछले दिनों तहलका के पठन-पाठन अंक में युवा लेखन पर एक टिप्पणी की थी जिसमें उन्होंने युवा लेखकों को अपनी रचनाओं पर ध्यान देने की सलाह देते हुए यह कहा था कि उनको बाजार की मांग के अनुसार लेखन नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा इसी कारण कुछ लेखकों की आरंभिक कहानियों में चमक दिखाई दी थी लेकिन जल्दी ही उनकी रचनाओं में बासीपन झलकने लगा। उन्होंने यह भी कहा था कि आज के लेखक प्रचार-प्रसार पर अधिक ध्यान देते हैं और उनको इससे बचना चाहिए। युवा लेखकों के एक गुट ने इस टिप्पणी को अपने खिलाफ माना और वे फेसबुक पर इसको लेकर अपना विरोध जताने लगे। एक बनारसी युवा लेखक ने उस लेख में काशीनाथ सिंह सहित अन्य वरिष्ठ लेखकों की टिप्पणी पर सवाल उठाते हुए एक लंबा लेख लिख मारा। कंटेंट से अधिक जिसकी भाषा-शैली को लेकर खूब चर्चा हुई।
    अभी उस लेख की गूंज थमी भी नहीं थी कि फेसबुक पर काशीनाथ सिंह के फर्जी अकाउंट का मामला सामने आ गया। निश्चित रूप से किसी युवा लेखक ने अपने उन्नत तकनीकी ज्ञान का लाभ उठाते हुए शरारतन यह कार्य किया है और हम सभी युवाओं को कठघरे में खड़ा कर दिया है। काशीनाथजी हम शर्मसार हैं।
    काशीनाथ सिंह हिन्दी के न सिर्फ वरिष्ठ लेखक हैं बल्कि ऐसे लेखकों में हैं जिनके कारण हिन्दी साहित्य की लोकप्रियता दूसरे हलकों में बढ़ी है। काशी का अस्सी जैसी उनकी रचनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि केवल अच्छे लेखन की बदौलत ही कितनी लोकप्रियता अर्जित की जा सकती है। काशीनाथ सिंह ने बताया कि उनके साथ ऐसा भी हो जाएगा यह उन्होंने कभी सपने में भी सोचा भी नहीं था।
    साहित्य में बहस की गुंजाइश तो होती है लेकिन साहित्य के नाम पर इस तरह के अपराधिक कृत्य को कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। वह हमारे बीच का ही कोई लेखक लगता है क्योंकि जिस तरह से चुन-चुनकर युवा लेखकों को दोस्ती के प्रस्ताव भेजे गए उतने लेखकों को कोई बाहरी व्यक्ति जानता हो ऐसा मैं नहीं मान सकता। मुझे ऐसा कोई गुमान नहीं है कि मेरे जैसे युवाओं की इतनी लोकप्रियता है कि समाज में उसके बड़ी संख्या में प्रशंसक हों। हमारे समाज में पाठक भी लेखक ही होते हैं। इसलिए हम युवा लेखकों को इसकी एक होकर निंदा करनी चाहिए तथा इस दिशा में सावधान भी रहना चाहिए कि आगे से इस तरह की घटना न घटे जिससे मर्यादा का उल्लंघन हो और हमें कहना पड़े कि साहित्यकार के भेष में कोई अपराधी हमारे बीच में आ गया है। निश्चित रूप से यह साइबर क्राइम का मामला है।

    15 thoughts on “फेसबुक पर फर्जी काशीनाथ सिंह

    1. मुझे भी बहुत खुशी हुई थी जब काशीनाथ जी की तरफ से रिक्‍वेस्‍ट आई। कुछ लोगों का सुझाव भी आया। परंतु, कल जब भोपाल से एक फोन आया तो धक्‍का लगा।
      यह साइबर अपराध है। इस पर तुरंत कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। छूट का मतलब ऐसे अपराधियों को प्रोत्‍साहन।

      काशीनाथसिंह जी, हम आपके साथ हैं।

      @प्रभात रंजन जी, आपका आलेख सटीक है। आभार।

    2. हास-परिहास तो तब माना जाता जब लिखनेवाला सामने आ जाता लेकिन उसने तो रातोरात काशीनाथ सिंह का अकाउंट ही हटा दिया। यही नहीं उनके नाम पर तरह-तरह की टिप्पणियां भी की जा रही थीं। यह मजाक की हद से आगे की बात है।

    3. लिंक दिया नहीं गया है, इस लिए हम नहीं जानते की उस फर्जी खाते में सम्माननीय लेखक के सम्बन्ध में कुछ असंगत टीपित है क्या. यदि नहीं है,तो मित्रों हिंदी में परिहास के लिए भी थोड़ी जगह रहने दो.और अगर है तो उसे कचरा समझ कर नज़रों से ओझल ही रहने दो.

    4. हद है। जिसने भी ये किया फालतु का अपना टाइम खराब किया। वैसे,सूचना के लिए धन्यवाद।

    5. इससे युवा लेखन की विश्वसनीयता घटेगी की हम संवाद में नहीं विध्वंस में यकीन रखते हैं. अपने बयान में मुझे साथ माने.

    6. vinod bhai ham sab log ek behtar vatavaran banan chahte hain. jismen gambhirata bani rahe aur garima bhi. dhanyavad aapka blog par aane ka. aap jaise gambhir log jab parhte hain to utsaah barhta hai.

    7. chhudra sararaton aur tuchhi harkaton se intetrnet par hindi ke sahityik vatavaran ko bigadne ka yah khel kab band hoga. kab hindi gambhirta se is madhyam ka upyog karana seekh payegi? prabhat bhaie aisi tuchhaie par lanat hai.

    8. बेहद घटिया काम है ये. शर्मसार करने वाली.

    9. मै आपकी इस टिप्पणी से सौ फीसदी सहमत हूं…इसे मेरा बयान भी माना जाय

    10. लेखक बिरादरी को शहर, समाज में बड़े सम्‍मान और प्रतिष्‍ठा से देखा और जाना जाता है, इस नाते यह मामला ज्‍यादा खेदजनक है.

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    कल दोपहर बाद हम युवा लेखकों को बड़ा सुखद आश्चर्य हुआ जब हमने वरिष्ठ लेखक काशीनाथ सिंह का फेसबुक पर दोस्ती का रिक्वेस्ट देखा। यही नहीं हिन्दी में फेसबुक पर टाइप करने के संबंध में उन्होंने सुझाव भी मांगे थे। शायद ही कोई युवा लेखक रहा हो जिसकी तरफ उन्होंने दोस्ती का हाथ न बढ़ाया हो। मैं तो फूला नहीं समा रहा था और खुशी के मारे मैंने अनेक समवयस्कों को इस संदर्भ में फोन भी किया। अनेक युवा लेखकों ने उनका फेसबुक पर स्वागत किया और उनसे आशीर्वाद भी मांगा। लेकिन इस प्रकरण का दिलचस्प पहलू रात में उनसे बातचीत करने पर खुला। उन्होंने बताया कि वे कम्प्यूटर प्रेमी नहीं हैं तथा अपना अधिकतर समय वे लिखने-पढ़ने में बिताना ही पसंद करते हैं बजाय फेसबुक पर समय बर्बाद करने के। यह बात मेरे लिए चौंकाने वाली थी। असल में उनका फेसबुक खात फर्जी है।
    दरअरसल, काशीनाथ जी ने पिछले दिनों तहलका के पठन-पाठन अंक में युवा लेखन पर एक टिप्पणी की थी जिसमें उन्होंने युवा लेखकों को अपनी रचनाओं पर ध्यान देने की सलाह देते हुए यह कहा था कि उनको बाजार की मांग के अनुसार लेखन नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा इसी कारण कुछ लेखकों की आरंभिक कहानियों में चमक दिखाई दी थी लेकिन जल्दी ही उनकी रचनाओं में बासीपन झलकने लगा। उन्होंने यह भी कहा था कि आज के लेखक प्रचार-प्रसार पर अधिक ध्यान देते हैं और उनको इससे बचना चाहिए। युवा लेखकों के एक गुट ने इस टिप्पणी को अपने खिलाफ माना और वे फेसबुक पर इसको लेकर अपना विरोध जताने लगे। एक बनारसी युवा लेखक ने उस लेख में काशीनाथ सिंह सहित अन्य वरिष्ठ लेखकों की टिप्पणी पर सवाल उठाते हुए एक लंबा लेख लिख मारा। कंटेंट से अधिक जिसकी भाषा-शैली को लेकर खूब चर्चा हुई।
    अभी उस लेख की गूंज थमी भी नहीं थी कि फेसबुक पर काशीनाथ सिंह के फर्जी अकाउंट का मामला सामने आ गया। निश्चित रूप से किसी युवा लेखक ने अपने उन्नत तकनीकी ज्ञान का लाभ उठाते हुए शरारतन यह कार्य किया है और हम सभी युवाओं को कठघरे में खड़ा कर दिया है। काशीनाथजी हम शर्मसार हैं।
    काशीनाथ सिंह हिन्दी के न सिर्फ वरिष्ठ लेखक हैं बल्कि ऐसे लेखकों में हैं जिनके कारण हिन्दी साहित्य की लोकप्रियता दूसरे हलकों में बढ़ी है। काशी का अस्सी जैसी उनकी रचनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि केवल अच्छे लेखन की बदौलत ही कितनी लोकप्रियता अर्जित की जा सकती है। काशीनाथ सिंह ने बताया कि उनके साथ ऐसा भी हो जाएगा यह उन्होंने कभी सपने में भी सोचा भी नहीं था।
    साहित्य में बहस की गुंजाइश तो होती है लेकिन साहित्य के नाम पर इस तरह के अपराधिक कृत्य को कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। वह हमारे बीच का ही कोई लेखक लगता है क्योंकि जिस तरह से चुन-चुनकर युवा लेखकों को दोस्ती के प्रस्ताव भेजे गए उतने लेखकों को कोई बाहरी व्यक्ति जानता हो ऐसा मैं नहीं मान सकता। मुझे ऐसा कोई गुमान नहीं है कि मेरे जैसे युवाओं की इतनी लोकप्रियता है कि समाज में उसके बड़ी संख्या में प्रशंसक हों। हमारे समाज में पाठक भी लेखक ही होते हैं। इसलिए हम युवा लेखकों को इसकी एक होकर निंदा करनी चाहिए तथा इस दिशा में सावधान भी रहना चाहिए कि आगे से इस तरह की घटना न घटे जिससे मर्यादा का उल्लंघन हो और हमें कहना पड़े कि साहित्यकार के भेष में कोई अपराधी हमारे बीच में आ गया है। निश्चित रूप से यह साइबर क्राइम का मामला है।

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