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  • मनीषा कुलश्रेष्ठ के उपन्यास ‘स्वप्नपाश’ का एक अंश

    स्वप्नपाश का एक अंश
    हाल में ही मनीषा कुलश्रेष्ठ का उपन्यास आया है ‘स्वप्नपाश’. मनीषा हर बार एक नया विषय उठाती हैं, नए अंदाज़ में लिखती हैं. ये उपन्यास भी उसका उदाहरण है. बहरहाल, उपन्यास मैंने अभी तक पढ़ा नहीं है. पढने के बाद लिखूंगा उसके ऊपर. फिलहाल इस अंश को पढ़िए और लेखिका को शुभकामनाएं दीजिए- मॉडरेटर 
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    मैंने खुद को व्यस्त कर लिया. दिमाग़ से खुरच – खुरच कर रुद्र को निकाल दिया. मैं पान – पराग खाती. वोद्का और ट्कीला शॉट्स लेती थी. उन व्यस्त दिनों में मैं ऎसा नहीं कि अपने अजीब और भयानक ख़्यालों की ज़द में नहीं आई. लेकिन मैं काम कर पा रही थी साथ ही मैं समझ पा रही थी जल्दी ही मैं ध्वस्त होने वाली हूँ, क्रिएटिवली व्यस्त रहना मुझे सहायता कर रहा था. लेकिन मुझे शामें सबसे भयावह लगती हैं आज भी. यही समय है जब मैं अपनी सोच पर अंकुश नहीं लगा पाती, बेतरतीब होती हूँ. ठोकर खाती हूँ. चीजें फैलाती – गिराती हूँ. फिसलने लगती हूँ भीतर बने गड्ढे में. एक शाम मैं अपने ही हाथों से छूट कर गिर गई. मुझे याद है मैं कोलाबा मुंबई में फुटपाथ पर टहल रही थी, हल्की बूंदाबांदी हो रही थी सो मैंने हाथ में छाता ले रखा था. अचानक मुझे विस्मृति का दौरा सा पड़ा, मैं अहसास और समय स्थान से तालमेल गड़बड़ा बैठी.ऐसा लगा कि दिमाग़ का कोई चक्का चलते चलते रुक गया, या उसे घुमाने वाली कोई बेल्ट टूट गई हो.   जिसकी आशंका को डॉक्टर से बताते हुए मैं डर रही थी. मेरे दोस्त मेरी सनकों को एक कलाकाराना नाम देते थे और मैं निश्चिंत थी कि यह ढोंग मुझे नहीं करना पड़ा था और स्वीकृत हो चुका था. भूल जाना, मूडी होना और कभी कभी क्रूर हो जाना और गालियाँ देने तक हर कोई यह बात मान लेता. लेकिन इस बार बात पटरी से उतर गई.
    मैंने चाकू से किन्हीं छायाओं पर वार करते हुए खुद को और घर की नौकरानी को घायल कर बैठी. नाना जी घबरा गए. मम्मी पहली फ्लाईट से मुंबई आईं और मुझे जबरदस्ती मेडिकल कॉलेज के साईकियाट्री वार्ड में भेज दिया गया. मेरी इच्छा के ख़िलाफ़! मुझे यही सुनाई दिया कि मैं अपने और औरों के लिए खतरनाक हो रही हूँ. मेरे कॉलेज का आखिरी साल था… मुझे जबरदस्ती दवाएँ खिलाई गईं. मुझे वार्ड में रखा गया…. जाने दो वह नाईटमेयरिशथा….मेरे उन दिमाग़ी उत्पातियों से कहीं बुरे और क्रूर थे डॉक्टर नर्सें और कम्पाउंडर….मैं यह सब नहीं लिख सकती. मेरे हाथ काँपते हैं क्योंकि वह विशुद्ध यातना थी. घर लौट कर भी मेरा अकेले में रहना, मेरी प्रायवेसी छिन गई. नहाने के समय भी मम्मी कमरे में रहती थीं बाथरूम की कुंडी खुलवाकर.
    उस ध्वस्त समय में से निकल कर मैं जो बचीथी, और परिस्थितियों के घालमेल में जो मैं बन चुकीथी, और वह खुद जो मैं होना चाहती थी, मैं इन सब के बीच की अवस्था में थी। मैंने अब तो यात्रा मानो शुरू की थी, अभी ही तो मुझे इन यात्राओं से लगाव हुआ था। मैंने अब तक सुना था जैसे तेंदुए कभी अपने धब्बे नहीं बदलते, वैसे लोग कभी व्यवहार नहीं बदलते ।  मेरे आस पास के संसार में जो जैसा पैदा हुआ वह वैसा का वैसा ही रहा, लेकिन मैंने ही अपने धब्बों को अचानक बदलते देखा।
    अब मैं कॉलेज के आखिरी साल में थी आर्टेमिज़िया मेरा दिमाग़ अपने बस में लेकर समय और ऊर्जा खाने लगी. मैं अगर कुछ गलत करती जो उसे पसंद न होता वह मुझे सज़ा देती. वह सारे समय मुझ पर चिल्लाने लगी थी. ऎसा भी वक्त आया कि मैं आर्टेमिज़िया से अपने झगड़े को वास्तविक मान कर उस से सड़क पर, ट्रेन में, कॉलेज में, लाईब्रेरी में झगड़ती. लोग मुझे टोकते. चौथे साल में मुझे अपना डिग्री कोर्स पूरा करना मुश्किल हो चला था. मैं जानती थी कि केवल यही एक साल बचा था… मैं किसी से कुछ कह नहीं पा रही थी, रुद्र जिसे कह सकती थी जा चुका था.  मुझे स्किज़ोफ्रेनिकका टैग लग गया था. मुझे अपना दिमाग़ अब बिलकुल अपने बस में नहीं लग रहा था. मुझे नहीं पता था कि अब मुझे क्या करना है. आर्टेमिज़िया मुझे रोज़मर्रा के कामों से भी दूर करती जा रही थी. मैं शिद्दत से चाहती थी कि मैं अपना डिग्री कोर्स पूरा कर लूँ और कहीं नौकरी में बिज़ी हो जाऊं. मैंने कोशिश की थी कि सबसे यह बीमारी छिपा लूँ पर अब सब खुल चुका था…पर अब भी कोई समझने को नहीं तैयार था. मेरा क्लासेज़ अटैंड करना भी रोज़ के नाम पर बोझ हो गया था. मम्मी मेरे साथ रह रहीं थी, मैं रोज़ सुबह बहाना बनाती – मेरा शरीर अकड़ रहा है. मुझे पैरालिसिस होने को है. आज बुखार है…आज छुट्टी है मम्मी. मुझे क्लास मॆं कुछ समझ नहीं आता.. मैं ऑबजेक्ट पेंटिंग करते करते कुछ और बनाने लगती. बहुत कुछ अजीब. मेरा सारा समय आर्टेमिज़िया के कमांड सुनने में जाता. मैं ही जानती हूँ वह साल कैसे बीता. पर मम्मी की ज़िद और उनकी सेवा के चलते मेरा ग्रेजुएशन हो गया फाईन आर्ट्स में. लेकिन मेरी सोच बहुत – बहुत बंटी – बंटी हो गई. एक मिनट यह तो दूसरे मिनट यह. दवाएँ बंद कर दी थीं मैंने….मैं बस नींद की गोलियाँ और वोद्का लेती. कभी – कभी कोकीन!
    मैडिकल कॉलेज के थेरेपिस्ट ने कभी मुझे खोलने की कोशिश नहीं की. बहुत कुछ पूछा यूँ तो बहुत कुछ पर मैं ही नहीं खुली…तब आर्टेमिज़िया बहुत बुरे मूड में थी. उसने उस डॉक्टर को शक्ल देख कर ही भरोसा करने से मना कर दिया. मत सुन इसकी बात, यह शैतान है.
    मत लेना गोलियाँ” “ यह शॉक देगा.मैं अब बिखर जाने की कगार पर थी, मैंने दो – तीन जगह पर नौकरी के लिए एप्लीकेशन भेजीं थीं. आर्टेमिज़िया   ने…. मैं अब यह मान बैठी थी कि मेरे पिछले जन्म के गुनाह थे कि मेरा दिमाग़ इस कदर… मैंने मम्मी से पूछा… क्या तुम ड्रग्स लेती थीं मेरे जन्म से पहले. वे कहतीं – तुम सच में क्रेज़ी हो क्या गुल? मैंने तुम्हारे होने में सबसे ज़्यादा बैलेंस्ड डाईट ली. लगातार नाचती रही..”  मुझे लगता इनके नाचते चले जाने ने, सातवें महीने तक मेरा कबाड़ा किया है. मेरा मन मर जाने को करता था डॉक्टर. मुझे किसी पर विश्वास नहीं होता था. मैं उन पर चिल्लाती, गालियाँ देती. एक दिन वे दुखी होकर वे लंदन चली गईं. वहीं अपने भाई के पास रहने लगीं. मैं जानती थी, मेरी मम्मी शुरु ही से पलायनवादी हैं. वरना उन्होंने पापा की हत्या का केस लड़ा होता.
    मम्मी को गए दूसरा महीना हुआ होगा कि मुझे मम्मी को फोन करके वापस बुलवाना पड़ा नाना को पहला हार्टअटैक पड़ा था। मम्मी चाहती थीं कि यह घर बेच कर हम तीनों लंदन चले जाएं। वे नाना को मनाने में सफल हो गईं पर मैं नहीं गई। कितना गर्वीला और निष्ठुर होता है न यौवन।
    मैं अब स्वतंत्र थी, आत्मनिर्भर. मुझे अपने लिये ज़रिया – ए – माश खोजना था. उनके जाने से पता नहीं क्या हुआ सब शांत हो गया. मुझे एक प्रायवेट आर्टगैलेरी में नौकरी मिल गई, आर्टेमिज़िया गायब हो गई और मैं सुकून से चित्र बनाने लगी. मेरे वो दिन अपूर्व थे. मेरे शत्रु भाग गए थे. माया-जाल टूट चुका था. मैं थोड़ा – थोड़ा स्वीकृत हो रही थी चित्रों की दुनिया में, सामाजिक तौर पर भी मेरे मित्र बन रहे थे. मेरा मन संतुलन के झूले पर शांति के गीत गा रहा था. मैं पूरी ताकत से बुरी चीजों को एक – एक कर अपने से परे धकेल रही थी. आश्चर्यजनक तौर पर मेरी याद से मेरे डर और पापों की कहानियाँ गायब हो चुकी थीं.
    मेरे दूसरे पेंटरों के साथ आरंभिक शोज़ हुए, अच्छे रिव्यूज़ मिले. मैं शांत और खुश थी अपने घर और घर में अपने स्टूडियो के स्वर्ग में.
    यह उस साल की गर्मियों के उतरते दिनों की बात है. मुंबई में मेरे चित्रों की पहली एकल प्रदर्शनी हुई थी. एक कला दीर्घा में मेरे चित्र सराहे गए और अगले दिन के टाईम्स में सकारात्मक रिव्यू भी आया था. एक पत्रकार पूछ रहा था कि चित्रों की पहली सीरीज़ के पीछे मेरा प्रस्थान बिंदु क्या था? मैं उसे उत्तर ही नहीं दे पाई, हकलाने लगी क्या कहती? मुझसे कुछ कहा ही नहीं गया. बस यह कहा कि बचपन में कहीं शुरु हुआ था. उस वक्त मैं यह सोचने लगी कि क्या वह प्रस्थान था? या कि पलायन? मुझे अपना बचपन याद आगया, जब मैंने पहली बार मम्मी से कहा था कि –
    मम्मी सच…सच में मुनक्यो है..मम्मी से मैंने ज़िद की कि मुझे रंग लाकर दो. मैं बना कर दिखाऊंगी …ऎसी है मुनक्यो”  ऎसे  तो मैंने पेंटिंग करना शुरु किया. मम्मी ने मुझे अपनी स्टडी का एक कोना दिया. छोटी – छोटी ट्यूबों में भरे जलरंग, रंगीन पेंसिलें, हर तरह के ब्रश एक चौकीनुमा ज़मीन से ज़रा उठी टेबल और एक बंडल ड्रॉईंग के कागज़. मैंने मुनक्यो के चेहरे को बड़े ध्यान से पेंसिल से रचा, गोल – फूले गाल, दबी हुई छोटी नाक और लगभग बड़ी मक्खी जैसी आँख़ें और उसके पंख सी फड़फड़ाती बरौनियाँ. पतले – पतले भिंचे होंठ और बड़ा सा माथा, ढेर सी स्प्रिंगों सरीखे बहुत घुंघराले बाल. पेंसिल स्कैच देख कर मम्मी खुश हुई. जब मैंने रंग भरा और उसके त्वचा के रंग को क्रोमियम हरा रंगा तो मम्मी ने कहा – बकवास!  भयानक!
    अपने इन उत्पातियों के चित्र , मैं क्या हर स्किज़ोफ्रेनिक रचता है. क्योंकि कोई मानता नहीं कि उनके साथ कोई है. पेंसिल से नहीं तो कोयले से, नहीं तो खड़िया से. हाँ  मैंने अपने  वार्ड में देखे थे…कई कई…गुमसुम, मिट्टी में उंगलियों को फंसाकर कुछ न कुछ रचतेहम कहाँ ले जाएँ अपने दिमाग़ों के इन उत्पातियों को? इन आवाजों से. इन आदेशों से…पलायन के चार रास्ते थे. आत्महत्या, पेंटिग, डायरी और सेक्स….हम्म.
    उन्हीं दिनों एक अच्छे एडवांस के साथ एक आर्ट कलैक्टर ने मेरे साथ कॉन्ट्रेक्ट भी किया. उसका नाम संगीत सालुंखे था. उसने मेरे पहले शो की सफ़लता पर एक छोटी सी पार्टी रखी अपने फ्लैट में. उसमें उसने मुंबई के कलाजगत के लोगों को बुलाया था.
    यह मेरी ही बेवकूफ़ी थी कि मैं पार्टी के बाद उसके फ्लैट में रुक गई  थी.  वहाँ  रुकते समय मेरे मन में उसके साथ रुकते हुए अपने जेंडर का ख़्याल भी नहीं आया था. मुझे बस किसी साथ की ज़रूरत थी उस रात. मैं बहुत दिनों से एक दोस्त की तलाश में थी, जिससे बात कर सकूँ.  उस पर कोकीन के नशे ने मुझमें हिम्मत नहीं छोड़ी थी कि मैं कार चला कर घर जा सकूँ.  जब हम बिस्तर पर लेटे तो वह मेरे शरीर पर झूमने लगा. मेरी पीठ से खुद को रगड़ने लगा. मैं उससे कहती रही, मेरा ऎसा कोई मन नहीं है, नहीं, मुझे सेक्स नहीं चाहिए. उसे पता था मैं सच ही में कोई स्पर्श भी नहीं चाहती. लेकिन कुछ देर बाद उसने मुझे पलटा लिया और कर डालाक्योंकि मैं मना करते – करते थक गई थी और वह कोशिश करते करते नहीं थका था. मैं सहज रिश्ते बनाना चाहती हूँ. पता नहीं लोग शरीर क्यों ले आते हैं? ऎसा क्या है इस शरीर में?
    बीच रात जब मैं उठ कर उसके फ्लैट से लगी आर्ट गैलेरी में पहुँची. वहाँ मैंने पहली बार छिन्नमस्ता की पेंटिंग देखी. छिन्नमस्ता एक देवी, जो एक संभोगरत युगल पर चढ़ी हुई थी . उसने अपना कटा सिर हाथ में लिया हुआ था.  दो योगिनियाँ उस मस्तक से फूट रही रक्त – धाराओं को अपने खुले मुंह में ले रही थीं. अचानक मुझे एक भीषण संगीत सुनाई पड़ा –  नगाड़ों और टंकारों का. एकाएक बहुत से बैलों की भगदड़ से कमरा भर गया.  मैं  बहुत दिनों तक नाना  के साथ योग, हठयोग  करती रही हूँ अपने दिमाग़ की आवाज़ों से निजात पाने के लिए. अकसर सफल भी हुई हूँ.  नाना के कहने से मैंने अपनी ऊर्जा कुंडिलिनी और चक्रों में भी एकत्र की है. मैंने अपनी आत्मा को नीली रेत घड़ी में सुनहरी रेत सा झरते हुए देखा है. मैंने उस पेंटिंग के आगे बैठ खुद को एकाग्र किया लेकिन मैंने योगिनियों को पेंटिंग से निकलते नाचते पाया. मुझे उस पल लगा कि मैंने अपनी कुंडलिनी इतनी जगा ली है कि मैं उसे बंद नहीं कर पा रही…और ये योगिनियाँ और पिशाच मुझसे घृणित यौन क्रियाएँ कर रहे हैं.
    मैं गैलेरी से बाहर निकली और मैंने एकदम नंगे सोए हुए सालुँखे पर अपना पैर रख दिया था, मेरा कटा सिर मेरे हाथ में था और योगिनियाँ और पिशाच उसके आस – पास नाच रहे थे. नगाड़े – दमामे बज रहे थे और मेरे आंसूँ निकल रहे थे. सालुंखे उसी हालत में चीख कर बाथरूम में घुस गया और डर के मारे सुबह तक नहीं निकला.
    मैं सुबह उठी और कार चला कर घर आ गई.  जामरुल का पेड़ अपने पत्ते झड़ा झड़ा कर उजड़ा खड़ा मुझे लानतें भेज रहा था. मेरी ज़िंदगी एबनॉर्मल थी. मेरे उस दिन के रूप से सालुंखे शायद बुरी तरह डर गया था…पर वह मेरे चित्र बेचता रहा. मुझ तक मेरे चित्रों की कीमत पहुंचती रही.  आगे उसने मुझसे एक दूरी बरती और मेरे नाम के आगे जीलगाने लगा. अब मेरी स्थिति और अलग स्तर पर पहुँच गई थी. सेक्सुअल भ्रम के अतिरेकों ने मुझे हिला दिया था. मेरे पास कुछ बहाने थे उन भ्रमों के लिएजिन्हें मेरा मन मान लेता लेकिन  दिमाग चीख पड़ता. मैंने बहुत दम लगा कर पान – पराग, कभी – कभी मस्ती में ली जाने वाली कोकीन छोड़ दी थी. सिगरेट मैं नहीं पीती. मैंने मेडिटेशन भी बंद कर दिया. जाग्रत कुंडलिनी की ओर एकाग्रता को चित्रों में झौंक दिया, मेरी पोर्ट्रेट्स वीभत्स तौर पर न्यूड होने लगीं..जिनमें कुछ अजीब प्राणी देह कुतर रहे होते. बिना निपल्स वाले रक्त सनी छातियाँ…और रक्त बहाती योनि..और उस कुंड पर जीभ चलाते छोटे पंख वाले, सूंड – नलिकाओं वाले क्रूर विशाल कीड़े. शिव और शव के सीनों पर नाचती भैरवियाँ.
    मैं बहुत परेशान हो रही थी और मैं किसी अपने के साथ शिफ्ट होना चाहती थी. माँ तो नाना को लेकर लंदन चली गई थीमेरी एकमात्र रिश्तेदार चचेरी बहन शिफ़ा ने मुझे कभी भी चले आने और डिनर साथ करने का तो निमंत्रण दिया लेकिन साथ रहने के विषय को वह टाल गई.

    मैं अपने अकेलेपन में लगातार चित्र बनाती रही मैं लेकिन वहम होने बंद नहीं हुए बढ़ गए. मेरा उन पर कोई बस नहीं था. मेरे दिमाग़ में कोई रोशनी जलती और कोई रंगमंच जाग्रत होता और उस पर नित नया खेल. देवदूतों की जगह पिशाच ले रहे थे…शुरु में तो मुझे लगा सड़क पर माईक्रोफोन लगे हैं और कुछ घटिया लोग कुफ्र बक रहे हैं. पर घर में? मैं टीवी को देखती वह बंद होता, खिड़कियाँ मूंदती….लेकिन गालियाँ और गंदे कमांड. मैं रो पड़ती सारे देवी – देवताओं को बुला डालती… चुप कराओ इन …मादर…बहन….के…को!!!!!! मुझे संशय हुए कि मेरी मॉम ने  सायकियाट्री वार्ड’  के उस क्रूर इलाज के दौरान मेरे दिमाग़ में माईक्रोचिप लगवा दिए हैं. ताकि मैं उनके कंट्रोल से न फिसलूँ. उन्होंने मुझे एपल का एक नया फोन भेज

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