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इस फांसी से सवालों के दूसरे कई फंदे सामने लटक आए हैं

कसाब की फांसी से उपजे सवालों पर कल हमने युवा लेखक चंदन पाण्डेय का लेख पढ़ा. आज प्रसिद्ध पत्रकार कुमार प्रशांत का एक विचारोत्तेजक लेख, जो आज के ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित हुआ है- जानकी पुल.
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इक्कीस नवंबर की सुबह साढ़े सात बजे, पुणे की येरवडा जेल में- जिसे अपने कारावास-काल में महात्मा गांधी ने येरवडा मंदिर कहा था- अजमल कसाब को फांसी दे दी गई। इस खबर से देश में हर कोई अचंभित है।

यह समझना खासा मुश्किल है कि एक ऐसे अपराधी को फांसी देने में सरकार को ऐसी गोपनीयता क्यों बरतनी पड़ी, जिसे चौराहे पर फांसी देने की मांगें भी लंबे समय से उठ रही थीं। क्या हमें पाकिस्तान में होने वाली प्रतिक्रियाओं का डर था, या कि अपने देश में आतंकवादियों को समर्थन देने वाले तत्त्वों से इस खबर को छिपाना था, या यह कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई और राष्ट्रपति द्वारा पुष्ट की गई फांसी की सजा को बहाल करने का आत्मविश्वास नहीं जुटा पा रही थी हमारी सरकार!

कसाब को फांसी की सजा काफी पहले सुना दी गई थी और राष्ट्रपति के यहां उसका क्षमायाचना-पत्र लंबित था। उसके अपराध और उसकी सजा के बारे में सारे संसार में एकमत था। उसे अब तक फांसी नहीं देने के पीछे अगर कोई एकमात्र मजबूत कारण था तो यह कि वह भारत के हाथ में एक ऐसा सशक्त राजनयिक मोहरा था, जिससे पाकिस्तान की राजनीति का सारा समीकरण गड़बड़ाया हुआ था। यह पाकिस्तान का दुर्भाग्य था कि 26/11 के हमले में कसाब मारा नहीं गया, बल्कि घायल बच गया और हमारे हाथ लग गया। जिंदा कसाब ने पाकिस्तान की जितनी अंतरराष्ट्रीय किरकिरी संभव थी, करा दी। यह फैसला तो भारत सरकार को करना था कि कब कसाब की उपयोगिता समाप्त होगी और जैसे ही वह उपयोगी नहीं रहा, उसे फांसी देनी ही थी।

इसलिए सारे देश को अंधेरे में रख कर, एक सुबह अचानक उसे फांसी दे देना और फिर देश को इस तरह उसकी खबर देना मानो कोई बड़ा मिशन पूरा हो गया हो, सरकार और प्रशासन के रूप में भारत की एक कमजोर छवि बनाता है। सारे देश-दुनिया को बता कर, एक सहज कानूनी प्रक्रिया के रूप में कसाब को फांसी दी जानी चाहिए थी। पाकिस्तान ने इस मामले में हमसे ज्यादा प्रौढ़ता का परिचय दिया। भारत सरकार ने जब उसे सूचित किया कि कसाब को फांसी दी जा रही है तो उसने सिर्फ इतना कहा कि उसे भारत की कानूनी प्रक्रिया पर भरोसा है। उसने कसाब की लाश की मांग भी नहीं की। यह सही भी था! जिस जिंदा कसाब ने पाकिस्तान सरकार के चेहरे पर कालिख पोत दी, उसे मरा लेकर वह करती भी क्या!

मुंबई की आर्थर रोड जेल से निकाल कर, दो दिन पहले जब कसाब को येरवडा जेल पहुंचाया गया तभी अनुमान हो गया था कि उसके लिए फांसी का फंदा तैयार हो चुका है। कसाब का अपराध ही ऐसा था कि उसे इसके अलावा दूसरी सजा नहीं दी जा सकती थी। इस फांसी से कसाब का किस्सा समाप्त हो गया, लेकिन सवालों के दूसरे कई फंदे सामने लटक आए हैं। हम इनकी अनदेखी करेंगे तो कभी न कभी, कहीं न कहीं किसी दूसरे कसाब का सामाना भी हमें करना होगा। सबसे पहली बात यही है कि अपराधी कसाब नहीं, पाकिस्तान था। कसाब एक मोहरा था। ऐसे हजारों युवा पाकिस्तान सरकार और फौज की कुचालों की बलि चढ़ते रहते हैं। जब तक पाकिस्तान सरकार से इसका कोई ठोस जवाब नहीं मांगा जाएगा, कसाबों को फांसी चढ़ाना कोई खास मतलब नहीं रखता। भारत सरकार इस दिशा में क्या कर रही है और क्या कर सकती है, इस बारे में गहरी बहस खड़ी होनी चाहिए।

सवालों का दूसरा फंदा यह है कि फांसी की सजा पाए जो दूसरे अपराधी राष्ट्रपति के फैसले का इंतजार कर रहे हैं, उनके मामलों को भी लटकाया क्यों जाए। कसाब को फांसी देने के बाद अनिर्णीत फैसलों की संख्या कोई दर्जन भर है। इनमें पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के अपराधी बलवंत सिंह राजोआणा का मामला भी है, अफजल गुरु का भी, और राजीव गांधी के हत्यारों का भी। इनमें सामान्य अपराध के मामलों में फांसी की सजा को लटकाए रखना गलत भी है और अमानवीय भी। देश में फांसी की सजा आज तक मान्य है और अदालत जब वैसी सजा सुनाती है तब हमें उसके अमल में तत्परता दिखानी चाहिए। 

दूसरा मामला उन अपराधों का है, जिनके पीछे राजनीतिक कारण हैं। अफजल गुरु या बलवंत सिंह आदि का मामला इसी श्रेणी का है। क्या इनकी सजा राजनीतिक अवसर देख कर दी जाएगी- ऐसा करना गलत और संविधान की अवमानना है। आतंकवाद के प्रसार के साथ-साथ परिस्थिति में एक बड़ा परिवर्तन हुआ है। राजनीति ने आतंकवाद की बैसाखी थाम ली है। दोनों में भेद करना कठिन हो गया है। इसलिए अब राजनीतिक असहमति नहीं, आतंकवाद ही सजा का एकमात्र आधार बच गया है।

अब यह जरूरी हो गया है कि फांसी की सजा पाया जो भी भारतीय जेल में है, उसे उसके अंजाम तक पहुंचाया जाए। अब चाहे पंजाब की सरकार हो या जम्मू-कश्मीर की, उसे यह तैयारी रखनी ही होगी कि ऐसे मामलों में न्यायालय के आदेश का पालन करने से अगर आतंकवादी बड़े या छोटे पैमाने पर अशांति का सहारा लेते हैं तो वह उन पर सख्ती से काबू करे। जिन राज्य सरकारों का रवैया ऐसे मामलों में ढुलमुल हो, उन्हें केंद्र सरकार संविधान की व्यवस्था के तहत ठिकाने पर लाए। जरूरत हो तो संविधान में आवश्यक संशोधन भी किया जाए, क्योंकि आतंकवाद का राक्षस सर्वभक्षी होता जा रहा है। यह समस्या एकदम नए स्वरूप में हमारे सामने आई है, जिसका मुकाबला करने की बात संविधान निर्माताओं ने तब सोची नहीं थी। अब यह आई है तो हमें इसके मुकाबले की परिणामकारी व्यवस्था खड़ी करनी होगी।

जब हम इस दिशा में जाते हैं तो शिवसेना के प्रवक्ता संजय राउत का एक बयान हमसे टकराता है। वे कहते हैं कि कसाब को फांसी देकर सरकार ने बाल ठाकरे को सच्ची श्रद्धांजलि दी है। उनका यह कथन आधा सत्य और आधा असत्य है। यह सच है कि बाल ठाकरे इस पक्ष में थे कि कसाब को अविलंब फांसी मिलनी चाहिए। यह भी सच है कि प्रणब मुखर्जी जब राष्ट्रपति के उम्मीदवार के रूप में अपने लिए समर्थन जुटाते हुए महाराष्ट्र पहुंचे थे तब बाल ठाकरे के दरवाजे भी गए थे। ठाकरे ने तब उनके लिए शिवसेना का समर्थन घोषित किया था और साथ ही यह आश्वासन भी मांगा था कि प्रणब बाबू राष्ट्रपति बनेंगे तो कसाब को तुरंत फांसी देने का आदेश देंगे। ऐसा ही हुआ। अगर कुछ फर्क रहा तो यह कि प्रणब बाबू ने यह फैसला करने में जितना वक्त लिया, बाल ठाकरे की सांसों ने उन्हें उतनी मोहलत नहीं दी। बस, संजय राउत का सच यहीं आकर खत्म हो जाता है।

इस सचाई के कई दूसरे पहलू भी हैं, जो खासे कड़वे हैं। बाल ठाकरे हमेशा सख्त कानूनों की मांग करते और शोर मचाते थे कि उनका सख्ती से पालन हो। लेकिन वे खुद को, अपनों को और अपनी शिवसेना को इसका अपवाद मानते थे। वे लोकतंत्र की छाया में बैठ कर तानाशाही की वकालत भी करते थे और उसी तरह बरतते भी थे। इस सचाई को कोई बदल नहीं सकता कि जब भी भारत में आतंकवाद के पनपने का इतिहास लिखा जाएगा, उसमें यह भी दर्ज होगा कि बाल ठाकरे ने अपनी राजनीति पुख्ता करने में उग्रवादी तरीकों का खुलेआम इस्तेमाल किया। महाराष्ट्र में बनने वाले सभी राजनीतिक समीकरणों में शामिल राजनीतिक दलों ने इस या उस वक्त पर इस अतिवादी व्यक्ति का इस्तेमाल किया और धीरे-धीरे इसे मजबूत जमीन दी। इसकी सजा किसे मिलेगी!

हत्यारों-आतंकियों आदि का सम्मान-स्थल अगर पंजाब में बनता है, स्वर्ण मंदिर के भीतर बनाया जाता है तो हमें उससे शिकायत होती है। यह बिल्कुल जायज शिकायत है। नागरिक स्तर पर इसकी निंदा होनी चाहिए और सरकारी स्तर पर इसे रोका जाना चाहिए। लेकिन जब हम ऐसा करेंगे तब क्या यह कहेंगे कि इसमें शिवसेना और बाल ठाकरे को अपवाद मानना चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो शिवाजी पार्क में उनके शवदाह की अनुमति कैसे मिली? क्या सार्वजनिक स्थलों का इस्तेमाल अब ऐसे कामों के लिए किया जाएगा- और कहीं से दबी-ढकी खबर यह भी आ रही है कि शिवाजी पार्क को उनके समाधि-स्थल के रूप में विकसित करने की योजना है!

मुंबई में शिवाजी पार्क की महत्ता और उसकी ऐतिहासिकता का जिसे जरा भी भान होगा वह ऐसे प्रस्ताव से विचलित होगा। ऐसा कुछ हुआ तो मुंबई की सांस घुट जाएगी। अतिवादी नारे उछाल कर बेरोजगार, दिशाहीन मध्य और कमजोर वर्ग के सपनों से खेलने की चालाकी ही बाल ठाकरे की राजनीति थी, जिसमें सभी तरह के अस्वस्थ तत्त्वों का समावेश होता था। अगर हाहाकार करती भीड़ का जुटना किसी की महानता का प्रमाण हो तो महानता की सारी परिभाषाएं बदलनी होंगी। पाकिस्तान और कश्मीर में हम रोज ही आतंकवादियों को शहीद का दर्जा पाते देखते और सड़कों पर खड़े बेहिसाब लोग स्यापा करते दिखाई देते हैं। उन सबको क्या मानेंगे हम!

और सवाल यहीं खत्म नहीं होता। मुंबई के आजाद मैदान में भीड़ जुटा कर जिन्होंने बेहिसाब तोड़-फोड़ करवाई, लाखों की सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान किया, अगर वे हमारी निंदा के पात्र हैं तो लाखों की भीड़ अयोध्या में जुटा कर बाबरी मस्जिद का ध्वंस करने वालों को हम किस श्रेणी में रखेंगे! आखिर अपराध तो अपराध है और कानून की नजर में उसकी सजा भी समान है। तो जवाब भारतीय जनता पार्टी को भी देना है कि जो कसाब की फांसी को तो देर आयद दुरुस्त आयद कह रही है और यह भी पूछ रही है कि अफजल गुरु को फांसी क्यों नहीं दी जा रही है, लेकिन गलती से भी यह नहीं पूछती है कि अयोध्या के गुनहगारों को सजा कब मिलेगी- और गुजरात के अपराधियों के बारे में भी किसी को मुंह खोलना चाहिए या नहीं!

जिंदा कसाब ने पाकिस्तान को तो कठघरे में खड़ा किया ही, मर कर उसने हमारे सामने भी एक नहीं, कई कठघरे खड़े कर दिए हैं। अब हम पर है कि हम इन कठघरों में खड़े हों या इन्हें सिरे से खत्म करें। जिस दिन हम इन्हें सिरे से खत्म करेंगे उसी दिन सही अर्थों में कसाब का अंत होगा।

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