क्या पत्रकार होना कमतर लेखक होना होता है?

जब दो सप्ताह पहले ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित अपने लेख में  प्रोफ़ेसर गोपेश्वर सिंह ने लप्रेक लेखक रवीश कुमार को टीवी पत्रकार कहकर याद किया था तो सबसे पहले मेरे ध्यान में यह सवाल आया था कि क्या लेखक होने के लिए किसी ख़ास पेशे का होना चाहिए? हम शायद यह भूल जाते हैं कि रघुवीर सहाय, मनोहर श्याम जोशी, धर्मवीर भारती आदि हिंदी की बड़ी विभूतियाँ पत्रकार ही थे. और कमलेश्वर? बहरहाल, पत्रकार हृदयेश जोशी के उपन्यास ‘लाल लकीर’ को पढ़ते हुए, उसके ऊपर लिखते हुए भी यही सवाल मन में चलता रहा कि क्या पत्रकार होना कमतर लेखक होना होता है?

“लाल लकीर’ उपन्यास बस्तर की नक्सलवादी पृष्ठभूमि में लिखा गया है, किस तरह तरह से शासन, सत्ता के गठजोड़ ने आम आदमी को बन्दूक उठाने पर मजबूर कर दिया. उपन्यास के लेखकीय में और आमुख पर तिग्मांशु धुलिया के हवाले से इसे एक प्रेम कहानी कहा गया है- दो आदिवासियों भीमे और रामदेव की प्रेम कहानी. लेकिन मुझे लगता है कि यह उपन्यास को सीमित करके देखना है. 1998 से शुरू होकर ‘लाल लकीर’ की कहानी में सलवा जुडूम, जीरम घाटी काण्ड तक की घटनाओं को समेटा गया है, उसके आम जीवन पर, नक्सलवादी आन्दोलन के ऊपर प्रभाव का आकलन किया गया है. भीमे और रामदेव तो बस्तर की अबूझ घाटियों में फैली जिन्दगी के उथल-पुथल को जोड़ने वाले सूत्र हैं.

हृदयेश जोशी ने एक महाकाव्यात्मक कलेवर का उपन्यास लिखने की कोशिश की है. अगर इसे उपन्यास नहीं कहा गया होता तो मैं इसकी तुलना राहुल पंडिता की पुस्तक ‘सलाम बस्तर’ से करता या इन्डियन एक्सप्रेस के जांबाज पत्रकार आशुतोष भारद्वाज की ‘बस्तर डायरी’ से जो पुस्तकाकार प्रकाशित तो नहीं हुई है मगर ‘जनसत्ता’ में उसका धारावाहिक प्रकाशन हुआ था तो उसकी भाषा, उसकी शैली ने सहज रूप से ध्यान खींचा था, और निस्संग तटस्थता ने.  

‘लाल लकीर’ की शैली उस तरह से औपन्यासिक नहीं है, इसमें बस्तर के वास्तविक घटनाक्रम की मिक्सिंग इस इसे विश्वसनीय बना देती है, अंदर ही अंदर चलती राजनीतिक उठापटक, उससे आदिवासी जीवन में बढती जागरूकता. यह एक प्रकृति प्रेमी समाज के रूपांतरण की भी रोमांचक कथा है. लाल रंग प्यार का रंग होता है जो धीरे धीरे हिंसा का पर्याय बनता चला गया है.

उपन्यास में एक बात जो प्रभावित करती है वह इसकी तटस्थता है. लेखक अपनी तरफ से कोई निष्कर्ष नहीं देता, किसी बने बनाए वैचारिक पड़ाव तक कहानी को नहीं पहुंचाता. बल्कि जीवन की सहजता, उसका हाई वोल्टेज ड्रामा ही कहानी आगे बढाता जाता है.

अब कुछ बातें संपादन की दृष्टि से. सबसे पहली बात यह कि 318 पन्नों का यह उपन्यास बहुत बड़ा है जो निर्मम संपादन की मांग करता था. आजकल इतना वृहत उपन्यास लिखने का चलन नहीं है. लेखक ने बस्तर के जीवन को बहुत करीब से देखा है और इस एक उपन्यास में सब कुछ समेट लेने की जिद है. उसकी वजह से मूल प्रेम कथा उस शिद्दत से नहीं उभर पाती, प्रेम तो है प्रेम की वह तड़प नहीं दिखाई देती है जो किसी प्रेम कहानी को यादगार बनाती है. मैं यह मानता हूँ कि अच्छे संपादन से यह संभव था. किताब में इसकी पूरी गुंजाईश थी. लेकिन खराब संपादन से किताब को फिक्शन से अधिक नॉन फिक्शन हो गयी है. उपन्यास पर हृदयेश जोशी का व्यक्तित्व हावी हो गया है. ऐसा मुझे एक पाठक, लेखक के रूप में लगा.

बहरहाल, अंत में इतना जरूर कहूँगा कि बस्तर के नक्सलवाद की पृष्ठभूमि को लेकर यह अब तक की सबसे सुदीर्घ पुस्तक है. लेकिन यह लघु का ज़माना है. लघु में विस्तृत कहने का.

हार्पर कॉलिन्स से प्रकशित इस उपन्यास की कीमत पेपरबैक में 350 रुपये है, जो इसकी सफलता में एक बड़ी बाधा है. लेकिन यह बिकने के लिहाज से नहीं एक दस्तावेजी पुस्तक के रूप में याद की जायेगी. एक सजग पत्रकार की ईमानदार पुस्तक के रूप में. 

प्रभात रंजन 

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