कल हमने जनसत्ता संपादक ओम थानवी का लेख ‘आवाजाही के हक में‘ जनसत्ता से साभार लगाया था. फेसबुक और ब्लॉग्स पर गुंटर ग्रास की कविता, विष्णु खरे और मंगलेश डबराल को लेकर चली बहसों के सन्दर्भ में उस लेख में जो सवाल उठाये गए उसने उन बहसों को एक बात फिर बहसतलब बना दिया है. आज उसी लेख का rejoinder लिखा है कवि-संपादक गिरिराज किराडू ने- जानकी पुल.
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“खुलापन” और वाम विरासत का सवाल: गिरिराज किराडू
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ओम थानवी इन्टरनेट को संदेह से देखते रहे हैं और उसके आलोचक रहे हैं. उन्होंने ब्लॉग और फेसबुक पर की गई टिप्पणियों और प्रतिक्रियाओं के आधार पर “जनसत्ता” में लिखा है यह कुछ अचरज और कुछ प्रसन्नता की बात है. अपने अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर इन्टरनेट पर प्रकाशित सामग्री का पुनर्प्रकाशन तो वे कुछ समय से कर ही रहे हैं. अच्छा है कि इस माध्यम को वे केवल ‘जाहिली‘ के सर्वेक्षण के लिए इस्तेमाल नहीं कर रहे.
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यहाँ “जानकी पुल” पर “जनसत्ता” से साभार प्रकाशित उनका लेख लोकतान्त्रिक खुलेपन और सहिष्णुता के पक्ष में तर्क करता है. उसका शीर्षक ही है: “आवाजाही के हक़ में”. उनके निशाने पर ‘मतवादी‘ लेखक और उनके संगठन हैं. अन्य पहलुओं पर विचार करने से पहले इस पर बहस होनी चाहिए कि हिन्दी का साहित्यिक वाम स्तालिनवादी और माओवादी जनसंहारों पर या पोलपोट के अमानवीय कृत्यों को लेकर अभी भी ‘अपोलोजेटिक‘ क्यूँ हैं और संगठनों से जुड़े लेखक इन भयानक मनुष्यता विरोधी कृत्यों पर कोई साफ़ पोजीशन क्यूँ नहीं लेते? अरुंधती राय यह मान सकती हैं कि रूस में स्तालिन के शासन में और चीन में माओ के दौर में व्यापक पैमाने पर जो जानें ली गईं वे‘जनसंहार‘ थीं लेकिन हमारे लिए यह कह पाना अभी भी संभव नहीं है.
व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि ‘द हिस्ट्री एंड द सोशियोलाजी ऑफ जेनोसाइड‘ के लेखकों फ्रैंक चाक और कुर्ट योहानसन की परिभाषा ज्यादा उपयुक्त है. वे कहते हैं कि ‘जनसंहार किसी एक समूह को नष्ट करने के लिए राज्य या किसी अन्य सत्ता द्वारा की गई एक-तरफा सामूहिक हत्याओं का एक प्रकार है जिसमें उस समूह और उसकी सदस्यता को भी नष्ट करने वाली सत्ता ही परिभाषित करती है. इस तरह परिभाषित करने पर सुहार्तों द्वारा इन्डोनेशिया में (10 लाख), पोलपोट द्वारा कंबोडिया में (15 लाख), स्तालिन द्वारा सोवियत यूनियन में (6 करोड़) और माओ द्वारा चीन में (7 करोड़) विराट पैमाने पर किए गए अपराध जनसंहारों में शामिल होते हैं .
(अरुंधती रॉय, आउटलुक पत्रिका में, लिंक:
अरुंधती रॉय के लिए यह संभव है कि एक स्वतंत्र बुद्धिजीवी की तरह उपरोक्त जनसंहारों के साथ गुजरात, इजरायल, रवांडा और तुर्की में हुए जनसंहारों का भी प्रतिरोध कर सकें. यह हिन्दी में न वाम के लिए संभव है न वाम विरोधियों के लिए. जैसी ‘सेलेक्टिविटी‘ ज़्यादातर वाम समर्थकों में है वैसी ही ज़्यादातर वाम विरोधियों में भी है. अरुंधती रॉय ने अब और खुल कर अपने ऊपर भी सवाल उठाना शुरू कर दिया है. हाल में उन्होंने कहा है कि मेरे जैसे कॉर्पोरेट रॉयल्टी पर जीवन चलाने वाले लोगों को कॉर्पोरेट दुराचारों पर पहला पत्थर फेंकने का हक़ नहीं है. इसी तरह नोम चौमस्की जो अमेरिकी विदेश नीति और उसके साम्राज्यवाद के सबसे प्रभावी आलोचकों में हैं, दुनिया भर में अमेरिकी प्रभुत्व का विरोध करने वालों के लिए प्रेरणा हैं, लेनिनियत और सोवियत यूनियन के इतने प्रबल आलोचक हैं कि न सिर्फ “लेनिन को समाजवादी आंदोलन का दक्षिणपंथी विचलन” मानते हैं बल्कि सोवियत यूनियन को लेनिन के जमाने से ही समाजवाद के विरुद्ध चलने वाली व्यवस्था मानते हैं. (http://www.chomsky.info/articles/1986—-.htm)
यह ‘खुलापन‘ एक सबक है.
दुर्भाग्य से यह खुलापन हिन्दी में दोनों तरफ, पर्याप्त नहीं है और जो थोड़े से लोग इन दोनों से असहमति जताते हैं उन्हें ये अपने ‘प्रतिपक्षी का आदमी‘ सिद्ध करने में लग जाते हैं.
साहित्य में सारा विमर्श इस पर सिमट जाता है कि किसकी उपेक्षा हुई, किसे पुरस्कार मिला आदि. हम यह भूल जाते हैं कि किसी के नाज़ी दमन का, फ़ासिज़्म का समर्थक होने का या स्तालिन को जायज ठहराने का अर्थ लाखों करोड़ों हत्याओं को जायज़ ठहराना है. ऐसे लेखकों को आदर मिले, इसकी इतनी चिंता क्यूँ की जाये? उसी तरह किसी भी तरह के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद या धार्मिक कट्टरपंथ का बचाव हजारों लाखों लोगों की हत्या को सही ठहराने और उसके विरोध में लोगों के आक्रोश और मत को प्रभावित करने की कोशिश है, ऐसा करने वालों को आदर मिले यह कैसा लोकतन्त्र है?
हिन्दी समाज में उदारता क्या दक्षिणपंथी मंचों पर जाने से ही आएगी? क्या लोहियादियों और वामपंथियों के बीच, प्रगतिशीलों और कलावादियों के बीच, विचारधारावादियों और अस्मितावादियों के बीच आवाजाही नहीं रही है? उनके बीच बहसें, झड़पें, संवाद नहीं हुआ है?
लेकिन ऐसे लेखकों के काम और जीवन का, उनकी प्रसिद्धि और लोकप्रियता का गंभीर अध्ययन ज़रूर होना चाहिए ताकि यह समझ में आ सके कि आखिर वे ऐसे जनसंहारों के समर्थक कैसे हुए और होने के बावजूद लोकप्रिय कैसे हुए और समाज के किन वर्गों में हुए. “समाज” मोनोलिथ नहीं है वैसे ही जैसे ‘पश्चिम‘ भी नहीं हैं.
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ओमजी की एक स्थापना यह है कि पश्चिम में लेखक के जीवन और सृजन के बीच दूरी को, उसके सामाजिक प्रतिफलनों और ‘साहित्यिक‘ऊंचाइयों के बीच फर्क को शुरू से सम्मान दिया गया, कि वहाँ “अभेद का यह सलीका बगैर किसी गांठ के जाने कब से कायम है.” इस स्थापना में पश्चिम को एक मोनोलिथ की तरह देखा गया है. एज़रा पाउंड को पश्चिमी वामपंथ ने बल्कि बहुत सारे उदारतवादियों ने कभी स्वीकार नहीं किया. एज़रा पाउंड के बारे में यह छुपाने की कोशिश की जाती रही है कि वे मुसोलिनी के समर्थक थे, वैसे ही जैसे भारत में निर्मल वर्मा के बाद के दिनों के दक्षिणपंथ पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है. नोबेल विजेता नूट हाम्सुन को आज तक उनके देश में माफ नहीं किया गया है हिटलर का समर्थन करने के लिए. ज्यां जने को सार्त्र ने ‘सेंट जने‘ लिख कर स्वीकार्यता दिलाई लेकिन उन्हें एक महत्वपूर्ण लेखक शायद ही कोई पश्चिमी वामपंथी मानता हो. उसी पश्चिम में जब सी.आई.ए. ने यह उजागर किया कि वह काँग्रेस फॉर कल्चरल फ़्रीडम जैसे संगठनों की गुप्त मदद करती रही है तो स्टीफन स्पेंडर ने उसके द्वारा प्रकाशित ‘एनकाउंटर‘ पत्रिका के संपादक पद से इस्तीफा दे दिया था लेकिन हिन्दी में इस प्रसंग में किसी जुड़े हुए किसी लेखक ने खेद प्रकट करना भी ज़रूरी नहीं समझा. शायद इसलिए कि भूतपूर्व वामपंथी स्पेंडर, जिनका स्तालिन और हिटलर के बीच 1939 में हुए समझौते के कारण वामपंथ से मोहभंग हो गया था, और कुछ भी करें अमेरिकी एजेंट नहीं कहलाना चाहते थे.
जबकि हाल ही में एक हिन्दी पत्रिका ने मेरे एक वाक्यांश “स्टालिन के अपने पुराने सहयोगी हिटलर के खिलाफ एक अहम फतह हासिल करने” को संपादित करके “स्टालिन के हिटलर के खिलाफ एक अहम फतह हासिल करने” कर दिया. मानो यह वाक्यांश संपादित होने से इतिहास से ”मोलोतोव-रिबेनट्राप समझौता” इरेज़ हो जाएगा.
भारत के हिन्दू समाज में एकलव्य और शंबूक की कथा से लेकर बौद्धों के साथ बर्ताव में और इसके जातिवादी ढांचें में असहिष्णुता का अमानवीय रूप देखा जा सकता है. अन्य समाजों में भी गैर बराबरी और दमन के कई रूप हैं. अकादमिक रस्साकशी लाखों के दैनिक अपमान और मनुष्य से एक दर्ज़ नीचे जीने की असहनीय वेदना को कम नहीं कर सकती. लेकिन एक स्तर पर भारतीय समाज नए और विरोधी विचार को लेकर कभी उस तरह असहिष्णु नहीं रहा जैसे पश्चिमी समाज मध्यकालीन चर्च द्वारा ‘विधर्मियों‘ और उनकी पुस्तकों को जलाने से लेकर नाज़ी कैंपों, स्तालिनी शो ट्रायल्स और मैकार्थियन विच हंट में रहा है.
इसके बरक्स कबीर से लेकर कुफ़्र की शायरी करने वालों तक के साथ भारतीय समाजों ने अपेक्षाकृत रूप से सहिष्णुता दिखाई है. कहा जा सकता है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और फतवों जैसी कट्टरता एक ‘आधुनिक‘ घटना है जो बहुत हद तक पश्चिम से आई है लेकिन ‘पूरब‘ और‘पश्चिम” के भेद को आत्यंतिक और अटल मानना एक किस्म का हटिंग्टनी ‘सांस्कृतिक/ साभ्यतिक सापेक्षतावाद‘ होगा जो वहीं ले जा सकता है जहाँ वो ले जा रहा है.
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हिन्दी में अपनी संपादकीय, आयोजकीय अभिरूचियों और चयन में अज्ञेय और अशोक वाजपेयी लोकतान्त्रिक लोगों में रहे हैं – सुना है विष्णु खरे ने तो एक बार अशोक वाजपेयी के विजन की तुलना नेहरू से की थी. अज्ञेय के सप्तकों में कई वामपंथी हैं, अशोक वाजपेयी के सारे कामों में सभी तरह के लोग रहे हैं. बहुत सारे वामपंथी मंच और पत्रिकाएँ भी सभी तरह के लेखकों को स्थान दे रहे हैं, धुर दक्षिणपंथियों को छोडकर.
अपने लेखन में ‘अहं के विलयन‘ की बात करने वाले अज्ञेय लेकिन एक नवागंतुक द्वारा की गई तीखी आलोचना से इतने आहत हुए कि उन्होंने एक सार्वजनिक संस्था का बरसों बहिष्कार किया.
जिनका आप विरोध करते हैं और सचेत करते हैं उनसे सम्मान की अपेक्षा क्यूँ? क्या अज्ञेय को वामपंथियों की स्वीकृति ही ‘निर्विवाद‘ रूप से एक महान लेखक सिद्ध कर सकती थी?
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(साहित्यिक) वाम की दीर्घकालीन राजनीति क्या है? लंबे समय में वे क्या करना चाह रहे हैं? क्या साहित्य अकादमी ‘सही‘ लोगों को मिलता रहे, राजा राम मोहन रॉय में ‘सही‘ किताबें खरीदी जाती रहें, जी.एन.यू., डीयू, वर्धा में ‘सही‘ लोगों को नौकरी मिलती रहे, राजकमल आदि में ‘सही‘ लेखक भी छपते रहें यही दीर्घकालीन राजनीति है? या इसके परे भी लेखक कुछ कर सकते हैं?
क्या वे इसी लोकतान्त्रिक व्यवस्था को और समतामूलक और सहनीय बनाने के लिए काम कर रहे हैं या ‘साम्यवादी सर्वहारा क्रांति‘ के लिए?यदि सर्वहारा क्रांति ही लक्ष्य है तो उसके लिए जनता के बीच में क्या तैयारी है? नक्सल इलाकों को छोडकर क्या यह कहीं और अंश मात्र भी संभाव्य और वास्तविक लक्ष्य है? सरकारी या कॉर्पोरेट नौकरी करने और उसके बीच साहित्य की यह भारी दुनियादारी संभालने के बाद कितने लोग कितना समय ‘साम्यवादी सर्वहारा क्रांति‘ के लिए दे रहे हैं? या लेखन ही काफ़ी है उसे लाने के लिए? इस बार ‘रेवोल्यूशनरी सबजेक्ट‘ कौन होगा? सर्वहारा क्या वही है या कोई नया सर्वहारा इस बीच आ गया है? इन प्रश्नों का जवाब निश्चयात्मक रूप से देना भारत में ही नहीं कहीं के भी प्रतिबद्ध के लिए बेहद मुश्किल है. समाज, और पूंजीवाद ही इस बीच इतना बदल गया है.
इसलिए किसी फ्यूचर मॉडल के लिए खाका बनाते हुए भी वर्तमान में ‘प्रतिरोध‘ ही सबसे प्रभावी रणनीती भी है, राजनीति भी, लेकिन प्रतिरोध सच्चा होना चाहिए, अवसरवादी नहीं. कभी किसी संस्था का बहिष्कार करना कभी वहाँ चले जाना, दक्षिणपंथी शासन में राज्य स्तरीय ठुकरा देना केंद्रीय अकादेमी का ले लेना, कभी शीलाजी के फोटो वाली पत्रिकाएँ छापना कभी रमन सिंह जी की, कभी मायावती जी की, कभी अर्जुन सिंह की गोद में बैठना कभी दुर्जन सिंह जी की – जब तक यह चलता रहेगा समाज में तो क्या साहित्यिक समाज में विश्वसनीयता नहीं बन पाएगी.
पर इसके बावजूद भविष्य की कोई भी जन-पक्षी राजनीति बिना वाम के हो सकती है?
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देरीदा जैसे उम्र भर वाम से दूरी रखने वाले दार्शनिक ने कहा था बिना मार्क्स के, बिना मार्क्स के किसी एक संस्करण के कोई भविष्य नहीं हो सकता. यह उन्होंने रूस के पतन के बाद कहा था. वाम को कुछ खास तरह के वामपंथियों से बचाना अंदर बाहर सभी तरह के लोगों की ज़िम्मेवारी है. वाम-समता मूल्यों वाला, वर्तमान लोकतन्त्र से ज़्यादा स्वाधीन और बराबरी वाला और पुरानी वाम व्यवस्थाओं के सर्वसत्तावादी दमन से मुक्त समाज बनने के लिए यह ज़रूरी है. वाम विचारक ज़िजेक ने ईसाईयत के बारे में कहा है कि इसकी विरासत इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे केवल ईसाईयों के भरोसे नहीं छोड़े जा सकता वैसे ही वाम-विरासत इतनी महत्वपूर्ण है कि इसे केवल संस्थागत वामपंथियों के भरोसे नहीं छोड़े जा सकता.
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खुद ओम थानवी की राजनीति क्या है? इधर कभी उन्होंने “जनसत्ता” के बारे में लिखा कि वह एक वाम-समर्थक अखबार रहा है और रहेगा. खुद वे क्यूंकि अज्ञेय को लेकर एक अभियान चला रहे हैं उनके बारे में यह धारणा बन गई है कि वे प्रतिगामी मूल्यों के हैं. उनके द्वारा वामपंथी लेखकों के आचरण पर दो टूक टीका टिप्पणी से भी ऐसा माहौल है. लेकिन वामपंथी लेखक= वामपंथ नहीं हैं. जिन लेखकों को लगता है वही वामपंथ हैं और उनकी, उनके व्यक्तिगत आचरण की आलोचना विचारधारा की आलोचना है उन्हें खुद के वामपंथी होने का – द्वन्द्वात्मक दर्शन में विश्वास करने वाला होने का – दावा फिर से परख लेना चाहिए.
ओम थानवी की राजनीति के लिए उनका बेहतरीन यात्रा वृतांत ‘मुअनजोदडो‘ पढ़ना चाहिए. उन्होंने उसमें भारतीय इतिहास के बार में जहाँ जहाँ भी ज़रूरत पड़ी है दक्षिणपंथी दकियानूसियों का स्पष्ट प्रतिवाद किया है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित इतिहास दृष्टि का समर्थन किया है.
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लेखकों के खेल निराले होते हैं. भाजपाई सरकार के कार्यकाल में साहित्य अकादेमी का पुरस्कार ठुकराने वाली और कॉर्पोरेट तंत्र पर तीखा प्रहार करने वाली, जयपुर में साहित्य महोसत्व के डी.एस.सी द्वारा स्पान्सर्ड होने पर व्यंग्य करने वाली अरुंधति रॉय ने बुकर जैसे कॉर्पोरेट का पुरस्कार क्यूँ लिया?
1972 में मार्क्सवादी जॉन बर्जर ने यही पुरस्कार स्वीकार करते हुए दिये गए भाषण में कंपनी द्वारा वर्षों तक बंधुआ मजदूर रखने का विरोध किया और कहा कि इस कंपनी का 130 वर्षों का शोषण ही गयाना में गरीबी का कारण है. बर्जर ने अपनी आधी पुरस्कार राशि ब्रिटिश ब्लैक पैन्थर्स को दे दी. अरुंधती ने भी इस पुरस्कार की राशि नर्मदा आंदोलन को दे दी थी.
साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता उदय प्रकाश ज़बरदस्त फिनोमेना हैं. काश मैं उनके सिर्फ लेखन के बारे में जानता! उन्होंने कब क्या कहा और किससे कब क्या स्वीकार किया उसे जाने भी दें (क्यूंकि उदय एज़रा पाउंड बिलाशक नहीं हैं) तो आज मंगलेश डबराल को “दैत्यों, सत्ता के तिकड़मबाजों” में शामिल मानने वाले (और मंगलेश भी एज़रा पाउंड बिलाशक नहीं हैं) उदय ने कभी “कविता की अपनी पहली किताब” जिन लोगों को समर्पित की थी उनमें मंगलेश भी थे!
जय हो! संतों घर में झगरा भारी!


