बाल साहित्य और शिक्षा की किताबों की चर्चा क्यों नहीं होती?

हिंदी में साल भर की किताबों का जो लेखा जोखा प्रकाशित होता है उनमें बाल साहित्य तथा शिक्षा से सम्बंधित पुस्तकों की चर्चा न के बराबर होती है. शिक्षाविद कौशलेन्द्र प्रपन्न ने एक बढ़िया आकलन करने की कोशिश की है- मॉडरेटर.
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कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रा वृत्तांत आदि साहित्य की विधाओं में खूब लिखा जा ररह है, उनके बारे में खूब छापा जा रहा है। किताबें की सूची बनाई जाए तो वह हजारों की संख्या सहजता से पार कर जाएंगी। लेकिन यदि बच्चों के लिए लिखी गई किताबों की सूची देखने चलें तो वहां हम 10-20 के बाद हांफने लगते हैं। यही हाल शिक्षा का भी है। बाल और शिक्षा गोया साहित्य का हिस्सा ही नहीं माना जाता। शायद यही वजह है कि जब पूरे साल का लेखा जोखा लिखा जाता है तब बाल और शिक्षा उन आकलनों से नदारत होते हैं। यदि आप यही जानना चाहें कि इस वर्ष बच्चों के लिए कौन सी किताब आई तो आपके हाथ निराशा ही लगेगी। कविता, कहानी, उपन्यास विधा की किताबों से कोई गुरेज नहीं है लेकिन क्या बाल और शिक्षा विधा को हाशिए पर ढकेल कर एक मुकम्मल तस्वीर की कल्पना की जा सकती है? क्या भविष्य के पाठक के लिए ऐसी जमीन की उपजाऊ है? कुछ और भी सवाल हैं जिनसे मुंह नहीं मोड़ सकते। दरअसल बाल और शिक्षा शास्त्र विधा में कम लिखे जाने के कारणों पर विचार करें तो पाएंगे कि यहां बाजार और आर्थिक पहलू ज्यादा हावी है। यदि बाल एवं शिक्षा साहित्य के खरीदार न के बराबर हैं तो ऐसे में प्रकाशक इस दुखते रग पर हाथ नहीं धरना चाहता। इसका अर्थ यह भी नहीं कि कविता,, कहानी, उपन्यास के बाजार गरम हैं। हां इन किताबों के लोर्कापण तो होते हैं लेकिन उन्हें भी पाठकों के राह जोहने पड़ते हैं। संभव है कविता, कहानी के पाठक ज्यादातर वे होते हैं जिन्हें भेंट स्वरूप किताबें मिलती हैं। जिन्हें पढ़कर मित्रों को एहसास करना होता है कि हां हमने तुम्हारी किताब पढ़ी बहुत अच्छी है। इस अच्छी की परिभाषा पर न जाएं। क्योंकि उन्हें महज एक दो कहानी व कविता पढ़कर अपनी राय बना लेते हैं। दरअसल अभी कविता, कहानी आदि की किताबों की समालोचना होना बाकी है। विभिन्न प्रकाशकों के सूची पत्रों से गुजरने के बाद जो हाथ लगता है वह बेहद निराशाजनक ही कहा जाएगा।
हिन्दी के प्रकाशक जिस तरह की बाल किताबें छापते हैं उनमें ज्यादातर बाल कहानियां, बाल गीत की किताबें होती हैं। दूसरे स्तर की वे किताबें मिलेंगी जो सिर्फ नसीहतें देती मिलेंगी। जैसे बच्चे कैसे सीखते हैं, बाल मन के गीत, बाल नाटक, मंदबुद्धि बच्चे आदि। इन किताबों की विषयी समझ और फैलाव पर नजर डालें तो ये किताबें बड़ों कह नजर से बच्चों की दुनिया को देखने की कवायदें ज्यादा लगेंगी। बच्चों के लिए उपयागी किताबें की संख्या बेहद कम हैं। जो बाजार में उपलब्घ हैं वे अंग्रेजी की किताबें हैं या फिर बाल गीत हैं। क्या बाल साहित्य सिर्फ बाल गीत, बाल कहानियां भर ही हैं। इस पर विमर्श करने की आवश्यकता है।
बच्चे कैसे सीखते हैं, भाषा शिक्षण के तौर तरीके क्या हों, कहानी कैसे कही जाए, कक्षा में भाषा और बोली, बच्चों की कहानियां कैसी हों आदि ऐसे विषय हैं जिन पर लेख, किताबें लिखी जानी चाहिए। यदि 2014 में प्रकाशित कुछ किताबों पर नजर डालें तो विभिन्न प्रकाशकों की सूची में बाल साहित्य और शिक्षा की किताबें 50 से ज्यादा नहीं हैं। वहीं अन्य कविता, कहानी की किताबें हजार की संख्या आसानी से पार कर जाएंगी।  भाषा और शिक्षा से संबंधित समाज, बच्चे-बच्चियां और शिक्षा सवालों की शिक्षा’- वीरेंद्र रावत की लिखी इन दो किताबों से गुजरना गणित शिक्षण, कक्षा अवलोकन, भाषा की बुनियादी शैक्षिक समझ की विस्तार से विमर्श करती चलती है। वहीं कई प्रासंगिक दस्तावेजों की रोशनी में यह किताब नेशनल करिकूलम फ्रेमवर्क की परिभाषित भी करती है। भाषा, बच्चे और शिक्षा, कौशलेंद्र प्रपन्न की किताब सड़क पर भटकने वाले लाखों बच्चों को समर्पित है। इस किताब में भाषा से संबंधित शिक्षण विधि, भाषा की प्रकृति-भूगोल की जानकारी तो देती ही है साथ ही बच्चों के अधिकारों के लिए 1989 में संपन्न संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन की पांच बाल अधिकारों की रोशनी में भारत के बच्चों को देखती और विमर्श करती है। प्रेमपाल शर्मा की किताब शिक्षा भाषा और प्रशासन’, शिक्षा के सरोकार 2014, पढ़ने का आनंद 2013, भाषा का भविष्य 2012। यदि 2014 में प्रकाशित शिक्षा के सरोकार के कथ्य पर नजर डालें तो पाएंगे कि हिन्दी माध्यम और भाषा शिक्षण को लेकर उठे यूपीएससी की विवाद बवंड़र को ठहर कर विचारने की ओर प्रेरित करता है।
यदि बड़े प्रकाशकों की प्रकाशित किताबों की सूची देखें तो प्रेमचंद की कहानियां प्रमुखता से छापी जा रही हैं। वहीं दूसरे ज्यादा छपने वाले लेखक रवींद्र नाथ टैगोर हैं जिनकी कहानियां भी पेपर बैक में छपी हैं। राजकमल प्रकाशन की बच्चों की किताबों में प्रेमचंद, टैगोर, रवि शंकर आदि की किताबें ज्यादा हैं। जो विभिन्न मुद्दों पर लिखी गई हैं। एक ओर कृष्ण कुमार किताब मैं नहीं नहीं पढ़ूंगा है वहीं दूसरे ओर बड़े भाई साहब, सवा सेर गेहूं, गिल्ली डंडा और रवि शंकर की नालंदा, राममनोहर लोहिया, प्रवासी पक्षियों का बसेरा आदि टाईटिल मिलती हैं। वहीं प्रभात प्रकाशन की ओर शिक्षा पर बारह टाइटिल छापे गए हैं। लेकिन उन किताबों का प्रकाशन वर्ष स्पष्ट नहीं है कि कितनी किताबें 2014 में छपीं। लेखकों में शामिल हैं दीनानाथ बत्रा, देवेंद्र स्वरूप, जगमोहन सिंह राजपूत, जे एस अग्रवाल जो एक खास विचारधारा से संबंधित हैं। इनमें दीनानाथ बत्रा की भारतीय शिक्षा का स्वरूप’, जे एस राजपूत की किताब ‘शैक्षिक परिवर्तन का यथार्थ’, देवेंद्र स्वरूप की किताब राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन का इतिहासशामिल है। बाल कथाओं में विष्णु प्रभाकर, श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी, प्रकाश मनु, हरीश शर्मा आदि की रोचक बाल कहानियों की किताबें मिलेंगी। हितोपदेश की कहानियां,, उपनिषद की कहानियां, चुनी हुई बाल कहानियां, सात बहनों की लोक कथाएं आदि बच्चों के लिए टाइटिल हैं। पंचतंत्र की कहानियां, पूर्वोंत्तर की लोकगाथाएं आदि बाल किताबों पर नजर डालें तो एकबारगी बच्चों पर नैतिक शिक्षा, मूल्य, प्राचीन कथाओं पर पढ़ाने पर जोर दिया गया है।

आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा और बाल साहित्य को नजरअंदाज किया जाए बल्कि उन साहित्यों को भी मुख्यधारा की समीक्षा और सूची में माकूल स्थान दिया जाए। क्योंकि बाल साहित्य और शिक्षा संबंधी किताबों को हाशिए पर रख कर साहित्य के वृहद् परिदृश्य की कल्पना करना मुश्किल है। संभव है इस लेख में कुछ किताबें यहां छूट गईं हों लेकिन उसके पीछे कोई सोची समझी रणनीति नहीं है।

कौशलेंद्र प्रपन्न
भाषा विशेषज्ञ एवं शिक्षा सलाहकार
अंतःसेवाकालीन शिक्षक शिक्षा संस्थान, टेक महिन्द्रा फाउंडेशन

दिल्ली

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