लाल सिंह दिल की कविताएं

लाल सिंह दिल पंजाबी कविता का एक अलग और जरूरी मुकाम है. अपने जीवन में खेत मजदूरी से लेकर चाय का ठीया चलाने तक के अनेक काम करते हुए वे समाज के हाशिये के जीवन से करीबी से जुड़े रहे. उन्होंने अपने जीवन के कडवे अनुभवों को पूरी दुनिया के हाशिये के समाज के अनुभवों से जोड़ते हुए ऐसी कवितायेँ लिखी जिसमें वंचित समाज का दिल धडकता है. अभी हाल में उनकी कविताओं की किताब हिंदी में आई है. जिसका अनुवाद सत्यपाल सहगल ने किया है. आधार प्रकाशन से प्रकाशित उसी संग्रह से कुछ कविताएं- जानकी पुल.
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1.
समाजवाद

समाजवाद ने
क्या खड़ा किया?
गर व्यक्तिवाद
गिराया ही नहीं?
मछली पक भी जाए
औ’ जिन्दा भी रहे?
2.
जात

मुझे प्यार करने वाली
पराई जात कुड़िये
हमारे सगे मुर्दे भी
एक जगह नहीं जलाते.
3.
सोच

वे ख़याल बहुत रूखे थे
मैंने तेरे भीगे बालों को
जब मुक्ति समझ लिया.
4.
तुम्हारा युग

जब
बहुत सारे सूरज मर जायेंगे
तब
तुम्हारा युग आएगा
है न?
5.
जनता बेचारी

लोगों ने
बनवास वापसी पर
जब राम से पूछा
कैसी बीती?
तो उन्होंने कहा
हमें उलटी तराजू के साथ
दिया गया
और हमसे
सीधी तराजू के साथ
लिया गया.
राम ने कहा
तुम्हारा यह हाल हुआ?
अब भी करने वाले
वही हैं.
6.
भारतीय संस्कृति

कोई संस्कृति नहीं
सिर्फ एक भारतीय संस्कृति.
शेष सब नदियाँ
इसी सागर में
आ मिलती हैं.
हाथी के पाँव में
सबके पाँव आ जाते हैं.
डाकुओं की संस्कृति
भारतीय संस्कृति नहीं है.

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