ये कैसा मुल्क है लोगों जहाँ पर जान सस्ती है

दिल्ली में किसान नंगे हो रहे हैं. यह अवाक कर देने वाली स्थिति है. किसान बचेंगे या नहीं, किसानी बचेगी या नहीं यह बड़ा सवाल है. ऐसा लग रहा है कि सरकारों को उनकी रत्ती भर परवाह नहीं है. आज बस त्रिपुरारि की यह नज़्म- मॉडरेटर

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किसान 

ये ज़ाहिर है कि अंधेरा यहाँ बेख़ौफ़ फैला है
फ़क़त कुछ ख़ास चौखट पर उजाले सिर पटकते हैं
मगर उम्मीद से रोशन हैं अब भी मुंतज़िर आँखें
मगर मायूस चेहरे हैं कि अब भी राह तकते हैं

उन्हें मालूम है कि रोशनी इक रोज़ आएगी
दुखों के दौर में भी ख़ुद को अक्सर आज़माते हैं
वो अपनी साँस बोते हैं सदी से बाँझ धरती में
हमारे वास्ते वो ज़िंदगी हर पल उगाते हैं

कभी जब पानियों में उनकी मेहनत डूब जाती है
तो अपने आप को हर तरह से वो मोड़ देते हैं
कभी जब आसमानों से मुसलसल दुख टपकता है
वो अपने हौसलों की छतरियों को ओढ़ लेते हैं

ये सच है उनके दम से ज़िंदगी त्योहार लगती है
कोई माने न माने रोज़ होली-तीज हैं वो लोग
उन्हीं के दम से तो सारी ज़मीनें भी सुहागन हैं
पकी फसलें छुपाए ख़ुद में ज़िंदा बीज हैं वो लोग

मगर ये वक़्त कैसा है वो सारे बे-सहारे हैं
कि उनके सामने अब ख़ुदकुशी ही राह बचती है
हुकूमत सो रही है आँख पर बाँधे हुए पट्टी
ये कैसा मुल्क है लोगों जहाँ पर जान सस्ती है

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