मनोज कुमार पांडेय की पांच कविताएँ

प्रसिद्ध कथाकार मनोज कुमार पांडेय की प्रेम कविताओं ​का संकलन आया है ‘प्यार करता हुआ कोई एक’। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस संकलन की कुछ कविताएँ पढ़िए-
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1
रोता हूँ और रोता रहता हूँ

रोता हूँ रोता रहता हूँ
कोई चुप कराने नहीं आता
मरता हूँ मरता रहता हूँ
कोई पानी पिलाने नहीं आता

मोहब्बत में हुआ हूँ कोढ़िया कलन्दर और अछूत
छूने भर से लग जाती है छूत

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2
तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहूँगा

हवा को इस बात का पता भी है कि नहीं
कि उसमें चिड़िया रहती हैं
पानी इस बात को जानता है या नहीं
कि वह घर है मछलियों का
और तुम तो यकीनन नहीं ही जानती होगी
कि यह तुम हो जिसके भीतर बन गया है मेरा बसेरा

हवाएँ तेज होती हैं तो गिरते हैं पेड़ मरती हैं चिड़ियाँ
पानी मौज में आता है तो बहुत सारी मछलियों को
उछाल देता है अपने से बाहर

तुम्हारे बारे में कुछ नहीं कहूँगा
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3
मैं तुम्हारे भीतर रहता हूँ 

मैं तुम्हारे भीतर रहता हूँ
जैसे मछलियाँ पानी में रहती हैं
जैसे धूल हवा में रहती है
जैसे पत्तियों में रहता है हरापन
जैसे फूल में रहती है महक
जैसे चाँदनी में रहता है चाँद
जैसे आकाशगंगा में रहती है पृथ्वी
जैसे हथेली में रहता है हथेली का निशान

जैसे पानी में पानी रहता है
जैसे हवा में हवा रहती है
जैसे हवा में जगह रहती है
जैसे धरती में रहते हैं खनिज
जैसे सूरज में रहती है आग
जैसे रोशनी में रहते हैं रंग
जैसे मिट्टी में रहती है गमक
जैसे समन्दर में रहता है नमक

मैं तुम्हारे भीतर रहता हूँ
जैसे मेरे भीतर रहता है खून
जैसे खून में रहता है लोहा
जैसे एक जीवन में छुपा रहता है दूसरा जीवन
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4
तुम्हारी बेरुखी झेलते हुए

थक गया हूँ मैं
तुम्हारी बेरुखी झेलते हुए

दिन का मतलब दिन नहीं होता
रात का मतलब रात नहीं होती
तुम्हारी बेरुखी मेरी साँस में चुभकर
सारी चीजों के मानी बदल देती है
मैं चीजों और उनके बहुत सारे अर्थों के बीच
हवा द्वारा दुरदुराए पत्ते की तरह दर दर बिखरता हूँ
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5
ऊब का रंग

ऊब का रंग जून की धूप जैसा होता है
अगर प्रिय पास न हो
तो बारिश सिर्फ़ उमस लाती है

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