भोगे हुए यथार्थ द्वारा सम्बन्धो से मोहभंग

हिंदी में छठे दशक के बाद लिखी गई कहानियों को केंद्र में रखकर, विजय मोहन सिंह और मधुकर सिंह द्वारा
सम्पादित एक समीक्षात्मक किताब आई है. अब उस समीक्षात्मक किताब की समीक्षा कर रहे हैं माधव राठौर. आप भी पढ़िए- संपादक
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“60 के बाद की कहानियां” किताब विजय मोहन सिंह और मधुकर सिंह द्वारा सम्पादित संग्रह का नया संस्करण  लोक भारती प्रकाशन ने हाल ही में प्रकाशित किया है जोकि शामिल किये गए चौदह कहानीकारों की कहानियों की बनावट -बुनावट और उनकी विशिष्टताओं को समझने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज है जो तत्कालीन स्थापित कहानीकारों के शुरूआती दौर की कहानियों को समझने में निश्चित तौर पर मददगार साबित होता हुआ दिखाई देता है। इन कहानियों का विषय और शिल्प दोनों ही दृष्टियों से पूर्ववर्ती कहानी से भिन्न है। पुरानी कहानी में जहां अपने पूर्वाग्रह है वहीं नयी कहानी ने पूर्वाग्रह से मुक्त होकर जीवन को यथार्थ रूप में देखने समझने का प्रयास किया है। ये कहानियां भोगे हुए यथार्थ से जुडी हुई है। आधुनिक मानव के जीवन को विविध कोणों से देखकर उसका सही परिप्रेेक्ष्य में चित्रण करने का प्रयास इन कहानीकारों ने किया।
 
डॉ नामवर सिंह के अनुसार, “अभी तक जो कहानी सिर्फ कथा कहती थी, या कोई चरित्र पेश करती थी अथवा एक विचार को झटका देती थी। वहीं आज की कहानी जीवन के प्रति एक नया भावबोध जगाती है।” ‘नयी कहानी’ जिन चीजों से ‘मुक्त ‘हुई है, उनमें तथाकथित ‘यथार्थवादिता ‘भी है। आज की कहानी का सत्य कहानीकार की अनुभूति है। नयी कहानी में विषयों की विविधता के साथ साथ शिल्प का नयापन भी विद्यमान है। उसमें प्रभावान्विति पर इतना जोर नहीं है, जितना जीवन के संश्लिष्ट खण्ड में व्याप्त संवेदना पर है। नया कहानीकार किसी दार्शनिक,  सामाजिक अथवा राजनीतिक विचारधारा से प्रतिबद्ध न होकर विशुद्ध अनुभूति की सच्चाई और विषय की यथार्थता के प्रति प्रतिबद्ध होता है। इन कहानियों के स्वर में हमेशा एक उपेक्षा और एक सपाट खुरदरा व्यंग्य रहता है। यह बोध न तो निराशावादी है न पलायनवादी। बल्कि एक ठोस ‘यथार्थबोध’है।
 
“सम्बन्धों से मोहभंग “इन कहानीकारों का प्रमुख बिंदु रहा है। सम्बन्ध हमारी सामाजिकता ज़ाहिर करते है क्योंकि वे हमें  एक दूसरे से जोड़ते हैंl यहाँ तक की सम्बन्ध टूटने की पीड़ा का बोध भी सामाजिक चेतना का ही अंग है। पुराना कहानीकार समस्याओं को सुलझाता था क्योंकि वह समस्याओं से बाहर होता था। वह उन्हें सुलझाना अपना कर्तव्य समझता था। लेकिन आज का कहानीकार समस्या के भीतर है इसलिए उसे सुलझाता नहीं बल्कि उसके साथ सफ़र करता है। काशीनाथ सिंह प्रगतिशील चेतना के लेखक हैं जिनकी कहानियों में’ व्यवस्था द्वारा आम आदमी का शोषण’, ग्रामीण और नगरीय जीवन मूल्यों की टकराहट, मानवीय मूल्यों का विघटन और मनुष्य का नैतिक पतन का बड़ा मार्मिक व प्रभावी चित्रण किया है। ‘आखिरी रात’ और ‘सुख’ दोनों कहानियों में सबसे बड़ी बात यह है कि विचारधारा के अंतर्वर्ती प्रवाह से आपकी कला कहीं भी आक्रांत नहीं हुई है और आपका कहानीकार निरन्तर कलात्मक समृद्धि की और अग्रसर है।
 
मधुकर सिंह की कहानियों में आधुनिकताबोध की परख और पहचान है। ‘बफरस्टेट’ और ‘कल’ दोनों कहानियों में महानगरीय बोध के सभी तत्त्व-संत्रास, ऊब, विवशता, तनाव, टूटन और बिखराव आदि मिलते है। दूधनाथ सिंह ने आज के जटिल यथार्थ को मूर्त करने के लिए नये शिल्प का प्रयोग किया है। “रक्तपात” और “इंतजार” दोनों कहानियों की अपनी अलग रोचकता है। ज्ञानरंजन मुख्यरूप से मध्यमवर्गीय जीवन की कुरूपताओं, विसंगतियों और खोखलेपन को निस्संग भाव से खोलने वाले यथार्थवादी कथाकार है। ज्ञानरंजन की कहानियों की विशेषता है कि वह अपने निजी जीवन में भोगी स्थितियों को सामाजिक धरातल तक लाने में सक्षम रहे हैं। “पिता” कहानी पुरानी पीढ़ी और नयी पीढ़ी में आये बदलाव का चित्रण करती है ।पिता की पीढ़ी अगर अपनी समकालीन स्थितियों से नहीं जुड़ पा रही है तो पुत्र की पीढ़ी भी अपने पिता की पीढ़ी को समझने की जद्दोजहद नहीं करती।
 
गंगाप्रसाद’ विमल की कहानी “एक और विदाई” में गुमशुदा पहचान की तलाश है। इसमें रिश्तों का बदलाव से दो पीढ़ियों की टकराहट का परिणाम देखने को मिलता है। महेंद्र भल्ला कृत “एक पति के नोट्स” में आत्मनिर्वासन का वह दर्द है, जिसे वह खुद झेलता है। जिस जिंदगी को वह नहीं चाहता वह जीनी पड़ रही है। यह उसकी अपनी नियति नहीं है, बल्कि आधुनिकता बोध से संपृक्त प्रत्येक व्यक्ति की नियति है। अक्षोमेश्वरी प्रताप की कहानियां “सीलन” और “अभिनय” दोनों ने समस्याओं का यथार्थ रूप में चित्रण किया है। गुणेंद्र सिंह कम्पानी ने “छाया” और “बिल्डिंग” के माध्यम से आधुनिक परिवेश को कहानी में एक नया आयाम दिया है। इसी प्रकार प्रबोध कुमार की कहानी “आखेट” और “अभिशप्त” में आधुनिक जीवन के अंतर्विरोधों को अभिव्यक्ति मिली है।
पूरे संग्रह की बात करे तो इसमें  नवपूंजीवाद, और भूमण्डलीकरण से उत्पन्न विडम्बनाओं और आधुनिक जीवन के अंतर्विरोधों को जबरदस्त अभिव्यक्ति मिली  है। यद्यपि इन कहानियों पर सामान्यता, शिल्पहीनता, सपाटता, कृत्रिमता और प्रभावहीनता के आरोप भी लगें है। मगर इसकी प्रांसगिकता की बात की जाये तो इस संग्रह के पुनःप्रकाशन से नवोदित कहानीकारों को कहानी की यात्रा को समझने का बेहतरीन अवसर मिलता है और साथ कहानी के भविष्य की आहट को भी सुन सकते है।

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