सूखै न प्रेम के सोतः जाता हुआ आषाढ़-आता हुआ सावन

आषाढ़ जाने वाला है और सावन आने वाला है. प्रसिद्ध लोकगायिका चंदन तिवारी ने इन महीनों के लोक जीवन से सम्बन्ध को लेकर एक छोटा-सा रोचक लेख लिखा है. पढियेगा- मॉडरेटर

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आषाढ़ जानेवाला है और सावन आनेवाला है. यह जो आषाढ़ जानेवाला है या कि जो सावन आनेवाला है, यह कोई साधारण,सामान्य महीना नहीं है. बेशक,सभी महीने की अपनी खासियत होती हैं, सभी मौसम,ऋतु जरूरी हैं,सबका अपना महत्व होता है लेकिन आषाढ़ और सावन की कुछ विशिष्टताएं ऐसी हैं, जिससे वह लोकजीवन के लिए पीढ़ियों से अहम और खास महीना बना हुआ है. इसकी ठोस वजहें भी हैं. आषाढ़ बरखा-बुन्नी का महीना होता है. सृष्टि को नवजीवन देनेवाला. खेती-बारी से लेकर नदी-नाला-पहाड़-जंगल सबकी हरियाली को आधार देता है, इसलिए आषाढ़ खास होता है. लोकजीवन के नजरिये से देखें तो आषाढ़ के मिजाज पर सभी महीने का उत्साह-उमंग निर्भर करता है. लोकगीतों की दुनिया से गुजरेंगे, विशेषकर ‘बारहमासा’ जैसे गीतों की विधा से तो आषाढ़ तो आरंभिक महीने के तौर पर उन गीतों में आता है. चाहे वे पारंपरिक बाहरमासा गीत हों या भिखारी ठाकुर, महेंदर मिसिर जैसे कालजयी रचनाकारों के बारहमासा गीत. आषाढ़ उम्मीदों को पंख लगाता है, सपनों में रंग भरता है, इसलिए आषाढ़ के तुरंत बाद आनेवाले सावन महीने में ही इसका असर दिखने लगता है. लोकजीवन-लोकसंस्कृति की दृष्टि से सावन एक खास महीना हो जाता है. लोकगीतों की दृष्टि से सावन को देखें तो कोई ऐसा महीना नहीं मिलेगा, जिस एक महीने में गीतों का रेंज इतना विस्तार लिये हुए हो.

सावन की बात आती है तो सबसे पहले कजरी की याद आती है. झूला गीतों की बात आती है. मिर्जापुर के गांवों और गलियों से निकली कजरी विधा है भी देश भर में मशहूर और कई नामचीन कलाकारों ने उसे गाकर, मंचों से प्रस्तुत कर मशहूर भी किया है. सुंदर वेश्या का लिखा दो कजरी गीत, जिनके धुनों को बिस्मिल्लाह खान साहब ने कम्पोज किया था- पिया मेंहदी लिया द मोतिझील से… और मिरजापुर कईलअ गुलजार हो, कचौड़ी गली सुन कईलअ बलमू… बेहद लोकप्रिय कजरी है. कजरी और झूला के और भी कई गीत बेहद लोकप्रिय हैं. सावन में भोला बाबा के गीतों की परंपरा भी एक बड़े इलाके में रही है. सावन को शिव का महीना भी कहा गया है, इसलिए शिव के गीत इस महीने में पीढ़ियों से गाये जाते रहे हैं. इसी महीने में बड़े मंचों से विशेष ठुमरियों को गाये जाने का चलन है. याद पिया की आये… एक ऐसा ठुमरी हुआ, जिसे बड़े गुलाम अली खान साहब, शोभा गुर्टू, राशिद अली खान साहब, कौशिकी चक्रवर्ती, हरिहरण साहब से लेकर अब तक करीब दो दर्जन कलाकार अपने तरीके से गाते रहे हैं और यह सावनी ठुमरी हमेशा ताजगी से दिलो दिमाग में बना ही रहता है. इन सबसे इतर एक इलाके में सावन को राधाकृष्ण के प्रेम का महीना माना गया है, सावन के आखिरी पांच दिन झूलनोत्सव होता है तो राधाकृष्ण के प्रेम गीत खूब गाये जाते हैं. और जब सावन का आखिरी दिन होता है वह रक्षाबंधन का दिन हो जाता है तो राखी के गीतों का चलन है. इस बीच गांव में सावनी झूमर, सावनी निरगुण, रोपनी आदि श्रम गीत का चलन तो लोकप्रिय है ही. कोई एक ऐसा महीना नहीं, जिसमें मात्र तीस दिनों में लोकजीवन ने लोकराग के इतने रंग भरे हो. आप खुद गौर कीजिए, कजरी, ठुमरी, शिव के गीत, राधाकृष्ण के गीत, प्रेम-विरह के गीत, श्रम के गीत, झूमर, निरगुण, भाई बहन के प्रेम के गीत. यह सब तो लोकगीतों की दुनिया की बात है. अब अगर इसका विस्तार यदि हिंदी फिल्मी दुनिया में कर दें, जो एक समय में लोकजीवन के सूत्रों को पकड़कर, लोकमानस के हिसाब के फिल्मों का निर्माण करता था, दृश्यों को दिखाता था, गीतों को सामने लाता था तो सावन के इर्द-गिर्द गीतों की भरमार मिलेगी. रिमझिम घिरे सावन, बहक-बहक जाये मन…, सावन का महीना पवन करे सोर… लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है… हाय-हाय रे मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी… आया सावन झूम के…. रिमझिम घिरे सावन… अबके सजन सावन में, आग लगेगी बदन में… मेरे नैना सावन भादो…सावन बिता जाये…गरज-बरस सावन घिर आयो…तुम्हे गीतों में ढालूंगा सावन को आने दो… अबके बरस भेज भइया को बाबुल…अबके बदरा अइयो बिदेसी…सावन का महीना आया है घटा से…मेघा छाये आधी रात बैरन बन गयी निंदिया…कारे कारे बदरा, जारे जारे बदरा…आओगे जब तुम साजना, अंगना फूल खिलेंगे…ओ सजना बरखा बहार आयी…. जैसे न जाने कितने गीत वर्षों से सदाबहार बने हुए हैं. इन बातों पर गौर करने पर साफ होता है कि हम सृष्टि और प्रेम के सबसे खुशगवार मौसम और महीने से अभी गुजर रहे हैं. प्रेम का सोता इसमें ही फूटता है. और यह प्रेम ऐसा होता है जो सबके लिए होता है, क्योंकि आषाढ़-सावन सृष्टि का महीना होता है. भाषा, धर्म, संप्रदाय, जाति से परे सिर्फ प्रेम, उत्साह, उम्मीदों की भाषा जानता है, सिर्फ प्रेम बरसाता है.

 

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