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  • नामवर सिंह की नई किताब है ‘द्वाभा’

     

    जीते जी किंवदंती बन चुके नामवर सिंह की नई किताब आ रही है ‘द्वाभा’. राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब के बारे में पढ़िए- मॉडरेटर

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    नामवर सिंह अब एक विशिष्ट शख्सियत की देहरी लाँघकर एक लिविंग ‘लीजेंड’ हो चुके हैं। तमाम तरह के विवादों, आरोपों और विरोध के साथ असंख्य लोगों की प्रशंसा से लेकर भक्ति-भाव तक को समान दूरी से स्वीकारने वाले नामवर जी ने पिछले दशकों में मंच से इतना बोला है कि शोधकर्ता लगातार उनके व्याख्यानों को एकत्रित कर रहे हैं और पुस्तकों के रूप में पाठकों के सामने ला रहे हैं। यह पुस्तक भी इसी तरह का एक प्रयास है, लेकिन इसे किसी शोधार्थी ने नहीं उनके पुत्र विजय प्रकाश ने संकलित किया है।

    इस संकलन में मुख्यत: उनके व्याख्यान हैं और साथ ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लिखे-छपे उनके कुछ आलेख भी हैं। नामवर जी ने अपने जीवन-काल में कितने विषयों को अपने विचार और मनन का विषय बनाया होगा, कहना मुश्किल है। अपने अपार और सतत अध्ययन तथा विस्मयकारी स्मृति के चलते साहित्य और समाज से लेकर दर्शन और राजनीति तक पर उन्होंने समान अधिकार से सोचा और बोला। इस पुस्तक में संकलित आलेख और व्याख्यान पुन: उनके सरोकारों की व्यापकता का प्रमाण देते हैं। इनमें हमें सांस्कृतिक बहुलतावाद, आधुनिकता, प्रगतिशील आन्दोलन, भारत की जातीय विविधता जैसे सामाजिक महत्त्व के विषयों के अलावा अनुवाद, कहानी का इतिहास, कविता और सौन्दर्यशास्त्र, पाठक और आलोचक के आपसी सम्बन्ध जैसे साहित्यिक विषयों पर भी आलेख और व्याख्यान पढ़ने को मिलेंगे।

    पुस्तक में हिन्दी और उर्दू के लेखकों-रचनाकारों पर केन्द्रित आलेखों के लिए एक अलग खंड रखा गया है, जिसमें पाठक मीरा, रहीम, संत तुकाराम, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, त्रिलोचन, हजारीप्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, परसाई, श्रीलाल शुक्ल, $गालिब और सज्जाद ज़हीर जैसे व्यक्तित्वों पर कहीं संस्मरण के रूप में तो कहीं उन पर आलोचकीय निगाह से लिखा हुआ गद्य पढ़ेंगे।

    बानगी के रूप में देश की सांस्कृतिक विविधता पर मँडरा रहे संकट पर नामवर जी का कहना है : ‘संस्कृति एकवचन शब्द नहीं है, संस्कृतियाँ होती हैं…सभ्यताएँ दो-चार होंगी लेकिन संस्कृतियाँ सैकड़ों होती हैं…सांस्कृतिक बहुलता को नष्ट होते हुए देखकर चिन्ता होती है और फिर विचार के लिए आवश्यक स्रोत ढूँढ़ने पड़ते हैं।‘

    यह पुस्तक ऐसे ही विचार-स्रोतों का पुंज है।

    पुस्तक : द्वाभा

    लेखक   :  नामवर सिंह 

    आईएसबीएन  : 978-93-88183-22-2

    प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन 

    बाईंडिंग : हार्डबाउंड 

    मूल्य : 695

    प्रकाशित वर्ष   : 2018, नॉन फिक्शन

    Key Selling Points  | यह किताब क्यों खरीदें ?

    • इस पुस्तक में सांस्कृतिक बहुलतावादआधुनिकता,प्रगतिशील आन्दोलनभारत की जातीय विविधता जैसे सामाजिक महत्त्व के विषयों के अलावा अनुवादकहानी का इतिहासकविता और सौन्दर्यशास्त्रपाठक और आलोचक के आपसी सम्बन्ध जैसे साहित्यिक विषयों पर भी आलेख और व्याख्यान पढऩे को मिलेंगे।
    • पुस्तक में हिन्दी और उर्दू के लेखकोंरचनाकारों पर केन्द्रित आलेखों के लिए एक अलग खंड रखा गया हैजिसमें पाठक मीरारहीमसंत तुकारामप्रेमचंदराहुल सांकृत्यायन,त्रिलोचनहजारीप्रसाद द्विवेदीमहादेवी वर्मापरसाईश्रीलाल शुक्ल, $गालिब और सज्जाद ज़हीर जैसे व्यक्तित्वों पर कहीं संस्मरण के रूप में तो कहीं उन पर आलोचकीय निगाह से लिखा हुआ गद्य पढ़ेंगे।

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