अभी हाल में ही वरिष्ठ पत्रकार राकेश तिवारी की किताब आई है- ‘पत्रकारिता की खुरदरी जमीन’. इस पुस्तक में उन्होंने…
एक अनुशासनहीन फेंटेसी है ‘अँधेरे में’
पिछले साल मुक्तिबोध की मृत्यु की अर्ध-शताब्दी थी. इस मौके पर उनके ऊपर खूब कार्यक्रम हुए, थोक के भाव में…
गंभीर साहित्य सृजन में पैसा कहां है- सुरेन्द्र मोहन पाठक
प्रतिष्ठित पत्रिका ‘पाखी’ ने लोकप्रिय साहित्य को लेकर एक ऐतिहासिक आयोजन किया है जिसमें लोकप्रिय धारा के प्रसिद्ध लेखक सुरेन्द्र…
गंभीर और लोकप्रिय साहित्य के बीच कोई अंतर नहीं होता है!
हिंदी में लोकप्रिय और गंभीर साहित्य के अंतर्संबंधों को लेकर मेरा यह लेख ‘पाखी’ पत्रिका के नए अंक में प्रकाशित…
दिबाकर बनर्जी की अब तक की सबसे कमजोर फिल्म है ‘ब्योमकेश बक्शी’
फिल्म समीक्षक आजकल समीक्षक कम पीआर कम्पनी के एजेंट अधिक लगने लगे हैं. ऐसे में ऐसे दर्शकों का अधिक भरोसा…
डेढ़ सौ साल की कृति ‘एलिस इन वंडरलैंड’
‘एलिस इन वंडरलैंड’ के डेढ़ सौ साल हो गए. इस कृति की अमरता के कारणों पर जानी-मानी लेखिका क्षमा शर्मा…
मृणाल पाण्डे की कुछ कविताएं
मृणाल पाण्डे के उपन्यासों, उनकी कहानियों से हम सब वाकिफ रहे हैं. उनकी पत्रकारिता से हमारा गहरा परिचय रहा है. लेकिन…
प्रियंका दुबे की कहानी ‘डेडलाइन’
यह सब हम सब लिखने वालों के साथ होता होगा, डेडलाइन का दबाव, लिखने न लिखने का उहापोह. प्रियंका दुबे…
आलोचकों की लीला आलोचक जानें- मृणाल पाण्डे
वरिष्ठ लेखिका, लब्धप्रतिष्ठ पत्रकार मृणाल पाण्डे से बड़े दिनों बाद एक लम्बी बातचीत पढ़ी. अंजुम शर्मा के साथ इस बातचीत…
क्या कैलाश वाजपेयी हिंदी के लिए ‘आउट ऑफ़ कोर्स’ कवि थे?
जब से कैलाश वाजपेयी के निधन के बारे में सुना तब से उनके बारे में लिखने की सोच रहा था.…



