आज प्रस्तुत हैं कुलदीप कौर की कविताएँ. प्रेम पर कुछ छोटी-छोटी मगर गहरी बातें.
1.
तुम चलने को एक बिन्दू से दूसरे बिन्दू तक गिनते हो।
मैं बीच में होती हूं कई बार ग़ैर हाज़िर।
तुम्हारा कहना सही है के मैं हो कर भी नहीं होती…
बिल्कुल जैसे मैं सब जगह पहुंच कर भी नहीं पहुंचती कहीं भी।
हम जैसे, जो कहीं नहीं पहुंचे कभी भी।
दरअस्ल सिर्फ़ हाशिये के लिये ही बने हैं।
2.
तुम मुझसे मुझको तकसीम करते हो।
और मैं तुम्हारे हर हिस्से को जमा।
तुम बांटते हो मेरे होने ना होने का हर हिंदसा।
और मैं जोड़ती हूं तुम्हारे होने की हर सम्भावना।
तुमने भी ना सोचते हुये मुझे सोचा।
मैंने भी हर तरह तुम्हें सोच कर नहीं सोचा।
यूं ही होने ना होने के दरमियां लटकते पल जीते रहे हम।
3.
दीमक की तरह चाटते हैं ज़हन,
ये सीधा सादा प्रेम और इसके साथ उगती एक एक नयी सम्भावना।
अजीब है के नसें चटकती भी हैं और टूटती भी हैं एक ही समय में।
और मन जितना ख़ुद के अन्दर डूबता है
उतना ही डुबोता है बाहर के टापू।
पानी के निशानों जैसी ना पढ़ी जा सकने वाली इबारतें तलाशते हो
आप उन अजनबी आँखों में भी।
प्रेम है आपके होने की सम्भावना जैसा।
और ना होने की तकलीफ़ जैसा
4.
तुम देख सकते हो मुझे।
जैसे देखा जाता है इक पारदर्शी शीशा।
और देखते हैं हम बारिश की बूंदों को टूटते।
या फिर गर्म चाय से उठती भाप को।
हां तुम देख सकते हो मुझे…
जैसे हम चिन्ता के साथ
देखते हैं हमारे जिस्म पर लगा हुआ ज़ख़्म।
जैसे हम देख सकते हैं…किसी ग़ुब्बारे का सिकुड़ना
या साइकल के चक्के का जाम हो जाना।
जैसे हम देखते हैं दिन का सफ़ेद रंग।
(जो अस्ल में सफ़ेद नहीं)
और आसमान का नीलापन।
(जो अस्ल में नीला भी नहीं)
हां… इक तुम ही देख सकते हो मुझे एैसे।
5.
तुम हो मुझ में जैसे पानी में गीलापन।
और सहरा की रेत में किरकिरी का होना।
जैसे धूप में होना तपिश का।
और अंधेरे में घुली रहती है कालिख़।
मेरी रगों में बहते लहू का रंग तुम हो।
और माथे पे मौजूद हर इक शिकन भी।
6.
नदी के नीले पानी सा तुम्हारा मन
और उस में पड़ी लाल कंकर सी मैं।
तुम असहज हो मेरी चुभन से।
और मैं डरती हूं नीलेपन की गति से।
दुखों की परछायी से मुझे बचाते तुम।
मन में मुझे गहरा छुपा लेना चाहते हो।
लेकिन दुख हर जगह ढूंढ ही लेते हैं मुझे।
और मेरा एक मात्र सुख है तुम्हारा मुझे दफ़्न करना।
7.
तुम कहते हो दुनिया चाँद की तरह गोल है।
और मैं देखती हूं इसका चौरस होना।
तुम्हें जानना दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत अर्थों को छूना है।
और सुनना है तुम्हारे चौरस होठों से सीटी बजाना।
ये शायद कभी ना समझ सके चौरस वाली मेरी और गोल पर इतराती ये तुम्हारी दुनिया…..
के दरअस्ल हम दोनों मिलकर एक तिकोन बना सकते हैं।
8.
भूरे रंग की है रेत।
और उसमें बहता हरा पानी।
तुम हरे रंग को जज़बाती मानते हो।
मैं भूरे रंग से मनफ़ी करती हूं रेत को।
तुमने खिड़की पे ठहरी धूप पकड़ रखी है।
मैं उस में से तुम्हारी परछायी चुराती हूं।
तुम दीवार से गिरते रेत के नन्हे कण जैसे।
और मुझे होना होता है हर बार वो दीवार।
तुम ज़िद करते हो दुनिया ग्लास में डालने की।
और मैं हर बार उस में उड़ेल देती हूं हरा पानी।

