संगीता गुन्देचा की कविताएँ

आज पढ़िए संगीता गुन्देचा की कविताएँ। संगीता संस्कृतज्ञ हैं और उनकी कविताओं में शास्त्रीय कविताओं की गूंज सुनाई देती है। ये कविताएँ उनके कविता संग्रह ‘पडिक्कमा‘ से ली गई हैं। यह संग्रह वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है —

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जाड़े के दिनों में

जाड़े के दिनों में
पहाड़ पर गिरती उज्ज्वल धूप में
अकेला खड़ा है शाल्मलि वृक्ष

अपने कक्ष को निरन्तर झाड़ती-बुहारती
असंग-यौवना का प्यानो
हो जाता है निःशब्द

सुविख्यात होने की होड़ में लगे संसार के बीच
क्यों नहीं सीख लिया जाये
अकेले रहने का जादू

अचानक आवाज़ आती है
कोई कहता है;
अकेले रहना सीखो

अपने आपसे!
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आत्ममुग्ध

क्या फर्क पड़ता है दुनिया को
तुम तोड़ो पहाड़ बनाओ जूए शीर
तुम मंगलग्रह के एकान्त में
पीछा करो एक चम्मच का

सघन पीड़ाओं से अलंकृत तुम्हारा मन
शब्दों और अर्थों का अन्तर्द्वन्द्व
तुम्हारे उत्सर्गों और प्रेम का
अविरल छन्द

यही सब बनाता है उसे
जो तुम हो
इसलिए एक लेखक का आत्ममुग्ध होना
नहीं शोभता प्रिये!

एक लेखक का आत्ममुग्ध होना
बिल्कुल नहीं शोभता!!

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