माधुरी की कहानी ‘और गाय मर गई’

 

राजस्थान के उदयपुर में स्त्रियों के लिए रमा मेहता राइटिंग ग्रांट की शुरुआत हुई जो अब एक प्रतिष्ठित और विश्वसनीय संस्था बन चुकी है। 2023 में यह ग्रांट युवा लेखिका माधुरी को दिया गया। इस बार उनको यह पुरस्कार जाने माने लेखक विक्रम सेठ के हाथों प्रदान किया गया। लेखिका को बधाई के साथ उस कहानी को पढ़िए जिसको आधार बनाकर उनको यह ग्रांट दिया गया-

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और गाय मर गयी

ये कहानी नहीं है , ऊन से बुना हुआ स्वेटर है। मुनमुन की नानी ने इसे बुना है । बुनते हुए नानी जब ऊँघने लगतीं  तो उनकी बिल्ली आकर ऊन के गोले से खेलने लगती । नानी उसे डपटतीं और फिर स्वेटर बुनने लगतीं। पहले पिछला हिस्सा बुना फिर आगे का , उसके बाद एक बांह फिर दूसरी । सब को सिल दिया फिर गला बना दिया । सुनने में ये जितना आसान लगता है उतना आसान है कहाँ ?  कई बार फंदे उलझने लगते हैं, ऊन ख़ुद भी उलझ जाती है। डिज़ाइन डालने के चक्कर में बीच बीच में कई दफ़ा उधेड़ना पड़ता है । कभी कभी फंदा ही छूट जाता है। मगर तब भी तैयार हो ही जाता है स्वेटर म्म…मतलब कहानी ।

बहरहाल , मुनमुन की नानी की बात फिर कभी फ़िलहाल कहानी कहते हैं –

कहानी दो सहेलियों की है । मोना और बबली। मोना एकदम सीधी , बबली एकदम टेढ़ी , प्रेम एकदम घनघोर । लगता जैसे जुड़वा बहनें हों जो शरीर के किसी अंग से जुड़ी पैदा हुई हों। शायद दिमाग़ से ।

स्वेटर का अगला हिस्सा –

गणगौर के दिन की बात है । मोना की सास, देवरानी और मोहल्ले की कुछ औरतें घर के आँगन में बैठी थीं। सभी  सजी धजी  गौरा बनी हुई थीं। चटक लाल चूंदड़ी पहने हुए मोना भी। लेकिन मन एकदम बिन मेकअप था जैसे आधार कार्ड में छपी फ़ोटो होती है । सामने पाटे पर ईसर और गौरा की मिट्टी की मूर्तियाँ रखी हुई थीं । सभी औरतों ने अपनी सहेलियों के साथ चिटकी उँगलियाँ एक दूसरे में फँसा रखी थीं। गा रही थीं –

“गौर गौर गोमती , ईसर पूजे पारबती

म्हे पूजां आला गीला

गौर रै सोने रा टीका

टीका दे टमका दे ,राजा राणी बरत करे

राणी को राज घटतो जाये , म्हारो सुहाग बढ़तो जाये “

बबली इसका उलट बोलती “राणी को राज बढ़तो जाये, म्हारो सुहाग घटतो जाये।“ सखी मोना उसे कोहनी से टल्ला मारती , “ कांईं बोल री है  ? सही सूँ बोल । सब सुण रिया है ।“ और आँख मारती । इशारा समझते ही वह सबके सुर में सुर मिलाती मगर आख़िरी पंक्ति में मन ही मन घपला कर जाती । मगर मोना उसके मन को पढ़ लेती थी। आख़िरकार वह स्वयं भी तो यही बोलना चाहती थी-“राणी को राज बढ़तो जाये, म्हारो सुहाग घटतो जाये।“

बबली को मालूम था कि मोना की उल्टी प्रार्थनाओं का ये सिलसिला आज का नहीं , पुराना है। ब्याह के दो तीन बरस बाद करवा चौथ की रात थी। मोना पति के साथ कहीं जा रही थी।  बैलगाड़ी पक्की सड़क को छोड़, गडार (कच्ची राह ) पर उतरी थी कि सामने चाँद दिख आया था। मोना को कब से पुड़ी आलू की सब्ज़ी , बेसन के लड्डू , दाल बाटी चूरमा, गोलगप्पे और जाने क्या क्या स्वादिष्ट ख़्याल आ रहे थे।  चाँद भी उसे  एक तरफ़ से थोड़ा सा कुतरा हुआ सा जूठा रसगुल्ला लगा। उससे रहा नहीं गया । चौथ मैय्या से हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी। बैल हाँकते,बीड़ी के धुएं से धुन्धलाये पति के चेहरे को देखा और नज़रें बचा कर बूंदी का एक लड्डू  मुंह में रख लिया. और कुछ बरस बाद तो उसने व्रत छोड़ ही दिया ।पति समेत पूरी दुनिया को व्रत के भ्रम में रखा ।

बबली को मालूम है कि बाहर जिस तरह से नीम झर रहा है , मोना के मन में मन झर रहा है । अंतर इतना है कि नीम पतझड़ में झरता है , मोना का मन अनवरत । अब तो ये हालत है कि उसके मन ज़रा सा हिलाओ तो सर्र-कर्र-झर्र-फर्र की आवाज़ आए । मोना भूले भटके क़दम ना बढ़ाती मन की ओर कि कहीं कोई सुन न ले।

वह लोगों के घरों में झाड़ू पौंछा का काम करती है । सुबह घर से निकलती है, दो गली छोडकर एक बरगद का पेड़ है। जहाँ हज़ारों चिड़ियाएं एक साथ चहकती हैं सुबह शाम । बस वहीं बबली उसका इंतज़ार करती मिलती है। रास्ते भर एक दूसरे से सुख दुख कहती दोनों काम पर निकल जाती हैं । ऐसा लगता है उसी पेड़ से दो चिड़ियाँ फुर्र से उड़कर निकली हों । चीं चीं चीं करती । दोनों अलग अलग सोसाइटी में काम करती हैं । वापसी में वही बरगद का पेड़ होता है।  घंटा दो घंटा कहना-सुनना चलता है । बबली ज़्यादा सुनती है , मोना ज़्यादा कहती है। कुछ देर मोना बबली में डूब जाती है ।  उसके भीतर धीमे धीमे बबली भरती रहती है । जैसे किसी किशमिश को पानी में भिगो दिया हो। उसी बबली को भीतर लिए वह घर चली आती है । उसी प्रभाव में वो हर पीड़ा सह लेती है जबकि बबली चाहती है कि वो दर्द सहने के बजाए उसे उखाड़ कर फेंक दे । एक बड़ी अजीब सी बात है पर है। सुबह मिलते ही सबसे पहले दोनों पास के खेत में पेशाब करतीं । इस एंगल में बैठतीं जैसे घड़ी में दस बजकर दस मिनट पर काँटों की स्थिति होती है। जिस वक़्त पर दुनिया की सब घड़ियाँ ख़ूबसूरत लगती हैं।  बतियाती भी जातीं। उठने के बाद मोना रेत पर पेशाब से बन आए गीले निशान को ज़रूर देखती , मानो ये उनके साथ होने का प्रमाण हो ।

स्वेटर की बायीं बांह –

एक दिन मोना काम से जल्दी घर चली गयी । जाड़े के दिन थे, सोचा घर जाकर बाल धो लेगी फिर धूप धूप में ही सुखा लेगी । बबली से भी ज़्यादा बातें नहीं हुईं ।

उसने गली के छोर से ही देखा कि घर के बाहर बहुत भीड़ जमा है। सभी बुदबुदा रहे हैं । बुदबुदाहट की तीव्रता बहुत है मगर इतने डेसिबल में है कि शोर भी नहीं कहा जा सकता । अलबत्ता कोलाहल कह सकते हैं । मोना को दो ही शब्द लूप में सुनाई पड़ रहे थे मसलन किसी डीजे की डिस्क अटक गयी हो । पाप – हत्या , पाप – हत्या  । दिल किसी अंजान आशंका से लब -डब -डब के बजाए भड़- भड़ -भड़ करने लगा । दरवाज़े पर पहुँची तो देखा एक गाय मृत पड़ी है। वो धक से रह गयी।  सास आँगन में खटिया पर सिर पकड़े बैठी सुबक रही है। देवरानी बेचैन क़दमों तेज़ तेज़ टहल रही है। आते ही मोना से बोली , “जीजी , थे आ ग्या ?  जल्दी सूं भैया जी ने फोन लगाओ । अर ई गाय ने उठवाओ। “ सास आँसू अपने पल्ले से पौंछती हुई बोली  – “पाणी री रोड लगाई , पाणी गरम करवा ने, पण गाय बी बाल्टी में ई मूंड़ो घात दियो अर करंट सूं मर गी । गऊ हत्या होगी , भोत बड़ो पाप लाग ग्यो रामजी रे । “ और दहाड़ मार कर रोने लगी।

मोना ने पति को फोन लगाया । एक , दो,  दस बार और हमेशा की तरह वो उसका फोन काटता रहा ।आख़िर मोना ने अपने बड़े बेटे को फोन कर कुछ इंतेज़ाम करने को कहा।  बेटा कहीं से अपने दोस्तों के साथ एक हाथ गाड़ी ले आया। तब तक देवर भी आ गया था । गाय के मृत शरीर को उसमें डालकर ले गए ।

मोना और उसकी देवरानी चबूतरे की धुलायी करने लगीं , भीड़ छंट ही रही थी कि उनके बीच से एक अधेड़ महिला दो जवान लड़के और कुछ औरतें आती दिखीं । यूं लग रहा था मानो कोई पर्फेक्ट सिनेमैटोग्राफी वाली फिल्म हो ,जाती हुई भीड़ के बीच से उभरते चिल्लाते क्रुद्ध चेहरे। हादसे की शिकार गाय इनकी गाय थी।

अधेड़ औरत रोती-झींकती-चिल्लाती जाती, “हाय म्हारी गाय मार डाली । हाय म्हारी गाय ।“

मोना बेइंतेहा डरी हुई थी , भरी आँखों और भर्रायी आवाज़ में वो हाथ जोड़े हुए कहने लगी, “ म्हें जाण बूझ’र कोनी

मारी थारी गाय नै। भरोसा तो राखो , थांकां पड़ोसी हां । गऊ मैया री हत्या रो पाप कुण करे  “

कुछ देर की बहस के बाद । सामने वाली पार्टी से एक लड़का बोला, “एक काम करो गाय के बदले गाय दे दो।“  बस यहाँ से दुख सौदेबाज़ी में तब्दील होने लगा । आख़िरकार बात पच्चीस हज़ार रुपये पर तय हुई । उस वक़्त मोना ने ही कुछ रुपये अपने पास से देकर उन्हें रवाना किया । क्या करती देवर तो ख़ाली पर्स दिखाने लगा । सास बोली, “म्हारे कने कोनी , तू कमाव है , तो थूं ई दे ।”

शाम हो आई थी। मोना ने नहाकर चूल्हा जला लिया। इधर मोना के पति घर लौटा । उसे ऑटो स्टैंड पर घटना की ख़बर मिली थी। आँगन में बैठी सास ने सारा क़िस्सा कह सुनाया । पति ने सुना और चूल्हे पर खाना बनाती मोना पर टूट पड़ा ,”मुझे क्यूँ नहीं बताया , बुलाया क्यूँ नहीं , इतनी बड़ी बात हो गयी ,पहले बुलवा लेती ।“  उसका बेलन छीनकर जहाँ तहाँ मारता रहा । अंत में पास पड़ी ईंट उठा कर सिर पर दे मारी । मोना के सिर से ख़ून का फव्वारा फूट पड़ा । बेहोश होती मोना समझ नहीं पा रही थी कि वो पिट क्यूँ रही है ? बेहिसाब पिटने  का कोई हिसाब तो मिले उसे ।

स्वेटर की दायीं बांह –

रामस्वरूप उर्फ़ मोना के पति के भीतर का ये ज्वालामुखी बहुत दिनों से फटना चाह रहा था । तभी से जब से मोना ने उसे एक लड़की से बात करते हुए पकड़ा था। अपने और उस लड़की के परिवार वालों के सामने उसकी पोल खोल दी थी। । दरअसल लड़की रामस्वरूप की फुफेरी बहन की बेटी थी यानि उसकी भतीजी- ज्योति। बचपन से ही उनके घर आती जाती रहती थी । मोना उसे अपनी बेटी की तरह प्यार करती उधर रामस्वरूप की नज़रें शुरू से ज्योति की आँखों पर अटक गयी थीं। कुछ सम्मोहन दिखता आँखों में। ज्योति  बड़ी हुई , सम्मोहन देह भर में फैलने लगा । जाने कब कैसे वो उसकी तरफ़ खिंच गया । इस बीच सत्रह बरस की होते ही ज्योति की शादी करा दी गयी। । सुनने में आया था कि तेरह बरस की थी तभी पेट से हो गयी थी। मोहल्ले का ही कोई रईस लड़का था। शर्मसार घरवालों ने सबसे छुपा कर बच्चा गिरवा दिया । पर ऐसी बातें कहाँ छिपती हैं । सभी दबे स्वर में ये क़िस्सा कहते सुनते । उधर रामस्वरूप को यक़ीन हो जाता कि ज्योति तक जाना आसान है। दूसरी ओर शादी से ज्योति नाख़ुश थी। उसे आज़ाद रहना था ख़ुद पैसा कमाना और उड़ाना था । नतीजतन दो साल बाद ही, अपनी एक साल की बेटी को लेकर वो पीहर आ गयी । रामस्वरूप ने मौक़े का फ़ायदा उठाया । ज्योति को कार के एक  शो रूम में काम पर लगवा दिया । व्हाट्सएप पर मामा से नज़दीकियाँ बढ़ती गईं। मामा ऑटो चला कर जितना कमाता उस पर लुटा देता । होटल के कमरे में दोनों की इच्छाएं पूरी होती रहीं। अब जबकि उनकी प्रेम कहानी से पर्दा उठ चुका था , ज्योति को जबरन ससुराल भेज दिया गया ।  उसके जाते ही रामस्वरूप के ऊपर प्रेम प्रेत सवार हो गया था । खाट पकड़ ली थी, चेहरा ज़र्द हो गया ,आँखों के कोटर और गहरे हो गए । माँ ने उसे खरी खोटी सुना दी थी, भाई ने मुँह पर थूक दिया था, रिश्ते नाते वालों की दृष्टि बदल गयी थी। इसकी एकमात्र वजह मोना थी। हालांकि ऐसा पहली दफ़ा नहीं हुआ था । इससे पहले रामस्वरूप का दिल मोना की बहन की लड़की पर भी आ चुका था । मोना ने जैसे तैसे उससे पीछा छुड़ाया था। मगर वह जानती थी कि ये कुछ दिनों की बात है । रामस्वरूप फिर उठेगा,  फिर कोई और लड़की होगी।

स्वेटर का पिछला हिस्सा

बेहोश मोना के दिमाग़ का एक कोना होम थिएटर बन गया था जहाँ फ़िल्म चल रही है- सरकार गाँव को शहर से जोड़ने वाली सड़क बना रही है । कच्ची-पक्की-कच्ची  सड़क को उधेड़ने में कई मजदूर लगे हैं। पंद्रह साल की एक लड़की अपनी माँ बाप के साथ वहाँ मजूरी करने आई है । लड़की की नज़र मजबूत क़द काठी के उस नौजवान पर पड़ती है जो बुलडोज़र पर सवार बैठा उसे ही देख रहा था । लड़की नज़रें झुका लेती है। बुलडोज़र पर लगे रेडियो पर गाना बजता है – “नज़रें मिली दिल धड़का , मेरी धड़कन ने कहा लव यू राजा।” लड़का नीचे उतरता है , उसके पास आकर खड़ा हो जाता है , कहता है ,”मेरा नाम राजा है , तू माधुरी दीक्षित है क्या ?” लड़की शरमा कर उस उधड़ी सड़क में ही समा जाना चाहती है , कुछ नहीं सूझता तो भाग जाती है। लड़का मुस्करा देता है। कई रोज़ नज़रों से बात होती रहीं । एक दिन लड़के ने लंच टाइम में उसे बुलडोज़र के पीछे खींच लिया। अपनी बाँहों  में जकड़ कर बोला , “क्या नाम है, अब तो बता ?

“बबली।”

“देख मैं चाहता हूँ शादी तुझी से हो मेरी,  चाहे शादी के दिन मर जाऊँ । करेगी ? “ बबली का अंग अंग सिहर-सिहर-सिहर कर कहना चाहता था , “हाँ।” पर वह बोली, ”तू मेरी जात का नहीं , तेरे घरवाले नहीं मानेंगे ।“  वो उसके होंठों को चूमता हुआ बोला , “देख ,  तू मानेगी तो सब मानेंगे, बस तू हाँ कर दे ।“  बबली ने हाँ बोला और ख़ुद को छुड़ा लिया ,भागने लगी , भागती रही। राजा के साथ भाग गयी । दुल्हन बन गयी राजा की । बस में बैठे हैं दोनों । बेहोशी में भी मोना के चेहरे के हाव भाव बदलते हैं, अचरज से भर जाती है वह । देखती है कि बस में उसके क़रीब राजा नहीं रामस्वरूप है।

रात का दृश्य है, राम स्वरूप और बबली एक कमरे में हैं । रामस्वरूप बबली के ऊपर चढ़ रहा है। उसके मुँह से शराब की बू आ रही है । बबली उसे नज़दीक से देखती है । ये उसका पति है , इसके साथ ही उसे जीना-रहना – मरना  है।

सुबह हो चुकी है । सास दरवाजा पीट रही है। नयी बहू को भी खेत में मटर की तुड़ाई करने जाना है । बबली की आँख नहीं खुलती, रामस्वरूप उसे लेटे लेटे ही लात मारकर उठाता है। कल शादी हुई और आज ही लात ?

इसके बाद तो यही सिलसिला चलता रहा । बबली दिन भर खेत में झुलसती है , शाम को चूल्हे में झोंक दी जाती है और रात को पति की हवस में होम हो जाती है । इसके बाद मार पीट। कोई हड्डी साबुत नहीं थी , दाँत पूरे नहीं थे , बाल जाने कितने नुच चुके थे । तीन लड़के पैदा हो गए । उससे पहले दो बच्चे पेट में ही ख़तम हो गए थे।पति ने जाने कितने धंधे किए , कोई सफल न रहा , भारी क़र्ज़े में डूब गया है। डूब से बचने को ताश के महल बनाता है। दिन भर शहर के ऑटो स्टैंड पर बैठा ताश खेलता है । बबली ने ख़र्च चलाने को घरों में काम करना शुरू कर दिया ।

मोना बुदबुदाती है – उसने मेरे साथ किया सो किया पर बबली के साथ ये हरगिज़ नहीं करने दूँगी । मोना को और देखा नहीं जा रहा था ।

स्वेटर का गला –

मोना कसमासा कर आँखें खोल लेती है। कमज़ोर आवाज़ में परंतु दृढ़ निश्चय से पास खड़े डॉक्टर को कहती है –“पुलिस नै बुलाओ, घरवाळै रै खिलाफ रपट लिखाणी है।“

पास ही खड़ी बबली इशारे से पूछती है ,” कांईं होयो ?”

“तू कैवती कै, म्हे जादा सीधी हूं , म्हारे मांय एक गाय रेवे है , आज वा गाय मर गी । तू बस आ समझ ल्ये ” मोना मुस्कराती है। बबली भी मुस्करा देती है । वहाँ से चली जाती है ।

धुंधली आँखों से मोना देखती है कि पास ही उसका भाई खड़ा है, भरभराकर कहता है – “बबली जीजी तू होश में आगी!!”

“मुझे बबली कहा, क्यों ?” मोना का मन हुआ कि वहीं बरगद के पास वाले खेत में जाकर करे पेशाब करे जहाँ दोनों सखियाँ किया करती थीं । निशान  सिर्फ़ एक हुआ करता था ।

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