राजपाल एंड संज प्रकाशन से प्रकाशित ‘मेरी प्रिय कहानियाँ’ सीरिज़ के अंतर्गत प्रकाशित अमृता प्रीतम की कहानियों पर युवा लेखिका अनु रंजनी ने बहुत विस्तार से लिखा है। यह लेख मुझे इसलिए महत्वपूर्ण लगा क्योंकि अनु रंजनी उस पीढ़ी की लेखिका हैं जिन्होंने अमृता प्रीतम की कहानियाँ उनके जादू से हटकर पढ़ा। हामारी पीढ़ी तक अमृता प्रीतम की कहानियों, उपन्यासों का जादू था। हम कभी उनका ईमानदार मूल्यांकन नहीं कर पाए। लेकिन अनु रंजनी की पीढ़ी उस जादू से बहुत दूर है। बहुत दिनों बाद अमृता प्रीतम की कहानियों पर इतना विस्तृत लेख पढ़ा-
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‘मेरी प्रिय कहानियाँ’, यह राजपाल एण्ड सन्स के द्वारा किया गया एक प्रयास है, जिस शृंखला के अंतर्गत कई लेखकों ने अपनी प्रिय कहानियों को एक किताब के रूप में पाठकों के लिए उपलब्ध करवाई है, मसलन, अखिलेश, अज्ञेय, अमृतलाल नागर, कमलेश्वर, काशीनाथ सिंह, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, मन्नू भंडारी, शिवानी, ममता कालिया, प्रतिभा राय, निर्मल वर्मा, अमरकांत इत्यादि। इसी शृंखला के तहत अमृता प्रीतम ने भी अपनी पसंदीदा कहानियों को इकट्ठा किया है, पसंदीदा- बतौर पाठक। उन्हीं के शब्दों में – “मैं केवल यह विश्वास दिला सकती हूँ कि मैंने अपनी लिखी हुई कहानियों में से यहाँ जिन कहानियों का आपके पढ़ने के लिए चुनाव किया है, यह एक लेखक की हैसियत से नहीं, एक पाठक की हैसियत से किया है।”
इस किताब में कुल 16 कहानियाँ शामिल हैं, जिनसे गुजरते हुए स्त्री-जीवन के विभिन्न आयाम परत दर परत खुलते जाते हैं। प्रायः यह कहानियाँ स्त्री-पुरुष संबंध पर ही आधारित हैं। उन संबंधों को समाज किस तरह प्रभावित करता है, (वह समाज पितृसत्तात्मक ही है) यह अलग-अलग कहानियों के ज़रिए अलग-अलग रूपों में सामने आते हैं।
इसमें संकलित पहली कहानी है ‘जंगली बूटी’। एक ऐसी लड़की की कहानी जिसकी शादी बिना उससे पूछे, उसकी राय जाने, सिर्फ लोक में प्रचलित एक रस्म के तहत कर दी जाती है, जिसका नाम अंगोछा निचोड़ना है, जिसके बारे में अमृता लिखती हैं कि “किसी भी मर्द का यह अंगोछा भले ही अपनी पत्नी की मौत पर आंसुओं से नहीं भीगा होता, चौथे दिन या किरिया के दिन नहाकर बदन पोंछने के बाद वह अंगोछा पानी में ही भीगा होता है, पर गाँव की इस साधारण-सी रस्म से किसी और लड़की का बाप उठकर जब यह अंगोछा निचोड़ देता है तो जैसे कह रहा होता है – उस मरने वाली की जगह मैं तुम्हें अपनी बेटी देता हूँ और अब तुम्हें रोने की जरूरत नहीं, मैंने तुम्हारा आँसुओं से भीगा हुआ अंगोछा भी सुखा दिया है।” यहाँ पुरुष के आँसुओं को पोंछने का रिवाज़ तो दिख रहा लेकिन स्त्री का क्या? एक तो विवाह बिना लड़की के दृष्टिकोण, उसकी परिस्थिति जाने तय कर दी गई, दूसरे, विवाह हुआ तो वह भी बेमेल। यह बेमेल रूप-रंग के साथ-साथ उम्र में फ़र्क भी है। दोनों की शारीरिक सुंदरता का बखान लेखिका कुछ यूं करती हैं – “वैसे मैं अंगूरी के मुँह की ओर ध्यान लगाकर देखती रही। गहरे साँवले रंग में उसके बदन का मांस गुँथा हुआ था। कहते हैं – औरत आटे की लोई होती है। पर कइयों के बदन का मांस उस ढीले आटे की तरह होता है जिसकी रोटी कभी भी गोल नहीं बनती, और कइयों के बदन का मांस बिल्कुल खमीरे के आटे जैसा, जिसे बेलने से फैलाया नहीं जा सकता। सिर्फ़ किसी-किसी के बदन का मांस इतना सख्त गुँथा होता है कि रोटी तो क्या चाहे पूरियाँ बेल लो।… मैं अंगूरी के मुँह की ओर देखती रही, अंगूरी की छाती की ओर, अंगूरी की पिंडलियों की ओर… वह इतने सख्त मैदे की तरह गुँथी हुई थी कि जिससे मठरियाँ तली जा सकती थीं और मैंने इस अंगूरी का प्रभाती भी देखा हुआ था, ठिगने कद का, ढलके हुए मुँह का कसोरे जैसा। और फिर अंगूरी के रूप की ओर देखकर मुझे उसके खाविंद के बारे में एक अजीब तुलना सूझी कि प्रभाती असल में आटे की इस घनी गुँथी लोई को पकाकर खाने का हकदार नहीं – वह इस लोई को ढककर रखने वाला कठवत है।”
पितृसत्ता अपने वर्चस्व को बरकरार रखने के लिए हर संभव प्रयास करती है। इस प्रयास की ओर भी बहुत ही सूक्ष्मता से यह कहानी संकेत करती है। आखिर क्या वजह है कि अंगूरी यह कह रही है कि “औरतों को पाप लगता है पढ़ने से, मर्दों को नहीं लगता पाप, ना हीं शहर की औरत को पाप लगता।” यहाँ पितृसत्ता की कितनी बारीक चाल दिखती है क्योंकि ज़ाहिर है कि स्त्री पढ़ने लगेगी, शिक्षित हो जाएगी तो पितृसत्ता की साज़िश भी समझने लगेगी, सवाल करने लगेगी, परिणामस्वरूप उसका विद्रोह सामने आएगा, जो कि यह पितृसत्ता कभी भी नहीं होने देना चाहती, और न चाहेगी। लेकिन हाँ, शहर में जागरूकता के कारण कुछ लड़कियाँ पढ़ भी रही है किन्तु अंगूरी या अंगूरी जैसी अन्य लड़कियों के पास वह तर्कशक्ति ही नहीं है जिससे वह सोच पाए कि शहर की लड़कियाँ यदि पढ़ रही हैं तो उसके पीछे कारण क्या है?
इसी तरह प्रेम, जिसे जीवन के सबसे सुंदरतम अनुभूतियों में से माना जा सकता है, माना जाता है, उसे भी पितृसत्ता संचालित करती है, इससे निर्मित एक बिल्कुल ही अलग तरह का मनोविज्ञान सामने आता है। अंगूरी का यह भी मानना है कि लड़कियों के पढ़ने से पाप लगने के साथ-साथ उनके प्रेम करने से भी पाप लगता है। आगे उससे यह पूछे जाने पर कि जब प्रेम करने से पाप लगता है तो भी उसके गाँव की कोई-कोई लड़कियाँ प्रेम क्यों करती हैं? तब वह बड़े विश्वास के साथ बताती है कि “कोई आदमी जब किसी छोकरी को कुछ खिला देता है तो वह उससे प्रेम करने लग जाती है।” उसी कुछ का नाम ‘जंगली बूटी’ है। लेकिन यह कहानी फिर सुंदर मोड़ तब लेती है जब अंगूरी के मन में पढ़ने की चाह जागती है और कहती है “बीवीजी, मुझे पढ़ना सिखा दो।” कारण यह कि अंगूरी को भी प्रेम हो गया है, अपने पति के अलावा कोई और पुरुष उसे पसंद आ गया है, तीन दिन उससे न मिल पाने के कारण उसके मन में सहज ही चिट्ठी का ख्याल आया होगा और वह उसी की मान्यता अनुसार दो तरह के पाप की भागी हो गई, और इस तरह यह कहानी कहीं न कहीं प्रेम की शक्ति की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है।
मार्था मेरिडोस, ब्राज़ील की एक कवयित्री की एक कविता है ‘Muere Lentamente’ जिसका हिंदी अनुवाद ‘आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं’ शीर्षक से प्रसिद्ध है। कविता की शुरुआती पंक्तियाँ हैं –
“ आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप
करते नहीं कोई यात्रा,
पढ़ते नहीं कोई किताब,
सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
करते नहीं किसी की तारीफ़”
अब तक यह कविता बहुत रोमांच से पढ़ती रही, कभी इस ओर ध्यान गया ही नहीं कि बतौर स्त्री इसके अलग मायने हो सकते हैं। यह ध्यान आकर्षित करती है दूसरी कहानी ‘गुलियाना का एक खत’। यह एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो पूरी दुनिया को जानने निकली है, अकेली यात्रा पर, जिसकी ख़्वाहिश है कि वह दुनिया के हर कोने में जाए, हर जगह के बारे में जाने-सीखे। लेकिन यही दुनिया उसके सपनों के कत्ल के साथ-साथ उसकी हत्या भी कर देती है। यहीं पाश की यह पंक्ति भी याद आती है – ‘सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना’ लेकिन यह पंक्ति भी शायद पुरुषों के लिए ही सही हो क्योंकि यदि एक स्त्री सपने देखती है तो उसमें यह समाज क्या करता है? क्या वह कभी यह जानता है? समझता है कि स्त्री जो कर रही है वह क्यों कर रही है? उसके लिए वह मात्र एक शरीर होती है। पुरुषों के सपने देखने और उसे पूरा करने में भी अड़चने आती हैं लेकिन इस क्रम में शायद ही कभी किसी पुरुष का बलात्कार या हत्या की गई हो। लेकिन हाँ, यह दोनों, बलात्कार और हत्या, स्त्री के हो सकते हैं, होते हैं, इसके एक प्रतीक के रूप में हम गुलियाना को देख सकते हैं।
इसी कहानी में लेखिका एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण वाक्य लिखती हैं – “हैरानी की बात यह थी कि ज़िन्दगी ने गुलियाना को जन्म दिया था, पर जन्म देकर उसकी खबर पूछना भूल गई थी।” क्या यह नहीं होता प्रायः सभी स्त्रियों के साथ कि उनका जन्म तो हो जाता है लेकिन उसके बाद वे समाज के नियमों में इस तरह उलझा दी जाती हैं कि ज़िंदगी होती क्या है, इसकी उन्हें ख़बर ही नहीं हो पाती। या ख़बर हो भी तो भी वो खुलकर अपनी ही ज़िंदगी नहीं जी पाती हैं।
इस संकलन में तीसरी कहानी है ‘करमांवाली’। हमारे समाज में सौत की जो अवधारणा है, उसकी उपस्थिति से किसी भी पति-पत्नी के रिश्ते पर जो प्रभाव होता है, प्रायः नकारात्मक ही, उसकी ओर भी यह कहानी सोचने का संकेत करती है। भारतीय समाज में पत्नी के लिए पति का महत्त्व सर्वोपरि है। उसके जीवन का आधार वही है। ऐसी स्थिति में जब पत्नी को मालूम हो कि उसके पति का अन्य स्त्री से भी संबंध है, यहाँ तक कि उससे शादी करने से पहले से ही रिश्ते में ननद लगने वाली स्त्री का ही उसके पति से सबंध है तो उसकी पत्नी का मनोविज्ञान कैसा निर्मित होगा? अगर ऐसी स्थिति रहे कि पति का संबंध घर के बाहर की स्त्री से हो, तो भी पत्नी के लिए कष्टकारी होता है, लेकिन फिर भी उसके पास एक उम्मीद रहती है कि वह अपने पति को समझा सके, या किसी भी तरह अन्य स्त्री से संबंध खत्म करने को राज़ी कर सके क्योंकि यह तो स्पष्ट है कि सामान्य स्थिति में पत्नी उस अन्य स्त्री को स्वीकार नहीं करेगी। लेकिन जब करमांवाली जानती है कि जिस स्त्री से उसके पति का संबंध है वह इसी घर की सदस्य है और करमांवाली ही बाहर की है तब ज़ाहिर है कि उसे हर ओर से पराजय का एहसास होगा। यों भी ससुराल में स्त्री पराई ही होती है। इस स्थिति में करमांवाली आजीवन उस घर में रहकर रोते-बिलखते रहने की बजाय उस घर से अलग होकर अपने दम पर जीवन चलाना चुनती है। इस तरह से एक नई राह दिखाती है यह कहानी कि अपने पति से अलग होकर भी स्त्री अपना जीवन चुन सकती है। ऐसे संबंध में जहाँ स्त्री का स्व ही न बचे, वहाँ उसे घुट-घुट कर जीने की बजाय स्वयं को मुक्त कर देना चाहिए।
इसके बाद की कहानी ‘छमक छल्लो’, यह भी एक लड़की के जीवन-संघर्ष को ही सामने लाती है। यह कहानी मुख्यतः तीन लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है – छल्लो, उसका पिता तथा उसकी सौतेली माँ। छल्लो का पिता, बूढ़ा और बीमार हो चुका है इसलिए अब पैसे कमाने में असमर्थ है। छल्लो की माँ, (चूँकि उसकी अपनी कोई संतान नहीं हुई थी, इसलिए उसे अपने पति की पूर्व-पत्नी की संतान के नाम से पुकारा जाता था, जिस बात की उसे हमेशा चिढ़ रही। ) पैसे कमाने का सारा बोझ छल्लो के ऊपर डाल चुकी है, और यदि छल्लो उसमें असमर्थ होती है तो उसे भरपूर डाँटती-फटकारती है। छल्लो, जिसे हर कदम पर संघर्ष करना पड़ रहा है, घर में माँ के बुरे-व्यवहार का दुख, बाहर अपने को सुंदर दिखाने, हँस-बोल कर टोकरी बेचने का असफल प्रयास और उससे उत्पन्न ग्लानि का एहसास।
इस लड़की के जीवन-संघर्ष के साथ-साथ यह कहानी पिछली कहानी का, सौत की अवधारणा के स्तर पर, विस्तार भी लगती है। क्योंकि जिस तरह की बात, जैसा व्यवहार छल्लो की माँ उससे कर रही है वहाँ सहज ही यह ख्याल आता है कि क्या यदि छल्लो उसकी अपनी संतान होती तब भी इसी कटुता के साथ वह उसके साथ पेश आती? क्या कोई अपनी माँ अपनी बेटी के शरीर के खास अंग के लिए सामान शब्द का इस्तेमाल कर सकती है? क्या यह कह सकती है कि अपनी टोकरियों को बेचने के लिए अपने शरीर का इस्तेमाल करे, अपने हाव-भव, रँग-ढंग, अपनी चाल से लोगों को लुभाए? उत्तर संभवतः ना में ही होगा। एक स्त्री के लिए क्या इससे भी तक़लीफ़देह कोई स्थिति होगी कि घर के बाहर तो लोग उसे इंसान की बजाय सिर्फ एक देह समझते हैं, और घर के भीतर भी उसे एक देह मात्र ही समझा जाए! लेकिन छल्लो के जीवन में उसे यही मिलता है, घर के भीतर, एक अन्य स्त्री ही, जो रिश्ते में उसकी सौतेली माँ है, उसे सामान कह रही और बाहर की दुनिया भी उसकी देह देख रही, तथा छल से, सहायता करने के बहाने उसका बलात्कार कर रही। हमारा जो भी व्यवहार सामने आता है उसके पीछे सबसे अधिक हमारे मनोविज्ञान का प्रभाव होता है। इसलिए किसी को भी सीधे गलत ठहरा देने के पहले यह समझा जाना चाहिए कि किसी कार्य के पीछे मनोविज्ञान कैसे काम कर रहा है, आखिर वह कैसे निर्मित हो रहा है। छल्लो के ऊपर बहुत ही आसानी से यह थोप दिया जा सकता है कि उसे इतनी भी अक्ल नहीं कि किसी अनजान के कहने पर ऐसे ही उसके साथ नहीं चले जाना चाहिए! लेकिन इस पर ध्यान नहीं जाता कि वह इतनी सरलता से ऐसा कैसे कर ले रही है। जबकि लेखिका वहाँ उसकी मानसिक स्थिति को एक-एक कर के सामने ला रही हैं। जिस तरह का दबाव उसे हर रोज़ घर में झेलना पड़ता है, उस रोज़ निकलते हुए पिता की स्वादिष्ट भोजन खाने की चाह, यह सब उसके मन में चलते रहता है और उसे लगता है कि मोटर वाले व्यक्ति से उसे पैसे मिल जाएँगे और घर में न उसे डाँट सुननी पड़ेगी, साथ ही पिता भी अपनी पसंद का भोजन कर पाएँगे। इस मानसिकता में यह बहुत मुश्किल है कि लड़की दुनिया के छल-छद्म के बारे में सोच भी पाए। परिणामस्वरूप उसका बुरा होगा ही।
इस संकलन की कुछ कहानियाँ ऐसी हैं जो मुख्यतः प्रेम बनाम समाज पर बात करती हैं। उदाहरणत: ‘अमाकड़ी’, ‘एक रुमाल, एक अँगूठी, एक छलनी’, तथा ‘धुआँ और लाट’। यह तीनों कहानियाँ समाज में प्रेम की स्थिति को प्रस्तुत करती हैं लेकिन तीनों को कहने का तरीका एक दूसरे से बिल्कुल ही भिन्न है। ‘अमाकड़ी’ एक ऐसे प्रेमी जोड़े की कहानी है जिसमें जैसे ही लड़के के परिवार को इसकी जानकारी होती है वे बिना किसी कारण के, सिर्फ प्रेम के नाम पर, तुरंत उस लड़के की शादी बिना उसकी मर्ज़ी के, किसी और लड़की से करवा देते हैं। यह कैसा समाज है जिसे प्रेम से इतनी दिक्कत? सिर्फ इस कारण से तीन लोगों की ज़िंदगी सुंदर बनने से रह जाती है, अमाकड़ी, किशोर व किशोर की पत्नी। यह कहानी एक तरह से उनलोगों के लिए एक जवाब की तरह भी है जिनका यह मानना, न केवल मानना, बल्कि थोपना भी है कि शादी के बाद प्यार हो ही जाता है। क्या यह समाज की कृत्रिमता नहीं मानी जाएगी कि जहाँ पहले से प्रेम है, उससे अलग कर के किसी और से विवाह के लिए बाध्य किया जाता है इस छलावे कथन के साथ कि शादी के बाद प्यार हो ही जाता है।
इसी तरह ‘एक रुमाल, एक अँगूठी, एक छलनी’ उन स्त्रियों की कहानी है जिन्हें अपने घर की खुशी के लिए अपने प्रेम-संबंध का त्याग करना पड़ता है तथा किसी और की पत्नी बन पतिव्रता बनने का प्रयास करना पड़ता है। और यह कैसे पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है इसे भी यह कहानी दर्ज़ करती है। कहानी शुरू होती है बन्ती की प्रेम कहानी से, जिस प्रेम का अंत बन्ती की शादी किसी और पुरुष से होने पर समाप्त हो जाता है, लेकिन मन में हमेशा प्रेम रहता है, उससे अधिक भय रहता है कि ससुराल में उसकी प्रेम कहानी कोई जान न जाए। आगे चल कर कहानी कितना सुंदर मोड़ लेती है जब बन्ती के साथ-साथ हम पाठकों के सामने भी यह रहस्य खुलता है कि उसकी सास का भी प्रेम संबंध था, लेकिन परिवार के कारण उसकी शादी एक दूसरे व्यक्ति से, उसकी अमीरी के कारण करा दी जाती है। प्रायः इस समाज में सभी स्त्रियों की यही कहानी होती है, अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनना उनके हक में नहीं आता है, इसलिए लेखिका बहुत सटीक वाक्य लिखती हैं – “पर आज बन्ती का अचानक पत्र आया है। पता नहीं यह कैसा पत्र है ! इसमें सिर्फ़ उसके मन की आवाज़ नहीं, इसमें जैसे हर स्त्री के मन की आवाज़ हो।”
इसके अलावा सास और बहू का दोस्ताना रिश्ता भी हो सकता है, लेखिका इसे भी प्रस्तावित करती हैं। भले वह अपनी सास नहीं है, ससुर की दूसरी पत्नी है, लेकिन रिश्ता तो सास-बहू का ही है। हम जितनी भी आधुनिकता, खुले विचारों की बात कर लें, लेकिन यह आज भी यह अकल्पनीय है कि कोई सास अपनी बहू से अपने प्रेम-संबंध की बात करे। इस कल्पना को अमृता प्रीतम दशकों पहले अपनी कहानी में दर्ज़ करती हैं।
इसके बाद की कहानी ‘धुआँ और लाट’ भी ऐसी प्रेम और समाज के द्वन्द्व को सामने लाती है। प्रेम है तो विवाह अनिवार्य है, लेखिका इस बंधन पर ही सवाल करती हैं। हरदेव और ब्रह्मी, दोनों की मुलाकात होती है, थोड़े दिनों में ही दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगते हैं, लेकिन दोनों की जीवनशैली, परिवेश सब अलग है। जब स्थिति आती है कि हरदेव को ब्रह्मी का घर छोड़ अपने शहर जाना होगा तब उसका समर्पण व्यक्त होता है, उसकी चाह है कि ब्रह्मी जो भी करेगी, उसका जीवन जिस तरह चलेगा उसमें वह हमेशा साथ देना चाहता है। वह कहता है – “ब्रह्मी जंगल के चश्मे से अकेली पानी लेने जाती है, मैं उसके साथ जाया करूँगा। वह खेतों में जाकर धान काटती है, मैं उसका गट्ठर उठवाया करूँगा। वह चूल्हे के आगे बैठकर रोटियाँ सेंकती है, मैं आग जलाया करूँगा।” यह पूछे जाने पर कि थोड़े दिनों बाद वह ससुराल चली जाएगी, तब क्या करोगे? उसका उत्तर होता है – “मैं उसकी डोली के साथ जाऊँगा। वह अपना नया घर बनाएगी मैं उसे सजाया करूँगा।” क्या यह प्रेम की उदात्त स्थिति नहीं लगती जहाँ सिर्फ समर्पण का भाव है, जहाँ सिर्फ देने की चाह है, लेने की कुछ भी नहीं! इस तरह से इस कहानी को ‘प्लेटोनिक लव’ की ओर एक संकेत भी मान सकते हैं। और जब यह सवाल आता है कि ब्रह्मी के साथ तुम्हारा रिश्ता क्या होगा तब वह इस सामाजिक बंधन पर प्रहार करते हुए जरूरी सवाल उठाता है – “यही तो दुनिया वालों की बुरी आदत है, कि वे आदमी का आदमी के साथ रिश्ता जानना चाहते हैं। वे आदमी को पीछे देखते हैं, रिश्ते को पहले। क्या औरत का मुँह औरत का नहीं होता ? क्या वह ज़रूर माँ का मुँह होना चाहिए ? बहन का मुँह होना चाहिए ? बेटी का मुँह होना चाहिए ? बीवी का मुँह होना चाहिए ? औरत का मुँह औरत का क्यों नहीं रह सकता?”
अगली कहानी ‘लाल मिर्च’ पुरुष के उस सामान्य मनोविज्ञान की कहानी है जिसके लिए स्त्री एक शरीर के सिवा कुछ भी नहीं। इससे भी आगे जो एक यह मानसिकता बनती है पुरुषों की, कि उसे एकदम ‘परफेक्ट’ लड़की चाहिए, इसके लिए कैसे अलग-अलग पैमाने तय करता है पुरुष-वर्ग, इन सब पर यह कहानी बात करती है। गोपाल, कॉलेज में पढ़ने वाला एक ऐसा लड़का है जिसे अपने लिए एक लड़की चाहिए, जो कि एकदम ‘परफेक्ट’ हो। लेकिन उसकी उम्र बीतती जाती और वह जिस तरह की लड़की की तलाश में था, वैसी नहीं मिलती है और अंतत: अपनी माँ की पसंद की लड़की से वह शादी कर लेता है। लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती है। जिसकी चाह उसे हमेशा रही वह न मिल पाने के कारण उसका मनोविज्ञान अजीब तरह से, बल्कि कहें कि भयानक तरह से निर्मित हो जाता है। ऐसा मनोविज्ञान कि गोपाल अपनी जवानी की चाह अपने बेटे से पूर्ति करने की रखने लगता है। यानी वह चाहता है कि उसकी पत्नी एक बेटा उत्पन्न करे, और बड़ा होकर उसका बेटा लाल-मिर्च सी लड़की ढूँढ पाए, ठेठ भाषा का प्रयोग किया जाए तो उसका बेटा लाल-मिर्च सी लड़की पटाए। लेकिन जब उसकी संतान के रूप में बेटा नहीं बल्कि बेटी का जन्म होता है तब एक बार फिर उसका सपना चूर हो जाता है। लेकिन अपनी बेटी को ही देख कर उसे समझ आ जाता है कि वह अपने जीवन भर क्या करता रहा, किस रूप में लड़की को देखता रहा! और कहानी यहाँ आकर खत्म हो जाती है कि वह अपने भविष्य की कल्पना में है, उसकी पत्नी कहती है “लड़की इतनी बड़ी हो गई है, कोई लड़का देखो न। कहाँ छुपाऊँ इस आँचल की आग को ? ऐसा रूप…ऊपर से जमाना बुरा है…। और फिर उसके दरवाज़े पर बारात आ गई…उसके दामाद ने उसके पाँव छुए…उसकी बेटी लाल सुर्ख कपड़ों में लिपटी हुई थी…वह डोली के पास जाकर उसे प्यार देने लगा…उसकी बेटी…बिल्कुल लाल मिर्च…। लाल मिर्च…लड़की… लाल मिर्च…और गोपाल को लगा, आज…किसी ने मिर्चें उठाकर उसकी आँखों में डाल दी थीं।”
अब तक जिन कहानियों में प्रेम का उल्लेख हुआ उन सबमें ऐसी स्थिति रही कि दोनों में प्रेम तो है लेकिन समाज को वह स्वीकार्य नहीं, जिसके कारण उनका संबंध विवाह तक नहीं पहुँच पाता। लेकिन ‘बू’ कहानी में इसके आगे की जटिलता को लेखिका सामने लाती हैं। हिंदी फ़िल्मों में जिस तरह दिखाया जाता है कि हीरो-हीरोइन मिलते हैं, उनमें प्रेम होता है, समाज उन्हें अपनाना नहीं चाहता लेकिन किसी तरह सबसे लड़-झगड़ कर समझौता हो जाता है, अंत में दोनों का विवाह हो जाता है और फ़िल्म खत्म, जैसे कि अब इसके आगे सबकुछ ठीक चलेगा। यह कहीं न कहीं इस तरह का भ्रम उत्पन्न करता है कि प्रेम में असल दिक्कत विवाह के पहले तक ही है, और विवाह के बाद सबकुछ ठीक रहता है। लेकिन वास्तव में ऐसा होता नहीं, उसके बाद भी कई तरह की जटिलताएँ हो सकती हैं। इसी के एक उदाहरण के तौर पर हम ‘बू’ कहानी का ज़िक्र कर सकते हैं। इस कहानी में गुलेरी और मानक, दोनों का प्रेम-संबंध बनता है, समाज के द्वारा स्वीकृति यानी कि विवाह भी हो जाता है लेकिन फिर भी कहानी का अंत होता है गुलेरी की आत्महत्या और मानक की आत्मा-हत्या से। कारण यह कि विवाह के 7 वर्षों तक भी गुलेरी गर्भवती नहीं हो पाती है, इसलिए उसकी सास इंतज़ार करती है कि जब वह अपने मायके जाए तब वह मानक की दूसरी शादी कर दे, जिसके लिए वह बिना किसी को बताए पहले ही पैसे देकर मानक का रिश्ता तय कर आती है। नतीज़न, मानक की दूसरी शादी की खबर सुन गुलेरी अतमहत्या कर लेती है और उसकी आत्महत्या की खबर सुन मानक हमेशा के लिए मौन हो जाता है, जैसे अब वह केवल एक शरीर बच गया हो और उसकी आत्मा गुलेरी की मृत्यु के साथ ही मर गई हो।
इसके बाद की दो कहानियाँ ‘मैं सब जानता हूँ’, तथा ‘एक लड़की: एक जाम’ पितृसत्ता के उस स्वरूप को सामने लाती है जिसके तहत पुरुष स्त्री को अपनी जागीर समझता है, अपनी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करता है, और इन दोनों कहानियों में स्त्री के हिस्से मृत्यु आती है। पहली कहानी में ठेकेदार है जिसका मानना यह है कि पहले बच्चा पैदा कर लो, उसके बाद पत्नी को जितना चाहो उतना पीटो, क्योंकि वह बच्चे के मोह से बंधी रहेगी और घर छोड़ कर नहीं जाएगी। यानी कि घर में स्त्री इसलिए नहीं चाहिए ताकि उसे प्यार से रखे, बल्कि इसलिए चाहिए कि घर ठीक से चले, क्योंकि अंततः घर को ठीक रखने का काम स्त्री ही करती है। लेकिन ठेकेदार यह नहीं जान सका कि एक वक्त तक ही उसकी यह चालाकी चल सकेगी। जब भी उसकी पत्नी कहती कि “मैं किसी दिन कुएँ में छलाँग मारकर मार जाऊँगी”, वह इसे भी ‘टेकेन फॉर ग्रांटेड’ लेता रहा और अंततः उसकी पत्नी का मृत शरीर कुएँ में मिलता है।
दूसरी कहानी में एक ऐसी लड़की, टूणी का ज़िक्र है जिसका परिवार गरीब है उस उस गरीबी से पीछा छुड़ाने के लिए, कर्ज़ चुकाने के लिए जिसने कर्ज़ दिया था उसी ने 1500 रुपए के बदले टूणी को खरीद लिया था। इसके बाद जब टूणी को प्रेम होता है, उसके प्रेमी को यह सारी परिस्थिति मालूम होती है तो वह खुद 1500 रुपए उस साहूकार को दे कर कर्ज़ चुकाने और फिर शादी के लिए टूणी के पिता को राज़ी कर लेता है। यहाँ फिर एक अलग बात आती है कि परिस्थितियाँ प्रेम को किस तरह प्रभावित करती हैं। इस कहानी में स्त्री-पुरुष दोनों को प्रेम है, परिवार की ओर से भी कोई रुकावट नहीं है लेकिन एक दूसरा व्यक्ति, जो टूणी को खरीदना चाहता था, उससे यह बर्दाश्त नहीं होता कि किसी और के साथ टूणी जाए, इसलिए वह उसे ज़हर दे कर मार देता है। इस तरह से यह दोनों कहानियाँ पितृसत्ता के इस रूप को प्रकट करती हैं जहाँ स्त्रियों से पुरुषों की संपत्ति की तरह व्यवहार किया जाता है।
इसके बाद की कहानी ‘एक गीत का सृजन’ एक ऐसे पुरुष की कहानी है जो एक समय में किसी प्रेम संबंध में रहा था, उसके बाद वह संबंध तो ताउम्र साथ नहीं रहा लेकिन उस संबंध की याद हमेशा उसके भीतर जीवित रही, और उस याद के सहारे ही वह अपना जीवन चलाने के लिए नज़्म लिखा करता था। इस तरह से एक ऐसे व्यक्तित्व से हमारा परिचय होता है जिसे अपनी चाहत के न मिल पाने पर उसका जीवन तो आगे बढ़ता है, लेकिन अवचेतन मन से वह अतीत में ही उलझा रहता है। चूँकि यह कहानी एक रचनाकार द्वारा एक अन्य रचनाकार के बारे में ही कही जा रही इसलिए स्वाभाविक रूप से कवि-लेखक की एक रचना-प्रक्रिया का भी ज़िक्र आता है। इसी का एक रूप यह पंक्ति बताती है – “जब आदमी एक तरफ़ से इतना गूँगा हो जाता है कि एक शब्द भी नहीं बोल पाता, तो उसे अपनी खामोशी से घबराकर कविता लिखनी पड़ती है।”
अगली कहानी है ‘पाँच बहनें’। यदि स्त्री-जीवन से संबंधित कहानियों को एक साथ देखा जाए तो यह कहानी सर्वश्रेष्ठ कहानियों में से एक होगी। कारण, इसे कहने का अनूठा ढंग। बात वही कही जा रही है कि स्त्रियों का अपना कुछ नहीं होता, उनका पूरा जीवन घर-परिवार के भीतर, पुरुषों के अधीन रहकर बीत जाता है लेकिन लेखिका ने जिस कल्पनाशीलता का परिचय यहाँ दिया है, कहने का जो ढंग चुना है वह अतुलनीय है। मूलतः यह कहानी ज़िंदगी और पवन के संवाद से शुरू होती है जहाँ ज़िंदगी अपनी यह इच्छा ज़ाहिर करती है कि ‘सुना है कि इस शताब्दी की पाँच पुत्रियाँ हैं, जवान और सुंदर।” और वह उनके घर जाकर उन्हें एक जैसी मूल्यवान सौगात देने की बात कहती है। इसके बाद वह पवन को अपने साथ ले चल पड़ती है। जिन पाँचों पुत्रियों, यानी कि पाँच अलग-अलग स्त्रियों के पास जाती है उन सबकी परिस्थितियाँ तो भिन्न हैं, लेकिन नियति एक है- अपनी ज़िंदगी से अनभिज्ञ, पितृसत्तात्मक समाज की बेड़ियों में जकड़ी हुई। उन पाँचों स्त्रियों के वर्णन को देखा जाए तो वे सभी हिस्से बेहद मार्मिक लगते हैं। पहली स्त्री के बारे में लिखा है – “उसके घर में खिड़कियाँ और दरवाज़े नहीं हैं। बस, एक ही दरवाज़ा है। उसका पति जब बाहर जाता है, तो जाते हुए वह बाहर से दरवाजे में लोहे का ताला लगा जाता है। और फिर जब घर आता है, तो वही ताला बाहर से खोलकर घर के भीतर लगा देता है।” इसे पवन कहता है कि यह दीवारें परम्परा की दीवारे हैं जिसे आज तक कोई तोड़ नहीं पाया। इस तरह से पहली पुत्री के घर के भीतर ज़िंदगी प्रवेश ही नहीं कर पाती है। दूसरी पुत्री रेल की पटरी पर कोयले चुन रही स्त्री है जिसकी स्थिति ऐसी हो गई है कि उसे यह ज़रा भी नहीं लगता कि उससे कोई ठीक तरीके से बात भी कर सकती/सकता है। इसलिए जब ज़िंदगी उसे बहन कह कर पुकारती है तो वह देख कर, सुन कर भी अनसुना कर देती है। ज़िंदगी पुन: प्रयास करती है तब वह स्त्री उस ओर ध्यान देती है। बातचीत के क्रम में ज़िंदगी के यह पूछने पर कि तुमने कभी मेरा नाम नहीं सुना? स्त्री अपने बचपन में देखी गई गरीबी, साहूकार का छल इन सबको याद करते हुए कहती है “ मेरी माँ को रात भर नींद नहीं आती थी। वह रात को मुझे जगाकर कहानियाँ सुनाया करती थी – भूतों की, प्रेतों की, देवों की कहानियाँ। पर मैंने तुम्हारा नाम तो कभी नहीं सुना।” जब ज़िंदगी उसे सौगात देने की बात कहती है तो जिस भय से वह स्त्री मना करती है वह एक वाक्य उसके कष्टों की पूरी व्याख्या कर देता है। उसे भय है कि यदि वह सौगात ले लेती है तो कल को पुलिस वाले उसपर चोरी का इल्जाम लगा देंगे। इसके बाद जो तीसरी पुत्री है वह महल की है लेकिन वहाँ भी उसका होना कुछ नहीं है, वह केवल एक मूर्ति बन कर रह गई है। उसे पैसों की कोई कमी नहीं है लेकिन जिंदगी किसे कहते हैं, इसे वह भूल चुकी है। जब वह कहती है कि जब कोई लड़की बड़े घर में ब्याह कर आती है तो पहली रात ही उसका ऑपरेशन कर के उसका दिल निकाल लिया जाता है, इससे साफ़ है कि अब ससुराल में उसकी कोई इच्छा नहीं चल सकती, वह अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं कर सकती। साथ ही ज़िंदगी के सौगात को लेने से यह कह कर मना कर देती है कि अभी चुनाव आने वाला है इसलिए उसके पति ने आजकल किसी से कोई चीज़ लेने से मना किया है। चौथी पुत्री एक ऐसी स्त्री है जिसका बार-बार बलात्कार किया गया है। जिसका पहला बलत्कार देश की आज़ादी की रात हुआ था, जिस दिन लोग आज़ादी का जश्न मना रहे थे उस रात भी न जाने कितनी स्त्रियों के हिस्से बलात्कार आया था, उन्हीं में से एक यह पुत्री भी थी। जिसने एक समय पर प्रेम संबंध को जीते हुए ही अपनी ज़िंदगी जी थी लेकिन घर की परिस्थियाँ बदलने के बाद उसका ज़िंदगी जीना पीछे रह गया। और बाद में चूँकि उसका बलत्कार हो चुका है, जिसमें उसका कोई दोष नहीं, सिवा इसके कि वह एक स्त्री-देह है , इस कारण प्रेमी के पास भी उसका स्वीकार्य नहीं होता है। अब वह स्वयं को इतनी खराब मानती है कि उसे लगता है कि वह यदि सौगात भी लेगी तो वह भी खराब हो जाएगी। अंतत: ज़िंदगी पाँचवी पुत्री के पास पहुँचती है जो पढ़ने-लिखने वाली, संगीत और चित्र कला प्रेमी, 20 वर्षीय एक लड़की है। लेकिन वह भी ज़िंदगी की सौगात लेने से मना कर देती है क्योंकि दिन के उजाले में, सबके सामने वह अपना जीवन सहजता से नहीं जी सकती इसलिए जिंदगी को रात के समय, उसके सो जाने पर, उसके सपनों में आने को कहती है। इस तरह से हर वर्ग की, हर तरह की स्त्रियाँ ज़िंदगी से मुँह मोड़ लेती हैं।
इसके बाद की कहानी ‘उधड़ी हुई कहानियाँ’ में लेखिका पितृसत्ता का एक और नया रूप सामने लाती हैं। जहाँ एक स्त्री के जुड़वा बच्चा होने पर गाँव के बड़े लोगों यह कहा जाता है कि उसने एक ही दिन अपने पति से भी संबंध बनाया था और अपने प्रेमी से भी इसलिए दो बच्चे हुए हैं, और जब थोड़े ही समय बाद एक बच्चे की मृत्यु हो जाती है तो यह आरोप लगता है कि जो पाप का बच्चा था वह मर गया। इन सबसे तंग आकर वह स्त्री आत्महत्या कर लेती है।
अगली दो कहानियाँ ‘अजनबी’ तथा ‘एक दुखान्त’ पुरुष मन के सहारे कही गई कहानियाँ है जिसमें से पहली कहानी पुरुष के एक मनोविज्ञान को सामने लाती है जो अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाता लेकिन वर्षों बाद जब वही स्थिति उसकी बेटी के साथ होने की संभावना लगती है तब सारी बात, सारी भावनाएँ उसके सामने स्पष्ट रहती है। अगली कहानी फिर से स्त्री-पुरुष संबंध और सामाजिक बंधन के द्वन्द्व पर आधारित है। जहाँ एक पुरुष एक स्त्री शुरू में भाई-बहन की तरह एक दूसरे को संबोधित करते हैं लेकिन बढ़ती उम्र के साथ दोनों के मन में प्रेम भावना जाग जाती है, इस पाठ पर आगे बढ़ने का दोनों निर्णय भी करते हैं लेकिन अंतत: स्त्री उस ओर बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पाती और इस संबंध को वह राखी भेज कर समाप्त कर देती है।
अंत में यह कहा जा सकता है कि इन सारी कहानियों से गुजरते हुए कुछ बातें प्रमुखता से सामने आती हैं जिनके केंद्र में स्त्री-पुरुष संबंध, पितृसत्ता के विभिन्न रूप, स्त्री-जीवन के विभिन्न पहलू, प्रेम का उदात्त रूप शामिल है लेकिन इनमें से एक भी ऐसी कहानी नहीं है जिसका सुखांत हुआ हो, यानी कि लेखिका इस बात को हर कहानी से बता रही हैं स्त्रियों के हिस्से खुशी आए, उन्हें सुख मिले यह बहुत मुश्किल है, लगभग असंभव। इस तरह से इन कहानियों के ज़रिए हमारा परिचय स्त्री-जीवन के विभिन्न आयामों से होता है जिनमें एक बात समान है, और वह है दुख।

