सौम्या बैजल की ताज़ा कविताएँ

सौम्या बैजल कवयित्री, रंगमंच की दुनिया से जुडी कलाकार, विज्ञापन की दुनिया में काम करने वाली, एक फेमिनिस्ट, एक्टिविस्ट, लेखिका हैं. कविताओं में वह सब कहने की कोशिश करती हैं, जो कई बार रोज़ की भागम-भाग में आँखों से ओझल रहता है. वह लाडली मीडिया अवार्ड्स में jury भी रह चुकी हैं, और हिंदी में उनके लेख, कहानियां और कविताएं समय समय पर प्रकाशित होते रहते हैं. जो वायर, firstpost , डेक्कन हेरल्ड इत्यादि में उनके लेख पढ़े जा सकते हैं-
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उसका क्या?
 
आसान होता होगा न, छोड़ कर चले जाना,
न सवाल का डर न जवाबदेही की फिक्र,
और साथ, रोके जाने की ख़ुशी भी.
 
लेकिन उसका क्या जिसे छोड़ा जाता है?
 
आसान होता होगा, किसी के साथ चलना,
उस से सीखना, उस से प्यार पाना, और एक दिन अलग हो जाना.
और साथ, याद किये जाने का सौभाग्य भी.
 
लेकिन उसका क्या, जो याद करता है?
 
आसान होता होगा, किसी का भरोसा जीतना,
उसे दिलासा देना, कि आप हैं, साथ हैं. और फिर एक दिन, दूर चले जाना.
और साथ, आज़ादी का जश्न भी.
 
लेकिन उसका क्या, जो ठंडी हवाओं में हाथों की गर्माहट ढूंढ रहा है?
 
आसान होता होगा, सूरज की रौशनी में,
नए सवेरे का स्वागत करना,
और साथ, किसी की रातों का आज भी सपना बनना.
 
लेकिन उसका क्या, जो रात भर चाँद से सवाल करता है, और रात भर सन्नाटा सुनता है?
भरोसे के टूटने की आवाज़ सुनने की कोशिश कर रहा है?
 
उसका क्या जिसकी कहानी अधूरी रह गयी?
जो सन्न से रुकी दुनिया को चलते हुए देख रहा है?
जो एक बार फिर भरोसा करने से कतरा रहा है?
 
उसका क्या, जो छोड़ा गया?
जो अकेले अपने साथ, जीने की कोशिश कर रहा है?
 
उसका क्या?
 
 
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तुम्हारे जाने के बाद
 
तुम्हारे जाने के बाद,
तुम्हारे शब्दों में,
पुराने खतों में,
पुरानी बातों में,
मैं जवाब ढूंढ़ती रही.
 
तुम्हारे जाने के बाद,
उन्हीं रास्तों पर खड़ी रही,
शायद किसी मोड़ पर,
लौट आओ तुम, खोये हुए.
 
तुम्हारे जाने के बाद,
मैंने गुलमोहर की ओर पलकें उठाकर नहीं देखा.
सूखे पत्तों में बिछड़ने की कहानियां ढूंढी।
 
तुम्हारे जाने के बाद,
आँखें बंद कर कर,
तुम्हारी आवाज़ सुनती रही,
जिसकी आदत थी मुझे.
 
तुम्हारे जाने के बाद,
स्थिर सी बैठी रहती थी,
घंटो, सन्नाटे में खुद को खोने की कोशिश करती रहती थी,
बिना कुछ कहे, बिना कुछ किये.
 
तुम्हारे जाने के बाद,
तुम्हारी राहो से कतराती थी,
चाहती थी तुम खुश रहो,
लेकिन अपने बिना, तुम्हें खुश देखना नहीं चाहती थी.
 
तुम्हारे जाने के बाद,
तुम वक़्त से नज़र आने लगे,
जो बेरहम बीतता जाता है,
आगे बढ़ते जाता है, और कभी पलट कर नहीं देखता.
 
तुम्हारे जाने के बाद,
मैं भी आज़ाद होना चाहती थी,
दर्द से, इश्क से, इंतज़ार से.
तुम्हारी यादों के गिरफ़्त से.
 
तुम्हारे जाने के बाद,
मैं अब भी वहीँ हूँ.
सब कुछ वही नहीं है,
कुछ भी वही नहीं है, मैं भी नहीं.
 
लेकिन तुम्हारे जाने के बाद,
मैं हूँ, वक़्त है,
उसे अपनी कलाई में बाँध कर,
उसके साथ आगे बढ़ूंगी मैं.
 
उस पल का इंतज़ार करूंगी,
जब मेरे जाने के बाद,
तुम किसी खोये को,
उन्हीं राहों में ढूंढोगे.

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