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  • मुक्तिबोध का लेख ‘दून घाटी में नेहरु’

    मुक्तिबोध का यह लेख भी आज पढ़ा जाना चाहिए। मुक्तिबोध ने यह लेख लिखा था जब नेहरू छुट्टी मनाने के लिए गये थे। पढ़ने लायक लेख है- 

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    सुना है पण्डित जवाहरलाल नेहरू एक हफ़्ते छुट्टी पर रहेंगे। ‘आराम हराम है’ का नारा देने वाले नेहरूजी को स्वयं आराम की कितनी जरूरत है, यह किसी से छिपा नहीं। देश-विदेश की हर छोटी-सी घटना उनके संवेदनशील मन को केवल प्रभावित ही नहीं करती, वरन् उन्हें योग्य कार्य करने के लिए संचालित भी कर देती है। इनका मानसिक भार उन लोगों से भी छिपा नहीं है जो सिर्फ़ चित्र में उन्हें देखते हैं। उनका कहना है कि नेहरूजी के चेहरे पर चिन्ता की रेखाएं गहरी और कई गुना हो गयी हैं तथा वे जल्दी-जल्दी बूढ़े हो रहे हैं।

    जहां तक बुढ़ापे का सवाल है, हम नहीं कह सकते कि दार्शनिकता और चिन्ता या सफे़द बाल वृद्धत्व का लक्षण है। वह एक नये प्रकार के उच्च स्तर वाले हमधवल तारुण्य का भी लक्षण हो सकता है। पण्डित नेहरू का दिल, जो पृथ्वी जैसा ही बड़ा और गंगा-जैसा ही गम्भीर और चपल है, इस लायक नहीं है कि वह सिर्फ़ एक भव्य दार्शनिक सिफ़र बनकर सन्तुष्ट हो लें।

    व्यक्तित्व-पूजा के धिक्कार के इस युग में भी, तरुण लोग अगर पण्डित नेहरू में अपनी झलक देख लेते हों, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है! एक बार एक बीस साला जवान ने मुझसे पूछा कि नेहरूजी रात में क्या सोचते-सोचते सो जाते होंगे।

    तीसरे विश्वयुद्ध के दृश्य, लोहा और इस्पात के विशाल नये कारखाने का धुआं, नये उठते हुए शहरों की मीनारें, पृथ्वी पर लहराते, कई देशों को जोड़ते अथाह नीले समुद्र, कूटनीतिक-चर्चाओं में उठाये गये तर्क और दलीलें, आदि-आदि के बिम्ब देखते हुए उनकी आंख लग जाती होगी। शायद हां, शायद नहीं। किन्तु यह नामुमकिन है कि पण्डित नेहरू का आदर्शवादी मन हम लोगों की भावुक दिलचस्पी का विषय न हो। इसीलिए, हम चाहते हैं चन्द रोज ही क्यों न सही, पण्डित नेहरू को नियमपूर्वक उसी प्रकार विश्राम लेना चाहिए, जिस प्रकार, ठण्डी लड़ाई के हजार ठण्डे लेकिन चमकते हुए अंगारों के बावजूद, अमरीकी प्रेसिडेंट आइजन हॉवर तथा अन्य यूरोपीय नेतागण समय पाकर विश्राम, मनोरंजन और खेल-कूद में समय बिता देते हैं।

    जबर्दस्ती विश्राम, यानी बेकारी और स्वेच्छापूर्वक निरन्तर विश्राम, यानी आलस्य के इस क्लासिकल देश यानी भारत में आवश्यक विश्राम का महत्व शायद समझा ही नहीं गया है। यही कारण है कि पण्डित नेहरू जैसे तत्पर जागरूक नेता भी समय-समय विश्राम लेते रहने का नियम नहीं बना पाते। देश के भीतर हजार तोड़-फोड़ और षड्यन्त्र के बावजूद, अपना यथायोग्य काम करके, नया केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल बनाकर, प्रधानमन्त्री को देश की समस्याओं को हल करने के लिए प्रवृत्त और प्रेरित करके, चिन्ताग्रस्त डॉक्टर सुकर्नो, बड़े मजे में बाली द्वीप में छुट्टी मनाने को चल दिये जहां एक लम्बे अरसे तक आराम और मनोरंजन करते रहेंगे।

    विश्राम की कितनी जरूरत होती है, यह फ्ऱास के बादशाह नेपोलियन के एक कार्य से ही सूचित होता है। केन्द्रीय यूरोप की एक लड़ाई। दोनों ओर से धुआंधार गोलन्दाजी। दोनों ओर से सुबह से लड़ाई हो रही है। रात हो गयी। फिर भी लड़ाई जारी है, जो लगातार दो रोज से चल रही थी। नेपालियन हर मोर्चे पर सिपाही से मिलते, बात करते, प्रोत्साहित करते, जनरल से मिलते, बहस करते, आदेश देते, और इस प्रकार लड़ाई और भी उग्र, और भी कठिन, और भी भयानक होती जाती। नेपोलियन का युद्ध संचालन उचित गति से सफलतापूर्वक चल रहा था, यद्यपि उनके ख़याल से, फिर भी कहीं-कहीं नुक्स रह जाते। कहीं-कहीं अप्रत्याशित घटना हो जाती। युद्ध में तो यह होता ही है। सारा आसमान तोपों के गोलों की ज्वाला से लाल हो रहा था। एकाएक नेपोलियन ने थकन महसूस की। वे एक सिपाही के पास भागे गये और उससे कहा मुझे एकदम आराम की जरूरत है, क्या करूं!

    सिपाही असमंजस में पड़ गया। युद्ध क्षेत्र में बादशाह कहां सोयेगा? सिपाही का यह भाव ताड़कर नेपोलियन ने कहा, ‘अच्छा, मैं इस तोप के अन्दर सो जाता हूं। ठीक पन्द्रह मिनिट बाद उठ जाऊंगा, तब तक मुझे छेड़ना मत।’

    और सिपाही ने देखा कि उचित समय पर नेपोलियन अपनी फौजी वर्दी झाड़ते हुए प्रफुल्ल-वदन होकर उसके सामने फिर खड़ा हो गया और हंसते हुए पूछा, ‘क्या तुम्हें भी सोने की जरूरत है? जाओ, तोप में सो जाओ! तब तक मैं तुम्हारा काम करूंगा।’ सिपाही ने अनुग्रहीत होकर बादषाह से कहा, ‘नहीं, फिलहाल जरूरत नहीं।’

    मतलब यह है कि जो लोग जिम्मेदारी के काम पर हैं उन्हें आराम भी एक कर्तव्य होना चाहिए। अगर हम चाहते हैं कि पण्डित नेहरू दीर्घ काल तक हमारे बीच रहें, तो उनके लिए विश्राम का नियम बना देना अनुचित न होगा।

    इसी दृष्टि से, हम पण्डित नेहरू द्वारा दून घाटी में विश्राम का स्वागत करते हैं। प्रकृति से सम्पर्क, उसके उत्फुल्ल सौन्दर्य से साक्षात्कार उन्हें निःसन्देह ताजा बना देगा और उनकी रूह में नयी ताकत फूंक देगा। लेकिन नेहरू के उत्साही पुजारियों ने यहां भी उन्हें नहीं छोड़ा, और उन्हें कष्ट देने का पूरा सामान तैयार कर लिया। मसूरी में देश के विभिन्न डेवलपमेण्ट कमिश्नरों का जो एक सम्मेलन होने जा रहा है, उसमें पण्डित नेहरू का भाषण भी आयोजित किया गया है। मतलब यह कि नेहरूजी को पूरा एक हफ्ता भी शान्ति का नहीं मिलेगा। वे इस गुरुवार को दून घाटी गये, तो उन्तीस तारीख को मूसरी पहुंचकर एक भाषण देंगे। क्या इस कार्यक्रम की बहुत आवश्यकता थी?

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