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  • कितना प्यार करता हूँ मैं इण्डियन फ़िल्म्स से!  

     

    एक उभरते हुए रूसी बाल-साहित्यकार हैं- सिर्गेइ पिरिल्यायेव उन्हें भारत और भारतीय फिल्मों से दीवानगी की हद तक प्यार है। अपनी जीवनी भी उन्होंने इण्डियन  फिल्म्स ” नाम से लिखी है। उसी किताब से एक अंश जिसका अनुवाद किया है आ. चारुमति रामदास

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    पहली इण्डियन फ़िल्म, जो मैंने देखी, वो थी फ़िल्म सम्राट’. फिल्म देखने के बाद मैं लड़खड़ाते हुए, खुले हुए मुँह से, अपने चारों ओर की कोई भी चीज़ न देखते हुए और लगातार गलत जगह पर मुड़ते हुए घर जा रहा था और क्वार्टर के अंदर जाते ही मैंने कहा:

    “तोन्, क्या तुझे पता है, कि हिटलर से भी ज़्यादा बुरा कौन है?”

    “अरे,” तोन्या नानी ने अचरज से पूछा, “ये हिटलर से भी ज़्यादा बुरा आख़िर कौन है?”

    कुछ देर चुप रहने के बाद और हौले-हौले दूर के मुम्बई से घर आते हुए, मैंने कहा:

    “बॉस.”

    बेशक! वो हिटलर से कई गुना बुरा है, क्योंकि उसने कैप्टेन चावला को कई सालों तक तहख़ाने में कैद करके रखा था. कैप्टेन चावला अकेला ही ऐसा आदमी था, जो उस जगह को जानता था, जहाँ उसने सोने से लदे हुए जहाज़ सम्राटको समंदर में डुबाया था! और डुबाया भी उसी बॉस की आज्ञा से था! और अगर फिल्म के ख़ास हीरो राम और राज न होते, तो न जाने और कितने साल वो बुरे काम करता रहता!

    मैं व्लादिक को विस्तार से सम्राटकी कहानी सुनाता हूँ, और हमने फ़ौरन उसे देखने का फ़ैसला कर लिया. व्लादिक को भी फ़िल्म बहुत अच्छी लगती है, मगर सिर्फ जब हम थियेटर से बाहर निकल रहे थे, तो उसने कहा, कि आख़िर में बॉस पे सिर्फ तीन गोलियाँ चलाई गई थीं, न कि बीस, जैसा मैंने उसे बताया था. मगर मुझे लगा था, कि बीस थीं!

    और उसके बाद मैंने लगातार एक के बाद एक “तकदीर”, “जागीर”, हुकूमत”, “शोले”, “मुझे इन्साफ़ चाहिए!” – ये फ़िल्में देखीं और अब मुझे मालूम है, कि वो, जो “सम्राट” में राम का रोल कर रहा था, – वो एक्टर धर्मेंद्र है, “शोले” में वो वीरू का रोल कर रहा था, और वो जो बॉस बना था, – वो अमजद ख़ान है, वो “शोले” में वैसे ही घिनौने आदमी का रोल कर रहा था, सिर्फ इस बार उसका नाम है गब्बर सिंग. फिर मैंने “शक्ति”, “ख़ुद्दार ”, “मुकद्दर का सिकंदर”, “त्रिशूल”, “जंज़ीर” देखी और मैं अमिताभ बच्चन से प्यार करने लगा, जो इन सभी फ़िल्मों में और, “शोले” में भी, प्रमुख रोल करता है, और सभी में उसका नाम विजय ही है. अगर मुझे कभी लड़का हुआ, तो मैं उसका नाम भी विजय ही रखूँगा, अमिताभ के सम्मान में.

    फिर थियेटर्स में राज कपूर की “आवारा” और “डिस्को डान्सर” दिखाई जाती हैं. मेरे लिए इण्डिया, दो सिरीज़का मतलब है, कि मुझे जाना ही पड़ेगा, क्योंकि फ़िल्म अच्छी ही होगी, और मैं फ़ौरन ये दोनों फ़िल्में देखने के लिए लपकता हूँ. “आवारा” तो मुझे बेहद पसंद है. मगर चार बार “डिस्को डान्सर” देखने के बाद (उसमें हीरो है मिथुन चक्रवर्ती – ये वो ही है, जिसने “जागीर” में फ़ैक्ट्री मालिक रणधीर के छोटे भाई का रोल किया था) मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ, कि जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तो एक्टर ही बनूँगा, और “डिस्को डान्सर-2” में काम करूँगा, मिथुन चक्रवर्ती के साथ. और, अचानक “डिस्को डान्सर – 2” आ जाती है! मगर इस फ़िल्म का नाम है “डान्स डान्स!” मुख्य रोल भी मिथुन चक्रवर्ती ने ही किया है, डाइरेक्टर भी वो ही बब्बर सुभाष है, वो ही ऑपरेटर राधू करमाकर है, वो ही म्यूज़िक डाइरेक्टर बप्पी लहरी है! जब मैंने वर्कर्स वेमें सव्रेमेन्निकथियेटर की अनाउन्समेन्ट और ये वाक्य देखा: “…फिल्म “डिस्को डान्सर” के चाहने वाले सोवियत फ़ैन्स के लिए”, तो पाँच मिनट के लिए मैं जैसे ख़ुशी से मर ही गया. और न जाने क्यों ये भी ख़ास तौर से अच्छा लगा कि “डिस्को डान्सर” को सिर्फ मैं ही नहीं, बल्कि सभी सोवियत दर्शक पसंद करते हैं!

    फिर एक समय ऐसा भी आता है, जब हमारे शहर के थियेटर्स में इण्डियन फिल्म्स आती ही नहीं हैं. तब मैं ‘09’ इस नंबर पे शहर के सिनेमा-डिस्ट्रीब्यूटर ऑफ़िस में फ़ोन करता हूँ, और पूछता हूँ, कि क्या कोई नई इण्डियन फ़िल्म दिखाई जाने वाली है. मुझे जवाब मिलता है कि जल्दी ही फ़िल्म “प्यार करके देखो” आने वाली है और रिसीवर रख देते हैं. मैं पूछ भी नहीं पाता कि फ़िल्म में कौन-कौनसे एक्टर्स हैं.  फिर से फ़ोन करता हूँ, पूछता हूँ, कि फ़िल्म “प्यार करके देखो” का हीरो कौन है. मुझे मालूम तो होना चाहिए ना कि किसे पसंद करूँ और किस पर यकीन करूँ! उन्हें बहुत अचरज होता है, कि मुझे इस बात में दिलचस्पी है, मगर फिर भी टेलिफ़ोन वाली औरत ने हँसकर कहा, कि जब फिल्म दिखाई जाएगी, तो मुझे पता चल जाएगा, कि उसमें कौन-कौन काम कर रहा है. मगर मुझे उसका लहजा अच्छा नहीं लगा. मैं फिर से फोन करता हूँ, और आवाज़ बदलकर पूछता हूँ, कि कहीं किसी थियेटर में “डिस्को डान्सर” तो नहीं दिखाने वाले हैं. मुझे मरियलपन से जवाब मिलता है, कि नहीं दिखाएँगे.

    जब अगली सुबह मैं फिर से हमारे शहर के थियेटरों में इण्डियन फ़िल्म्स दिखाने के बारे में फ़ोन करता हूँ, तो वो लोग मुझे पहचान लेते हैं:

    “दोस्त, तू क्या नींद में भी सोच रहा था, कि कहाँ फ़ोन करना है?”

    अब मैं उन्हें फोन नहीं करता. अच्छा नहीं लगता. मगर, ये मैं उनका दोस्त कैसे हो गया?!

     

     किस्सा मेरा नाम जोकर…का                 

    इण्डियन फ़िल्म्स की तरह नास्त्या भी पहली ही नज़र में पसंद आ गई. पहले तो हमारे बीच सब कुछ बड़ी अच्छी तरह चल रहा था, मगर फिर (वो भी, शायद पहली ही नज़र में) नास्त्या को पुरानी इण्डियन हिंदी फ़िल्म मेरा नाम जोकर पसंद नहीं आई. और हम अलग हो गए.

    ये सब ऐसे हुआ.

    नास्त्या मेरे घर आई, हमने कॉफ़ी पी, और मैंने कोई फ़िल्म देखने का सुझाव दिया. जैसे, ‘मेरा नाम जोकर’.

    “चल, देखते हैं,” नास्त्या ने कहा.

    मैंने कैसेट लगाई, और स्क्रीन पर दिखाई दिया: राज कपूर फ़िल्म्स प्रेज़ेन्ट्स. मेरी आँखों में आँसू आ गए और सर्कस के अरेना में रंगबिरंगी रिबन्स के, गुब्बारों के शोर के बीच जोकर की ड्रेस में राज कपूर निकला. उसके पास फ़ौरन सफ़ेद एप्रन पहने, हाथों में कैंचियाँ लिए कई सारे लोग भागते हुए आए.

    “आपके दिल का फ़ौरन ऑपरेशन करना पड़ेगा, ”  उन्होंने कहा.

     “क्यों?” राज कपूर ने पूछा.

     “क्योंकि, इतने बड़े दिल के साथ, जैसा आपका है, ज़िंदा रहना बेहद ख़तरनाक है,” उन्होंने कहा, “क्योंकि इतना बड़ा दिल तो दुनिया में किसी के भी पास नहीं है! सोचिए, क्या होगा, अगर आपके दिल में पूरी दुनिया समा जाए?!”

    और राजकपूर गाना गाने लगा. मैं ये भी भूल गया कि मेरी बगल में नास्त्या बैठी है. उत्तेजना के कारण मेरे दाँत कस कर भिंच गए थे, और मैंने दाएँ हाथ से बाएँ हाथ की कलाई इतनी कस के पकड़ रखी थी, कि उसमें दर्द हो रहा था.

    पहला आधा घण्टा तो नास्त्या बिना किसी भावना के देखती रही. फिर वो हँसने लगी. राजकपूर की मम्मा मर रही है, वो उसी शाम अरेना में निकलता है और बच्चों को हँसाता है, और शोके बाद काला चश्मा पहन लेता है, जिससे कि कोई उसके आँसू न देख सकेऔर नास्त्या हँस रही है!

     “ओय, चश्मा कैसा है उसका – एकदम सुपर! – वो कहती है.

     “नास्त्या,” भिंचे हुए दाँतों के बीच से मैं तिलमिलाता हूँ, “ये फिल्म सन् सत्तर की है!”

    मगर नास्त्या को इससे कोई फ़रक नहीं पड़ता था कि फ़िल्म कौन से सन् की है. जब राज कपूर ने अपने सामने पुराने चीथड़ों से बना गुड्डा-जोकर रखा और स्कूल टीचर के साथ अपने पहले नाकामयाब प्यार के बारे में बताने लगा, तो मुझे नास्त्या की तरफ़ देखने में भी डर लगने लगा. मैं सिर्फ हँसी दबाने की उसकी ज़बर्दस्त कोशिशें ही सुन रहा था.

    करीब बीस मिनट तक हम तनावपूर्ण ख़ामोशी के बीच फ़िल्म देखते रहे. नास्त्या ने अपने गालों को हाथ से पकड़ रखा था, और वो कोशिश कर रही थी कि परदे की तरफ़ न देखे. मुझे अपने भीतर ऐसी ताकत महसूस हो रही थी, कि जैसे मैं अपनी नज़र से हमेशा के लिए सूरज को बुझा दूँगा. राज कपूर समन्दर के किनारे पर किसी कुत्ते को सहला रहा था.

    “सिर्योग, क्या ये फ़िल्म बहुत देर चलेगी?” आख़िर नास्त्या ने पूछ ही लिया.

    जैसे मुझे चिढ़ाने के लिए रिमोट भी कहीं गिर गया था. फिर मैंने उसे ढूँढ़ा, कैसेट रोक दिया, उसे वीड़ियो-प्लेयर से बाहर निकाला, उसे डिब्बे में रख दिया और डिब्बे से नज़र हटाए बिना धीरे-धीरे कहा:

     “सोवियत बॉक्स ऑफिस में ये फ़िल्म दो घण्टे से कुछ ज़्यादा की थी. मगर, मेरे पास – पूरी, ओरिजिनल फ़िल्म है. तीन घण्टे चालीस मिनट की.”

    “बड़ी तकलीफ़देह बात है,” नास्त्या ने कहा.

    “तकलीफ़देह,” मैंने दुहराया और मेज़ पर कोई ताल देने लगा.

    “सिर्योग,” नास्त्या ने भँवें चढ़ाईं, “क्या तुझे भी ये सब मज़ाकिया नहीं लगता? देख, कैसा है वो, बूढ़े ठूँठ के जैसा, मगर जा रहा है, जा रहा है, अपने लिए दुल्हन ढूँढ़ रहा है! और जब सब उसे निकाल देते हैं, तो वो बैठा-बैठा अपने गुड्डे से शिकायत करता है!”

    “नहीं,” मैंने कहा, “मुझे इसमें कोई मज़ाक नज़र नहीं आता.”

    बकवास,” नास्त्या ने कहा. “ चल, इससे अच्छा, मैं कोई म्यूज़िक लगाती हूँ.”

    मैंने मेज़ से लाइटर उठाया, उसे क्लिक किया और लौ की ओर देखता रहा.

     “म्यूज़िक तो तू कभी भी लगा सकती है. मगर फ़िल्म मेरा नाम जोकरतो तुझे दुनिया का कोई भी नौजवान नहीं दिखाएगा.”

    “थैन्क्स गॉड,” नास्त्या हँस पड़ी.

    इसके बाद हम कभी भी एक दूसरे से नहीं मिले.

    जाते जाते नास्त्या ने यकीन से कहा, कि पहले मैं ही उसे फ़ोन करूँगा. मगर मैंने फ़ोन नहीं किया. कुछ ही दिन पहले मैं आन्या से मिला. मैं उसे मेरा नाम जोकरनहीं दिखाऊँगाउसे मैं श्री 420दिखाऊँगा. उसमें राजकपूर काफ़ी जवान है, और गाने भी बढ़िया हैं.

    मैं तोन्या नानी के साथ देर शाम को, करीब-करीब रात ही को समर कॉटेज से लौट रहे हैं. जून का महीना है. अंधेरा होने लगा है, हालाँकि इस समय सबसे लम्बे दिन होते हैं. गंधाती नदी को पार करके पहाड़ी से नीचे उतरते हैं और देखते हैं कि हमसे मिलने नानू आ रहे हैं, जो घर पे नहीं रुक सके, क्योंकि परेशान हो रहे थे: ख़बरों के प्रोग्राम व्रेम्यामें घोषित किया गया था, कि सबसे भयानक तूफ़ान आ रहा है. नानू ने कई बार कहा, कि हम पगला गए हैं, वर्ना ग्यारह बजे तक बगिया में न बैठे रहते, और जैसे ही नानी उन्हें जवाब देती, वो तूफ़ान आ ही गया. बिजली, कड़कड़ाहट, तूफ़ान, हर चीज़ थरथरा रही थी, और मुझे डर भी लग रहा था और ख़ुशी भी हो रही थी, और एक सेकण्ड बाद हमारे बदन पर कुछ भी सूखा नहीं बचा था.

    मिलिट्री एरिया की संकरी पगडंडियों से होकर हम एक झुण्ड में भागते हैं; तोन्या नानी और नानू ठहाके लगा रहे हैं, ये देखकर कि मैंने कैसे अपनी सैण्डल्स उतारीं और मोज़े भी उतार दिए और डबरों में छप्-छप् कर रहा हूँ, और उन्हें हँसाने में मुझे खुशी भी हो रही है; मैं डान्स करने लगता हूँ और ज़ोर-ज़ोर से “डिस्को डान्सर” का अपना पसंदीदा गाना गाने लगता हूँ: “गोरों की ना कालों की-ई-ई! दुनिया है दिलवालों की. ना सोना-आ! ना चांदी-ई! गीतोंसे-ए, हम को प्या-आ-आ-र!!!” (गीत का मतलब इस तरह है – चाहे खाने-पीने के लिए हमारे पास पैसा न हो, मगर आज़ादी और गीत – यही मेरी दौलत है). जब हम अपने कम्पाऊण्ड में आ जाते हैं, तब भी मैं गाता रहता हूँ, मगर इतनी ज़ोर से, कि पडोसी भी खिड़कियों से झाँकने लगते हैं; मगर मुझे इससे कोई फ़रक नहीं पड़ता – बल्कि और ज़्यादा गाने और डान्स करने का मन करता है.

    घर में हम यूडीकलोन से नहाएँगे, जिससे कि बाद में बीमार न हो जाएं, फिर हम पैनकेक्स खाएँगे, जिन्हें बनाने का परनानी नताशा ने सुबह ही वादा किया था, और कल होगा सण्डे, व्लादिक आएगा और हम पढ़ाई के अलावा कुछ और चीज़ के बारे में सोचेंगे, जैसे बौनों का बिज़नेस करना या नॉवेल्स लिखना…

    और कुछ महीनों बाद मैं हमेशा के लिए स्मलेन्स्क से चला जाऊँगा, जहाँ ये सब हुआ था, जिसके बारे में मैंने आपको बताया है. एक नई ज़िंदगी शुरू होगी, नए हीरोज़ के साथ, नए कारनामों के साथ, जिनके बारे में मैं यहाँ नहीं बताना चाहता, क्योंकि उनके लिए दूसरी किताब की ज़रूरत है. हो सकता है, वो ज़्यादा गंभीर, ज़्यादा दुखी हो…और ये वाली, अगर ये हँसाने वाली, ख़ुशी देने वाली बनी हो, तो इसे यहीं ख़तम करना अच्छा है. उम्मीद करूँगा, कि दुबारा ऐसा वक्त आएगा, जब हम ख़ुशी-खुशी सिनेमा थियेटर्स में जाएँगे और इण्डियन फिल्म्स देखेंगे. तब मैं नए इण्डियन एक्टर्स से भी उसी तरह प्यार कर सकूँगा, जैसे मैंने मिथुन चक्रवर्ती और अमिताभ बच्चन से किया था, और फिर से बारिश में नंग़े पैर डान्स करते हुए, इण्डियन गाने गाऊँगा, पड़ोसियों को अचरज से अपनी-अपनी खिड़कियों से बाहर झाँकने दो और आश्चर्य करने दो – उसी तरह, जैसे कई साल पहले हुआ था…

     

     

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