आज मातृभाषा दिवस है. समझ में नहीं आ रहा है कि किस भाषा को मातृभाषा कहूं- बज्जिका को, जिसमें आज भी मैं अपनी माँ से बात करता हूँ. नेपाली को, नेपाल के सीमावर्ती इलाके में रहने के कारण जो भाषा हम जैसों की जुबान परअपने आप चढ़ गई. भोजपुरी को, बचपन में आरा में रहने के कारण जो भाषा आज भी मैं फर्राटे से बोल लेता हूँ. मैथिली को, जो मेरी पहली प्रेमिका की भाषा थी. मुझे आज भी इतनी भाषाओं को छोड़कर हिंदी को अपनी मातृभाषा कहने में तकलीफ होती है.
वसुधा डालमिया ने भारतेंदु हरिश्चन्द्र पर लिखी अपनी किताब में यह लिखा है कि 19 वीं शताब्दी के आरम्भ में जब हिंदी भाषा बनाई गई और उसने पढ़ाई-लिखाई शुरू हुई तो उस दौर में अंग्रेज पादरियों, धर्म प्रचारकों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल यही थी कि वे हिंद की भाषा को सीख लेने के बावजूद गाँव-देहातों में लोगों से संवाद नहीं कर पा रहे थे. वे गाँवों से लौटकर आते थे तो यही कहते थे कि यह जो हिंदी है न यह किसी की भाषा है ही नहीं.
जो किसी की भाषा थी ही नहीं, आज भी नहीं है लेकिन उसे मातृभाषा कहना पड़ता है यही बड़ी तकलीफ की बात है. बावजूद इसके कि मैं हिंदी का लेखक हूँ, बज्जिका का नहीं, मैं हिंदी का प्राध्यापक हूँ, हिंदी का पत्रकार रहा हूँ. लेकिन आज भी आत्मीयता की भाषा मेरे लिए हिंदी नहीं है. वह बज्जिका है. मुझे सबसे तकलीफ आज भी इससे होती है जब अपने भाई, अपने पापा, अपने गाँव के किसी बिछड़े मित्र से हिंदी में बात करनी पड़ती है. लगता है कि दूरी आ गई है. अभी कल ही मेरे गाँव के मेरे खानदानी लोहार के बेटे ने मुझे फेसबुक पर 30 साल बाद ढूंढ निकाला. बचपन में वह मेरा थोड़ा दोस्त टाइप भी था. लेकिन उसने जब मैसेंजर में मुझे अच्छी हिंदी में मैसेज किया और यह बताया कि वह पिछले 20 साल से जालंधर में रह रहा है और उसे सबसे अधिक दुःख इस बात का है कि उसके बच्चे अपने गाँव की भाषा नहीं सीख पाए. सच बताऊँ तो हिल गया. अन्दर से. याद आया कि मेरी बेटी को भी बज्जिका नहीं आती.
असल में हिंदी अपनाने के बाद हम जैसे लोग अपनी बोलियों से दूर होते गए, अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के नजदीक होते चले गए. इसका सबसे अच्छा उदाहरण समकालीन हिंदी कविता में दिखाई देता है. इस समय जो हिंदी के श्रेष्ठ कवि हैं उनकी कविता में विश्व की श्रेष्ठ कविता की झलक तो मिल जाती है लेकिन अपनी बोलियों का कोई सुराग नहीं मिलता.
सच बताऊँ तो इतनी भाषाओं को छोड़कर एक भाषा हिंदी से जुड़ने के कारण मैं अपनी जड़ों से कट गया. हिंदी रोजगार की भाषा है, राजनीति की भाषा है, सत्ता की भाषा बनने की लड़ाई लड़ रही है. आज दुनिया की सबसे बड़ी भाषाओं में एक मानी जाती है. लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि एक हिंदी भाषा के लिए कितनी बोलियों को अपनी-अपनी अलग पहचान की कुर्बानी देनी पड़ी है.
मैं जब हिंदी को अपनी मातृभाषा या राष्ट्रभाषा कहता हूँ तो मुझे अपनी भाषा बज्जिका की कुर्बानी याद आती है. आज भी, हिंदी में लगभग 20 साल का पेशेवर जीवन गुजारने के बाद, इस भाषा से एक पहचान बनाने के बाद भी इसको मातृभाषा नहीं कह सकता.
बज्जिका मेरा देस है हिंदी परदेस!
-प्रभात रंजन
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