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अखिलेश के उपन्यासों के केंद्र में बेदखल होता मनुष्य है

 

कल मैंने एक आत्ममुग्ध लेखिका का यह वक्तव्य पढ़ा कि अखिलेश का उपन्यास ‘निर्वासन’ हिट नहीं हुआ. मुझे हैरानी हुई कि क्या साहित्यिक कृतियाँ, गंभीर साहित्यिक कृतियाँ हिट या फ्लॉप होती हैं? क्या साहित्यिक कृतियों का मूल्यांकन इस तरह से किया जाना चाहिए? यह गंभीर बात है कि किस तरह से कोई लेखक या लेखिका हिट-फ्लॉप के आधार पर अपनी रचना को देख-परख रहा है. कभी कभी कई कृतियाँ जिनकी किसी समय किसी कारण से बहुत चर्चा होती है समय के साथ वे कूड़ेदान में भी नहीं दिखाई देती हैं. अखिलेश जैसे लेखकों ने एक पीढ़ी की रचनाशीलता को संवारा है. उनकी रचनाएं समय के साथ अपनी प्रासंगिकता को बरकरार रखेंगी. बहरहाल, अखिलेश के उपन्यासों पर पढ़िए युवा कवि-लेखक हरे प्रकाश उपाध्याय का यह जरूरी लेख- प्रभात रंजन

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नौवें दशक के कथाकार अखिलेश  के अब तक दो उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। दोनों ही उपन्यासों के नायक या कहें केंद्रीय चरित्र बेरोजगारी और बेदखली से जूझते मध्यवर्गीय युवक हैं जो व्यवस्था से विद्रोह करते हैं और अपने दौर के समकालीन यथार्थ से टकराते हैं। इस प्रक्रिया में भारतीय समाज और व्यवस्था से जुड़े बहुत सारे प्रश्न उठते हैं, जो पाठकों पर दूरगामी असर छोड़ते हैं। हम जिस समाज में जी रहे हैं, वह लैंगिक, जैविक, आर्थिक आधारों पर विभाजित है और कुल मिलाकर एक सामंती व्यवस्था वर्चस्व बनाये हुए है, यही हाल शासन-प्रशासन का भी है, वक्त बदलता रहता है, पर समाज की रूढ़ियाँ इतनी मजबूत हैं कि उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता। इससे सर्वाधिक टकराव हर दौर में युवा पीढ़ी का ही होता है। अखिलेश के दोनों उपन्यासों के बीच दशक-डेढ़ दशक का फर्क है, मगर बुनियादी समस्याएं हल होने की जगह कैसे और जटिल होती गयी हैं, इसको समझने के लिए दोनों उपन्यासों को एक साथ पढ़ना उपयोगी है।

बेरोजगारी का मार्मिक आख्यान

कथाकार अखिलेश का पहला उपन्यास ‘अन्वेषण’ दरअसल भयावह बेरोजगारी और करियरवाद के बीच व्यवस्था से जूझते उस संघर्ष और सरोकार की तलाश की कोशिश है, जो कहीं दीप्त तो अपनी पूरी आभा के साथ है मगर उसके लापता हो जाने का खतरा सामने पेश है। ध्यान देने की जरूरत है कि यह उपन्यास नब्बे के आसपास लिखा गया है और प्रकाशित हुआ है, जब एक तरफ आर्थिक उदारवाद, भूमंडलीकरण आदि का शोर तेजी से उभरता है और नये तरह का कैरियरवाद युवाओं के बीच जगह बनाने लगता है, वही हाशिये पर धकेल दिये गये वंचित व संघर्षरत लोगों की तरफ से उठने वाली आवाजें कमजोर पड़ने लगती हैं, बिखरने लगती हैं, लापता होती सी लगती हैं। सामानांतर रूप से बेरोजगारी भी तेजी से बढ़ रही है। पढ़े-लिखे युवाओं के सुरक्षित भविष्य पर खतरा मंडराता हुआ साफ दिखाई पड़ रहा है। साधारण आदमी के जीवन की जद्दोजहद और जटिल होती महसूस हो रही है। किस तरह व्यवस्था लगभग एक ही वर्ग के युवाओं के बीच भयानक खाई पैदा कर देती है, उन्हें आपस में शत्रु बनाकर छोड़ती है, इसका बड़ा ही मार्मिक वर्णन इस उपन्यास में देखने को मिलता है। जो नवयुवक प्रशासनिक सेवा के लिए चुन लिया गया है, उसके लिए बेरोजगार या साधारण लोगों के पक्ष से उठ खड़ा होने वाला युवक शत्रु जैसा लगता है। हालत यह है कि आपस में वे फूटी आँख नहीं सुहाते। इन सबके बीच जो स्त्रियाँ हैं, वे नियति की शिकार हैं। वे नियतिवश किसी पक्ष के साथ बँध गयी है या बाँध दी गयी है और तमाम झंझावात व दुःख उठाते हुए जी रही हैं। वह चाहे कम पढ़े-लिखे मकान मालिक की औरत हो या प्रशासनिक अधिकारी सुरेंद्र की बीवी विनीता। दोनों अपने-अपने पति से मार खाती हैं और परिवार का सामंजस्य बनाये रखना चाहती हैं। उनके लिए इस जकड़न से बाहर आ पाना आसान नहीं है और वे समझौते का जीवन जी रही हैं। ऐसा नहीं है कि वे हालात से अचेत हैं या कि परिस्थितियों को समझ नहीं पा रही हैं मगर वे जिस सिस्टम में है, जिस समाज व व्यवस्था में हैं, उसमें उनके लिए विद्रोह का रास्ता लगभग आत्मघाती है। यह उपन्यास हमारे मध्यवर्गीय समाज में स्त्रियों की जो हालत है, उसको भी बखूबी उकेरता है। इस उपन्यास में जो एक हत्या होती है, वह एक स्त्री की हत्या है। वह मध्यवर्गीय परिवार की एक धर्मभीरू स्त्री है जो पति की कुंठाओं की भेंट चढ़ जाती है मगर उफ् तक नहीं करती। उपन्यास में एक माँ का जिक्र है, जो दरअसल सूत्रधार की माँ है, उसके माध्यम से भी मध्यवर्गीय परिवार में स्त्री के हालात की एक अलग दास्तान उजागर होती है।

  यह उपन्यास प्रमुखतः बेरोजगारी की समस्या को जिस आवेग से उठाता है, वह झकझोर देने वाला है। एक ऐसा युवक जो उच्च शिक्षित है, प्रतिभावान है मगर किन्हीं कारणों से नौकरी नहीं पा सका है और उसकी नौकरी पाने की उम्र गुजर चुकी है, उसके लिए बेरोजगारी क्या चीज है, इस बात को दूसरा कोई नहीं समझ सकता। वह किस तरह अपने जीवन को शर्म की तरह जीता है, इसका बड़ा ही सांगोपांग चित्रण अखिलेश ने अपने इस उपन्यास में किया है। उसके जीवन की असुरक्षा व निराशा को उपन्यास के सूत्रधार के माध्यम से अखिलेश ने व्यक्त किया है- “मैं रात को सो नहीं पाता था। सोता तो चौंक कर जाग जाता। मुझमें असुरक्षा की बरसात में डर और निराशा के मेढक उछल-कूद करते। कभी-कभी रात-रात भर जागता और पसीना-पसीना हो जाता।“ हर आदमी उस नवयुवक को संदेह की नज़र से देखता है, हर नज़र और संवाद उसे अपमानित करते से लगते हैं। हमेशा उसके आत्मसम्मान व आत्मविश्वास को ठेस लगती रहती है। भला इस तरह का युवा अपने भीतर यौवन, जज्बे व जोश को कैसे बरकरार रख सकता है। यह कोई काल्पनिक स्थिति नहीं है, यह हमारे समाज की तीखी सच्चाई है। हमारे देशकाल के बहुत सारे युवा इस विडंबना के शिकार हैं, इससे जूझ रहे हैं। इस उपन्यास का सूत्रधार भी एक ऐसा ही युवक है जो इन स्थितियों में भरी जवानी में अपने भीतर निस्तेज व निशक्तता को महसूस करता है। वह कहता है, “सुबह आँख खुलने पर कायदन मुझे स्फूर्त और चैतन्य होना चाहिए था, लेकिन मैं पाता, पूरे बदन में सुस्ती हिल रही है। शरीर में रक्त संचार बेहद मद्धिम हो गया है। मुझे महसूस होता, कमर जकड़ी है और मैं बेहद थका हूँ। मैं उठकर बैठता लेकिन खड़ा होने पर लगता, चक्कर खाकर गिर जाऊँगा, इसलिए फिर चरपाई पर बैठ जाता और फिर लेट जाता था।“ एक बेरोजगार मध्यवर्गीय युवक को जिसे नौकरी मिलने की कोई उम्मीद भी नहीं है, जिसको लेकर परिवार की अपेक्षाएं जुड़ी हुई हैं और नाउम्मीदी हर पल जिस पर हमले कर रही है, उसके जीवन में भला उत्साह आये तो कहाँ से आये…? वह स्वीकार करता है, “…जब भी मुझमें बेरोजगारी और उम्र के इस पड़ाव का विचार घूँसा मारता है, मैं इसी तरह जड़ एवं हत्बुद्धि हो जाता हूँ। “

    बेरोजागार व्यक्ति की नियति यह है कि लोग या तो उससे दूरी बनाने लगते हैं, उसकी उपेक्षा करने लगते हैं, उसकी क्षमताओं पर संदेह करने लगते हैं या उस पर अतिरिक्त दया दिखाने लगते हैं। ये सारी परिस्थितियाँ अमानवीय हैं, उस व्यक्ति के मनोविज्ञान को झिंझोड़ डालने वाली। इस उपन्यास के सूत्रधार या नैरेटर बेरोजगार युवक का मकान मालिक जो खुद ही हीन भावना से ग्रस्त है, एहसासे कमतरी का शिकार है और अपनी बीवी को बेवजह पीटता रहता है, वह भी उस युवक पर दया दिखाने की कोशिश करता है। नैरेटर कहता है- “ मेरा मकान-मालिक खिचड़ी बालों वाला नाटे कद का एक मोटा इन्सान है जिसकी एक आँख टेढ़ी है। मैं प्रायः जैसे भी हो, उसका किराया समय पर चुकाने में सफल होने की कोशिश करता हूँ। उससे खाने-पीने की कोई चीज़ कभी उधार नहीं लेता, फिर भी वह मुझसे इस तरह पेश आता है कि मुझ पर दया कर रहा है। मैं उसकी दया को नापसंद करता हूँ लेकिन वह जबरदस्ती मुझ पर दया करता है, हालाँकि मैं किसी की भी दया को नापसंद करता हूँ। “ बेरोजगार व्यक्ति का भी कोई स्वाभिमान हो सकता है, इस बात को बहुत कम लोग समझ पाते हैं। मकान मालिक दया ही नहीं दिखाता, बल्कि वह उस युवक पर संदेह भी करता है, उसको लगता है कि यह हरदम शराब पिये रहता है। जबकि यह वही युवक है जो पढ़ाई के दौरान अपने दोस्तों में अपनी क्षमताओं का लोहा मनवाता रहा है- “ एक वक्त था कि मेरे दोस्तों ने मेरे बारे में मशहूर किया था कि मैं जीवन के किसी भी इलाके में प्रवेश करूँ, सफलता कदम चूमेगी। सचमुच, मेरे मित्रों का दावा था कि मैं चाहूँ तो बहुत बड़ा लेखक बन सकता हूँ, मैं चाहूँ तो बहुत बड़ा अफसर बन सकता हूँ। मैं चाहूँ तो बहुत बड़ा स्मगलर बन सकता हूँ। मैं चाहूँ तो बहुत बड़ा अभिनेता बन सकता हूँ। मैं जो भी चाहूँ, बन सकता हूँ। लेकिन मैं अपने किराये के कमरे की चारपाई पर निरर्थक मनुष्य की तरह लेटा हुआ हूँ।” यह अनायास नहीं है कि एक जगह यह युवक कहता है- “ मैंने सड़क से यूनिवर्सिटी पर निगाह डाली, वह हत्यागृह लगी।” यह हमारी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था पर सबसे कठोर टिप्पणी है, जो लगातार बरोजगारों की फौज उत्पादित कर रही है। यह व्यवस्था क्षमता के हिसाब से लोगों को काम नहीं देती, उस हिसाब से लोगों को तैयार नहीं करती, बल्कि उन्हें एक निरर्थक मनुष्य में बदल देती है, नक्कारा बनाकर छोड़ देती है। सूत्रधार का दोस्त राघव उससे ठीक ही कहता है, “तुम या मैं या तुम्हारे और मेरे जैसे बहुत से नवयुवकों के बीते हुए कल में कोई तैयारशुदा फसल नहीं होती और जब जवान होकर हम फसल उगाने लायक होते हैं, हाथ-पाँव-दिमाग के रूप में हमारे पास हल-फावड़े-बीज होते हैं तो धूप-जल-खुराक नहीं मिलती। हालाँकि ये बिकाऊ हैं और कोई भी इनको खरीद सकता है पर हममें खरीद सकने की सामर्थ्य नहीं। क्योंकि हमारे बीते हुए कल में सुखों की कोई तैयारशुदा फसल नहीं होती। हमारे पास धन नहीं होता। हमारे पास शक्ति नहीं होती। हमारे पास कुछ भी नहीं होता।”

 एक बेरोजगार नवयुवक के मनोविज्ञान को यह उपन्यास जिस तरह सामने लाता है, उस तरह की रचना हिंदी में बहुत कम दिखाई पड़ती है। बेरोजगारी जैसी भयावह समस्या को लेकर हिंदी में वैसे भी बहुत गंभीरता से सोचा नहीं गया है, कुछ गिनी-चुनी कहानियों में इसका जिक्र है, जबकि यह समस्या हमेशा से रही है और अब तो और विविध आयामी व व्यापक होती चली जा रही है। एक परिवार के भीतर या समाज के सामने बेरोजगार नवयुवक खुद को किस तरह पाता है, किस तरह वह सबसे बचते हुए अपने अकेलेपन की तलाश करता है, किस तरह वह परिवार और समाज की हर समस्या के लिए खुद को जवाबदेह समझने लगता है, इसका बहुत मार्मिक चित्रण उपन्यास में हुआ है। चाहे माँ-पिता हों या दोस्त हों या प्रेमिका हो, किसी के भी सामने बरोजगारी का दंश सहज नहीं रहने देता। वह हर तरह के आस्वाद व सौंदर्यबोध को रौंद डालता है। समाज में जो तरह-तरह के अपराध जन्म लेते हैं और विस्तार पाते हैं, उसके पीछे या उसकी जड़ में बेरोजगारी जैसी समस्या का बहुत बड़ा हाथ है।

  बेरोजगार होने के कारण इस उपन्यास का सूत्रधार अपनी प्रेमिका तक को खो देता है, उसकी शादी एक अधिकारी से कर दी जाती है। अपनी बेरोजगारी के कारण वह नवयुवक अपने माँ-बाप तक से नज़रें चुराता है, वह शहर से लंबे-लंबे समय तक अपने घर नहीं जाता, जाना नहीं चाहता। वह दोस्तों तक से नहीं मिलना चाहता। उसकी सारी जीवंतता, सारी प्रतिभा कुंद होती जा रही है। वह एक जगह आत्ममंथन कर रहा है- “ताज्जुब है,  कभी मैं कितना मुखर और जिंदादिल था ! मैं दोस्तों का दोस्त और दुश्मनों का दुश्मन था। मेरे ठहाके विख्यात थे और रात-रात भर की मेरी गप्पें कुख्यात। लेकिन अब मैं अन्तर्गुहावासी। मेरी बेरोजगारी ठोकर मारते हुए मुझे इस कमरे की गुफा में धकेल देती है। मैंने शुरू में इस कमरे से आजाद होकर सूर्य और पृथ्वी-जल के मध्य के इस संसार का संगी होने की कोशिश की। कई बार कोशिश की, लेकिन हर बार मेरे खालीपन- मेरी अस्तित्वहीनता ने धक्के देकर मुझे गुफा रूपी इस कमरे में गिरफ्तार कर दिया।“ दूसरी तरफ इस उपन्यास में उन स्थितियों का भी बहुत बारीक व प्रभावी तरीके से चित्रण हुआ है कि किस तरह एक बेरोजगार युवक के माँ-बाप उससे जुड़े तमाम झंझावात झेलते हैं और अपनी उस संतान पर जाहिर न होने देने की भरसक कोशिश करते हैं, पर घर की आर्थिक परेशानियाँ किस तरह बेलिहाज हो जाती हैं। इस उपन्यास के बेरोजगार नैरेटर के माता-पिता की स्थिति को देखते हुए, अमरकांत की प्रसिद्ध कहानी ‘दोपहर का भोजन’ का स्मरण हो आता है। पर अखिलेश ने उस कहानी से आगे जाकर बहुत विस्तार से इस उपन्यास में एक बेरोजगार युवक के परिवार का चित्रण किया है। इस उपन्यास में हालत यह है कि बेरोजगार युवक अपनी बेरोजगारी के कारण पैदा हुई शर्म-संकोच के कारण महानगर से बहुत इच्छा के बावजूद घर नहीं जाता मगर उससे मिलने के लिए माता-पिता अपनी उत्कट इच्छा के कारण गाँव से एक दूसरे लड़के को उसे हर हालत में लिवा लाने के लिए भेजते हैं।

 बेरोजगार युवक से पूछा गया सामान्य सा औपचारिक प्रश्न, ‘क्या हालचाल है’, ‘आजकल क्या कर रहे हो’ आदि भी कैसे चुभने वाले होते हैं, इसका अंदाजा दूसरा कोई नहीं लगा सकता। इन्हीं कड़ुवाहटों से इस उपन्यास का सूत्रधार भी शुरू से अंत तक जूझता है। इन्हीं सब के बीच उसका अपनी प्रेमिका रही विनीता के पति सुरेंद्र से टकराव पैदा होता है, जो कि प्रशासनिक अधिकारी है और उसकी नजर में वंचितों, गरीबों व पीड़ित किसानों-मजदूरों का पक्ष लेने वाला अपराधी है। वह राघव को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा क्योंकि वह किसानों से उनके हक के लिए हड़तालें करवा रहा है, मजदूरों की मजदूरी बढ़वाने की लड़ाई लड़ रहा है। अंत में होता क्या है कि उपन्यास का सूत्रधार वह बेरोजगार युवक राघव की तलाश में निकल पड़ता है, जो पढ़ाई के दौरान उससे बिछड़ गया था। इस तरह यह उपन्यास युवाओं को संघर्ष से जुड़ने और इस अन्यायी और अनाचारी व्यवस्था को पलटने के लिए भी संकेत करता है, जो शोषण व दमन पर टिकी है। जहाँ हर हाथ को काम नहीं है। हर मनुष्य को मनुष्य की तरह जीने का सम्मान हासिल नहीं है।

  अखिलेश का यह पहला उपन्यास है मगर जिस भाषाई सघनता से उन्होंने उपन्यास को बुना है, वह काफी प्रभावित करने वाला है। उपन्यास एक नैरेटर के आत्मकथ्य के रूप में है, मगर विषय पर पकड़ के कारण कही भी अपनी मार्मिकता नहीं खोता। कई जगह तो भाषा अद्भुत रूप से काव्यात्मक व प्रतीकात्मक होकर विषय को और प्रभावी तरीके से संप्रेषित करती है। जब तक बेरोजगारी रहेगी, जो कि दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है, यह उपन्यास प्रासंगिक बना रहेगा।

 

बेदखली का महाआख्यान

उग रहे हैं दरोदीवार पे सब्जा गालिब

हम बियाबान में हैं घर में बहार आयी है।

-गालिब

अखिलेश के दूसरे उपन्यास ‘निर्वासन के केंद्र में यूँ तो विस्थापन की समस्या है, पर यह महज भौगोलिक स्तर पर नहीं है, यह बहुस्तरीय और बहुआयामी है। दरअसल विस्थापन एक ऐसी शाश्वत समस्या है जो निरंतर घटित होती रहती है और मनुष्य के पर्यावरण में यह आदि से अनंत तक फैली हुई है। एक काल को विस्थापित कर दूसरा काल दाखिल होता है, एक पीढ़ी को विस्थापित कर दूसरी पीढ़ी दाखिल होती है, एक स्मृति या अवधारणा को मिटाती हुई दूसरी स्मृति काबिज होती है। कई बार कई प्रसंगों में विस्थापन इतना बेआवाज और अमूर्त्त होता है कि उसकी भनक तक नहीं मिलती पर चीजें विस्थापित होती रहती हैं और हम वक्त की रफ्तार में उसकी अनुगंजों को पकड़ नहीं पाते। उससे अनुकूलित हो जाते हैं। जो अनुकूलित नहीं हो पाते, वे अन्य तरीके से विस्थापित हो जाते हैं। विस्थापन कई स्तरों पर घटित हो रहा है, समाज के स्तर पर, पारिवारिक स्तर पर, यथार्थ के स्तर पर, अनुभव के स्तर पर, भावनाओं के स्तर पर। इसके लिए बिल्कुल सटीक शब्द ‘निर्वासन है जिसे अखिलेश ने उपन्यास के शीर्षक के तौर पर चुना है। भौगोलिक विस्थापन को तो हर कोई समझ लेता है, वह अति प्रचलित और अति चर्चित है मगर जीवन स्थितियों, सामाजिक स्थितियों और भावनात्मक स्थितियों के स्तर पर जो निर्वासन बेआवाज जारी है, उससे पीड़ित-प्रताड़ित होते हुए भी हम न उस पर बहुत बात करते हैं और न उसे ठीक से समझ पाते हैं। इस प्रसंग में उपन्यास में चाचा द्वारा सूर्यकांत को लिखी चिट्ठी की पंक्तियां याद आती हैं, जिसमें चाचा अपने शहर में होते हुए भी खुद को विस्थापित बताते हुए लिखते हैं- “मैं पांडे के बाबा या पांडे की तरह विस्थापित बिल्कुल नहीं हूँ। मैं जिस सुलतानपुर में बचपन से धूल-मिट्टी खाता रहा, वहीं हूँ लेकिन मैं बिछड़ने की तकलीफ कम नहीं सह रहा हूँ। मेरा पूरा समय ही लोप हो गया है। मेरे सारे अपने, मेरा हर परिचय मुझसे छिटक कर बहुत दूर जा गिरा है या मैं उनसे बेदखल पाताल में पटक दिया गया हूँ। हर विस्थापन में वापसी होती है, लौटने की गुंजाइश या उसका सपना रहता है मगर मैं जो विस्थापन भुगत रहा हूँ, उसमें लौटना बिल्कुल नहीं है, लगातार दूर होते जाना है।  आज का यह निर्वासन अत्यंत भयावह है और अखिलेश ने इसी पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। सूर्यकांत भी चाचा के उस पत्र का जवाब लिखते हुए खुद को एक भयावह विस्थापन का शिकार बता रहा है। जबकि घर से निकाले जाने के लंबे अर्से बाद वह अपने परिवार से मिलकर सुलतानपुर से लखनऊ लौट रहा है। वह सुलतानपुर रामअंजोर पांडे के बाबा के पुरखों-परिजनों की तलाश में आया है पर अपने परिजनों, गाँव और गोसाईंगंज के निवासियों से मिलकर उसे जो अहसास होता है, उसे वह कुछ यूँ प्रकट करता हैविस्थापन में आपकी जड़ें आपके भीतर पैठ बनाये रहती हैं, लेकिन अब मेरे अंदर वह सारा तबाह हो चुका है। संबंध अपने अर्थ खो चुके हैं, वे अपनी आत्मीयता और ऊष्मा से स्खलित हो चुके हैं। ट्रेन में सफर कर रहा सूर्यकांत परिजनों द्वारा दिये गये उपहार की पोटली उठाता है और धीरे से ट्रेन के बाहर छोड़ देता है। यह अत्यंत मार्मिक दृश्य है।

      आलोचक राजकुमार ने अखिलेश के इस उपन्यास को ‘संभाव्य चेतना का उपन्यास माना है, पर दरअसल यह ‘शाश्वत चेतना का उपन्यास है। यह उन सच्चाइयों से टकराने की कोशिश है, जो ओझल तो हैं पर आक्रांत पूरी सृष्टि को किये हुई हैं। इस उपन्यास में भविष्य की आहटें भी हैं और अतीत की स्मृतियां भी हैं और वर्तमान की जद्दोजहद की ध्वनियां भी हैं। इस उपन्यास में अपने देश, अपने समाज, अपने परिवार और अपने यथार्थ से निर्वासित हुए लोग अपने मूल की तरफ, अपने अतीत की तरफ अत्यंत करुणा व बेचारगीपूर्वक बार-बार मुड़कर देखते हैं और उसके प्रति पर्याप्त मोह और ममता से आप्त हैं मगर वह अतीत और मूल वक्त के प्रवाह में स्वयं ही इतना निर्वासित, गडमड, जर्जर और जटिल हो चुका है कि उसे पाना, उससे जुड़ना भी अंततः एक निर्वासन का ही चुनाव है। वक्त की आंधी ने चीजों को इतना झकझोर दिया है कि वे अपनी जगह से हिल गयी हैं, धकेल दी गयी हैं और धूसरित हो चुकी हैं। क्या विडंबना है कि एक समय जो विस्थापन मजबूरी और यातना का सबब था, वही विस्थापन बदले हुए वक्त में स्वप्न बन गया है।

  सवा सौ साल पहले भगेलू को अकाल और भूखमरी ने अपनी जमीन से निर्वासित किया। अपने गाँव, देश, परिवार को छोड़ने के लिए वे अभिशप्त हुए। वे जीवन और प्रकृति की यातनाओं की मार झेलते हुए धोखे से गिरमिटिया मजदूर बनाकर गोसाईंगंज से सूरीनाम पहुँचा दिये गये। वही सौ-सवा सौ वर्ष बाद उसी गोसाईंगंज और सुलतानपुर में हालत यह है कि पढ़े-लिखे से न पढ़े-लिखे तक हर आदमी का सपना हो गया है कि वह देश छोड़े। उसे अपना देश रास नहीं आ रहा है। उपन्यास का एक पात्र शिब्बू कहता है- “आज के सभी लड़के-लड़की पासपोर्ट बनवा चुके हैं या उसके लिए अप्लाई कर चुके हैं। इंडिया में कोई सड़ना नहीं चाहता, हर कोई अच्छी लाइफ मांगता चाचा। भयानक विडंबना है कि गुलाम भारत का नागरिक यातना और धोखे के कारण देश से निर्वासित होने को अभिशप्त था, तो आजाद भारत का नागरिक स्वेच्छा से, उम्मीद और खुशी से देश छोड़कर बाहर जाना चाहता है।

 इस उपन्यास में इतने तरह के निर्वासनों से साक्षात होता है कि जैसे यह सृष्टि ही निर्वासनों की प्रतिश्रुति हो। सभी चीजें, हर मानव किसी न किसी कारण निर्वासित होने को अभिशप्त है। उपन्यास में दादी अपनी यादों में निर्वासित हैं। वे अपनी उम्र के यथार्थ से निर्वासित हैं। सूर्यकांत विजातीय लड़की से प्रेम विवाह करने के कारण परिवार से बाहर निकाल दिया जाता है। उसे अपना शहर, परिवार और घर छोड़ना पड़ता है। नौकरी में अपनी वैचारिक स्थिति के कारण वह निर्वासित होता है। वही उसके चाचा समय के साथ तालमेल न बिठा पाने, आधुनिक जीवन की चमक-दमक व संवेदनहीनता को न स्वीकार कर पाने के कारण अपने परिवार और अपने समय से निर्वासित हैं। राम अंजोर पांडे अपनी अमीरी से ऊबे हुए हैं, इस कारण वह अपने यथार्थ से निर्वासित हैं। वह ‘हौली की शराब और चने की घुघरी का स्वाद लेना चाहते हैं और अंततः पुनरुत्थानवादी आध्यात्मिकता में जाकर गर्क होते हैं। हर आदमी या तो निर्वासन के कारण या निर्वासन के स्वप्न के कारण बेचैन रूह बना हुआ है। चैन किसी को नहीं है। यहाँ तक की बदलते दौर ने वस्तुओं में भी निर्वासन पैदा किया है। भाषा में निर्वासन हुआ है। बहुत सारे शब्द निर्वासित हो गये हैं। सबका बड़ा ही मार्मिक और सटीक संज्ञान अखिलेश ने इस उपन्यास में लिया है। पर निर्वासित चीजें नष्ट नहीं होती, बस वे रोशनी के बाहर चली जाती हैं, प्रचलन से हट जाती हैं। उन्हें फिर से कोई चाहे तो संजो भी सकता है। अखिलेश अपने इस उपन्यास में अतीत की उन मूल्यवान चीजों को, जो निर्वासित हो चुकी हैं, पुनर्वास की संभावना को भी इंगित करते हैं। उपन्यास में एक प्रसंग है। सूर्यकांत अपने चाचा के घर गया हुआ है अरसे बाद। परिवार और घर से निर्वासित होने के काफी समय बाद। चाचा अपनी तरह का जीवन जी रहे हैं। उन्होंने वर्तमान की आधुनिक चकाचौंध को नकारकर अलग ही यथार्थ में जीना शुरू कर दिया है। सूर्यकांत उनसे एक सवाल पूछता है- “चाचा तुम कहां-कहां से तमाम ऐसी चीजें इस घर में रखे हो जो अब गायब हो चुकी हैं?

चाचा इस सवाल को जो जवाब देते हैं, काफी दिलचस्प है, ध्यान देने लायक है। चाचा हँस कर कहते हैं- “वे गायब नहीं हुई हैं। वे अपनी जगह से धकेल दी गयी हैं। मैं समझ रहा हूँ तुम्हारी बात। ये देसी आम, ये बरतन, ढिबरी, लालटेन, ये सिकहर, ये सिल लोढ़ा, ये सब इसी भारत देश में हैं, पर अपनी-अपनी जगह से धक्का दे दिये गये हैं। ये सब अंधेरे में गिर गये हैं कि तुम लोगों को दिखायी नहीं देते। पर ये हैं।

  दरअसल यह उपन्यास महज निर्वासन के बारे में ही नहीं है बल्कि निर्वासन के बहाने उन्नीसवीं सदी के उतर्रार्द्ध से लेकर इक्कीसवीं सदी के पहले दशक तक सामाजिक-पारिवारिक यथार्थ और मूल्यों में जो बदलाव घटित हुआ है, जो उत्तर आधुनिकता है, उसको भी पकड़ने की कोशिश है। किस तरह समय के साथ मनुष्य का काईंयापन, संवेदनहीनता बढ़ती गयी है, पुनरुत्थानवादी कोशिशें मजबूत होती गयी हैं, इन सब चीजों की बेहतर पड़ताल इस उपन्यास के माध्यम से हुई है। दरअसल संपूर्णानंद वृहस्पति, बहुगुणा, राम अंजोर पांडे महज खास चरित्र नहीं हैं, वे नये दौर के प्रतीक हैं, बिंब हैं। उनकी सोच में जो काइंयापन दिखाई पड़ता है, उनके मन में जो भ्रष्टाचार मौजूद है, वह हमारे दौर का यथार्थ है। नये दौर में यानी इक्कीसवीं सदी में मनुष्य सभ्यता के समक्ष जो संकट पैदा हुआ है, उस पर गंभीर बहस चाचा और सूर्यकांत के बीच हुई है, जो इस उपन्यास के ‘बतर्ज हिंद स्वराज अध्याय के अंतर्गत दर्ज है। यह इस उपन्यास का ‘ की-चैप्टर’ है। यही सारे वे निचोड़ व्यक्त हैं जो इस उपन्यास के प्रस्थान की वजह बने होंगे। यहाँ चाचा और सूर्यकांत के बीच के दो प्रश्नोत्तरों का उल्लेख बहुत जरूरी है, वैसे इस पूरे अध्याय को ही गौर से समझा जाना चाहिए।

सूर्यकांत चाचा से पूछता है- “ऐसा क्या हुआ जो आपको नयेपन से इतना परहेज हो गया?”

चाचा का जवाब है- “गलत कह रहे हो…कौन ऐसा होगा जिसे बच्चे, कोंपलें और ताजा खिले फूल अच्छे नहीं लगेंगे। लेकिन कल्पना करो कोई शिशु अपने से बड़ों को गालियां बकना शुरू कर दे या दौड़ा-दौड़ा कर पीटना शुरू कर दे, तो वह सुंदर लगेगा या तरस खाने योग्य? पुराने का जाना और नये को आकर पुराना पुराना होना और जाना इस नियम से मैं भी वाकिफ हूँ किंतु ऐसा भी नहीं होता कि किसी वृक्ष पर केवल नये पत्तों को ही रहने का अधिकार होता है। पतझड़ एक साथ सभी पुरानी पत्तियों को नहीं उखाड़ देता है। इस तर्क से समाज में जो पिछड़े हैं, जो हाशिये पर हैं उनकी रुचियों, उनके रिवाजों, संस्कृतियों के लिए कोई जगह ही नहीं होनी चाहिये। देखो सूर्यकांत मुझे नयेपन से बिल्कुल परहेज नहीं है, तुम भूले नहीं होगे, मैंने हमेशा उसे गले लगाया। मुझे बस नयेपन का अहंकार और उसकी बेमुरौव्वती असह्य हो गयी, मुझे नफरत हो गयी उससे। मेरी दिली ख्वाहिश ऐसे समय में रहने की थी जहाँ नये पुराने दोनों की सुंदरताएं एक-दूसरे को मजबूती देती हों लेकिन कम से कम मैं ऐसा समय या समय में ऐसी जगह ढूंढ़ सकने में नाकाम रहा। इसलिये मैं पुराने समय में चला आया हूँ। भविष्य में मैं जा नहीं सकता था क्योंकि अपने सपनों का भविष्य हासिल करना इन्सान के अकेले अपने बूते का नहीं होता। और मैं अतीत में आ गया। जानता हूँ कि यह पुराना समय मेरा गढ़ा हुआ है। यह सहज नहीं, बनावटी है। लेकिन क्या करता, भविष्य मैं गढ़ नहीं सकता।

  चाचा उत्तर आधुनिक जीवन में पैदा हुई बेरहमी, आपाधापी और चकाचौंध से व्यथित हैं, उसे स्वीकार-अंगीकार नहीं करना चाहते। वे इसके प्रति संघर्ष का रवैया अख्तियार किये हुए हैं। सूर्यकांत का एक और सवाल भी काफी उल्लेखनीय है और चाचा उसका जो जवाब देते हैं, उससे इस दौर की विडंबनाएं, कथित विकास के अंतर्विरोध तार-तार हो जाते हैं।

सूर्यकांत सवाल उठाता है- “चाचा आप बस खराब बातों को ही घुमाफिरा कर ला रहे हो। इतने सुंदर पार्क बन रहे हैं। चमचमाती सड़कें, फ्लाईओवर, साफ़-सुथरे मॉल बन रहे हैं। सुंदर मकान और उनकी सुंदर साज-सज्जा, एक से एक बढ़िया कपड़े, पहनने का ढंग- ये सब आपको कुरुप लगते हैं? आपको बस अपना राग अलापने की पड़ी है…।

चाचा जवाब देते हैं- “इन्हें तुम सौंदर्य मानते हो! मुझे तुम्हारी दिमागी गिरावट पर तरस आ रहा है। तुम्हारे तथाकथित महान सौंदर्य पर तुम्हारी गौरी या मेरी बलवंत कौर या किसी भी निष्कलुष स्त्री की मुस्कान या एक रोते हुए बच्चे का अचानक हँस पड़ना या एक चिड़िया का इस डाल से उस डाल पर फुदकना-कोई भी एक भारी पड़ेगा। सुंदरता तभी जन्म लेती है जब उसमें इन्सान, पशु, पक्षी किसी का भी जीवन भीतर से खुशी पाये। इसलिये वही खूबसूरत है जो भीतर से भी खूबसूरत है। तुम्हारे ये राष्ट्रीय राजमार्ग जो करोड़ों वृक्षों का वध करके बने हैं ये कैसे सुंदर हो सकते हैं। ये गाड़ियों और अमीरों की सुविधा के लिए बनाये गये हैं। मॉल सामान बेचने के लिए हैं। तुम्हारा ये औद्योगिक विकास सेज वगैरह फलाना ढिमाका जो किसानों की जमीन छीन कर तैयार हो रहे हैं। बाँध, बिजली परियोजनाएं जो इलाके की पूरी की पूरी आबादी को बेघर, विस्थापित करके प्रकट हो रही हैं- सुंदर कैसे हो सकती हैं?”

चाचा इस उपन्यास के सबसे संघर्षशील, सजग और सतर्क चरित्र हैं। उनमें अपने युग का प्रतिकार भरा हुआ है। आज जो अंधाधुंध विकास की होड़ मची है, उस पर वे सवाल उठाते हैं। वे विकास की वजह से किसानों और हाशिये के लोगों के हो रहे विस्थापन का प्रश्न खड़ा करते हैं। कथित विकास ने मनुष्य की जिस सहजता व मनुष्यता को नष्ट कर दिया, जीवन के जिस आस्वाद को छीन लिया, चाचा उसकी याद दिलाते हैं। वे होड़ में शामिल होने से इंकार करते हुए अलग रास्ता चुनते हैं, हालांकि इस कारण वे अलग-थलग पड़े हुए भी दिखाई पड़ते हैं। यह हमारे समय की अजब त्रासदी है। इसी होड़ ने सुलतानपुर और गोसाईंगंज के लोगों में भी धन का अपार लालच और विस्थापन की ललक पैदा की है। धन की लालच के कारण गोसाईंगंज के तमाम लोग ‘अमरीका पांडे से संबंध जोड़ने के लिए झूठ का सहारा लेते हैं, अपनी परंपरा और विरासत से दगाबाजी करने को तैयार हैं। शिब्बू और देवदत्त तेंदुलकर अपना सहज जीवन और परिवार छोड़कर विदेश जाने की प्रचंड आतुरता प्रकट करते हैं।

  इस उपन्यास के और समकालीन यथार्थ के मर्म को और बेहतर तरीके से समझने के लिए वे दो चिट्ठियां भी काफी महत्वूपर्ण हैं जो परस्पर चाचा और सूर्यकांत ने एक-दूसरे को लिखा है। ऐसे समय में जब हमारे जीवन से चिट्ठियां गायब हो रही हैं, चाचा ने अपनी चिट्ठी की जो प्रेरणा बतायी है, वह झकझोर देने वाली हैं। चाचा अपनी चिट्ठी में लिखते हैं- “अब कोई पत्र नहीं लिखता, लोग एसएमएस और ईमेल से अपने संदेश भेजते हैं। मैं बहुत दिनों से इस चलन के चेहरे पर थप्पड़ मारने के लिए एक पत्र लिखना चाह रहा था। मैं कुछ वर्षों से चाह रहा था कि एक बढ़िया चिट्ठी लिखूं लेकिन बड़ा हृदयविदारक था कि मुझे कोई ऐसा मिल ही नहीं रहा था जिसको संबोधित करके मैं अपने दिल-दिमाग को उड़ेल दूँ।

तो हालात यह है इस उत्तर आधुनिक दौर की कि आप चिट्ठी लिखना भी चाहें तो सुयोग्य कोई पात्र नहीं मिलता जिसको संबोधित चिट्ठी आप लिख सकें। पूरा जमाना बहुत हाई-फाई है। यहाँ काम भर बातें होती हैं और सबकुछ त्वरित है। संचार की अति उपलब्धता ने संवाद की, आत्मीय-अतंरंग संवादों की गुंजाइशें नष्ट कर दी हैं। चाचा ने अपनी चिट्ठी में सर्वग्रासी विकास का विकल्प सुझाते हुए लिखा है- “देखो तो दुनिया की सुंदरता इसी में है कि मौसम को, नदी को, जंगल को, दिन और रात को मिटाओ नहीं और बर्बाद मत करो, बस उसमें इंसान के लिए थोड़ी गुंजायश और हिफाजत का रास्ता निकाल लो।

 इस उपन्यास का सूत्रधार है सूर्यकांत जिसके सहारे कथा आगे बढ़ती है। अपने विचारों के कारण तंत्र में फिट नहीं बैठने की वजह से वह अपनी नौकरी से लगभग विस्थापित है। वह रोजगार का विकल्प तलाश रहा है। इसी दौरान बहुगुणा नामक पत्रकार के माध्यम से उसकी भेंट रामअंजोर पांडे से होती है जो गोसाईंगंज से अकाल, भूख, बीमारी और मौत से पीछा छुड़ाते हुए बदहवास धोखे से सूरीनाम पहुँच गये भगेलू पांडे के पोते हैं। राम अंजोर अपार दौलत के स्वामी हैं। पर उनके जीवन का हाहाकार भी कम मार्मिक नहीं है। उन्हें अपनी विरासत को संभालने वाला भरोसे का एक वारिस तक नहीं मिलता, तो दूसरी तरफ अपने पुरखों की खोज उन्हें ऐसी जगह पहुँचा देती है जो एक तरह से उनके वैभव और आधुनिकता की त्रासद परिणति है। रामअंजोर पांडे अपने पुरखों का पता लगाने का काम लगभग बेरोजगार हो चुके सूर्यकांत को सौंपते हैं। इस काम के कारण सूर्यकांत का लौटकर अपने उस परिवार के पास जाने का संयोग बनता है, जहाँ से एक ऐसी लड़की से प्रेम विवाह के कारण जिसका पारिवारिक मूल स्पष्ट नहीं है, वह जलील कर भगा दिया गया होता है। पर सूर्यकांत की यह वापसी उसकी आँख खोलने वाली है। इस यात्रा में वह पाता है कि किस तरह वक्त की रफ्तार ने उसके अतीत की तमाम चीजों को, गाँव, परिवार, संबंधों और लोगों की दिलचस्पी को किस तरह बदल दिया है। इसी प्रक्रिया में उसका बदले हुए गाँव, बदले हुए परिवार और बदली हुई परिस्थितियों से साक्षात्कार होता है। गोसाईंगंज में सूर्यकांत की यात्रा के माध्यम से अखिलेश ने ग्रामीण जीवन का काफी दिलचस्प व जीवंत खाका खींचा है। वहाँ जगदम्बा और प्रधान जैसे दो ऐसे दिलचस्प पात्रों से साक्षात्कार होता है जिनको भुला पाना कठिन है। इसके साथ ही समाज में जाति के प्रश्नों और औरतों की स्थिति पर भी उपन्यासकार ने बखूबी प्रकाश डाला है। उचित ही कहते हैं वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह कि ‘निर्वासन भारतीय समाज के विकास मॉडल की सोनोग्राफी है। शिल्पगत रूप से भी उपन्यास में काफी नयापन है। विषय की संप्रेषणीयता और विश्वसनीयता के लिए अखिलेश ने उपन्यास के ढांचे में भी काफी तोड़-फोड़ किया है। और रोचकता का आलम यह है कि एक गंभीर विषय पर लिखा गया उपन्यास जीवन की तरलता से इतना छलछलाता हुआ भरा है कि कहीं कोई ऊब हावी नहीं होती। उपन्यास समाप्त होने तक सभी पात्रों की मित्रता पाठक से हो चुकी होती है।

संपर्क- 204, सनशाइन अपार्टमेंट, बी-3, बी-4, कृष्णा नगर, लखनऊ-226016

 

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