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गुरदयाल सिंह की कहानी ‘सांझ’

पंजाबी भाषा के प्रसिद्ध लेखक गुरदयाल सिंह का हाल में ही निधन हुआ. उनकी कहानी का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है. अनुवाद किया है युवा कवयित्री रश्मि भारद्वाज ने- मॉडरेटर

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वह औरत अभी-अभी गाड़ी से उतरी थी और अनिश्चय की स्थिति में स्टेशन के चारों ओर देख रही थी। बंटू उसे ठीक से देख पाने के लिए आगे झुका। उसकी आँखें कमज़ोर थीं और वह दूर से देखने पर लोगों को पहचान नहीं पाता था। जब वह उस औरत के थोड़ा करीब आया, उसे महसूस हुआ कि वह जय कौर हो सकती थी।

‘कौन है वहाँ?’

‘यह मैं हूँ, जय कौर’।

‘तुम यहाँ कैसे?’ बंटू का चेहरा खिल गया था।

जय कौर कुछ पलों के लिए झिझकी फिर कहा, ‘मैं शहर से आई हूँ। बड़ी बहू वहाँ अस्पताल में भर्ती है’।

‘सब ठीक तो है न?’

‘हाँ, उसे बच्चा होने वाला है’।

‘आओ, गाँव तक साथ चलें’।

जय कौर को समझ नहीं आया कि उस निमंत्रण पर क्या प्रतिक्रिया दे ! सूरज डूब रहा था और उनके गाँव पहुँचने तक रात घिर जाने वाली थी। सौभाग्य से कोई और यहाँ नहीं उतरा था।

ट्रेन कभी इतनी देर से नहीं पहुँची थी। सामान्यतः यह सूरज डूबने से पहले पहुँच जाया करती थी लेकिन आज़ यह देर से चल रही थी। जय कौर ने पहले शहर में ही अपनी भतीजी के यहाँ रात गुजारने की सोची लेकिन फिर उसका अपने गाँव घूमने का मन हो आया और वह यहाँ आ गयी।

उसने बंटू की ओर देखा। उसकी आँखें चमक रहीं थीं और वह भद्र लग रहा था।

‘ठीक है, आओ चलें,’ जय कौर ने हिम्मत बटोरते हुए कहा।

उत्साह से भरे बंटू ने इतनी लंबा डग भरी कि उसके माथे पर रखी सामान की गठरी फिसलते-फिसलते बची । उसे अपने हाथों से संभालने के चक्कर में वह इतनी ज़ोर से उछला जैसे किसी बेक़ाबू हो रखे जानवर को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश कर रहा हो। फिर वह कुछ बुदबुदाया और अपने आप में ही मुस्कुराया।

‘और बताओ, जय कौर?’ बंटू ने साथ चलते हुए उत्साहित स्वर में कहा। ‘सब ठीक है न’।

‘हाँ, वाहे गुरु की कृपा से सब ठीक है’।

‘शुक्र है रब का’।

बंटू खाँसा। उसने डूबते सूरज के सुकून देने वाले नज़ारे को निहारा। दूर क्षितिज पर गुलाबी और नारंगी रंग के शेड्स बिखरे थे। उसे बहुत गहरी ख़ुशी महसूस हुई। लेकिन बाजरे की लंबी डालें जो हल्की रोशनी में चमक रहीं थीं पर नज़र पड़ते ही उसने अपनी नज़रें झुका लीं।

पूरी दुनिया जैसे थमी हुई थी लेकिन कभी-कभी जंगली पौधों में छिपी गौरेया उनके कदमों की आहट सुनकर चौंकती और चहचहाने लगती। जब उनका चहचहाना बंद होता तो फिर शांति छा जाती। बंटू चलता हुआ आगे निकल गया,उसे पीछे आती जय कौर के कदमों की आहट साफ़ आ रही थी। उसके पैरों की आहट उसे गुरुद्वारा के बजने वाले झांझ से निकलने वाली मधुर ध्वनि की तरह महसूस हो रही थी।

‘बहुत साल हो गए न हमें मिले हुए, जय कौर?’

‘हाँ,’ जय कौर ने धीमे से कहा।

‘मुझे लगता है कि तुम पिछले छह या सात साल से अपने छोटे भतीजे के साथ राजस्थान में रह रही हो न,’ बंटू ने पूछा।

‘हाँ!’

जय कौर ने बंटू की ओर देखा और अवाक रह रह गयी। समय ने उस पर अपना ख़ासा प्रभाव डाला था। वह रुक गया था और अपने जूतों में घुस आई रेत को झाड़ कर निकाल रहा था।

उसकी आँखों में डूबते हुए सूरज की लालिमा थी। लेकिन उसकी पकी हुई दाढ़ी को देखकर जय कौर का विचलित मन थोड़ा शांत हुआ। अब उसे बंटू से डर या झिझक नहीं महसूस हो रही थी। जैसे उसे अभी तक इस बात का एहसास ही नहीं हुआ हो कि बंटू बूढ़ा हो चुका है। जब बंटू हंस कर आगे बढ़ा, उसके पीछे चलती हुई वह उसे बहुत गौर से सर से पैर तक देखने लगी। बंटू की पिंडलियाँ सिकुड़ कर सूखी लकड़ी की तरह दिखाई दे रहीं थीं। गर्दन का मांस लटक कर झूल गया था। उसकी कमर झुक आई थी,  कभी मज़बूत रहे कंधे अब ऐसे दिख रहे थे जैसे  बछड़े के नए सींग निकले हों। उसके कपड़े भी बहुत ही गंदे थे।

तभी अतीत का बंटू उसकी आँखों के आगे आकर खड़ा हो गया। वह तब किसी राजा की तरह सजीला हुआ करता था। लंबा और गठीला, आँखों में चिंगारी सी चमकती रहती और उसकी नज़रों का सामना करना मुश्किल हो जाता था। उसे यही बंटू याद रह गया था।

अचानक जय कौर की धड़कनें तेज़ चलने लगीं और उसे बेचैनी से बंटू की ओर देखा। लेकिन अगले ही पल उसके होंठों पर एक मुस्कान तिर आई।

‘तुम इतने कमजोर कैसे हो गए?’ जय कौर ने पूछा, उसकी सहानुभूति भरे स्वर ने उन दोनों के बीच घिर आए सन्नाटे को तोड़ने की पहल की। ‘क्या तुम बीमार थे या कोई और दिक्कत’?

बंटू ने एक तेज़ आह भरते हुए कहा, ‘मैं तुम्हें क्या बताऊँ, जय कौर? हालात बहुत ख़राब हैं’।

‘कोई बात नहीं, दिल छोटा मत करो’, जय कौर ने उसे सांत्वना दी। ‘यह हर घर की कहानी है। अपने परिवार की देखभाल करना और सारे ख़र्चे पूरे करना आसान काम नहीं है’।

‘सच कह रही हो, जय कौर, लेकिन समय इतना ख़राब है कि किसी को भी दूसरे की परवाह नहीं बची। मैं मेहनत के कामों के लिए बहुत ही बूढ़ा हो चुका हूँ। दस साल पहले मैंने ज़मीन अपने बेटों के बीच बाँट दी थी। उसके बाद से उन्होंने मेरी परवाह करना ही छोड़ दिया। मेरी दो बहुएँ इतनी मतलबी हैं कि मुझ बूढ़े से जो भी काम निकाल सकतीं, निकलवा लेतीं हैं लेकिन कभी भी मुझे नहाने का पानी देने या मेरे कपड़े साफ़ कर देने की ज़हमत नहीं उठातीं। लेकिन मैं किसे दोष दूँ, हमारी किस्मत तो भाग्य ही तय करता है’। बंटू एक छोटे बच्चे की तरह प्रतीत हो रहा था जिसे घर में पिटाई लगी हो और वह किसी शुभचिंतक के सामने शिकायत लगा रहा हो।

‘कोई बात नहीं, भाग्य से मत हारो!’ जय कौर ने मज़बूत आवाज़ में कहा, ‘मुझे देखो। मेरे पास तो अपना घर भी नहीं और मुझे दूसरों की दया पर रहना पड़ता है। ईश्वर ने मेरी प्रार्थना सुनी ही नहीं। अब मुझे अपने भतीजे के साथ रहना पड़ रहा’।

‘जब मेरे भाई ज़िंदा थे तब स्थिति कुछ और थी। इस संसार में हर कोई दुखी है। गुरु नानक ने कहा तो है कि इस जगत का आधार ही दुख है। कोई क्या कर सकता है! हम जो बोते हैं, वही काटते है। बीज की गुणवत्ता फसल का भविष्य तय करती है, हमारे जीवन की नियति भी कुछ ऐसी ही है’।

जय कौर बोलती जा रही थी और उसके शब्द बंटू के दग्ध हृदय पर मरहम का काम कर रहे थे । दुख से उबरने का एक ही तरीका है कि उसे दूसरों के साथ बाँटा जाए। और इस राज़दारी की सबसे ख़ास बात यह थी कि वह अपने दुख जय कौर के साथ बाँट रहा था। वह दोनों एक दूसरे के लिए गहरी आपसी समझ रखते आए थे।

बंटू ने बायीं ओर देखा। सूरज का विविध शेड्स वाला लाल रंग अंधेरे में गुम हो गया था और कुछ नन्हे तारे आसमान में झिलमिलाने लगे थे। थोड़ी देर पहले चल रही मद्धिम हवा अब बिलकुल बंद हो गयी थी और इतना सन्नाटा छा गया था कि पत्तियों की सरसराहट भी सुनाई नहीं दे रही थी। रास्ता सँकरा हो आया था लेकिन जय कौर बेखौफ़ उसके पीछे चली आ रही थी।  जय कौर की मज़बूत आवाज़, उसका भरा शरीर, चौड़ी भवें, गोरा रंग और ढलता हुआ शरीर, जिसका औरताना आकर्षण अभी बाकी था बंटू को अपनी ओर खींच रहा था। वह चाहता था कि एक एक बार रुक कर जय को जी भर कर देख ले।

‘जय कौर, यह हमारा खेत है’, बंटू ने अपने पैरों को आपस में रगड़ा और जूतों में फिर से घुस आई रेत को झाड़ते हुए, कपास की फसल की ओर इशारा करते हुए कहा। ‘हमने साढ़े पाँच टन बीज उस शीशम के पेड़ तक बोए हैं।

जय कौर एकाएक रुक गयी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा और उसकी सांसें भारी हों आयीं। जिस शीशम के पेड़ की ओर बंटू इशारा कर रहा था, वह वही था जो तीस- पैंतीस साल पहले उनके बीच के मधुर पलों का साक्षी बना था। यह वही पेड़ था, जहाँ बंटू ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोक लिया था। एक पल को जय कौर डर गयी थी लेकिन फिर उसे लगा कि काश बंटू उसके हाथ को जीवन भर थामे रहता।

उन पलों को याद कर जय कौर के सारे शरीर में सिहरन दौड़ गयी। बंटू शांत खड़ा अब भी अपने जूतों की रेत झाड़ने का नाटक करता उसे लगातार निहारता जा रहा था। जय कौर ने उसकी ओर एक बार देखा फिर अपनी आँखें झुका लीं।

उसे अचानक बंटू से डर लगने लगा और उसका झुर्रियों से भरा चेहरा उसे ख़तरनाक नज़र आने लगा।

‘उस शीशम के पेड़ के आगे बाजरे की फसल है,’ बंटू कहे जा रहा था हालांकि वह ख़ुद भी अपने अतीत की उस शरारत को याद कर रहा था। ‘मैंने बेटों को वहाँ भी कपास ही उगाने को कहा लेकिन तुम तो अच्छी तरह जानती हो कि बुड्ढों की कोई सुनता कहाँ है!’

‘कोई बात नहीं, मत परेशान हो’।

‘जय कौर, तुम्हें पता है मेरे पिता मेरी शादी के समय इस शीशम के पेड़ को बेचने का सोच रहे थे? लेकिन मैंने कहा कि यह नहीं होने दूँगा मैं। मैंने उन्हें कहा कि भले ही ज़मीन गिरवी रख दो लेकिन मैं आपको यह शीशम का पेड़ नहीं छूने दूँगा’।

जय कपूर के पूरे शरीर में सिहरन की एक लहर दौड़ गयी। बंटू लगातार उस शीशम के पेड़ के बारे में ही क्यों चर्चा किए जा रहा? जब वह चलने लगे तो जय कौर जानबूझ थोड़ा पीछे हो गयी और उनके बीच थोड़ी दूरी बन गयी। बंटू को अब उसके पैरों की आहट नहीं सुनाई दे रही थी। वह वहीं रुक गया और पीछे मुड़ कर देखा।

‘जल्दी आओ, साथ चलो, हम पहुँचने ही वाले हैं’।

जय कौर ने ऊपर देखा, गाँव सच में करीब ही था। वह तेज़ कदमों से चली और बंटू के साथ हो ली। ‘जय कौर,जब से तुम्हारी भाभी का देहांत हुआ है न, मुझे अपने जीने का कोई मकसद ही नज़र नहीं आता’।

उसके मुँह से अपनी पत्नी का ज़िक्र और उसे अपनी भाभी और ख़ुद को अनजाने में ही उसका भाई बुलाए जाने की बात सुनकर जय कौर के होंठों पर एक मुस्कान दौड़ गयी।

‘सही कहा, जय कौर! बंटू ने फिर कहा। ‘समय के साथ चीज़ें बदलती हैं। जब हम जवान थे, हमने कभी ईश्वर को याद नहीं किया लेकिन अब उससे रात-दिन यही दुआ करते कि वह हमारे अस्तित्व का अंत कर डाले । लेकिन मांगने से मौत कहाँ आती है’!

‘ऐसा मत बोलो! तुम अभी से मौत की दुआ क्यों मांग रहे?’ जय कौर ने उसे बीच में ही टोका। ‘क्या तुम्हें अपने पोतों की शादी नहीं देखनी और अपने पड़पोतों के साथ नहीं खेलना है? पड़पोतों के स्पर्श में ही मुक्ति है’।

जय कौर के शब्दों का बंटू पर विचित्र प्रभाव पड़ रहा था। वह एक पल में मौत की कामना कर रहा था और अगले ही पल जीने की दुआ कर रहा था।

‘तुम जो कह रही वह सही है। लेकिन जीवन में यूं घिसटते रहने का क्या मतलब है? घर में हर कोई मूझसे छुटकारा ही पाना चाहता है। कोई मुझे दो वक्त का खाना भी नहीं देना चाहता’।

जय कौर को लगा कि बंटू सही ही बोल रहा। उसे आज़ भी उनके बीच वही आपसी समझ महसूस हुई जो उसने तीस –पैंतीस साल पहले अनुभव की थी । उस समय वह दोनों जवान और अकेले थे। अब वह जवान नहीं रहे थे लेकिन आज़ भी अकेले ही थे और दूसरों की दया के मुहताज़ थे। लगातार बीस साल जाय कौर ने दुआ की थी और आशा नहीं छोड़ी थी कि उसकी भी एक संतान होगी। पति की आकस्मिक मृत्यु ने वह आशा भी नष्ट कर दी। पिछले सात सालों में वह कुछ दिनों के लिए अपने पति के परिवार वालों के पास जाकर रहती थी और फिर अपने भतीजे के दरवाजे पर लौट जाया करती। उसे दो वक्त के भोजन के लिए भी उनके अधीन रहना पड़ता था।

‘मैं अपने बच्चों और पोतों के रहमों करम पर जी रहा हूँ। चुपचाप उनकी सेवा करता रहता हूँ नहीं तो वे कब का मुझे मेरी खाट के साथ खेत की मरैया में डाल आए होते’।

बंटू अब भी अपनी दुख भरी कहानी ज़ारी रखता हुआ, ख़ुद के लिए उपजी दया की गहराई में ही डूबता जा रहा था।

जय कौर, यह भी कोई जीवन है! और जब मैं मरूँगा, मुझे कोई याद भी नहीं करेगा। एक अकेले आदमी की यही दुर्गति होती है’।

बंटू बोलता जा रहा था लेकिन जय कौर अब कुछ नहीं सुन रही थी।

वह गाँव में जल रहे लैंप से आती रोशनी को देख रही थी जो उसे किसी जलती चिता से उठती लौ की मानिंद लग रही थी।

वह बंटू को देखने के लिए मुड़ी। उसके पतली टांगें अंधेरे में गुम हो चुकी थीं और उसका सूखा हुआ शरीर ढुलमुल लग रहा था। जय कौर को उसके लिए बहुत अफ़सोस हुआ।

‘ठीक है बंटू, मैं गाँव की ओर जाने वाला बाहरी रास्ता लूँगी ,’ फिर उसने आगे जोड़ा, ‘इतना परेशान मत हो। जो चंद दिन जीवन के बचे हैं, चलो हंस कर ही गुजार लेते हैं। कुछ बदलने वाला नहीं है तो हर समय शिकायत करके भी क्या हासिल होगा?’

‘सही कह रही हो! बिलकुल सही!’ बंटू ने कहा और गाँव की ओर जाने वाले दूसरे रास्ते की ओर मुड़ गया।

अनुवाद –रश्मि भारद्वाज

Posted 29th November 2016 by prabhat Ranjan

Labels: gurdial singh rashmi bhardwaj गुरदयाल सिंह रश्मि भारद्वाज

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