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  • अज्ञेय के उपन्यास ‘अपने अपने अजनबी’ का एक अंश

     

    आज बैठे बैठे अज्ञेय के उपन्यास ‘अपने अपने अजनबी’ की याद आई। उपन्यास के केंद्र में मृत्यु का भय है। किस तरह मृत्यु को सामने पाकर कैसे प्रियजन भी अजनबी हो जाते हैं और अजनबी पहचाने हुए। मृत्यु से ज़्यादा डर मृत्यु के भय का होता है।सेल्मा कैंसर से पीड़ित एक वृद्ध महिला है जो मरने वाली है और योके एक लड़की. दोनों को बर्फ से ढके एक घर में साथ रहने को मजबूर होना पड़ता है जहां जीवन ठहरा हुआ है.  उपन्यास का एक अंश पढ़िए। राजकमल से प्रकाशित ‘अज्ञेय उपन्यास संचयन’ में यह उपन्यास सम्मिलित है। जिसका संपादन प्रसिद्ध लेखक संजीव ने किया है।

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    योके और सेल्मा

    एकाएक सन्नाटा छा गया। उस सन्नाटे में ही योके ठीक से समझ सकी कि उससे निमिष भर पहले भी कितनी जोर का धमाका हुआ था-बल्कि धमाके को मानो अधबीच में दबाकर ही एकाएक सन्नाटा छा गया था।
    वह क्या उस नीरवता के कारण ही था, या कि अवचेतन रूप से सन्नाटे का ठीक-ठीक अर्थ भी योके समझ गयी थी, कि उसका दिल इतने जोर से धड़कने लगी था ? मानो सन्नाटे के दबाव को उसके हृदय की धड़कन का दबाव रोककर अपने वश कर लेना चाहता हो।

    बर्फ तो पिछली रात से ही पड़ती रही थी। वहाँ उस मौसम में बर्फ का गिरना, या लगातार गिरते रहना, कोई अचम्भे की बात नहीं थी। शायद उसका न गिरना ही कुछ असाधारण बात होती। लेकिन योके ने यह सम्भावना नहीं की थी कि बर्फ का पहाड़ यों टूटकर उनके ऊपर गिर पड़ेगा और वे इस तरह उसके नीचे दब जायेंगे। जरूरत वह बर्फ के नीचे दब गयी है, नहीं तो उस अधूरे धमाके और उसके बाद की नीरवता का और क्या अर्थ हो सकता है? ‘वे दब जायेंगे’-सहसा उसे ध्यान आया कि वह अकेली नहीं है और मानो इससे उसकी तात्कालिक समस्या हल हो गयी, क्योंकि उसे तुरंत ही चिन्ता करने की कोई दूसरी बात मिल गयी जिससे उसका ध्यान तूफा़न की ओर से हट जाये। मिसेज ऐकेलोफ का क्या हुआ होगा ? योके दौड़कर दूसरे कमरे में गयी—लेकिन देहली पार करते ही ठिठक गयी। श्रीमती एकेलोफ धुँधली खिड़की के पास घुटने टेककर बैठी थीं। उनकी पीठ योके की ओर थी। रुमाल से ढँका हुआ सिर तनिक-सा झुका हुआ था, जिससे योके ने अनुमान किया कि वह प्रार्थना कर रही होंगी। वह दबे पाँव लौटकर जाने ही वाली थी कि श्रीमती एकेलोफ ने खड़े होते हुए कहा, ‘क्यों, योके, तुम डर तो नहीं गयीं?’ योके को प्रश्न अच्छा नहीं लगा। उसने कुछ रुखाई से कहा, ‘किससे?’

    श्रीमती एकेलोफ ने कहा, ‘हम लोग बर्फ के नीचे दब गये हैं। अब न जाने कितने दिन यों ही कैद रहना पड़ेगा। मैं तो पहले एक-आध जाड़ा यों काट चुकी हूँ लेकिन तुम–’
    योके ने कहा, ‘मैं बर्फ से नहीं डरती। डरती होती तो यहाँ आती ही क्यों ? इससे पहले आल्प्स में बर्फानी चट्टानों की चढ़ाइयाँ चढ़ती रही हूँ। एक बार हिम-नदी से फिसलकर गिरी भी थी। हाथ-पैर टूट गये होते—बच ही गयी। फिर भी यहाँ भी तो बर्फ की सैर करने ही आयी थी।’

    श्रीमती एकेलोफ ने कहा, ‘हाँ, सो तो है। लेकिन खतरे के आकर्षण में बहुत-कुछ सह लिया जाता है—डर भी। लेकिन यहाँ तो कुछ भी करने को नहीं है।’

    योके ने कहा, ‘ऑण्टी सेल्मा, मेरी चिन्ता न करें—मैं काम चला लूँगी। लेकिन आपके लिए कुछ–’
    सेल्मा एकेलोफ के चेहरे पर एक स्निग्ध मुसकान खिल आयी। ‘ऑण्टी’ सम्बोधन शायद उन्हें अच्छा ही लगा। एक गहरी दृष्टि योके पर डालकर तनिक रुककर उन्होंने पूछा, ‘अभी क्या बजा होगा?’
    योके ने कलाई की घड़ी देखकर कहा, कोई साढ़े ग्यारह।’
    ‘तब तो बाहर अभी रोशनी होगी। चलकर कहीं से देखा जाये कि बर्फ कितनी गहरी होगी—या कि खोद-खोदकर रास्ता निकालने की कोई सूरत हो सकती है या नहीं। वैसे मुझे लगता तो यही है कि जाड़ों भर के लिए हम बन्द हैं।’
    योके ने कहा, ‘मेरी तो छुट्टियाँ भी इतनी नहीं हैं।’ और फिर एकाएक इस चिन्ता के बेतुकेपन पर हँस पड़ी।

    ऑण्टी सेल्मा ने कहा, ‘छुट्टी तो शायद—मेरी भी इतनी नहीं है—पर—योके ने चौंकते हुए पूछा, ‘आपकी छुट्टी, ऑण्टी सेल्मा ?’
    श्रीमती एकेलोफ ने बात बदलने के ढंग से कहा, ‘फिर यह भी देखना चाहिए कि इस केबिन में रसद-सामान कितना है—यों जाड़ा काटने के लिए सब सामान होना तो चाहिए। चलो, देखें।’

    योके वापस मुड़ी और अपने पीछे श्रीमती अकेलोफ के धीमे, भारी और कुछ घिसटते हुए पैरों की चाप सुनती हुई रसोई की ओर बढ़ चली। रसोई के और उसके साथ के भण्डारे से दोनों ही प्रश्नों का उत्तर मिल सकेगा-रसद का अनुमान भी हो जायेगा और अगर बर्फ के बोझ के पार प्रकाश की हल्की-सी भी किरण दीखने की सम्भावना होगी तो वहीं से दीख जायेगी। क्योंकि उसका रुख दक्षिण-पूर्व को है और धूप यहीं पड़ सकती है-धूप तो अभी क्या होगी, पर बर्फ के झक्कड़ में जितना भी प्रकाश होगा उधर ही को होगा। दोनों ही प्रश्नों का उत्तर एक ही मिलता जान पड़ा—कि जो कुछ है जाड़ों भर के लिए काफी है। खाने-पीने का सामान भी है और चर्बी के स्टोव के लिए काफी ईधन भी ; और शायद जितनी बर्फ के नीचे वे दब गयी हैं उसके मार्च से पहले गलने की सम्भावना बहुत कम है। बर्फ की तह शायद इतनी मोटी न भी हो कि बाहर उसे काटना असम्भव हो, लेकिन बाहर से उसे काटेगा कौन, और भीतर से अगर काटना शुरू करके वे इस एक हिमपात के पार तक पहुँच भी सकें तो तब तक और बर्फ न पड़ जायेगी इसका क्या भरोसा है ? यह तो जाड़ों के आरम्भ का तूफान था, इसके बाद तो बराबर बर्फ पड़ती ही जायेगी। उन्हें तो यही सुसंयोग मानना चाहिए कि वे बर्फ के नीचे ही दबीं, जिससे कैबिन बचा रह गया और अब जाड़ों भर सुरक्षित ही समझना चाहिए। अगर उसके साथ चट्टान भी टूटकर गिर गयी होती— तब इस कल्पना से योके सिहर उठी और बोली, ‘चलिए, चलकर बैठें। अभी तो कुछ करने को नहीं है, थोड़ी देर में भोजन की तैयारी करूँगी।’

    दूसरे कमरे में जाकर बैठते हुए श्रीमती एकेलोफ ने कहा, ‘अबकी बार बिलकुल पूरा क्रिसमस होगा। क्रिसमस के साथ बर्फ जरूर होनी चाहिए और अबकी बार बर्फ-ही-बर्फ होगी नीचे-ऊपर सब ओर बर्फ-ही-बर्फ।’ एक स्वरहीन हँसी हँसकर उन्होंने फिर कहा, ‘थोड़ी-सी लकड़ी भी तो पड़ी है— उसको अगर अभी से लाकर यहीं रख छोड़ें तो सूखी रहेगी और क्रिसमस के दिन भारी आग जलाएँगे। क्योंकि गरमाई भी बर्फ से कम जरूरी नहीं है।’ योके ने खोए हुए स्वर में कहा, ‘लेकिन ऑण्टी, क्रिसमस तो अभी बड़ी दूर है। तब तक क्या होगा ?’

    ऑण्टी सेल्मा उठकर योके के पास आ गयीं और उसके कन्धे पर हाथ रखते हुए बोलीं, ‘योके, तुम्हारी अभी उमर ही ऐसी है न। सभी-कुछ बड़ी दूर लगता है। मुझसे पूछो न, क्रिसमस कोई ऐसी दूर नहीं है, मेरे लिए ही-’ और वह फिर बात अधूरी छोड़कर चुप हो गयीं। योके ने एक बार तीखी नजरों उनकी ओर देखा। ऑण्टी सेल्मा क्या कहना चाहती हैं, या कि क्या कहना नहीं चाहतीं जो बार-बार उनकी जबान पर आ जाता है ? क्या वह उनसे सीधे-सीधे पूछ ले कि उनके मन में क्या है ? क्या सचमुच ऑण्टी सेल्मा का यही अनुमान है कि वे दोनों अब बचेंगी नहीं—यही बर्फ से ढँका हुआ काठ का बँगला उनकी कब्र बन जायेगा। बल्कि कब्र बन क्या जायेगा, कब्र तो बनी-बनायी तैयार है औऱ उन्हीं को मरना बाकी है। कब्र तो समय से ही बन गयी है—उन्हें ही मरने में देर हो गयी है—इस काल-विपर्यय के लिए निश्चय ही विधि को दोष नहीं दिया जा सकता। लेकिन वह ऑण्टी सेल्मा से क्या पूछे—कैसे पूछे ? यहाँ सैर करने और बर्फ पर दौड़ करने तो वह स्वेच्छा से ही आयी थी और पहाड़ की अधित्यका में इस काठ-बँगले की स्थिति से आकृष्ट हो गयी थी, और यहाँ रहने का प्रस्ताव भी उसी ने किया था। ऑण्टी सेल्मा गड़रियों की माँ है—दो लड़के अब भी गड़रिए हैं, लकड़हारा हो गया है ; तीनो नीचे गये हुए हैं और जाड़ों के बाद ही लौटकर आयेंगे। यह तो उनका हर साल का क्रम है—जाड़ों में रेवण लेकर नीचे चले जाते हैं और वसंत में फिर आ जाते हैं। यों तो ऑण्टी सेल्मा को भी चले जाना चाहिए था, लेकिन न जाने क्यों इस वर्ष वह यहीं रह गयीं। उन्हें देखकर पहले तो योके को आश्चर्य हुआ था। क्योंकि उसका अनुमान था कि काठ-बँगला खाली ही होगा, जैसा कि प्रायः इन पहाड़ों में होता है। फिर उसने मन-ही-मन अनुमान कर लिया था कि बुढ़िया कंजूस और शक्की तबीयत की होगी और उसको सामान से भरा हुआ खाली छोड़कर जाना न रुचा होगा— जाड़ों में काम-काज तो कुछ होता नहीं, और बर्फ के नीचे उतनी ठण्ड भी नहीं होती जितनी बाहर खुली हवा में, और बूढ़ों को चिन्ता किस बात की—एक ही जगह बैठे-बैठे पगुराते रहते हैं। अतीत की स्मृतियाँ कुरेदकर जुगाली करते हैं और फिर निगल लेते हैं।

    लेकिन जाड़ों भर यों अकेले पड़े रहना साहस माँगता है—कंजूस होना ही तो काफी नहीं है ; और बुढ़िया को कहीं कुछ हो हवा जाये तो…
    योके ने मानो अपने विचारों की गति रोकने के लिए कहा, ‘थोड़ी-सी लकड़ी तो आज भी जलाई जा सकती है—मैं अभी आग जला दूँ ?’

    ऑण्टी सेल्मा ने थोड़ी देर सोचती रह कर कहा, ‘नहीं, अभी क्या करेंगे? या चाहो तो रात को जला लेना।’ फिर थोड़ा रुककर एकाएक रुककर : या कि तुम्हारी अभी आग जलाकर बैछने की इउच्चा है ? मुझो तो आग अच्छी लगती है, पर…’ पर क्या ? यही कि लकड़ी अधिक खर्च हो जायेगी ? पर वैसा सोचना भी निरी कंजूसी नहीं है। कम-से-कम ढाई महीने वहाँ काटने की सम्भावना तो उन्हें करनी ही चाहिए—यानी बचे रहे तो। तीन महीने भी हो जायें तो हो सकते हैं। यों यह भी बिलकुल असम्भव तो नहीं है कि कोई उसे खोजने ही वहाँ आ जाये—घर के लोगों को तो पता ही है और पॉल तो यहाँ से एक ही दिन की दूरी पर होगा। पॉल तो रह नहीं सकेगा—जरूर उसे ढूँढ़ ही निकालेगा—पॉल जो कहा कहता है कि तुम दुनिया के किसी भी देश में होतीं तो मैं तुम्हें खोज निकालता—लाखों, करोड़ों में तुरन्त पहचान लेता…वह दूसरी टोली के साथ दूसरे पहाड़ पर गया था और बर्फ से उतरते आते हुए नीचे मिलने की बात थी। ढाई महीने-तीन महीने !

    कब्रगाह-क्रिसमस ! पाताल-लोक में देव-शिशु का उत्सव। नगर में भगवान् ! पॉल ढूँढ़ निकालेगा—पर किसको, या मेरी… अनचाहे ही योके के मुख से निकल गया, ‘नहीं ऑण्टी सेल्मा, मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। आग से शायद–’
    ऑण्टी सेल्मा फिर थोड़ी देर स्थिर दृष्टि से योके की ओर देखती रहीं फिर उन्होंने धीरे-धीरे, मानो आधे स्वगत भाव से कहा, ‘खतरे की कोई बात नहीं है, योके ! वैसे खतरा तुम्हारे लिए कोई नयी चीज भी नहीं है। तुम तो तरह-तरह के खतरनाक खेल खेलती रही हो। लेकिन एक बात है। खतरे में डर के दो चेहरे होते हैं, जिनमें से एक को दुस्साहस कहते हैं ; कई लोग इसी एक चेहरे को देखते हुए बड़े-बड़े काम कर बैठते हैं और कहीं-के-कहीं पहुंच जाते हैं। लेकिन धीरज में डर का एक ही चेहरा होता है, और उसे देखे बिना काम नहीं चलता। उसे पहचान लेना ही अच्छा है—तब उतना अकेला नहीं रहता। निरे अजनबी डर के साथ कैद होकर कैसे रह सकता है ? नहीं रहा जा सकता—बिलकुल नहीं रहा जा सकता ?..अच्छा, तुम आग जला लो, फिर मेरे पास बैठो, बहुत-सी बातें करेंगे। मैं तो अजनबी डर की बात कह गयी—अभी तो हम—तुम भी अजनबी से हैं, पहले हम लोग तो पूरी पहचान कर लें।’

    15 दिसम्बर :

    कब्रघर के दस दिन। सुना है कि दसवें दिन मुर्दे उठ बैठते हैं और किसी फरीश्ते के सामने अपना हिसाब-किताब करने के लिए हाजिर होते हैं। लेकिन इस कब्रगाह में तो हम दो ही हैं ; और उठ बैठने का कोई सवाल ही नहीं हुआ—और फरिश्ता भी तो हम दोनों में से किसको समझा जाये !
    ऑण्टी सेल्मा तो बूढ़ी है, और हिसाब करने का दिन उसका ही पहले आयेगा। या कि कम-से-कम उसके मन की अवस्था कुछ अधिक वैसी होगी। लेकिन फरिश्ता क्या मैं हूँ ? मेरे भीतर जैसे दूषित विचार उठते हैं उनको देखते हुए इस कल्पना से बड़ा व्यंग्य और नहीं हो सकता ! फरिश्ता हम दोनों में से कोई है तो शायद ऑण्टी सेल्मा, जिसके चेहरे पर अचानक कभी-कभी एक भाव दीखता है जो मानो इस लोक का नहीं है—और जिसे देखकर मैं बेचैन हो उठती हूँ, और मेरा मन हो उठता है कि कुछ तोड़-फोड़ कर बैठूँ।

    16 दिसम्बर :

    एक अन्तहीन, परिवर्तनहीन धुँधली रोशनी, जो न दिन की है, न रात की है, न सन्ध्या के किसी क्षण की ही है—एक अपार्थिव रोशनी जो कि शायद रोशनी भी नहीं है ; इतनी ही कि उसे अन्धकार नहीं कहा जा सकता। हमेशा सुनती आयी हूँ कि कब्र में बड़ा अँधेरा होता है, लेकिन यहाँ उसकी भी असम्पूर्णता और विविधता है। शायद यही वास्तव में मृत्यु होती है, जिसमें कुछ भी होता नहीं, सब कुछ होते-होते रह जाता है। होते-होते रह जाना ही मृत्यु का विशेष रूप है जो मनुष्य के लिए चुना गया है जिसमें कि विवेक है, अच्छे-बुरे का बोध है। यह उसमें न होता तो उसका मरना सम्पूर्ण हो सकता। जो चुकता वह सम्पूर्ण चुक जाता ; या जो रहता उसका बना रहना भी असन्दिग्ध होता। यह हमारे युगों से सँचे हुए नीति-बोध की सजा है कि हमारा मरना भी अधूरा ही हो सकता है—मरकर भी कुछ हिसाब बाकी रह जाता है।

    एक धुँधली रोशनी—एक ठिठका हुआ निःसंग जीवन। मानो घड़ी ही जीवन को चलाती है, मानो एक छोटी-सी मशीन ने जिसकी चाबी तक हमारे हाथ में है, ईश्वर की जगह ले ली है। और हम हैं कि हमारे में इतना भी वश नहीं है कि उस यंत्र को चाबी न दें, घड़ी को रुक जाने दें, ईश्वर का स्थान हड़पने के लिए यन्त्र के प्रति विद्रोह कर दें, अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दें !….घड़ी के रुक जाने से समय तो नहीं रुक जायेगा और रुक भी जायेगा तो यहाँ पर क्या अन्तर होने वाला है, घड़ी के चलने पर भी तो यहाँ समय जड़ीभूत है। एक ही अन्तहीन लम्बे शिथिल क्षण में मैं जी रही हूँ—जीती ही जा रही हूँ—और वह क्षण जरा भी नहीं बदलता, टस-से-मस नहीं होता है ! क्या अपने सारे विकास के बावजूद हम मनुष्य भी निरे पौधे नहीं हैं जो बेबस सूरज की ओर उगते हैं ? अँधेरे में भी अंकुर मिट्टी के भीतर-ही-भीतर सूरज की ओर बढ़ता है, रौंदा जाकर फिर टेढ़ा होकर भी सूरज की ओर ही मुड़ता है। कोई कहते हैं कि सब पौधे धरती के केन्द्र से बाहर की ओर बढ़ते हैं—यानी केन्द्र से दूर हटने की प्रवृत्ति उन्हें सूरज की ओर ठेलती है। लेकिन इस केन्द्रापसारी प्रवृत्ति को भी अन्तिम मान लेना तो वैसा ही है जैसे हम पृथ्वी को सौर-मण्डल से अलग मान लें। पृथ्वी भी सूरज की ओर खिंचती भी है और सूरज की ओर से परे को ठिलती भी रहती है। इसी तरह अंकुर भी जड़ों को नीचे की ओर फेंकता है और बढ़ता है सूरज की ओर।
    और हम जड़ें कहीं नहीं फेंकते, या कि सतह पर ही इधर-उधर फैलाते जाते हैं, लेकिन जीते हैं सूरज के सहारे ही ; अनजाने ही वह हमारे जीवन की हर क्रिया को, हर गति को अनुशासित कर रहा है। हम सब मूलतया सूर्योपासक हैं ; और हमारे चेतन में चाहें जो कुछ हो, हमारे जीवन में सूर्य ईश्वर का पर्याय है। सूर्य और ईश्वर, सूर्य और समय, इसलिए सूर्य और हमारा जीवन—जहाँ सूर्य नहीं है वहाँ समय भी नहीं है।

    लेकिन मैं जहाँ हूँ क्या सूर्य वहाँ सचमुच नहीं है ? क्या काल वहाँ सचमुच नहीं है ? क्या दावे से ऐसा न कह सकना ही मेरी यहाँ की समस्या नहीं है ? मैं मानो एक काल-निरपेक्ष क्षण में टँगी हुई हूँ—वह क्षण काल की लड़ी में से टूटकर कहीं छिटक गया है और इस तरह अन्तहीन हो गया है—अन्तहीन और अर्थहीन।

    19 दिसम्बर :

    शाम को हम लोग ताश खेलने बैठे थे। ऑण्टी सेल्मा न जाने कहाँ से एक पुराना डिब्बा ले आयी थी। जिसमें ताश की जोड़ी रखी थी। मुझसे बोली, ‘मुझे खेलना तो नहीं आता, लेकिन तुम सिखाओगी तो सीख लूँगी। तुम्हारा मन भी लगा रहेगा।’
    ऐसी बात नहीं थी कि वह ताश का खेल बिलकुल न जानती हो। थोड़ी देर बाद जब हम लोग खेलने लगे तो मैंने पाया कि ऐसा नहीं है कि बुढ़िया को उलझाए रखने के लिए या समय काटने के लिए ही हम लोग जबरदस्ती खेल रहे हैं। खेल अपने-आप चल निकला था। लेकिन एकाएक बुढ़िया की ओर से पत्ता फेंकने में देर होने पर मैंने आँख उठाकर देखा—पत्ती खींचते-खींचते वह सो गयी थी, यद्यपि पत्तों पर उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई थी। मैं चुपचाप बैठी रही। अगर उसके हाथ से पत्ते फिसल रहे होते तो लेकर समेट देती, लेकिन इस हालत में पत्ते लेने की कोशिश से वह जाग जाती। मैं किंकर्तव्यविमूढ़-सी उसके चेहरे की ओर देखती रही। साधारणतया मैं उसकी ओर प्रायः नहीं देखती, क्योंकि मुझे डर लगा रहता है कि कहीं मेरी आँखों में कोई छिपा हुआ विरोध-भाव उसे न दीख जाये ; क्या फायदा, जब इस कब्र-घर में जितने दिन साथ रहना है, रहना ही है…

    अब उसका चेहरा देखते-देखते एकाएक मुझे लगा कि वह बड़ा दिलचस्प चेहरा है, जिसे देर तक देखा जा सकता है। लेकिन अनदेखे ही, क्योंकि बुढ़िया से आँख मिलने पर शायद सब कुछ बदल जाता।
    चेहरे की हर रेखा में इतिहास होता है और ऑण्टी सेल्मा का चेहरा जिन रेखाओं से भरा हुआ है वे सब केवल बर्फानी जाड़ों की देन नहीं हैं। लेकिन क्या मैं उस इतिहास को ठीक-ठीक पढ़ सकती हूँ ? आँखों की कोरों से जो रेखाएँ फूटती हैं और एक जाल-सा बनाकर खो जाती हैं, उनमें कहीं बड़ी करुणा है—एक कर्मशील करुणा, जो दूसरों की ओर बढ़ती है, ऐसी करुणा नहीं जो भीतर की ओर मुड़ी हुई हो और दूसरों की दया चाहती हो। लेकिन नासा के नीचे और होठों के कानों पर जो रेखाएँ हैं वे इस करुणा का खण्डन न करती हुई भी और ही कुछ कहती हैं…मेरी आँखें सारे चेहरे पर घूमकर फिर बुढ़िया की बन्द आँखों पर टिक गयीं। अगर उसकी पलकें पारदर्शी होतीं—एक ही तरफ से पारदर्शी, जिससे कि बुढ़िया तो सोयी रहती पर मैं उसकी आँखों में झाँक सकती—तो मैं शायद इस पहेली का उत्तर पा लेती। उन आँखों से पूछ लेती कि बुढ़िया के जीवन का रहस्य क्या है—क्या बात है उसके अनुभव-संचय में जिस तक मैं पहुँच नहीं पाती हूँ।
    कि एकाएक मैंने जाना कि बुढ़िया की आँखें खुली हैं। बिना हिले-डुले अनायास भाव से वे खुल गयी थीं और भरपूर मेरी आँखों में झाँक रही थीं। मैंने सकपकाकर आँखें नीची कर लीं।

    बुढ़िया ने मानो मुझे असमंजस से उबारते हुए कहा, ‘मैं सो गयी थी। मुझे माफ करना।’ और उसने हाथ का पत्ता खेल दिया।
    बात इतनी ही थी। लेकिन न जाने क्यों मुझे लगा कि वह सोयी हुई नहीं थी। नींद में—चाहे कितनी भी हल्की नींद में—स्नायु कुछ-न-कुछ ढीले होते ही हैं और उनकी शिथिलता पहचानी जा सकती है। लेकिन बुढ़िया में कहीं भी उसका कोई लक्षण नहीं दिखा था—वह मानो एकाएक कहीं गायब हो गयी थी और फिर लौटकर आयी थी—और उसमें मैं औचक पकड़ी गयी थी।

    20 दिसम्बर :

    आज फिर वैसा ही हुआ। बुढ़िया ने एकाएक आँखें बन्द कर लीं और मुझे लगा कि वह सो गयी है। लेकिन मैं दुबारा पकड़ी जाने को तैयार नहीं थी। मैंने उसके चेहरे पर आँखें नहीं टिकायीं, कनखियों से ही बीच-बीच में देखती रही। लेकिन मुझे लगा कि ऑण्टी का चेहरा सफेद पड़ गया है। मुझे यह भी लगा कि अगर मैं साहस करके आँख उठाकर देख सकूँ तो पाऊँगी कि उसकी पलकें सचमुच पारदर्शी हैं—बल्कि शायद सारी त्वचा ही पारदर्शी है।

    जब देर तक वह नहीं जागी तो मैंने हिम्मत करके आँखों से, नीचे तक के उसके चेहरे की ओर देखा। चेहरा निश्चल ही था, लेकिन मुझे लगा कि होंठ न केवल शिथिल ही हुए हैं बल्कि थोड़ा और कस गये हैं। और गले में एक ओर रह-रहकर एक स्पन्दन भी होता जान पड़ा—मानो शिराएँ खिंचती हैं और फिर ढीली हो जाती हैं, फिर खिंचती हैं और फिर ढीली हो जाती हैं। यह तो शायद नींद नहीं है ; और बोलना उसमें बाधा देना भी नहीं होगा…मैंने एकाएक पूछा, ‘तबीयत तो ठीक है ऑण्टी ?’

    ऑण्टी ने बिना हिले-डुले आँखें खोलकर कहा, ‘हाँ, मैं बिलकुल ठीक हूँ—यों ही थोड़ी शिथिलता आ जाती है।’
    मैं चुप रही। थोड़ी देर बाद ऑण्टी थोड़ा हिली और फिर कुर्सी में ही अपनी बैठक बदलकर पूरी तरह जाग गयी।
    मैंने पूछा, ‘ओढ़ने को कुछ ला दूँ ?’
    उन्होंने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। बल्कि जो कहा उससे स्पष्ट था कि बात टाली जा रही है—कि उन्हें यह पसन्द नहीं है कि मैं उनकी तरफ अधिक ध्यान दूँ।

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