नीलिमा चौहान बहुत चुटीले लहजे में गहरी बात लिख जाती हैं. चर्चित पुस्तक ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स’ में उनकी भाषा उनकी बारीक नजर का जादू हम सब देख चुके हैं. यह उनके रचनात्मक गद्य की नई छटा है. समय की छवियाँ और उनके बयान की तुर्शी- मॉडरेटर
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रैम्प पे रामजी । रिंग में कपिजी ।
आजकल रजधानी के वाहनों के पिछवाड़े पर क्रुद्ध चेहरे वाले भगवान हनुमान को चिपकाने का चलन ज़ोरों पर है । दूसरी तरफ रामनवमी के पावन पर्व पर नए वाले चॉकलेटी राम भी मार्किट में अवतरित हुए हैं । पीठ पर धनुर्धधारण के साथ साथ पेट पर पूरे के पूरे छः पैक भी धारित करने वाले भगवान राम इस वॉल से उस वॉल इस खिड़की से उस खिड़की भिजाए चिपकाए जा रहें हैं ।
देखिए आपके देवता लोग आपकी मर्जी । अपने को क्या । पर क्या है कि धार्मिक त्यौहारों पर जब लोग पूजाकाज में लगे होते तब अपने को खुराफात की खुजली जोर से लगने लगती । तो इधर आकर बाल की खाल निकाल रहे आशा है कि आप ज्यादा तनावित न होंगे ।
हाँ तो दोस्तो बात यह कि मन ही मन भगवान की सख्त बेपरवाही करने वाली कन्या जब बड़ी होकर बहुत कड़ी काफ़िर बनी तो उस तक के मन में दो मेन भगवानों की इस गति पर पर्याप्त पीड़ा उठी है। हैरानी भी उठी कि देश और धर्म के पर्यायकरण करने वाले उर बात बेबात आहत हो जाने वाले भक्त जनों का गुस्सा ईश- प्रदूषण की इन हिमाकत भरी घटनाओं पर नदारत ? काय कू रे ?
राम झूठ न बुलवाए तो सच कहूँ कि रामायन के राम जी के मर्यादा पुरुषोत्तम रूप की दीवानगी अपन के दिल में तब से थी जब अपन मुहल्ले और टी वी पर रामलीला के लाचार दर्शक बनाए जाते थे । काफिरी को सीने में दबाए दबाए जब अपन खजूरवत बड़े हुए तो निराला के राम पर फिदा हो गए । हनुमान जी पर मरना ठीक वैसे ही रहा जैसे उपनायक पर मरा जाता है । इस वास्ते अच्छे भले अपीलिंग भगवानों की ऐसी बेकद्री के खिलाफ आवाज़ उठाना अपना फर्ज लग रहा अपने को।
अर्रे ! इससे पहले के आप इस लोफराना अंदाज़ के चलते पोस्ट से नौ दो ग्यारह हो लें बता दूं कि फिलहाल मेरा इरादा इतने ज़हीन , मर्यादाशील , कर्मवीर ,असुर निकन्दन देवताओं की छवि में सेंध लगाकर उसमें उग्र मुलकवाद के छर्रे फिट करने की साज़िश को जतलाने भर का है । और कुछ नहीं । कसम से ।
कहे दे रहे कि आपका आप जानें पर मेरे मन में बसे किरदार श्रीराम राजीव लोचन हैं । भवें विशाल धनुर सी तनीं बनीं । रसायन राम । नयनों से प्रिय सम्भाषण करने वाले । स्थित प्रज्ञ । स्थिर राघवेंद्र जिनको यदि हिला रहा संशय पर तब भी निष्कम्प दीप की ज्योति से जगमग करते से । सजल नयनों में जगती भर के लिए जो पूरी पड़े वह स्नेहसिक्ति लिए से। दिव्याभा से दीप्त वदन । इंदीवर निंदित लोचन से स्मित बिखेरते हुए से । पीड़ाहर्ता । परदुखकातर । श्रम स्वेद से जड़ित यौवन । अन्याय और अंधियारे से सतत संघर्षरत ।
अजी आप अपने नए राम को गढ़ते हुए जिस पौरुष को जिमोत्कर्ष भाव से रच रहे वह तो फुसफुस राम है । मंचित मॉडल राम । कठपुतली राम एमेच्योर के मनचले मेकअप से उत्कीरित । आत्मरति में लिप्त राम । जन जन के राम नहीं वे । ये तो बाज़ार के
राम हैं । विज्ञापित राम । आयातित राम । खालिस रघुनायक की तरल छवि पर आरोपित उथले मस्तराम ।
वैसे अपने को कम समझ में आता कि रामसिया प्रिय बालसुलभ भोलेपन वाले हनुमान छवि की विदाई की जा रही है या अपहरण । पर यह तो तय है कि हनुमान की नई डब्ल्यू डब्ल्यू एफ छवि जम रही है भक्तों को । “आतंक की करो मौलिक कल्पना “- के तहत जीने वालों को एक भले देवता का दरिंदगी भरा रूप खूब रुच रहा है । बल लेकिन दिशा विहीन । शक्ति लेकिन सम्वेदना विहीन । पौरुष लेकिन मर्यादाविहीन ।
मज़ाले सुखन कहेंगे आप पर अपन को कहना पड़ेगा कि यह शफाखाना वाली ताकत का धार्मिक स्थापन है । बदले और भय का मानकीकरण करना है । नए हिन्दू राष्ट्र के ओल्ड इज़ गोल्ड देवता लोग के पुनरुत्थान की आड़ में की जा रही धोखेबाज़ी है । इसे एंग्री यंग मैनों का देवताकरण कहिए या देवताओं का साधारणीकरण । एक नए धर्म युद्ध के लिए देवछवियां तैयार हो रही है और फिलहाल वह स्थापना काल में है । जिसका मकसद विधर्मियों के खात्मे वाली रघुकुल रीति स्थापित करना है । जहां अधर्म की परिभाषा का अतिव्याप्तिकरण किया जाना तय है । गाय ,प्रेम विवाह ,देशगान , शत्रु धर्म । नए मसले नये धर्म युद्ध। नए देवता । क्रोध बर्बरता और मदांधता से लबरेज़ देवता ।
लगता है वह वक्त आ गया है जब हमारा उग्र देशप्रेम और हमारी अंध भगवतभक्ति ” मैं तुम में समा जाऊं तुम मुझमें समा जाओ ” की सम्भोगशील अवस्था में रत हैं ।आने वाले वक्त में राम और हनुमान अपने भक्तों की आरोपित भावना के जाल के सबसे निरिह कैदी होंगे । तुलसी के राम हनुमान से लेकर निराला के राम हनुमान तक के रेखाचित्र हमारे जिहाद की जिद से विरूपित हो लेंगे। एक वक्त था जब औरतों को घर और रसोईघर में घुसाया गया और देवताओं उनकी हिफाज़त निगरानी का ज़िम्मा सौंपा गया था । एक यह वक्त है जब देवता हमारे वाहनों की पीठ पर चिपक चल रहे हैं । आग्नेय नेत्रों से , तनी भृकुटी से उग्र चेतस देवता शैतान में म्यूटेट होते जा रहे।
आज सड़कों पर भक्ति बह रही कल बहेगा खून । क्या देख रही हूँ । देवता और शैतान पास पास आ रहे । रेखाएं ओवरलैपिंग कर रहीं । हट्ट !! चश्मे का नम्बर बढ़ गया है लगता ।
हे राम ! हे रावण !

