गौतम राजऋषि की कहानी ‘चिल-ब्लेन्स’

सेना और कश्मीर के रिश्ते को लेकर इस कहानी का ध्यान आया। गौतम राजऋषि की यह कहानी इस रिश्ते को एक अलग ऐंगल से देखती है, मानवीयता के ऐंगल से। मौक़ा मिले तो पढ़िएगा- मॉडरेटर

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            “क्या बतायें हम मेजर साब, उसे एके-47 से इश्क़ हो गया और छोड़ कर चली गई हमको” कहते-कहते माजीद की आँखें भर आई थीं | माजीद…माजीद अहमद वानी…उम्र क़रीब सैंतीस-अड़तीस के आस-पास, मेजर नीलाभ से बस कुछेक साल बड़ा…मेहदी से रंगी हुई सफ़ेद दाढ़ी पर चढ़े हल्के भूरे रंग की परत उसकी आँखों के कत्थईपन को जैसे सार्थक करती थी |  तक़रीबन छह महीने पहले जब नीलाभ ने इस सैन्य-चौकी की कमान संभाली थी, कुपवाड़ा शहर के दक्षिणी किनारे पर अवस्थित सेना के एक महत्वपूर्ण बेस-हेडक्वार्टर की अग्रिम सुरक्षापंक्ति के तौर पर, माजीद का विस्तृत परिचय चौकी के पिछले कर्ता-धर्ता ने दिया था इलाके के बारे में चौकी की कमान देने से पहले…“आसपास के औसत युवाओं से एक़दम अलग सोच वाला और सुलझा हुआ युवक है और अगल-बगल की तमाम ख़बरें लाकर देता रहेगा…उसे चतुराई से इस्तेमाल करना”…चलते-चलते कहा था मेजर कौस्तुभ ने जाने से पहले |

            चौकी की कमान संभाले हुये दूसरा ही तो दिन था, जब मार्च की उस ठिठुरती दोपहर को माजीद आया था मिलने द्वार पर खड़े संतरी को पिछले मेजर का हवाला देते हुए…

            “सलाम वलेकुम, साब! वो मेजर नीलाभ वर्मा आप ही हैं ?” किसी गहरे कुएं से आती हुई एक अजब सी कशिश से भरी आवाज़ वाला माजीद अहमद वानी उस दिन से नीलाभ का लगभग सब कुछ हो चुका था…उसका दोस्त, उसका हमसाया…उसका फ्रेंड-फिलॉसोफर-गाइड | उसकी आँखों में एक कैसा तो कत्थईपन था जो हर वक़्त मानो पूरी की पूरी झेलम का सैलाब समाये रखता था अपनी रंगत में और हाथ इतने सुघड़ कि नीलाभ के उस लकड़ी के बने इकलौते कमरे का हर हिस्सा हर घड़ी दमकता रहता था | इन छ महीनों में जाने कब उसने कम्पनी द्वारा प्रदान किये गए रसोइये को बेदख़ल कर दिया था, नीलाभ को पता तक ना चला | उन सुघड़ हाथों की बनी रोटियाँ जैसे अपनी पूरी गोलाई में स्वाद का हिज्जे लिखा करती थीं और यही स्वाद जब उसके हाथों से उतर कर करम के साग या फिर मटन के मार्फत जिह्वा की तमाम स्वाद-ग्रंथियों तक पहुँचता तो नीलाभ का उदर अपने फैले जाने की परवाह करना छोड़ देता | अभी उस रात जब उसके हाथों के पकाये वाजवान का लुत्फ़ लेते हुये नीलाभ ने कहा कि “माजीद, तेरी बीवी तो जान छिड़कती होगी तुम्हारे हाथों का रिस्ता और गुश्ताबा खा कर” तो एक़दम से जैसे कत्थई आँखों में हर वक़्त उमड़ती झेलम अपना पूरा सैलाब लेकर कमरे में ही बहने लगी थी | पहले तो बस पल भर को एक विचित्र सी हँसी हँसा वो…वो हँसी जो उसके पतले होठों से फिसल कर उसकी मेहदी रंगी दाढ़ी में पहले तो देर तक कुलबुलाती रही और फिर धच्च से आकर धँस गई मेजर नीलाभ के सीने में कहीं गहरे तक |

            “क्या बतायें हम मेजर साब, उसे एके-47 से इश्क़ हो गया और छोड़ कर चली गई हमको !” दाढ़ी में कुलबुलाती हँसी के ठीक पीछे-पीछे चंद हिचकियाँ भी आ गई थीं दबे पाँव |

            “क्या मतलब ? क्या कह रहे हो, माजीद ?” अगला निवाला नीलाभ के मुँह तक जाते-जाते वापस प्लेट में आकर ठिठक गया था |

            “हमारी मुहब्बत, दो धूप-सी खिली-खिली बेटियाँ, भरा-पूरा घर और आपका ये रिस्ता-गुश्ताबा वग़ैरह कुछ भी तो नहीं रोक पाया हमारी कौंगपोश को | इन सब पर एके-47 का करिश्मा और नामुराद जिहाद का जादू ज़ियादा भारी पड़ा, मेजर साब |”

            “कौंगपोश ? तुम्हारी बीवी का नाम है ? बड़ा खूबसूरत नाम है ये तो ! क्या मानी होता है इसका ?”

            “जी साब ! केसर का फूल…उतनी ही ख़ूबसूरत भी थी वो, बिलकुल केसर के फूल की तरह ही !” हिचकियाँ जिस तरह दबे पाँव आई थीं, उसी तरह विलुप्त भी हो गईं…लेकिन झेलम का सैलाब अब भी उमड़ ही रहा था अपने पूरे उफ़ान पर |

            “हुआ क्या माजीद ? तुम चाहो तो शेयर कर सकते हो मेरे साथ सब बात…अब तो हमदोनों दोस्त हैं ना !”

            “आप बहुत अच्छे हो, मेजर साब ! हुआ कुछ नहीं, बस हमारी क़िस्मत को हमारी मुहब्बत से रश्क होने लगा था और हमारी मुहब्बत ने इस कश्मीर वादी के आवाम की तरह ही एके-47 के आगे अपनी जबीं टेक दी |”

            “तुम तो शायरी भी करते हो माजीद !”, उसे छेड़ते हुये नीलाभ ने कहा तो झेलम का उमड़ता सैलाब थोड़ा-सा थमक गया जैसे |

            “मुहब्बत ने जितने बड़े शायर नहीं पैदा किए होंगे, बेवफ़ाई ने उससे कहीं ज़ियादा और उससे कहीं बड़े-बड़े शायर दिये हैं इस जहान को | कौंगपोश को शायरी वाले माजीद से ज़ियादा एके-47 वाला उस्मान भाया और वो चली गई एक दिन हमको छोड़ के |”

            सिहरते हुये सितम्बर की जुम्मे वाली ये रात एक नए माजीद से मिलवा रही थी नीलाभ को , जो इन छ महीनों में अब तक छिपा हुआ था उस से | खाना ख़त्म करके बर्तन वग़ैरह धुल जाने के बाद, जब वो गर्म-गर्म कहवा लेकर आया तो उसकी आँखों के कत्थईपन ने अब झेलम के सैलाब को पूरी तरह ढाँप लिया था | कहवे के कप से इलायची और केसर की मिली-जुली ख़ुशबू लेकर उठती हुई भाप, कमरे में एक़दम से आन टपकी चुप्पी को एक अपरिभाषित-सा स्टीम-बाथ दे रही थी | फ़र्श पर चुकमुक बैठा अपने दोनों हाथों से कहवे के कप को थामे हुये माजीद बस अपने लौकिक अवतार में ही उपस्थित था नीलाभ के साथ…मन तो जाने कहाँ विचरण कह रहा था उसका | देर बाद स्वत: ही उसकी आवाज़ ने नीलाभ को कहवे के स्वाद और सुगंध की तिलिस्मी दुनिया से बाहर खींचा | कुआँ जैसे थोड़ा और गहरा हो गया था…

            “उस्मान नाम है उसका, साब ! हमारे ही गाँव दर्दपुरा का है | दस बरस पहले जिहादी हो गया | उस पार गया था ट्रेनिंग लेने | गाँव में आता था फ़ौज से छुप-छुपा कर और कौंगपोश से मिलता था | उसे रुपये-पैसे देता था और उसके लिए खूब सारे तोहफ़े भी लाता था | हमारे दर्दपुरा की लड़कियों पर एक अलग ही रौब रहता है, साब, इन जिहादियों का | तक़रीबन सत्तर घर वाले हमारे गाँव में कोई भी घर ऐसा नहीं है, जिसका लड़का जिहादी ना हो | एक तरह का रस्म है साब, हमारे दर्दपुरा का | मेरे दोनों बड़े भाई भी जिहादी थे…मारे गये फ़ौज के हाथों | मुझपे भी बड़ा ज़ोर था, साब, भाई के मरने के बाद…लेकिन मुझे कभी नहीं भाया ये जिहाद-विहाद |”

            “हासिल तो कुछ होना ही नहीं है इस जिहाद से और इस आज़ादी के नारों से, माजीद ! जिस पाकिस्तान की शह पर ये बंदूक उठाए घूमते हैं, उसी पाकिस्तान से अपना मुल्क तो संभलता नहीं !” नीलाभ से  रहा नहीं गया तो उबल सा पड़ा था वो…उसकी आँखों के सामने बीते वर्षों में अपने चंद साथियों की शहादत का मंज़र तैर उठा था |

            “सच पूछिए तो मेजर साब, ख़ता हमारे क़ौम की भी नहीं है | शुरुआत में जो हुआ सो हुआ…उसके बाद हमारी पीढ़ी के लिए आज़ादी का नारा उस भूत की तरह हो गया है, जिसके क़िस्से हम बचपन में अपनी नानी-दादी और वालिदाओं से सुनते आते हैं और बड़े होने के बाद ये समझते-बूझते भी कि भूत-प्रेत कुछ नहीं होते, मगर फिर भी ज़िक्र किए जाते हैं |”

            “ख़ता कैसे नहीं हुई, माजीद ? एक पूरी क़ौम ने एक दूजी पूरी क़ौम को जलावतन कर दिया और तुम कहते हो कि ख़ता क़ौम की नहीं है ?” चंद कश्मीरी पंडित मित्रों द्वारा सुने हुए सितम के क़िस्से इस वक़्त नाच उठे थे नीलाभ की आँखों के सामने | माजीद थोड़ा सहम-सा गया था नीलाभ की इस औचक प्रतिक्रिया पर |

            “आपका ग़ुस्सा सर-आँखों पर मेजर साब ! उस एक ख़ता की जो हमारे पंडित हमसायों की क़ौम के साथ हुई…उसकी तो कोई तौबा ही नहीं साब ! वो जाने किस क़ाबिल शायर ने कहा है ना साब कि लम्हों ने ख़ता की है सदियों ने सज़ा पायी…उसी की सज़ा तो हम भुगत रहे हैं | पूरी की पूरी एक पीढ़ी गुम हो गई है साब | निकाह के लिए लड़के नहीं हैं अब तो हमारी क़ौम में | आप यक़ीन करोगे साब, हमारे दर्दपुरा में कुंवारी लड़कियों की गिनती लड़कों से दूनी से भी ज़ियादा है | लड़के बचे ही नहीं इस नामुराद जिहाद के चक्कर में |” वो गहरा कुआँ जैसे एक़दम से भर सा गया था और नीलाभ को ख़ुद पर अफ़सोस होने लगा अपने इस बेवज़ह के ग़ुस्से से | ख़ुद पर बरस पड़ी खीझ की भरपाई करने के लिए, एक़दम से कह उठा नीलाभ उस से…

            “मुझे अपने गाँव कभी नहीं ले चलोगे, माजीद ?”

…और माजीद तो जैसे किलक ही पड़ा ये सुनकर | तय हुआ कि अगले सप्ताहांत का फ़ायदा उठाते हुये चौकी की तात्कालिक जिम्मेदारी सूबेदार रतन सिंह को सौंप कर माजीद के गाँव का भ्रमण किया जाएगा |

            74.420 डिग्री के अक्षांश और 34.311 डिग्री देशांतर पर बसे दर्द्पुरा गाँव तक पहुँचने के लिये कुपवाड़ा शहर को दायें छोड़ते हुये मुख्य सड़क से फिर से दायीं तरफ उतरना पड़ता है | पहाड़ों पर घूमती कच्ची सड़क पर लगभग साढ़े चार घंटे की हिचकोले खाती ड्राइव के पश्चात चारों तरफ़ से पहाड़ों से घिरे इस गाँव तक पहुँचने पर सम्राट जहांगीर के कहे “गर फ़िरदौस बर रूए ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त”… का यथार्थ मालूम चलता है | दर्दपुरा, जहाँ आज़ादी के इन अड़सठ सालों बाद भी बिजली का खंभा तक नहीं पहुंचा है…जहाँ भेड़ों की देखभाल के लिये एक देसी डॉक्टर तो है लेकिन इन्सानों के डॉक्टर के लिये यहाँ के बाशिंदों को लगभग सत्तर किलोमीटर दूर कुपवाड़ा जाना पड़ता है, इतना ख़ूबसूरत होगा, नीलाभ की कल्पना से परे था | कश्मीर में टूरिस्ट बस गुलमर्ग और सोनमर्ग के मिडोज़ देखकर जन्नत का ख़्वाब बुन लेते हैं, यहाँ तो जैसे साक्षात जन्नत अपनी बाँह पसारे पहाड़ों के दामन में बैठा हुआ था |  सुबह जब माजीद के घर पहुँचा तो जैसे पूरे का पूरा गाँव उमड़ा पड़ा था मेजर साब के स्वागत की ख़ातिर |

            माजीद का परिवार, जिसमें उसके अब्बू और अम्मी और उसकी दो छोटी बेटियाँ, हीपोश और शिरीन…नीलाभ को यूँ लगा कि जैसे दूर जालंधर में बैठा हुआ उसे अपना परिवार यहाँ मिल गया था | माजीद ने अपनी बड़ी वाली नौ साल की बेटी से बड़े गर्व से मिलवाया और ज़िद की कि नीलाभ उस से इंगलिश में कुछ पूछे | सकुचाहट को बड़े ही अंदाज़ में साक्षात अवतरित-सी करती हुई उस गोरी-चिट्टी सेब-सी लाल-लाल गालों वाली छुटकी से उसका नाम पूछा तो उसका “माय नेम इज हीपोश…हीपोश अहमद वानी” कहना जैसे इस सदी का अब तक गुनगुनाया हुआ सबसे ख़ूबसूरत नगमा था |

“एंड व्हाट डज हीपोश मीन माय डियर यंग लेडी ?” नीलाभ ने हंसते हुए पूछा |

“ओ…इट्स अ’ फ्लावर, अंकल ! जेस्मीन फ्लावर !”

            नीलाभ का मन किया उस सकुचाई-सी बोलती हुई जेस्मीन के फूल को गोदी में उठा ले |

            धीरे-धीरे जब अधिकांश गाँव वाले वहाँ से रुख़सत हुये तो चंद बुजुर्गों के साथ नीलाभ अब माजीद के परिवार के साथ अकेला था | ये तय कर पाना लगभग असंभव था कि पूरे परिवार का और ख़ास तौर पर माजीद के अब्बू का नीलाभ पर उमड़ता स्नेह महज़ इस वज़ह से था कि मेजर की सैन्य-चौकी उस परिवार के इकलौते कमाने वाले की आय का साधन थी या फिर वो स्नेह हर मेहमान के लिए नैसर्गिक ही था |

            दालान में सबके साथ बैठा नमकीन चाय के दौर पर दौर चल रहे गोल-गोल सख़्त मीठी रोटियों के साथ का लुत्फ़ उठाता बस चुपचाप सुने जा रहा था नीलाभ वहाँ बैठे बुजुर्गों की बातें | माजीद के अब्बू और उनके हमउम्र बुजुर्गों की क़िस्सागोई नीलाभ को जैसे नब्बे के दशक से पहले वाले ख़ुशहाल कश्मीर की यात्रा पर ले चली थी | एक अपनी ही तरह की टाइम-मशीन में बैठा नीलाभ सत्तर और अस्सी के दशक वाले कश्मीर की यात्रा पर था और तभी नज़र पड़ी उसकी माजीद के अब्बू के बायें हाथ पर | अंगूठे के छोड़ कर बाकी सारी ऊँगलियाँ नदारद थीं उनके बायें हाथ की | एक अजीब सी झुरझुरी दौड़ गई मेजर के पूरे वजूद में उस महज़ अंगूठे वाले हाथ को देखकर | पूछा जब उसने कि ये कैसे हुआ तो वहाँ बैठे तमाम के तमाम लोगों का जबर्दस्त मिला-जुला ठहाका गूँज उठा | नीलाभ तो अकबका कर देखने लगा था क्षण भर को | माजीद भी सबके साथ ठहाके तो नहीं, एक स्मित सी मुस्कान जरूर बिखेर रहा था …और तब जो मेजर नीलाभ वर्मा ने  उन कटी ऊँगलियों की कहानी सुनी तो वो बस दंग से भी ऊपर जो कुछ होता है, वो रह गया |

            अपने अब्बू के बायें हाथ की चारों ऊँगालियों को ख़ुद माजीद ने काटा था…वो भी कुल्हाड़ी से और वो भी तब जब वो बस ग्यारह साल का था | भेड़ पालने के अलावा माजीद के अब्बू का जंगल से लकड़ी काट कर लाने का भी व्यवसाय था | आतंकवाद का उफ़ान चढ़ा ही था कश्मीर में तब | माजीद के दोनों बड़े भाई जा चुके थे उस पार पाक अधिकृत कश्मीर के जंगलों में चल रहे किसी जेहादी ट्रेनिंग कैम्प में और अपनी दो बहनों के साथ माजीद था बस अपने अब्बू और अम्मी के साथ…अब्बू की भेड़ों की देखभाल में हाथ बँटाते हुये और बचपन की सुहानी पगडंडी पर एक़दम से जवान होते हुये | बर्फ़ की चादर में लिपटे सर्दी वाले उन्हीं दिनों में कभी इक रोज़ एक देवदार को अपनी कुल्हाड़ी से धराशायी करते हुये उसके अब्बू के बायें हाथ की तरजनी के जोड़ में भयानक दर्द उठा था | दो रोज़ लगातार भयानक पीड़ा सहते रहे वो…ठीक वहाँ, तर्जनी जहाँ हथेली से जुड़ी रहती है | अम्मी के चंद एक घरेलू उपचार बेअसर रहे थे और तीसरे दिन झिमी- झिमी गिरते बर्फ़ के फाहों में बाहर अपनी बहनों के साथ उधम मचाते माजीद को पकड़ कर ले गए अब्बू भेड़ों के बाड़े में | पहले से पड़े देवदार के एक कटे तने पर अपनी बायीं हथेली बिछाते हुये उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी की तेज धार को तर्जनी और हथेली के जोड़ पर रखा और माजीद को वहीं पड़ा पत्थर उठा कर कुल्हाड़े पर प्रहार करने का हुक्म दिया | सहमा सा माजीद डर से मना करता रहा देर तक, लेकिन फिर एक ना चली उसकी अब्बू की तेज़ आवाज़ में बार-बार दिये जा रहे हुक्म के आगे | उधर माजीद के दोनों हाथों से पकड़ा हुआ पत्थर पड़ा कुल्हाड़े पर और उधर तरजनी छिटक कर अलग हुयी हथेली से | अगली तीन सर्दियों तक ये सिलसिला फिर फिर से दोहराया गया और तरजनी की तरह ही मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा अलग होती गईं इम्तियाज़ अहमद वानी की बायीं हथेली से |

            दर्दपुरा के उस बुजुर्ग, इम्तियाज़ अहमद वानी, का ये अपने तरीके का खास उपचार था चिल-ब्लेन्स से निबटने का | एक उस गाँव में, जहाँ आज भी किसी सच के डॉक्टर से मिलने के लिए सत्तर किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है और वो भी बर्फ़बारी में अगर रास्ता बंद न हो तब…जहाँ शाम को सूरज ढलने के बाद अब भी लकड़ी की मशाल और कैरोसीन वाले लालटेन जलते हों, उन कटी हुई ऊँगलियों की हैरतअंगेज़ दास्तान पर मेजर नीलाभ की हैरानी को चुपचाप तकता हुआ दर्दपुरा जैसे हौले-हौले चिढ़ा रहा था उसे |

अगले दिन…रविवार की उस सिली-सी दोपहर को वापसी की यात्रा में गाँव को पलट कर निहारता हुआ नीलाभ सोच रहा था कि उसके हेडक्वार्टर की प्रतिक्रिया क्या होगी, जब वो उनको अपना प्रोपोजल देगा कि हफ़्ते में दो दिन उसकी सैन्य-चौकी पर पदस्थापित डॉक्टर इस दर्द्पुरा गाँव का विजिट करे !

            जीप के रियर-व्यू मिरर में पीछे छूटते हुए दर्दपुरा का चिढ़ाना जाने क्यों मेजर को एक़दम से एक मुस्कुराहट में बदलता नज़र आ रहा था इस प्रोपोजल पर | पलट कर पिछली सीट पर बैठे माजीद को बताने के लिए कि देखो तुम्हारा गाँव मुस्कुरा रहा है, मेजर नीलाभ वर्मा मुड़ा तो सीट की पुश्त पर सिर टिकाये माजीद का ऊंघना उसे भी रियर-व्यू मिरर में मुस्कुराते दर्द्पुरा के संग मुस्कुराने को विवश कर गया |

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