जयंती रंगनाथ के उपन्यास ‘मैमराज़ी: बजाएगी पैपराजी का बैंड’ का एक अंश

वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका जयंती रंगनाथ के उपन्यास ‘मैमराज़ी: बजाएगी पैपराजी का बैंड’ का एक रोचक अंश पढ़िए। यह उपन्यास हिंद युग्म से प्रकाशित है-

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शशांक अभी भी परेशान लग रहा था। उसने सुंदरी का हाथ पकड़ा और ज़ोर से कहा, “श्श्श! चलो, निकलते हैं यहाँ से।”

“कहाँ जा रहे हैं? किसी के घर?”

शशांक के दिमाग़ में घंटी बजी। भिलाई में वो जानता ही कितने लोगों को है! उसने विरल को फ़ोन लगाया। विरल अभी-अभी ऑफ़िस से निकला था।

“ब्रो, तेरे तो मज़े हैं।” विरल ने शिकायती अंदाज़ में कहा, “तूने बताया क्यों नहीं तू रौनी सर के घर शाम की दावत में इनवाइटेड है? बता देता तो हम भी साथ चल देते। वैसे भी वहाँ तेरी तरफ़ से तो कोई होगा नहीं।”

शशांक का मुँह खुला रह गया, “विरल, तुझे ये सब कैसे पता? मैंने तो नहीं बताया।”

“तो? तेरे न बताने से मुर्ग़ा बाँग नहीं देगा क्या? मेरी छोड़, पूरे भिलाई को पता है।”

शशांक ने सिर झटकते हुए कहा, “अब तुझे मैं पते की बात बता रहा हूँ। मैं रौनी सर के घर नहीं गया। पर ब्रो, मुझे इस समय तेरी ज़रूरत है। आज रात को रहने को जगह मिल सकती है?”

“मेरे घर आजा यार।”

“मेरे साथ सुंदरी भी है।”

“कौन सुंदरी? वो… तेरी गर्लफ़्रेंड? कम्माल है यार! स्साले, तू तो मरवा के छोड़ेगा!”

“तू ज्ञान पेलेगा या मेरा काम करेगा?”

“चल, कुछ सोचता हूँ, कुछ करता हूँ। तू आधे घंटे में मुझे इस ऐड्रेस पर मिल… व्हॉट्सएप कर रहा हूँ। लोकेशन भेज रहा हूँ। हाथ वाला रिक्शा लेना, इस गली में टैंपो या ऑटो वाले नहीं आते।”

शशांक ने तुरंत पास से जा रहे एक रिक्शा वाले को रोका, उसे पता बता दिया। रिक्शे में बैठने के बाद सुंदरी ने पूछा, “हम जा कहाँ रहे हैं? मुझे समझ नहीं आ रहा तुम अपने घर से क्यों भाग रहे हो?”

शशांक ने बस उसके होंठों पर अपनी उँगली रख दी। दरअसल, उसे भी समझ नहीं आ रहा था कि वो अपने घर से क्यों भाग रहा है? उसे किसका डर है? पर सच तो यह था कि उसके साथ जो कुछ भी हो रहा था, वो हैंडल नहीं कर पा रहा था। रिक्शे में सुंदरी के बग़ल में बैठकर भिलाई की गलियों में फिरते हुए उसे यह भी लगने लगा कि कहीं सुंदरी को यहाँ बुलाकर उसने ग़लत तो नहीं कर दिया?

गली-गली होते हुए आख़िरकार रिक्शे ने उन्हें मंज़िल तक पहुँचा ही दिया। एकदम तंग गली थी। भिलाई में बने शानदार मकानों की बनिस्बत एकदम पुराने से लगभग खंडहर हुए मकान।

शशांक के पीछे-पीछे बड़े बेमन से सुंदरी रिक्शे से उतरी। उसका मुँह बना हुआ था। वो बड़बड़ाई, “लगता है यहाँ आकर मैंने ग़लती कर दी।”

शशांक ने रिक्शे वाले को बीस का नोट थमाया और सुंदरी का हाथ पकड़कर गली के अंदर जाते हुए बोला, “दिल्ली में भी तो हमने रात-बेरात एडवेंचर किया है। याद नहीं पुरानी दिल्ली में हम पूरी रात घूमते रहे थे। मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली के बाहर सो गए थे। तब तो कुछ नहीं कहा तुमने? तुम न सैंडी, क्लास कॉन्शस हो गई हो।”

“बकवास मत करो। दिल्ली की बात अलग है। भिलाई के बारे में हम कुछ नहीं जानते। मेरे अंकल बता रहे थे कि यह नक्सलियों का इलाक़ा है। देखो इस गली की तरफ़, ऐसा लग रहा है जैसे इसका ओर-छोर ही नहीं है। ऊपर से उस सामने वाले मकान को देखो, एकदम टेढ़ा हुआ पड़ा है एकदम लीनिंग टॉवर ऑफ़ पीसा की तरह।”

“इसी में तो मज़ा है, सैंडी। ज़िंदगी में देखी हुई चीज़ें कीं तो क्या खाक मज़ा आया!”

शशांक ने अपने मोबाइल पर एक बार फिर ऐड्रेस देखा और सामने जा रहे एक आदमी से पूछ लिया, उसने उस टेढ़े मकान की तरफ़ इशारा कर दिया साथ ही यह भी कह दिया कि सँभलकर चढ़ना, दो दिन पहले बीच की सीढ़ियाँ टूट गई थीं।

शशांक अचकचा गया। सुंदरी ने उसे पीछे से खींचा, “मैं नहीं आ रही। तुम बेशक मुझे वापस से स्टेशन छोड़ दो। मुझे जो भी ट्रेन मिलेगी, हॉप-इन कर लूँगी। पर इस खंडहर में अपनी टाँग नहीं तुड़वाऊँगी।”

शशांक ने बिना कुछ कहे उसका हाथ कसकर पकड़ लिया और टेढ़े मकान के अंदर चला गया। सीढ़ियाँ थोड़ी सँकरी थी, पर पूरी थी। सीढ़ियों पर से ही उन्हें गाने-बजाने की आवाज़ सुनाई पड़ने लगी। तीन मंज़िल तक चढ़ते-चढ़ते आवाज़ें बुलंद होने लगी।

दरवाज़े के बाहर जूते-चप्पलों का ढेर लगा हुआ था। शशांक ने कमरे के अंदर झाँककर देखा, लगभग बीस-पच्चीस लड़के ताली बजाते हुए गा रहे थे–

कोनो है झालर धरे, कोनो है घड़ियाल।

उत्ताधुर्रा ठोंकैं, रन झाँझर के चाल॥

पहिरे पटुका ला हैं कोनो। कोनो जाँघिया चोलना दोनों॥

कोनो नौगोटा झमकाए। पूछेली ला है ओरमाए॥

कोनो टूरा पहिरे साजू। सुंदर आईबंद है बाज़ू॥

जतर-खतर फुंदना ओरमाए। लकठा-लकठा म लटकाए॥

ठाँव-ठाँव म गूंथै कौड़ी। धरे हाथ म ठेंगा लौड़ी॥

पीछू मा खुमरी ला बाँधे। पर देखाय ढाल अस खांदे॥

ओढ़े कमरा पंडरा करिहा। झारा टूरा एक जवहरिया॥

हो होकरके छेक लेइन तब। ग्वालिन संख डराइ गइन सब॥

हत्तुम्हार जौहर हो जातिस। देवी दाई तुम्हला खातिस॥

ठौका चमके हम सब्बो झन। डेरूवा दइन हवै भड़ुवा मन॥

झझकत देखिन सबो सखा झन। डेरूवा दइन हवै भड़ुवा मन॥

चिटिक डेरावौ झन भौजी मन। कोनो चोर पेंडरा नोहन॥

हरि के साझ जगात मड़ावौ। सिट सिट कर घर तनी जावौ॥

कमरे के अंदर बैठे विरल की नजर शशांक पर पड़ी। वह लपककर उठा और बाहर आ गया। शशांक ने उसकी बाँह पकड़ ली, “ब्रो, चल क्या रहा है? यहाँ क्यों बुलाया?”

विरल ने फुसफुसाकर कहा, “बस दस मिनट में सब टल जाएँगे। चलो अंदर आओ। तुम्हें पंडित भाई से मिलाता हूँ। यह उनका घर है।”

सुंदरी सीढ़ियों के पास खड़ी थी। शशांक ने उसकी तरफ़ देखकर अंदर आने का इशारा किया। सुंदरी बेमन से अंदर आई। लेकिन वह दूसरों की तरह चप्पल उतारकर बैठी नहीं। वह दरवाज़े के पास ही खड़ी रही। उसने धीरे-से फुसफुसाकर पूछा, “ये लोग कौन हैं?”

जवाब विरल ने दिया, “भाभी, ये लोग भिलाई के लूज़र्स हैं।”

सुंदरी चौंक गई– भाभी!

उसने धीरे से कहा, “ब्रो, मैं सुंदरी हूँ। शशांक की फ़्रेंड।”

“पर इसने तो बताया कि तुम इसकी गर्लफ़्रेंड हो?”

“ढक्कन, एक फ़्रेंड, गर्लफ़्रेंड नहीं हो सकती क्या? ये बताओ भिलाई के लूज़र्स क्या है?”

“वो जो पढ़ना नहीं चाहते, सही रास्ते वाला करियर नहीं बनाना चाहते, गॉसिप की परवाह नहीं करते।”

सुंदरी हँसने लगी, “तुम्हारे शहर में नॉर्मल लोगों को लूज़र्स कहते हैं? ग़ज़ब!”

कमरे में गाना-बजाना बंद हो गया। भिलाई के लूज़र्स धीरे-धीरे एक-एक करके उठने लगे। कमरे में एक कभी सफ़ेद रहे और अब पीले पड़ गए गद्दे पर एक दाढ़ी वाला बंदा बैठा था। सब जाकर उससे हाथ मिलाते, दरवाज़े के बाहर निकलकर अपनी चप्पल ढूँढकर पहनते और ख़रामा-ख़रामा टूटी सीढ़ियों से लटपट नीचे उतर जाते।

विरल ने इशारा किया और उसके साथ शशांक और सुंदरी कमरे के अंदर आ गए। दाढ़ी वाले भाई ने उन्हें तौलते हुए देखा। विरल उसके पास जाकर बैठ गया और धीरे से फुसफुसाते हुए कुछ कहने लगा।

भाई की आँखें अब भी दोनों को तौल रही थीं। अचानक वो ज़ोरों से सिर हिलाने लगा। विरल ज़ोर से बोला, “ब्रो, आकर मिल ले पंडित भाई जी से। तुम्हारा काम हो जाएगा।”

शशांक अपने जूते दरवाज़े पर खोलकर भाई के पास आ गया। भाई ने अपने मुँह में दबा पान गुलगुलाया और पान भरे मुँह से पूछा, “स्वीटी भाभी से परेशान हो?”

शशांक ने विरल की तरफ़ देखा। विरल ने हल्के-से आँख मारते हुए कहा, “पंडित भाई, एकदम परेशान करके रख दिया है लौंडे को। हर समय इसके घर में घुसी रहती है। कैमरा बनकर फिट हो गई है वहाँ। आप न भाई, बस इन दोनों को कुछ दिन अपने पास रख लो। आपके नाम से तो स्वीटी भी डरती हैं।”

पंडित भाई मुँह में पान चुबलाता हुआ उठ गया और अंदर चला गया।

शशांक और सुंदरी पीली गद्दी पर विरल के बाज़ू में बैठ गए। सुंदरी परेशान होकर बोली, “विरल, ये कहाँ ले आए तुम यार?”

“श्श्श भाभी, ये भिलाई की सबसे सेफ़ जगह है। भाई ऊपर से कड़क दिखते हैं, पर अंदर से बहुत दिलदार हैं। ये सच्ची वाले भाई हैं भिलाई के।”

भाई कमरे में आ गया। उसने मुँह साफ़ कर लिया था। कंधे पर गमछा डालकर वो एक मोढ़ा खिसकाकर बैठ गया, “हमें भी बहुत परेशान किया है भिलाई की भाभियों ने। बताओ दोस्त, हम तुम्हारी क्या मदद कर सकते हैं?”

“हमें एक-दो दिन रहने की जगह चाहिए।”

भाई ने सिर हिलाकर कहा, “नो प्रॉबलम। रहो न यहाँ। आराम से रहो। जब तक जी चाहे रहो। अंदर दो-तीन कमरे हैं। पसंद कर लो।”

विरल उठ गया, “भाई, आपको पता है न मैं अपने घर में अलाऊ नहीं कर सकता। मम्मी जी मेरी ले लेंगी।”

शशांक बीच में कूदा, “हम बस आज रात रुकेंगे, कल से होटल।”

भाई ने ज़ोर-से डाँट दिया, “ये होटल-होटल क्या लगा रखा है बे? घर नहीं है क्या? हमारे रहते भिलाई में होटल में रहोगे?”

सुंदरी कुछ चौंकी हुई-सी खड़ी रही। कैसे लोग हैं? किसी को अपने घर में ठहराने से पहले सोच भी नहीं रहे। भाई उठकर उन्हें अंदर ले गया। बाहर का कमरा जितना बेतरतीब था, अंदर का कमरा ख़ूब हवादार और करीने से सजा था। एकदम बड़ी-सी खिड़की। बाहर से झाँकते पेड़ों की डालियाँ। कमरे के अंदर बैठने के लिए बीन बैग थे और ज़मीन पर क़ायदे से बिस्तर और गावतकिया लगा था। दीवार पर एक छोटा-सा टीवी भी लगा था।

भाई ने टीवी का स्विच ऑन करते हुए कहा, “ये कमरा हमने अपने इंटरनेसनल दोस्तों के लिए रख छोड़ा है। तुम लोग यहाँ रहो। किचन में रोज़ ही बीस-तीस लोगों का खाना बनता है। कुछ इस्पेशल चाहिए तो महाराज को बता देना। वो कोसिस करेगा, नहीं तो बाहर से मँगवा देगा।”

भैया के कमरे से निकलने के बाद शशांक ने विरल का हाथ पकड़ लिया, “ये कौन हैं बे तुम्हारा पंडित भाई? हम इनके घर पर क्यों रहें? क्या लगते हैं?”

विरल ने आराम से कहा, “तुम इतना चौंक क्यों रहे हो भई? तुमने बोला था एक रात कहीं रहने का इंतज़ाम कर दूँ, सो कर दिया। अब बात रही भाई की। वो कुछ साल पहले भिलाई स्टील प्लांट में ही काम करते थे। इंजीनियर हैं, पर काम से जी ऊब गया। कुछ झगड़ा-वगड़ा हो गया था। फिर एक नाटक मंडली बना ली। आस-पास के नाटक मंडली के लोग, भिलाई के लूज़र्स इनको अपना हीरो मानते हैं। घर से बहुतै रिच हैं। सुना है हर महीने पचास-साठ हज़ार रुपैया आ जाता है फ़्री में। बस उसीसे दोस्तों के साथ अय्याशी कर लेते हैं।”

“अय्याशी?”

“बात के मर्म को समझो ब्रो। ये जो भाई है न, बहुत दिलदार है। एक बार किसी पर दिल आ गया तो बस अपना बना लेता है। हमने एक दफ़ा भाई की हेल्प की थी, वो आज तक एहसान नहीं भूले हमारा। अब तुम इतनी बकचोदी करोगे तो जाओ लौट जाओ अपने घर, क़ातिल भाभियों के पास।”

नाराज़ होकर विरल ने अपना गप्पू-सा गाल फुला लिया। सुंदरी ने बीन बैग पर पसरते हुए कहा, “हमारे पास चॉइस नहीं है शशांक। तुम अपने घर में नहीं रहना चाहते। होटल में नहीं जाना चाहते। कोई प्लान बी है तुम्हारे पास तो बताओ?”

शशांक झल्ला गया, “अबे, तुम लोग हर बात पर प्लान एबीसी क्यों ले आते हो? ठीक है, आज रात को यहाँ रह लेंगे। कल सुबह सोचते हैं। कल वैसे भी म्यूज़िक कंपटीशन की मैराथॉन रिहर्सल है। सुंदरी को भी झुमकी ऐंड पार्टी से मिलाना है।”

विरल ने लंबी साँस ली और उठ गया। थोड़ी देर बाद कमरे में आकर बोला, “भाई कैरम की महफ़िल जमा रहा है। तुम दोनों खेलोगे?”

पंडित भाई सही में लूज़रों का सम्राट था। एक के बाद एक चार गेम हार गया, पर चेहरे पर चूँ तक नहीं। हँसे जा रहा। जोक पर जोक क्रेक किए जा रहा। राहुल गाँधी पर एक से एक नायाब जोक्स। हँसते-हँसते सुंदरी का बुरा हाल हो गया। वह हँसती भी तो अजीब-सी थी। ज़्यादा हँसती तो हिलने लगती थी, और ज़्यादा हँसती तो रोने लगती थी। हँसाने और हारने के बाद भाई को याद आया कि रसरंजन का तो इंतज़ाम किया ही नहीं। उन्होंने ज़ोर-से पूछ लिया, “तुम बच्चा लोग बियर-शियर पीते हो कि नहीं?”

विरल ने ज़ोर-से नहीं में सिर हिलाया। शशांक के मुँह खोलने से पहले सुंदरी ने कह दिया, “भाई जी, बियर… यप्पी… आज दिनभर में ये सबसे अच्छी बात सुनी।”

भाई हँसने लगा, “सही हो। चलो उठकर फ़्रिज खोलो। पाइनैप्पल जूस के पीछे तीन चिल्ड बियर की बोतल होगी। उठाकर लाओ। और छोटे, किचन में मसाला मूँगफली का पैकेट पड़ा है। एक साफ़ प्लेट में रखकर ले आना।”

मिनटभर में कैरम टेबल के सामने बार सज गया। आड़े-टेढ़े काँच के गिलासों में झागदार बियर आ गई। विरल के सामने पानी का ग्लास रख दिया गया। चारों ने चिन-चिन किया और शुरू हो गए। ठंडी बियर, वो भी भिलाई में। शशांक के कलेजे को जैसे ठंडक मिल गई। उसने चहककर कहा, “भाई, आप असल में हैं कौन?”

भाई हँसा, “एक बड़ा वाला लूज़र हूँ ब्रो। देखा नहीं, एक थकेली-सी बिल्डिंग में रहता हूँ। कुछ नहीं करता। बस, न इससे आगे कुछ न पीछे कुछ।”

सुंदरी ने दो-तीन बड़े वाले घूँट लिए। अब वो कुछ भी बोल सकती थी, “आपको सब लोग भाई क्यों कहते हैं? कोई तो नाम होगा?”

भाई रुका, फिर थोड़ा सकुचाकर बोला, “है न। झंडेलाल।”

सुंदरी इतनी ज़ोर-से हँसी कि बियर की पिचकारी निकल गई। भाई शर्मिंदा हो गया, “बिलकुल यही वजह है कि मैं अपना नाम माथे पर नहीं चिपकाकर चलता। अपुन भाई या पंडित ही ठीक है। वैसे देखो तो झंडेलाल नाम इतना भी बुरा नहीं। मेरे बड़े भाई का नाम घंटेलाल है।”

कहते-कहते भाई ख़ुद हँसने लगा। रात नौ बजे के क़रीब विरल उठ गया, “भाई, अब मुझे इजाज़त दीजिए।”

विरल के जाने के बाद भाई ने महाराज से कहकर चिकन मसाला बनवाया। रोटी बाहर से मँगवाई। ये सब करते-करते दस बज गए। भाई, शशांक और सुंदरी हॉल में नीचे बैठकर खाने पर टूटने ही वाले थे कि शशांक का मोबाइल बजने लगा।

शशांक का उठाने का मन नहीं था। पर सुंदरी ने उसके हाथ में फ़ोन पकड़ा दिया। स्वीटी के हस्बैंड का फ़ोन था। शशांक चौंक गया। इतनी रात गए मिस्टर स्वीटी यानी राज उर्फ़ डीडी का फ़ोन!

शशांक के हैलो कहते ही दूसरी तरफ़ से डीडी की रुआँसी-सी आवाज़ आई, “शशांक, स्वीटी घर से ग़ायब है।”

“क्या?”

“तुम इस वक़्त कहाँ हो?”

शशांक हड़बड़ाया, “बाहर हूँ… कहाँ चली गईं स्वीटी भाभी?”

“पता नहीं भाई, मैं ऑफ़िस से लौटा तो घर का दरवाज़ा खुला हुआ था। बेटा कमरे में बैठकर पढ़ रहा था। बोला, नंदू घर पर आया था, उसके साथ कहीं गई थी। इसके बाद कुछ पता नहीं।”

“डीडी सर, आपने उनको फ़ोन किया?” शशांक घबरा गया।

“उसका फ़ोन ऑफ़ है। मुझे लगा यहीं कहीं गई होगी, किसी के घर। नंदू को बुलाकर पूछा, वो बोला, उसने शाम को स्वीटी को तुम्हारे घर के सामने देखा था।” डीडी की मायूसीभरी आवाज़ आई।

“ओह! लेकिन सर, मैं तो बहुत बीमार हूँ। मैंने स्वीटी भाभी को बताया था, आपने पुलिस को कॉल…”

“नहीं, अभी नहीं किया। मुझे लगा वो लौट आएगी। पुलिस के पास जाने से तो बहुत बदनामी होगी। अच्छा देखता हूँ। कुछ करता हूँ।”

डीडी ने फ़ोन रख दिया। सुंदरी आँखें फाड़े उसकी तरफ़ देख रही थी। उसने भौंहें ऊपर उठाईं।

शशांक ने कंधे झटक दिए, “कुछ नहीं। तुम रुक क्यों गई? तुम्हारा चांस है। गोटी खेलो।”

भाई के चेहरे पर अजीब-सी हँसी थी, “ब्रो, तुमने तो अपनी गोटी सही से खेल ली।”

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