रउफ रज़ा की गज़लें: इरशाद खान सिकंदर की प्रस्तुति

 

2 दिसम्बर 2016 को रऊफ़ रज़ा साहब के इन्तक़ाल की ख़बर ने मुझ समेत तमाम नौजवानों को भी गहरा दुख पहुँचाया था| इसका कारण ये नहीं था कि रऊफ़ साहब अच्छे शायर थे या सीनियर शायर थे(वो तो और लोग भी हैं) बल्कि कारण ये था कि रऊफ़ साहब का व्यवहार हमसे दोस्ताना था|
रऊफ़ साहब के इन्तक़ाल के बाद ‘’ऐवाने-ग़ालिब’’ में उनकी याद में एक प्रोग्राम हुआ था जिसमें फ़रहत एहसास साहब के लफ़्ज़ थे-
’’मौत ने अपना काम कर दिया अब ज़िन्दगी को अपना काम करने दीजिये…रऊफ़ की मौत का जो मुझे दुख है वो ये कि उन्हें भरी बहार में उठाया गया| इस वक़्त वो अपनी शायरी के उरूज पर थे ख़ूब ग़ज़लें कह रहे थे…..’’   ख़ैर…इस बात को यहीं रोक देना ठीक है वरना ‘’बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी….’’|
मुख्य बात ये है कि पिछले महीने उनकी किताब ‘’ये शायरी है’’ उर्दू में प्रकाशित हुई है, उसी किताब से ये पाँच ग़ज़लें पेश कर रहा हूँ| आप पढ़कर देखिये मुझे उम्मीद है आप भी कह उठेंगे ‘’ये शायरी है’’- इरशाद खान सिकंदर

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1
यहाँ-वहाँ से बिखर रहा हूँ ये शायरी है
मैं आज ऐलान कर रहा हूँ ये शायरी है

मैं जानता हूँ कि अगली सीढ़ी पे चाँद होगा
मैं एक सीढ़ी उतर रहा हूँ ये शायरी है

ख़ुदा से मिलने की आरज़ू थी वो बन्दगी थी
ख़ुदा को महसूस कर रहा हूँ ये शायरी है

वो कह रहे हैं बुलन्द लहजे में बात कीजे
मैं हार तस्लीम कर रहा हूँ ये शायरी है

जो उड़ रही है तुम्हारे क़दमों की दिल्लगी से
वो रेत आँखों में भर रहा हूँ ये शायरी है

2
हमरक़्स एहतियात ज़रा देर की है बस
ये महफ़िले-हयात ज़रा देर की है बस

कैसे महक उठे हैं मिरे ज़ख़्म क्या कहूँ
फूलों से मैंने बात ज़रा देर की है बस

मैंने कहा मैं रात के जोबन पे हूँ निसार
उसने कहा ये रात ज़रा देर की है बस

मैं जी उठा मैं मर गया दोबारा जी उठा
ये सारी वारदात ज़रा देर की है बस

कुछ और इन्तेज़ार कि फिर वस्ल-वस्ल है
क़िस्मत ने तेरे साथ ज़रा देर की है बस

3
रौशनी होने लगी है मुझमें
कोई शय टूट रही है मुझमें

मेरे चेहरे से अयाँ कुछ भी नहीं
ये कमी है तो कमी है मुझमें

बात ये है कि बयाँ कैसे करूँ
एक औरत भी छुपी है मुझमें

अब किसी हाथ में पत्थर भी नहीं
और इक नेकी बची है मुझमें

भीगे लफ़्ज़ों की ज़रूरत क्या थी
ऐसी क्या आग लगी है मुझमें

4
गुज़रते वक़्त ने तुमसे मिज़ाज पूछा है
जवाब दो उसे पलकों पे रोक रक्खा है

जहाँ-तहाँ से बिगाड़ो मगर सजा डालो
तुम्हारे सामने सारा जहान फैला है

ज़मीने-इश्क़ को ख़तरा किसी तरफ़ से नहीं
कि ये जज़ीरानुमा इन्तिहा-ए-दुनिया है

फ़ुज़ूलियात है अब शह्र में रवादारी
यहाँ ज़मीन नहीं आसमान चलता है

जहाँ किताब के किरदार बैठे रहते हैं
वहीँ ये तेरा दिवाना भी हँसता रहता है

5
जितना पाता हूँ गँवा देता हूँ
फिर उसी दर पे सदा देता हूँ

ख़त्म होता नहीं फूलों का सफ़र
रोज़ इक शाख़ हिला देता हूँ

होश में याद नहीं रहते ख़त
बेख़याली में जला देता हूँ

सबसे लड़ लेता हूँ अन्दर-अन्दर
जिसको जी चाहे हरा देता हूँ

कुछ नया बाक़ी नहीं है मुझमें
ख़ुदको समझा के सुला देता हूँ

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