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रुपेश दुबे की किताब ‘बोल बच्चन’ का एक अंश

पुस्तक मेले में रुपेश दुबे की किताब ‘बोल बच्चन’ खरीदी. इस किताब का आइडिया मुझे बहुत पसंद आया. अमिताभ बच्चन के संवादों के माध्यम से लिखी गई मोटिवेशनल किताब. बहुत दिलचस्प शैली में लिखी गई यह किताब बहुत अलग सी लगी. आप इसका एक अंश पढ़िए और किताब की शैली से रूबरू होइए- मॉडरेटर   

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आज खुश तो बहुत होगे तुम 

अमिताभ बच्चन की सफलता ने उनकी फ़िल्मी रील लाइफ की एंग्री यंग मैन की छवि तो गढ़ी ही साथ ही उस छवि के इर्द गिर्द या उस छवि को पूर्ण करने के लिए कुछ ऐसे मसाले भी ईजाद किए जो उनकी छवि का हिस्सा बन गए और फिल्म दर फिल्म दोहराए गए | उदहारण के लिए फ़िल्म में उनके पिता की उनके बचपन में ही मृत्य होना या फिर उनका उन्हें मंझधार में छोड़ के चले जाना, जो ज़्यादातर उनके गुस्से का मूल कारण होता था | अपनी माँ से प्यार का अतिरेक, शराब पीना और फिर छोड़ना | समाज में जहाँ-तहाँ हो रहे अत्याचार पर आक्रोश जो इस कदर गहरा था कि भगवान से भी उनकी अक्सर ठन सी जाती थी और तकरीबन अंतिम कुछ रीलों तक वो नास्तिक रहते थे | लेकिन अपने गुस्से को अभिव्यक्त करने के लिए वो भगवान से भी संवाद करते थे | उनका भगवान से किया गया सबसे लोकप्रिय संवाद आपको इस अध्याय के शीर्षक में नज़र आया होगा |

बड़ी कड़वाहट के साथ और खुद को महादेव शिव के लगभग समकक्ष मानने वाले अन्दाज़ में फ़िल्म ‘दीवार’ में वो शिवजी से कहते है कि “आज खुश तो बहुत होगे तुम |” अब वो ठहरे बिग बी , चलो  महादेव से ये प्रश्न कर भी लिया | महादेव ने भी बुरा नहीं माना और उनका ये संवाद कालजयी हो गया | बुरा मानना तो छोड़ो, शिव तो इस कदर प्रसन्न हुए कि पिक्चर सुपर डुपर हिट हो गयी और १०० हफ्ते चलने वाली पिक्चर की श्रेणी में आ गयी | लेकिन मैंने पहले ही कहा की भैया वो ठहरे बिग बी, पर आप को अगर अपने जीवन में फिल्म ‘दीवार’ की तरह सफल होना है और अपने जीवन को फिल्म की तरह ही यादगार बनाना है तो महादेव से यह सवाल पूछने के बजाय कि “आज खुश तो बहुत होगे तुम,” आप अपने अन्दर उपस्थित देव से पूछिए,

“ आज खुश हूँ क्या मै?”

तो जवाब क्या आया ?

क्या कहा ? नहीं हो ! चलो अच्छा है कि नहीं हो, वर्ना यह अध्याय आप आगे नहीं पढ़ते | जस्ट जोकिंग | सेल्फ़-हेल्प – यह वो श्रेणी है जिसमें मैं अपनी इस किताब को रखना चाहूँगा- इस साहित्य श्रेणी का अभ्युदय और इसका जन मानस में स्वीकार्य होना यह दर्शाता है कि आधुनिकता के साथ हमारे जीवन में दुख और दुविधा दोनों बढ़े हैं | ज़रा-सा दिमाग पर ज़ोर डालो तो खुद की पारीवारिक स्तिथि, शैक्षणिक योग्यता , आर्थिक स्तिथि, कैरियर की आपाधापी ऐसी लगती है कि इसमें खुश होने वाली आखिर बात ही क्या है | और यहीं पर व्यक्ति गलती कर जाता है | सदियों से यह बहस चलती आ रही है कि अंडा पहले आया या मुर्गी , सदियों तक आगे भी ये बहस चलती रहेगी | पर एक बात हम इस अध्याय में ही तय कर लेंगे कि- खुशी अधिकांशतः सफलता के पहले आती है | देखा जाये तो ज़्यादातर दुखों का कारक हमारी किसी अधूरी अभिलाषा से जुड़ा होता है जिसमे ‘अगर’ बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है-

  • अगर दसवी में मेरे अंक 90 प्रतिशत के ऊपर आ जाये तो मै खुश हो जाऊँगा !
  • अगर बारहवीं में मेरे अंक 90 प्रतिशत के ऊपर आ जायें तो मै खुश हो जाऊँगा !
  • अगर फ़लाँ लड़का/लड़की मेरे प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार कर ले तो मै खुश हो जाऊँगा !
  • अगर मेरी पत्नी मेरी बात मानने लगे तो मै खुश हो जाऊँगा (जागो मोहन प्यारे) !
  • अगर मुझे पदोन्नति मिल जाए तो मै खुश हो जाऊँगा !

मै पंक्तियों पर पंक्तियाँ लिखते चला जाऊँगा पर इस ‘अगर’ का अंत नहीं होगा और खुशी के दर्शन हमें हो नहीं पायेंगे | यहाँ जानबूझकर मैंने यह नहीं लिखा कि ‘खुशी का अनुभव नहीं हो पायेगा !’ कारण यह कि हम वर्षो से ख़ुशी को एक भावना मान कर चलते हैं जो किसी-न-किसी कार्य विशेष के अपने मनमाफ़िक होने पर अनुभव की जाती है | उसे हम वैसा ही एक्स्ट्रा समझते है जिन्हें हम हमारे हीरो-हीरोइन के इर्द गिर्द मंडराते हुए अपने फ़िल्मी नाच-गानों में देखते है | वह हमें इसलिए दिखाई पड़ जाते है, क्योंकि हमारा ध्यान जो वैसे तो मुख्य हीरो-हेरोइन पर ही रहता है, यदा कदा भटक कर उन तक भी पहुँच जाता है |

लेकिन खुशी को हमें एक क्रिया मान कर चलना होगा जो करने से ही पूर्ण होती है | हमें उसे मुख्य हीरो या सुपरस्टार मानना ही पड़ेगा |

बात जब फिल्मो की चल ही निकली है और आगे भी चलती रहेगी, तो मै एक और उदहारण आपको देता हूँ | जो लोग हमारी हिन्दी फ़िल्मों की कार्यशैली से परिचित होंगे वो तो यह बात जानते ही होंगे और जो परिचित नहीं होंगे उनके लिए मै थोड़ा विस्तार से बता देता हूँ | हमारी फ़िल्मों में अगर किसी सुपरस्टार को ले लिया जाता है तो बाकी की चीज़ें अपने आप हो जाती है | पूँजी निवेशक आसानी से मिल जाते हैं,एक बड़ी नायिका काम करने को तैयार हो जाती है, वितरक और थियेटरवाले आपकी शर्तें मानने को तैयार हो जाते है और हम सब जो जनता जनार्दन हैं वो भी रिलीज़ की तिथि की एडवांस बुकिंग करने को तत्पर रहते है | खुशी को भी हमें इसी सुपरस्टार की तरह समझाना है| हमें सबसे पहले उसके पास पहुँचना है जिस तरह आज के दौर के निर्माता-निर्देशक सलमान, आमिर, शाहरुख़ खान या फिर अक्षय कुमार के यहाँ पहुँचते है अपनी फिल्म बनाने के लिए | और जैसे फिछले ज़माने के, अमिताभ बच्चन के यहाँ पहुँचते थे | आखिर हम अपने जीवन के निर्माता, निर्देशक जो ठहरे |

लेकिन खुशी नामक सुपरस्टार के साथ हमें ‘नियम एवं शर्ते लागू’ वाला एक छोटा स्टार भी मुफ़्त मिलता है | यह स्टार हमें आगाह करने के लिए है कि ‘भैया सिर्फ़ ख़ुशी के पास पहुँचने से या उसे पा लेने से आप के जीवन की वैतरणी पार नहीं होने वाली |’ इसके लिए कुछ उम्दा काम भी करना पड़ेगा | विदित हो की बड़े-से-बड़े स्टार की पिक्चर उसके स्टारडम के नाम पर पहले तीन दिन ही ताबड़तोड़ कमाई करती है | उसके बाद तो पिक्चर कितनी उम्दा बनी है, उसी पर ही, फिल्म की सफलता निर्भर करती है |

‘लो कर लो बात, जब अंत में काम और वह भी उम्दा काम ही करना है तो हम इस कमबख्त खुशी के पीछे भागें ही क्यों ? आखिर क्यों ?“ यह सवाल आप के मन में हिलोरें मार रहा होगा | मारना भी चाहिए |

खुश रहना और दुखी रहना दोनों एक विकल्प की तरह है | दोनों में किस विकल्प का चुनाव करना है वह मैं आपकी समझदारी पर छोड़ता हूँ | और मुझे यकीन है कि हर समझदार व्यक्ति की तरह आप खुशी को ही चुनेंगे | जीवन रुपी इस चुनाव में हमें ‘नोटा’ (NOTA यानी इनमें से कोई नहीं) की सुविधा उपलब्ध नहीं होती | अगर हमने ख़ुशी को नहीं चुना तो हमारे बिना जाने ही हमारा मन-मस्तिष्क दुख को चुन लेता है, क्योंकि हमारा मन-मस्तिष्क  ‘शून्य’ में क्रियान्वित नहीं होता |

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है की यह ‘अगर’ जो है वो इकलौता नहीं है | इसका एक भाई भी है, जिसका नाम है ‘मगर’ | एक पल के लिए मान लें की उपरोक्त बातें जो आपके और आपकी खुशी के बीच दीवार बन कर खड़ी थी वह यथार्थ में बदल भी जाती है, तो, ‘अगर’ का छोटा लेकिन समान रूप से योग्य भाई “मगर” आपके जीवन में प्रवेश करता है-

  • दसवीं तो ठीक है मगर बारहवीं में भी 90 प्रतिशत के ऊपर अंक आयेंगे क्या?
  • बारहवीं तो ठीक है मगर सही कॉलेज मिलेगा क्या ?
  • कॉलेज भी अच्छे नम्बर से पास हो गए मगर अच्छी नौकरी मिलेगी क्या ?
  • प्रेम कहानी तो प्रारंभ हो गयी मगर विवाह में परिणत होगी क्या?
  • पत्नी तो सुनने लग गयी है (क्या बात है!) मगर बच्चे कब सुनेंगे ?
  • पदोन्नति तो हो गयी मगर अब इस साल कम-से-कम 30 प्रतिशत का इज़ाफ़ा मिलेगा क्या?

अक्सर होता यह है कि ये ‘अगर’ और ‘मगर’ नामक दोनों भाई आपको आपकी डगर से भटका देते हैं और खुशी नाम की आपकी प्रेमिका का आप इन्तज़ार ही करते रह जाते हैं| खुशी तो आपके साथ होती नहीं पर आपके साथ होते हैं मुहम्मद रफ़ी और उनका ये गीत-

“ सुहानी रात ढल चुकी ना जाने तुम कब आओगे,

 जहाँ की रुत बदल चुकी ना जाने तुम कब आओगे”

ऐसी बहुत सी सुहानी रातें ढल जायेंगी पर खुशी कभी आयेगी नहीं क्योंकि एक तो आपकी संगत ‘अगर’ और ‘मगर’ नमक भाइयो के साथ है और दूसरा आपने खुशी को एक्स्ट्रा समझ रखा है जो खुद उतनी ज़रूरी नहीं है | एक पर एक फ्री | अगर खुशी को पाना है तो इन दोनों भाइयों की बुरी संगत को छोड़ कर ख़ुशी के पास खुद चल के जाना पड़ेगा, वो खुद नहीं आयेगी |

एक ज़माना था जब लोग अपनी बात में और वज़न डालने के लिए चच्चा ग़ालिब का एकाध शेर अपनी बात के साथ कह दिया करते थे | साहित्य के कुछ रसिया अब भी ऐसा ही करते है, पर, आजकल लोगबाग अपने एक दूसरे चाचा का सहारा कुछ ज़्यादा ही लिया करते हैं | उनका नाम है गूगल चाचा | इस चाचा के पास अपने भतीजे और भतीजियों के कमोबेश सभी सवालों का जवाब होता है- इनके यहाँ से कोई खाली हाथ नहीं लौटता | तो भला मै कैसे लौटता | मैंने जब इनसे पूछा कि- बताओ खुश रहने और कार्यक्षमता बढ़ाने का कोई वैज्ञानिक शोध है ? तो इन्होंने मुझे बताया कि-

‘ब्रिटेन में सोशल मार्किट फाउंडेशन और वार्विक यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर कॉम्पिटीटिव एडवांटेज इन ग्लोबल इकोनौमी ने 700 कर्मचारियों पर एक शोध किया | उन्होंने इनको दो भागो में बाँट दिया | एक वर्ग को उन्होंने कॉमेडी फ़िल्म दिखा कर खुशी से चार्ज किया, और दूसरे वर्ग के साथ ऐसा नहीं किया | जिनको खुशी से चार्ज किया गया था उनकी कार्यक्षमता में औसतन 12 प्रतिशत का इज़ाफा हुआ और कुछ लोगों पर तो 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी भी हुई | शोधकर्ता डॉ डेनियल सिग्रोई ने अपनी रिपोर्ट में लिखा की अर्थव्यवस्था में जी.डी.पी अगर 3 प्रतिशत भी बढ़ जाती है तो उसे बहुत अच्छा मना जता है | ‘

आपको अब देख कर लगता है कि मेरी बातों का कुछ-कुछ असर आप पर हो रहा है | शुरुआत की वो अदृश्य दीवार जो मेरे सन्देश और आपके श्रवण के बीच थी, वह ज़्यादातर हिस्सों में अब ढह सी गयी है | कुछ लोग ज़रूर दिख रहे है जो दीवार को मजबूती से पकड़ के रखे हैं | गिरने नहीं दे रहे है |

‘खुश होने का गणित है कि यथार्थपरक आकांक्षा | खुश होने के लिए या तो अपने यथार्थ को समृद्ध  कर लीजिये या फिर अपनी आकांक्षाओं को कम कर दीजिये |’

जूडी पिकल्ट ( नाइनटीन मिनट्स)

तो क्या ये वे लोग है जो अपनी आकांक्षाओं को कम करने को तैयार नहीं ? अगर ऐसा हो तो भी कुछ बुराई नहीं क्योंकि इंसानी महत्वाकांक्षा ने ही इंसान को प्रगति के मार्ग पर अनवरत चलायमान रखा है | लेकिन इनके लिए तो हमने वो सुपरस्टार वाली बात कर ही ली है कि ‘महत्वाकांक्षा’ नामक फ़िल्म बाद में बनेगी और खुशी नामक सुपरस्टार पहले साइन होगा | थोड़ा और नज़दीक से देखता हूँ | अच्छा ! ये महात्वाकांक्षी लोग नहीं बल्कि कुछ ऐसे लोग हैं जिनके चेहरे के भाव ये कह रहे है कि-

“हमारे ह्रदय की पीड़ा तुम क्या जानो रुपेश बाबू !

हम चाह कर भी खुश नहीं हो सकते!’

ये वो लोग है जो आज भी चच्चा ग़ालिब को याद कर उन्हें दोहराते है कि

“हम भी जानते है जन्नत की हकीक़त लेकिन

दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है | “

आगे वह अपनी पीड़ा बयां करते हैं | हर के पास दुखी होने का एक लाइसेंस है | वो कहते है कि

– मुझे एक असाध्य रोग है |

– मै गले तक क़र्ज़ में डूबा हूँ |

– मै विकलांग हूँ |

– मै एक अबला नारी हूँ जिसका तलाक भी हो चुका है और जिसके एक बच्चा भी है |

– मैंने अपने जीवन के ४० बसंत देख लिये और इस जीवन में कुछ भी हासिल नहीं किया है |

अब ऐसी किसी लिस्ट को पढ़ कर अच्छा-खासा उत्साही व्यक्ति भी एक पल को रुककर सोचने पे मजबूर हो जायेगा कि भला अब क्या करें ? तो क्या हम उन्हें उनके हाल पर ही छोड़ दें? लोगों में उत्साह का संचार करने के लिए लिखी गयी इस किताब पर पहले अध्याय में ही पूर्णविराम कैसे लगाएँ ? चलो एक और लिस्ट है हमारे पास, ज़रा उसे मुलाहिज़ा फ़रमाइए | शायद अगली लिस्ट पढ़कर आप में उत्साह और खुशी का पुनः संचार हो |

– पाकिस्तानी ऑल राउंडर वसीम अकरम को 1997 में ही मधुमेह यानी डाइबिटीज़ की बीमारी हो गयी थी | पर वो 2003 तक सफलतापूर्वक खेलते रहे |

– सन 2000 में जब अमिताभ बच्चन की उम्र 58 वर्ष की थी, वे तकरीबन १०० करोड़ के क़र्ज़ में डूबे थे और आज उनकी जो संपत्ति है उसके जीरो गिनने में मेरी सीमित गणितीय योग्यता आड़े आती है |

– विश्वविख्यात भोतिकी वैज्ञानिक स्टीवन हॉकिंग को मोटर न्यूरोन बीमारी थी लेकिन वे वर्तमान युग के सबसे बड़े वैज्ञानिक माने जाते हैं |

– हैरी पॉटर पुस्तकों की लेखिका जे के रोलिंग, अपने पहले उपन्यास के प्रकाशन के समय तलाकशुदा सिंगल पैरेंट थी और सरकारी मुआवज़े पर गुज़र-बसर कर रही थीं |

– 1908 में जब हेनरी फोर्ड ने टी-कार नामक क्रन्तिकारी अविष्कार कर एक ऑटोमोबाइल क्रांति का सूत्रपात किया तब उनकी उम्र 45 वर्ष की थी |

उम्मीद है इस लिस्ट ने आप में  ज़रूर उत्साह का संचार किया होगा |

‘हमारी खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि हम अपनी सोच-विचार की प्रक्रिया को कैसे संचित करते हैं | अगर हम हर्षपूर्ण विचारों से अपनी विचार प्रक्रिया को सींचेंगे और खुश रहने को एक आदत बनायेंगे तो हम एक खुश दिल के मालिक होंगे और जीवन हमारे लिए कभी न खत्म होने वाला एक उत्सव होगा |’

-नार्मन विन्सेंट पील

कम्प्यूटर जी कृपया इस लाइन को लॉक किया जाए-

खुशी को अपने दैनिक लक्ष्य में शुमार कीजिये और पूरी कोशिश करिए कि ये लक्ष्य आप हर रोज़ हासिल करें | 

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