माधुरी की कहानी ‘लक ये है कि काफ़ी बैडलक है!’

आज पढ़िए युवा लेखिका माधुरी की कहानी। लॉकडाउन, टिक टॉक आदि संदर्भों के साथ कहानी बहुत रोचक बन पड़ी है। आप भी पढ़ सकते हैं-

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कानों से सुनी सुनाई बातें न होतीं तो उन्हें आँखों से देखने की इच्छा कहाँ से आती भला? कान ही हैं जो सुनने के अलावा आँखों को जिज्ञासा देने की महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी भी निभाते हैं । बहरहाल इस विज्ञान और दर्शन के बीच उलझने से बेहतर है कि हम अपने क़िस्से पर फोकस करना शुरू करें। सुना है कि शर्मा जी का लड़का कल ही लौटा है राजस्थान । सुना है पुणे में कहीं ड्राईवर की नौकरी करता है। सुनने में तो ये भी आया कि कोविड महामारी के चपेटे में आ गया, सुनते ही बेटे को देखने को आतुर ही माँ बाप ने आनन फ़ानन में ही गाँव बुलवा लिया उसे । इकलौता लड़का ठहरा उनकी चिंता जायज़ थी।
महामारी का समय भी अजीब होता है , हवाओं में महामारी घुल जाती है और समय को भय का रोग लग जाता है । यही हुआ भी था। हर रोज़ ही जाने कितने लोगों के बीमारी से घिरने और उससे बाहर निकलने की ख़बरें आतीं। मौत ऐसे आ रही थी जैसे कोई चक्रवाती तूफ़ान आया हो और जिसकी मियाद असीमित हो । एक अङ्ग्रेज़ी अख़बार ने अपने मुख्य पृष्ठ पर सिर्फ उन लोगों के नाम छापे जो पिछले दिनों महामारी में गुज़र गए । किसी अपने की देह को छूना तो दूर, अंतिम दर्शन भी दुर्लभ हो गए थे । नदियों में बहते शवों की सैटेलाइट इमेज से पहचानना मुश्किल था किस का शव है , कौन किसका भाई , माँ, पिता , पति पत्नी या बहन है । अपने पराये हो गए और पराये अपने। ऐसे में रिश्तेदारों पर बोझ बढ़ गया था अपनी रिश्तेदारी को साबित करने का । इसलिए शर्मा जी के बेटे के बीमार होने का नाम सुनते ही आस पास के गाँव से बहुत सारे रिश्तेनाते वाले भी इकट्ठे हो गए।
यूँ मानो कि घर में कुल जमा बाईस लोग हो गए थे ।
उधर अगले दिन जब घर घर सर्वे करती , मरीज़ों की पहचान करने आशा सहयोगिनी पहुँची तो निराशा ही लेकर पहुंची। उसकी टीम के सदस्य सब घरवालों को उठा कर ले गए और क्वेरेन्टीन कर दिया। क्वेरेंटीन का मतलब था किसी अज्ञातवास में लोगों को रखना जिन पर संदेह हो कि महामारी के चपेटे में हैं। अंतर बस इतना है कि अज्ञातवास का पता
सभी को ज्ञात होता है ।
शर्मा जी ने बहुत मिन्नतें की कि साहब बाक़ी तो सब ठीक है मगर घर में ढोर ढंगर हैं, संभालेगा कौन उन्हें ? दो भैंसे, चार गायें, चंद बकरियाँ और कुछ मुर्गियाँ हैं। मुझे कुछ नहीं हुआ है, आप मुझे तो कम से कम छोड़ दो।
पर महामारी में ढील करना सही नहीं था , ऊपर से सख़्ती बरतने के सख़्त सरकारी आदेश थे । लिहाज़ा, कोई रियायत नहीं , सबको जाना ही था। लॉकडाउन चल रहा था , एक नयी सी बात थी जो कभी सुनी , न देखी । लोगों को घर से बाहर क़दम तक नहीं निकालना था। सभी राहें सूनी सूनी , गलियों में आवारा जानवरों के अलावा कुछ नज़र नहीं आता था । हाँ , पुलिस वाले ज़रूर चप्पे चप्पे पर तैनात थे ताकि कोई घर से बाहर न निकले । लोग आपस में घर की छतों छज्जों , बालकनियों और खिड़कियों से एक दूजे के दीदार , दुआ सलाम कर लिया करते थे । शहरों का तो लगभग यही हाल था मगर गाँव में सख़्ती ज़रा कम मानते थे लोग।

इधर गाँव वालों को चिंता हुई कि शर्मा जी के मवेशियों का क्या होगा। प्रधानाचार्य जी , जो गाँव के कोविड महामारी के इंचार्ज थे सरल भाषा में कहें तो कोरोना मैनेजर थे (सही शब्द सूझ नहीं रहा तब तक आप स्वयं समझ जाएं) ने तुरत फुरत में कमिटी बनाई, मीटिंग रखी। तय हुआ कि गाँव के चार लोग इन मवेशियों का बारी बारी से चार दिन तक ख़्याल
रखेंगे इसके बाद फिर वही क्रम दोहराया जाएगा ।
ज़ालिम सिंह की ड्यूटी सबसे पहली थी. अपने नाम के बिल्कुल विपरीत व्यवहार करते हुए उसने दिन भर तो मवेशियों और मुर्गियों का ख़ूब ख़्याल रखा। मगर शाम से रात होते होते मुर्गी देख कर जी ललचा गया. एक मुर्गी पका डाली, सोचा, कह देंगे कि मुर्गी फ़रार हो गयी। रपट लिखानी है तो लिखा दो थाने में। दूसरे दिन रामकेश की ड्यूटी थी, चूंकि उसके ख़ुद के पास बहुत पशु थे, उससे बेहतर कौन ध्यान रख पाएगा यही सोचकर तो उसका चयन किया गया था । किन्तु अंदर की बात तो ये है कि वो ठहरा अकबर के ज़माने का आलसी। जानवरों का चारा सानी उसकी पत्नी ही करती थी । उसके ऊपर तो पेड़ से कोई पत्ता भी गिर जाये तो पत्नी को आवाज़ देता कि इसे हटा दो। रमिया इस वजह से बड़ी खिसियाई घूमती , रमिया थी रामकेश की बीवी। जब उसे मालूम हुआ कि उसे पड़ोसियों के गाय भैंस का ख्याल रखना है तो फट पड़ी । अपने घर का काम काज निपटा कर थकी हारी बेचारी रमिया दूसरे के घर के जानवर क्यों देखती भला. सो इधर ,रामकेश चारपाई पर पड़ा पड़ा ऊँघने लगा फिर खर्राटे भरने लगा उधर भूख से गाय – भैंस रंभाती रहीं, बकरियाँ रह रह कर फुदकती रहीं , मुर्गियाँ कुकड़ती रहीं।
तीसरा दिन मनोज कुमार के हिस्से था,उसे जाने क्या सोचकर ये काम सौंपा गया था , फ़क़त ऊपरवाला ही जाने। उसकी माँ घर में हमेशा एक बकरी रखती थीं, उसको चारा खिलातीं, दूध दुहतीं, सेवा करतीं। हुज़ूर ने बचपन में खेल खेल में बकरी के सींगों के बीच थैली बाँध दी। इस पर बकरी को इतना ग़ुस्सा आया कि मनोज के पेट पर सिर दे मारा, शुक्र है कि सींग नहीं घुसे, पेट नहीं फटा । बकरियों से तो उसे तभी से खुन्नस है। ख़ैर , जनाब को लगा था महामारी के दिन हैं , सभी कुछ न कुछ मदद कर रहे हैं, उन्हें भी आगे आना चाहिए । तो अपना नाम इन चार लोगों में शामिल होने पर समाज के प्रति ज़िम्मेदार बनने की भावना भीतर ही भीतर गहरा गई थी । फिर एक दो दिन की ही तो बात होगी , यही सोचकर चारा लेकर पहुँच। कितना ले जाना है इसका कोई आइडिया ही महानुभाव को न था । चारा खिलाने की महज़ फ़ार्मैलिटी पूरी कर दी। फलस्वरूप ये तीसरा दिन था जब जानवर भूखे ही बिलबिलाते रहे थे. अगले दिन यानि चौथे दिन ड्यूटी पर पहुँचा लक्ष्मीकांत। उसने जानवरों के चेहरे देख कर पता लगा लिया कि कितनी तड़प है उनके चेहरों पर। लक्ष्मीकान्त सीधा पहुंचा हैड मास्टर जी के पास और जानवरों की सारी व्यथा कह सुनाई । और ये भी कह डाला कि बाक़ी के जितने दिन शर्मा जी के परिवार कोई सदस्य नहीं आता वो जानवरों की देख रेख करेगा।मास्टर जी भला क्यों मना करते ।
अब आते हैं असल बात पर , तो मुद्दा ये था कि लक्ष्मीकान्त को लगा था टिक- टॉक का चस्का, दिन- रात वही वीडियोज़ बनाया करता । घर वाले इससे आजिज़ आ गए थे , कोई न कोई कुछ न कुछ जुमला कस ही देता । और उसे , टिक टॉक में कोई टोका टाकी पसंद ना थी। हाँ यूं तो, जीवन में भी नहीं थी इसीलिए पैंतालीस पार कर के भी अविवाहित रहा। वैसे सही कहें तो इसके पीछे की वजह जानने के लिए थोड़ा फ्लैश बैक में जाना होगा। लेकिन कुछ वक़्त बाद जानेंगे। फ़िलहाल , लक्ष्मीकांत माँ के साथ दो मंज़िले मकान की पहली मंज़िल पर रहता था। एक जोड़ी भाई भाभी वहीं रहते थे निचली मंज़िल पर । बिजली विभाग में कांट्रैक्टर था, महामारी के कारण फ़िलदौर वह भी ठप्प ही था। उसके नाम लक्ष्मीकांत की बैकग्राउंड स्टोरी बड़ी ही मज़ेदार थी, जब पैदा हुआ तो फिल्म संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के गानों की धूम थी। दादाजी उसे प्यारेलाल बनाना चाहते थे, दादी ने कहा दिया कि लक्ष्मीकांत रखेंगे। सत्यम शिवम सुंदरम के गाने सुन के माँ का मन था शिव रखूँ नाम। पर पहली हार दादाजी की हुई क्योंकि वो दादी के पति थे, दूसरी हार हुई माँ की, उसने ख़ुद ही हथियार डाल दिये क्योंकि सास से लड़ने से बेहतर है उनकी बात मान लें-लिहाज़ा नाम हुआ लक्ष्मीकान्त । पैदा हुआ , बड़ा हुआ लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के गाने सुनकर सुनकर । दादा दादी , पापा मम्मी सब पर लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल के म्यूजिक का जादू था । वो नफ़रत करने लगा था लक्ष्मीकांत प्यारे लाल के गानों से । उनकी
फिल्मों के नाम उसे उँगलियों पर रट गए थे। कभी कभी पसंद नहीं बल्कि नफ़रत कर के भी हम किसी को कितना ख़ास बना देते हैं। कितनी अजीब बात है न, पर है ।
चार भाइयों और दो बहनों में सबसे छोटा लक्ष्मीकांत। छोटा था तो गोरा चिट्टा, गोल मटोल बच्चा था। दिन भर पतंग उड़ाना , कंचे खेलना और कॉपी के पन्नों में बहुत सारे विद्या के पंख (एक क़िस्म का पंख ) रखना उसके शगल थे। उसका पढ़ाई से और पढ़ाई का उससे कोई वासिता: न था। ख़ैर , जैसे तैसे कॉलेज मे पहुंचे । जुगाड़ से विश्वविद्यालय में प्रथम वर्ष, कला संकाय में प्रवेश पा लिया। यहीं से कहानी ने मोड़ लिया और यहीं से अविवाहित रहने वाली कड़ी जुड़ती है ।अपनी कक्षा में पढ़ने वाली सीमा नाम की लड़की से असीमित मोहब्बत कर बैठे। सीमा को दूर से निहारते रहना, सीमा के पास से गुज़र जाना , सीमा का पीछा करना सब किया । सीमा भी ये सब देखरही थी। और उसका भी नज़रें मिली दिल धड़का वाला हाल तो था। पर कहीं से कुछ पहल नहीं हो रही थी। इधर लक्ष्मीकांत ने एक दिन ठान लिया कि अपना हाल ए दिल बयां कर ही देंगे । चर्चित फिल्मी गीतों की एक ऑडियो कैसेट रिकॉर्ड करा ली। सीमा को एक कार्ड मय चंद गुलाब थमा दिया । कार्ड पर लिखा था – लव मी , आई एम यौर्स !! लेकिन भाग्य देखिये सीमा उस दिन के बाद से कॉलेज नहीं आई। लक्ष्मीकान्त ने बहुत दिन राह देखी, कुछ दिन बाद वही कैसेट और एक छोटी सी स्लिप अपनी दोस्त बरखा के साथ भिजवा दी जिस पर लिखा था – आई एम सॉरी , आई लाइक यू बट केन नॉट बी यौर्स !
लक्ष्मीकांत के दिल को शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस हो गया , कुछ पलों के लिए धड़कना भूल गया। इधर सहेली से ही ये मालूम हुआ उसकी शादी तय हो गयी है , लड़का नेपाल में है। किसी शुगर मिल में अच्छी पोस्ट पर है। ये सुनकर लक्ष्मीकांत का माथा ठनका , घर में भी तो मँझले भाई के ब्याह का चर्चा था । कुछ दिन पहले ही सभी घर वाले लड़की देखने गए थे । तो क्या ये वही सीमा है , जो उसकी सीमा से बाहर हो गयी है?
और फिर शादी होकर सीमा घर की सीमा के भीतर दाख़िल हो गयी , लक्ष्मीकांत के दिल की सीमा रेखा पर गोली बारी शुरू गयी थी। उसे देखता और दिल छलनी छलनी हुआ जाता। फिर कुछ दिन रहकर शहर , देश की सीमा से भी परे चले गयी, नेपाल चली गयी।
मगर सिर्फ उसके प्यार के किसी और से ब्याहने की बात होती तो लक्ष्मीकांत को बुरा न लगता , बुरा लगा कि सीमा बहुत ख़ुश थी । वो क्यूँ थी ख़ुश ? क्या उसने एक पल को भी मोहब्बत नहीं की ? क्या वो एक पल को भी नहीं रोयी? लिखा तो था – “आई लाइक यू” , क्यूँ लिखा था ?
और इन सवालों से उपजी तड़प ने अपनी सीमा में जीवन को बाँध लिया था ।
सीमा जब भी कभी त्योहारों पर आती अपने बच्चे और पति के साथ । वो सुखी दिखती , वो दुखी रहता । पर उसके दुख की सीमा से सब अंजान थे यहाँ तक कि ख़ुद सीमा को भी नहीं । सीमा को उसने दिल के किसी सीक्रेट कॉर्नर में छिपा लिया था । अब दुनिया की नज़रों में वो पैंतालीस साल का कुँवारा आदमी था जो स्वभाव से रसिया था तथा आस पास की महिलाओं को घूरा करता था । लोग कहते शादी हुई नहीं तो पराई औरतों पर नज़र डालता है ।

और फिर सोशल मीडिया आया । फेसबुक पर उसे खूब वक़्त बिताना आ गया था , व्हाट्सएप्प और फिर इंस्टाग्राम। और जिस पर वो दिल हार गया था वो था टिक टॉक। कुछ अकाउंट्स को फॉलो किया हुआ था , सही बोलें तो कुछ बालाओं के अकाउंट्स को । उनके गाए गानों पर जुगल बंदी करते । आँखों से कमाल के एक्स्प्रेशन देते। गो कि रोमांटिक गानों मे उसे नज़रों से खेलना बहुत भाता था ।
अभी वर्तमान में लौटें तो सौ बातों की एक बात ये थी कि लक्ष्मीकान्त घर की किटर पिटर से दूर जाना चाहता था , जब तक घड़ी की टिक टिक कानों तक सुनाई देती रहे , टिक टॉक करना चाहता था और स्वभाव से ही गाय भैंसो और जानवरों के प्रति दयालु तो था ही , ये अलग बात है। अपने बिस्तर लेकर निकला और माँ को कह दिया उसके खाने की फ़िकर न करे और घड़ी घड़ी उसे फोन न करे। पहुँचते ही उसने सारा बाड़ा साफ किया , मवेशियों को नहला धुला कर चारा सानी किया और वहीं तबेले में अपना बिस्तर लगा
लिया ।
सूरज ढल रहा था , मवेशी सुस्ता रहे थे। सही सा एंगल बना कर लक्ष्मीकान्त जी बैठ गए , टिक टॉक ऑन किया। उस रोज़ भी अपनी पसंद की टिकटोकियन कन्या के साथ किसी गाने पर वीडियो बनाना शुरू किया। जज़्बातों की रौ में बिलकुल नोटिस नहीं कर पाये कि उनकी वीडियो में एक भैंस भी नज़र आ रही है। वीडियो को पोस्ट कर दिया । दो तीन गानों पर और वीडियो बनाया । पोस्ट करते करते देर हो गयी तो वहीं आँख लग गयी।
सुबह उठकर देखा तो दो भैंसों में से एक भैंस उसे ही देख रही थी । लक्ष्मीकान्त जी को लगा ज़रूर भूखी रही होगी , सो पानी भरा, चारा ले आए बाज़ार से । फ़ारिग होकर जब मोबाइल देखा तो सन्न रह गए , उनके एक विडियो को बहुत लाइक मिले थे , कई लोगों ने फॉलो किया था और कमेन्ट किए हुए थे । कमेन्ट पढे तो दिमाग़ उनका फन्ने खाँ हो गया , सब के सब भैंस के लिए थे जो विडियो में पीछे जुगाली करते हुए नज़र आ रही थी। न सिर्फ जुगाली कर रही थी बल्किम्यूजिक के साथ साथ अपना सिर हिलाती थी और बीच बीच में रंभाती थी। डांसिंग बफेलो , बफेलो इन मूड , भैंस का टिकटोकिया भेस, टिकटॉक विद भैंस और भी जाने क्या क्या लिखा था । लक्ष्मीकांत के लिए बस इतना ही लिखा था कि जैसा मालिक वैसी भैंस । बस इतना ही ? लक्ष्मीकांत को इस क़दर बुरा कभी नहीं लगा मगर सोशल मीडिया के इस ज़माने में दुख दर्द पर फोलोवर भारी होते हैं । उसने ख़ुद को दिलासा दिया कि लोग भैंस के साथ साथ ज़रूर उसे भी नोटिस कर ही लेंगे एक न एक दिन, फोलोवर बढ़ना ज़रूरी था और क्यूँ न हो ,फ़ेम का सुरूर ही अलहदा है ।
सो, ठान लिया कि अब से नो अदर गर्ल्स , ओन्ली अपनी भैंस। एक्सपेरिमेंट के तौर पर उसने नब्बे के दशक का गाना लगा लिया और एक सेल्फ़ी विडियो भैंस के साथ ट्राइ किया । भैंस ने कोई रेस्पोंस ने दिया बस भुच्च सी उसे देखती रही। लक्ष्मीकांत ने गाना बदला , सोचा शायद इस पर उसको अच्छा लगे । पर अभी भी कोई रेस्पोंस नहीं । वह किसी डीजे
की तरह गाने बदलता रहा और भैंस निर्लिप्त रही।
थक हार कर उसने रात वाला गाना ही चला दिया, क्या देखता है कि भैंस ने उस पर सिर हिलाना शुरू कर दिया। और ज्यों ही गाना बदला जुगाली शुरू। लक्ष्मीकांत को पसीने छूट गए कि आख़िर ये चाहती क्या है ? दोपहर हो चली थी, अब तक एक भी विडियो पोस्ट नहीं किया था । उसे डर लगा कि कहीं उसकी पोपुलरिटी क्षणिक तो नहीं थी?

वो सोच ही रहा था कि अचानक से उसके यू ट्यूब की प्ले लिस्ट से एक गाना प्ले हो गया। गाना सुनते ही भैंस ने रंभाना और फोन की ओर सिर घुमाकर देखना शुरू कर दिया। अचानक से तान में आने लगी – खोली नंबर 420 , इक्सक्यूज मी प्लीज । लक्ष्मीकान्त ने उसी प्ले लिस्ट का अगला गाना शुरू किया – सोलह बरस की बाली उमर को सलाम, भैंस की आँखों में एक चमक उभर आई।
अगला गाना – आने से उसके आए बाहर – भैंस खड़ी हो गयी और पैर भी हिलाने लगी । लक्ष्मीकांत के लिए ये हैरतनाक था। वो मुंह फाड़े बस देख रहा था। प्ले लिस्ट का अगला गाना – तो बोलो ॐ शांति ॐ , फिर – आज मौसम बड़ा बेईमान है बड़ा ।
लक्ष्मीकान्त को यक़ीन नहीं हो रहा था , लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के 100 आइकोनिक सोंग्स बज रहे थे । नफ़रत ने उसे घूम फिर कर जकड़ लिया था। क्या वो पोपुलरिटी का मोह छोड़े और जारी रखे अपनी नफ़रत ?
दिन भर उसके दिमाग़ में यही ऊहापोह मचती रही , घर से माँ ने बड़े भाई के बेटे के हाथों खाना भिजवाया था, वो भी जस का तस रखा था । एक विचार आता कि महामारी के इस दौर में नफ़रत को लेकर कहाँ जाएगा , म्यूजिक तो अच्छा ही है लक्ष्मीकान्त प्यारे लाल जी का । उसका नाम, अगर उनके नाम पर रख दिया गया तो क्या हुआ ? नाम से घृणा का
ये मतलब तो कतई नहीं न कि काम से भी नफ़रत हो। और रात होते होते ये तय हुआ कि अब इन्हीं गानों पर टिकटॉक बनेगा चाहे जो भी हो। प्रसिद्धि की मलाई वो चखना ही चाहता है ।
भैंस को खूब सहला कर , दुलार कर एक राहत की साँस लक्ष्मी ने ली , आँखें मूँदी तो नींद ही आ गयी। सीधे रात को आँख खुली , 12 बज रहे थे । देखा सब जानवर ऊँघ रहे हैं। सोचा फिलहाल सो जाते हैं , सुबह ताज़गी से भरा टिकटॉक विडियो बनाएँगे ।
सवेरे जल्दी उठ कर उसने सबसे पहले प्यार भरी नज़रों से भैंस को देखा । एक चुम्मी दे दी ग़ौर करें ये कोई फ्लाइंग किस नहीं थी बल्कि उसके माथे पर प्रोपर किस्सी थी । ये तो हुआ घास के बजाए घूस । इसके पश्चात गाय भैंसों का दूध दुहा, मुर्गियों के अंडे समेटे । सब लेकर बड़े मास्टरजी के घर पहुँचा । मास्टर जी उसकी ईमानदारी से बेहद ख़ुश हुए । उसको चारा सानी के लिए एवज़ में कुछ रुपये दे दिये।
लक्ष्मीकान्त प्रसन्नचित्त बाड़े में लौटा , सुबह के नौ बज रहे थे । नित्यकर्म से निबटा तो दस बज रहे थे । अपनी भैंस को स्नेह से निहारा। टिकटॉक एप खोली, ऐसा पहली बार था जब किसी लड़की को नहीं खोजा उसने । अपनी भैंस के लिए दो रिबन ले आया था । एक सींग पर गुलाबी और एक पर पीला बांधा और गाना चला लिया – तू मेरा हीरो है , तू मेरा दिलबर है । भैंस सुर लहरी पर थिरक रही थी, लक्ष्मीकान्त ने अपने चिर परिचित अंदाज़ में आँखों के मूवमेंट किए। एक ख़्याल ज़ेहन में यह भी था कि कहीं ग़लती से तो लोगों को पहले वाला वीडियो पसंद नहीं आ गया था इसलिए ज़्यादा विडियो न बनाने के बजाए उसने एक ही पोस्ट करने की सोची । जय गैया मैया जी (भैंसिया मैया कुछ जंच नहीं रहा था ) कहकर लक्ष्मीकांत ने दोपहर 12 बजे एक पोस्ट किया। देखते ही देखते लाइक्स की बाढ़ आ गयी । तीन बजे तक लक्ष्मीकान्त के सौ फ़ालोवर और बढ़ गए। व्यूज़ की तो पूछिए ही मत। लक्ष्मीकान्त ने दोपहर का भोजन भी नहीं ग्रहण किया इस ख़ुशी में । उसने सोचा , आज ही कई सारे वीडियोज़ बना लेगा फिर धीरे धीरे उनको पोस्ट करता रहेगा। कहीं ये न हो कि भैंस के मालिक लोग आ जाएँ और उसकी प्रसिद्धि का विलोमशब्द – गुमनामी उसके जीवन में लौट आए। सबसे पहले लक्ष्मीकान्त ने बाज़ार जाकर भैंस के लिए कुछ और प्रोप्स ख़रीदे

जिनमें कुछ फुलकारी के रंग – बिरंगे दुपट्टे, कुछ और रिबन , चुटीले यहाँ तक कि गॉगल भी शामिल था । एक हैट भी खरीद ली । और फिर सनसेट की रौशनी में अलग अलग अंदाज़ में दो विडियो बनाए और ड्राफ़्ट में सेव कर लिए । अगली सुबह सनराइज़ से लेकर शाम तक दिन भर में पाँच विडियो बनाने का लक्ष्य तय किया गया था । योजना थी कि बारी बारी से आने वाले दिनों में विडियो पोस्ट किए जाएंगे । ताकि लोगों में रोमांच बना रहे बहरहाल , अगले दिन के लिए गाने सिलैक्ट कर , भैंस को भरपेट चारा खिलाया गया। उसके चक्कर में उसे ना मुर्गियों का ख़्याल रहा और ना ही बाक़ी मवेशियों का । पास ही खड़ी दूसरी भैंस पर उनकी नज़र तक नहीं गयी। अहो , दुर्भाग्य ! लक्ष्मीकान्त ख़ुद घर गया , अपना खाना पैक करा कर ले आया । और अलमारी में छिपा कर रखी हुई रम की बोतल भी । मज़े से पार्टी हुई । चक कर खाना खाया तथा नौ बजे तक तो लुढ़क गए। सवेरे उठने में ज़रा देर हो गयी। सन, राइज़ होकर ख़ुद उठाने आया कि भाई टिकटॉक वीडियो का क्या हुआ ? उठते ही एक वीडियो पोस्ट करने की सोची – कैप्शन भी सोच रखा था –सनराइज़ के समय सनसेट की याद !
लेकिन लाख कोशिश के बाद वीडियो पोस्ट नहीं हुआ । उसने देखा नेट के तो पूरे टावर आ रहे हैं । फोन को रीस्टार्ट किया,कुछ न हुआ तब भी। बहुत देर जूझने के बाद अपने भतीजे को फोन कर बुलाया । उसने आकर जो कहा कि “चाचा, टिकटॉक तो बैन हो गया इंडिया में “, उसके होश फ़ाख्ता हो गए , ऐसा कैसे हो गया , कैसे हो सकता है ? उसे क्यूँ भनक न लगी ।
भतीजा बोला , “चाचा , ये समाचार तो कई दिन से चल रहा है, टिकटॉक बंद होगा । आपको कैसे नहीं पता यार चाचा । यहाँ तक कि टिकटॉक ने भी नोटिफ़िकेशन भेजा था । अच्छा , आप टिकटॉक बनाने में इतने बिज़ी थे कि ये भी नहीं पता चला , क्या चाचा ?” और भतीजा हँसते हुए चला गया । लक्ष्मीकान्त का कलेजा मुंह को आ रहा था उधर उसने देखा दरवाज़े से शर्मा जी अंदर आ रहे थे , बड़ी सी मुस्कान लिए ।
आते ही बोले,”अरे भाई लक्ष्मीकान्त हमारी भैंस को इतना स्टारडम दिलाने के लिए कितना थैंक यू कहें तुमको, हैं जी , ही ही ही । पशुओं का ध्यान रखने के लिए भी धन्यवाद। मैं तो जल्दी ही छूट गया, कोई कोरोना- वोरोना नहीं था मुझे , यूँ ही पकड़ कर ले गए।अच्छा , तुम जाना नहीं , एक तोहफ़ा देता हूँ तुम्हें ।“
थोड़ी देर में शर्मा जी हाथ में कुछ लेकर बाहर आए “ ये पेनड्राइव लो , सालों से मैं यही गाने लगातार सुनता आया हूँ ये अपनी सुपरस्टार भैंस के भी फ़ेवरिट हैं , क्यूँ री लक्ष्मी ?
“लक्ष्मी!! उफ़्फ़ , ये भी लक्ष्मी ” ये कहकर लक्ष्मीकान्त सिर झटक कर घर से बाहर निकल आया। रात भर नींद ना आई । सुबह हुई तो आवाज़ सुनाई पड़ी – रुक जाना नहीं तू कहीं हार के , काँटों पे चल के मिलेंगे साये बहार के ….ओ राही ओ राही.
देखा कि भतीजे ने संगीतकार लक्ष्मीकान्त प्यारे लाल के गाने बजा रखे थे ।बोला,” चाचा ये पेन ड्राइव मिली कूड़े में कल , लक से इसमें सब गाने आपके फेवरिट हैं”

उधर कोई टिक टॉक स्टार धीमे धीमे से सरक उसी लिहाफ़ के भीतर जा रहा था जहाँ सीमा रहती थी।

माधुरी
जयपुर , राजस्थान
9782376112

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