एक-आध दिन मौसी के घर भी चले जाना चाहिए

संजय गौतम कम लिखते हैं लेकिन मानीखेज लिखते हैं. उदाहरण के लिए यही लेख जिसमें इब्ने इंशा की किताब \’उर्दू की आखिरी किताब\’ के बहाने उर्दू व्यंग्य की परम्परा का दिलचस्प जायजा लिया गया है- जानकी पुल.
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व्यंग्य विधा में समकालीनता एवं उपयोगिता का प्रश्न
(उर्दू की आख़िरी किताब के विशेष संदर्भ में)
व्यंग्यविधा पर विचार करने के लिए मैंने हिन्दी के स्थान पर उर्दू गद्य को आधार क्यूँ बनाया, इससे पहले कि आप पूछें मैं ही बता देता हूँ। एक तो विद्वजनों ने निरंतर दोनों भाषाओं को बहन ही बताया है, सो एक एक-आध दिन मौसी के घर भी चले जाना चाहिए। दूसरे, इब्ने इंशा और मंटो दोनों वर्तमान भारत (लुधियाना) में जन्मे और बाद में पाकिस्तान चले गए। इस दृष्टि से इनकी रचनाओं में अविभाजित भारत तथा बाद के हालात पर किया गया व्यंग्य-लेखन साहित्य की समकालीनता और उपयोगिता के प्रश्न र विचार करने का बेहतर माध्यम प्रतीत हुआ।
          हास्य रस उन प्रधान रसों में से है, जिनके आधार नाट्यसाहित्य में स्वतन्त्र नाट्यरूपों की कल्पना हुई। प्रहसन में तो हास्य रस ही प्रधान है। भारतेन्दु-युग के प्रहसनों से पूर्व भी हिन्दी काव्य-साहित्य में भी हास्य रस का निरूपण बहुत समय तक संस्कृत साहित्य के आदर्श पर होता रहा। कविता में बहुधा आश्रयदाताओं अथवा दानदाताओं के प्रति कटु व्यंग्योक्तियाँ  की गयी  हैं, जिन्हें हास्य रस के अंतर्गत माना जाता है। गद्य साहित्य में इसकी शुरुआत भारतेन्दु-युग से मानी जाती है। इस काल से ही हास्य-व्यंग्य की छटा काव्य,नाटक, प्रहसन तथा निबंधों आदि अनेक विधाओं में दिखाई देती है। किन्तु आज़ादी के बाद व्यंग्य का एक स्वतन्त्र रूप भी विकसित हुआ। हास्य-व्यंग्य की पाँच-छ्ह पृष्ठों कहानियों और निबंधों का सर्वाधिक सशक्त प्रयोग केशवचन्द्र वर्मा ने किया। तत्पश्चात हरीशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, रवीन्द्रनाथ त्यागी, शरद जोशी मनोहरश्याम जोशी आदि बहुत से लेखकों ने लेखन के इस स्वरूप को खूब निखारा। 
             उर्दू के आरंभिक हास्य लेखकों में रतनानाथ सरशार ने फ़साना-ए-आज़ाद एक महत्वपूर्ण कृति माना जाता है। उर्दू काव्य में हास्य-व्यंग्य की परम्परा में नज़ीर अकबराबादी, दाग, अकबर इलाहाबादी, फुरकत, इस्सत देहलवी, दिलावर फ़िगार, हाजी लकलक आदि अनेक कवियों ने आला दर्जे की शायरी की। उर्दू गद्द में ख्वाजा हज़न निजामी, नियाज़ फतेहपुरी, सज्जाद हैदर, मिर्ज़ा अज़ीम बेग चुगताई, रशीद अहमद सिद्दकी, पतरस बुख़ारी, मंटो और इब्ने इंशा आदि लेखकों ने हास्य-व्यंग्य को नए तेवर दिये।  
      
             व्यंग्य को आज एक विधा का दर्ज़ा जाता है किन्तु हास्य-व्यंग्य की बात आते ही अक्सर दोनों को एक ही समझा जाता है। दोनों के बीच जो बारीक अन्तर है उसे समझना अत्यंत आवश्यक है। हास्य मनुष्य का मनोभाव है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मनोविकार कि चर्चा में इस विषय निबंध भी लिखा। हँसना मनुष्य के जीवन की एक अनिवार्य तथा स्वाभाविक क्रिया है। हँसी-ठिठोली के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि उसका कोई लक्ष्य अथवा प्रयोजन हो ही। मन प्रसन्न करने को हास्य भी किसी उपादान का सहारा ले सकता है। व्यंग्य को इसी प्रक्रिया का अगला चरण कहा जा सकता है क्यूँकि व्यंग्य के लिए किसी लक्ष्य की आवश्यकता होती है। व्यंग्य, हास्य रूप में किया गया प्रहार है। व्यंग्य अपनी इस प्रहार अथवा तिलमिला देने की क्षमता के कारण भाषिक हथियार का रूप ले लेता है। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता इसी ओर ईशारा करती है–                                 
व्यंग्य मत बोलो।                                                                 
काटता है जूता तो क्या हुआ /पैर में ना सही
सिर पर रख डोलो। व्यंग्य मत बोलो।…                                                                
राम-राम कहो/ और माखन-मिश्री घोलो।              
व्यंग्य मत बोलो।                          (प्रतिनिधि कविताएँ  पृष्ठ-72)                
ज़ाहिर है कि व्यंग्य की मारक क्षमता का ग़लत प्रयोग भी किया जा सकता है या किया जाता है। किसी को नीचा दिखाने या उपहास का पात्र बना पाना आसान हो, इसका प्रयोग समाज के कमजोर, लाचार, बेबस या हाशिये के पात्र अथवा समूह के लिए भी किया जा सकता है। इसके अनेकों उदाहरण फब्तिओं, चुटकलों के रूप में समाज या साहित्य के पात्रों में भी देखे जा सकते हैं। अभिप्राय यह है कि उपयोगिता के स्तर पर इसका घटिया रूप भी हमारे सामने सकता है या कहें कि आता है। साहित्य में औदात्य बिना

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संजय गौतम कम लिखते हैं लेकिन मानीखेज लिखते हैं. उदाहरण के लिए यही लेख जिसमें इब्ने इंशा की किताब \’उर्दू की आखिरी किताब\’ के बहाने उर्दू व्यंग्य की परम्परा का दिलचस्प जायजा लिया गया है- जानकी पुल.
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व्यंग्य विधा में समकालीनता एवं उपयोगिता का प्रश्न
(उर्दू की आख़िरी किताब के विशेष संदर्भ में)
व्यंग्यविधा पर विचार करने के लिए मैंने हिन्दी के स्थान पर उर्दू गद्य को आधार क्यूँ बनाया, इससे पहले कि आप पूछें मैं ही बता देता हूँ। एक तो विद्वजनों ने निरंतर दोनों भाषाओं को बहन ही बताया है, सो एक एक-आध दिन मौसी के घर भी चले जाना चाहिए। दूसरे, इब्ने इंशा और मंटो दोनों वर्तमान भारत (लुधियाना) में जन्मे और बाद में पाकिस्तान चले गए। इस दृष्टि से इनकी रचनाओं में अविभाजित भारत तथा बाद के हालात पर किया गया व्यंग्य-लेखन साहित्य की समकालीनता और उपयोगिता के प्रश्न र विचार करने का बेहतर माध्यम प्रतीत हुआ।
          हास्य रस उन प्रधान रसों में से है, जिनके आधार नाट्यसाहित्य में स्वतन्त्र नाट्यरूपों की कल्पना हुई। प्रहसन में तो हास्य रस ही प्रधान है। भारतेन्दु-युग के प्रहसनों से पूर्व भी हिन्दी काव्य-साहित्य में भी हास्य रस का निरूपण बहुत समय तक संस्कृत साहित्य के आदर्श पर होता रहा। कविता में बहुधा आश्रयदाताओं अथवा दानदाताओं के प्रति कटु व्यंग्योक्तियाँ  की गयी  हैं, जिन्हें हास्य रस के अंतर्गत माना जाता है। गद्य साहित्य में इसकी शुरुआत भारतेन्दु-युग से मानी जाती है। इस काल से ही हास्य-व्यंग्य की छटा काव्य,नाटक, प्रहसन तथा निबंधों आदि अनेक विधाओं में दिखाई देती है। किन्तु आज़ादी के बाद व्यंग्य का एक स्वतन्त्र रूप भी विकसित हुआ। हास्य-व्यंग्य की पाँच-छ्ह पृष्ठों कहानियों और निबंधों का सर्वाधिक सशक्त प्रयोग केशवचन्द्र वर्मा ने किया। तत्पश्चात हरीशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, रवीन्द्रनाथ त्यागी, शरद जोशी मनोहरश्याम जोशी आदि बहुत से लेखकों ने लेखन के इस स्वरूप को खूब निखारा। 
             उर्दू के आरंभिक हास्य लेखकों में रतनानाथ सरशार ने फ़साना-ए-आज़ाद एक महत्वपूर्ण कृति माना जाता है। उर्दू काव्य में हास्य-व्यंग्य की परम्परा में नज़ीर अकबराबादी, दाग, अकबर इलाहाबादी, फुरकत, इस्सत देहलवी, दिलावर फ़िगार, हाजी लकलक आदि अनेक कवियों ने आला दर्जे की शायरी की। उर्दू गद्द में ख्वाजा हज़न निजामी, नियाज़ फतेहपुरी, सज्जाद हैदर, मिर्ज़ा अज़ीम बेग चुगताई, रशीद अहमद सिद्दकी, पतरस बुख़ारी, मंटो और इब्ने इंशा आदि लेखकों ने हास्य-व्यंग्य को नए तेवर दिये।  
      
             व्यंग्य को आज एक विधा का दर्ज़ा जाता है किन्तु हास्य-व्यंग्य की बात आते ही अक्सर दोनों को एक ही समझा जाता है। दोनों के बीच जो बारीक अन्तर है उसे समझना अत्यंत आवश्यक है। हास्य मनुष्य का मनोभाव है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मनोविकार कि चर्चा में इस विषय निबंध भी लिखा। हँसना मनुष्य के जीवन की एक अनिवार्य तथा स्वाभाविक क्रिया है। हँसी-ठिठोली के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि उसका कोई लक्ष्य अथवा प्रयोजन हो ही। मन प्रसन्न करने को हास्य भी किसी उपादान का सहारा ले सकता है। व्यंग्य को इसी प्रक्रिया का अगला चरण कहा जा सकता है क्यूँकि व्यंग्य के लिए किसी लक्ष्य की आवश्यकता होती है। व्यंग्य, हास्य रूप में किया गया प्रहार है। व्यंग्य अपनी इस प्रहार अथवा तिलमिला देने की क्षमता के कारण भाषिक हथियार का रूप ले लेता है। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता इसी ओर ईशारा करती है–                                 
व्यंग्य मत बोलो।                                                                 
काटता है जूता तो क्या हुआ /पैर में ना सही
सिर पर रख डोलो। व्यंग्य मत बोलो।…                                                                
राम-राम कहो/ और माखन-मिश्री घोलो।              
व्यंग्य मत बोलो।                          (प्रतिनिधि कविताएँ  पृष्ठ-72)                
ज़ाहिर है कि व्यंग्य की मारक क्षमता का ग़लत प्रयोग भी किया जा सकता है या किया जाता है। किसी को नीचा दिखाने या उपहास का पात्र बना पाना आसान हो, इसका प्रयोग समाज के कमजोर, लाचार, बेबस या हाशिये के पात्र अथवा समूह के लिए भी किया जा सकता है। इसके अनेकों उदाहरण फब्तिओं, चुटकलों के रूप में समाज या साहित्य के पात्रों में भी देखे जा सकते हैं। अभिप्राय यह है कि उपयोगिता के स्तर पर इसका घटिया रूप भी हमारे सामने सकता है या कहें कि आता है। साहित्य में औदात्य बिना

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संजय गौतम कम लिखते हैं लेकिन मानीखेज लिखते हैं. उदाहरण के लिए यही लेख जिसमें इब्ने इंशा की किताब ‘उर्दू की आखिरी किताब’ के बहाने उर्दू व्यंग्य की परम्परा का दिलचस्प जायजा लिया गया है- जानकी पुल.
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व्यंग्य विधा में समकालीनता एवं उपयोगिता का प्रश्न
(उर्दू की आख़िरी किताब के विशेष संदर्भ में)
व्यंग्यविधा पर विचार करने के लिए मैंने हिन्दी के स्थान पर उर्दू गद्य को आधार क्यूँ बनाया, इससे पहले कि आप पूछें मैं ही बता देता हूँ। एक तो विद्वजनों ने निरंतर दोनों भाषाओं को बहन ही बताया है, सो एक एक-आध दिन मौसी के घर भी चले जाना चाहिए। दूसरे, इब्ने इंशा और मंटो दोनों वर्तमान भारत (लुधियाना) में जन्मे और बाद में पाकिस्तान चले गए। इस दृष्टि से इनकी रचनाओं में अविभाजित भारत तथा बाद के हालात पर किया गया व्यंग्य-लेखन साहित्य की समकालीनता और उपयोगिता के प्रश्न र विचार करने का बेहतर माध्यम प्रतीत हुआ।
          हास्य रस उन प्रधान रसों में से है, जिनके आधार नाट्यसाहित्य में स्वतन्त्र नाट्यरूपों की कल्पना हुई। प्रहसन में तो हास्य रस ही प्रधान है। भारतेन्दु-युग के प्रहसनों से पूर्व भी हिन्दी काव्य-साहित्य में भी हास्य रस का निरूपण बहुत समय तक संस्कृत साहित्य के आदर्श पर होता रहा। कविता में बहुधा आश्रयदाताओं अथवा दानदाताओं के प्रति कटु व्यंग्योक्तियाँ  की गयी  हैं, जिन्हें हास्य रस के अंतर्गत माना जाता है। गद्य साहित्य में इसकी शुरुआत भारतेन्दु-युग से मानी जाती है। इस काल से ही हास्य-व्यंग्य की छटा काव्य,नाटक, प्रहसन तथा निबंधों आदि अनेक विधाओं में दिखाई देती है। किन्तु आज़ादी के बाद व्यंग्य का एक स्वतन्त्र रूप भी विकसित हुआ। हास्य-व्यंग्य की पाँच-छ्ह पृष्ठों कहानियों और निबंधों का सर्वाधिक सशक्त प्रयोग केशवचन्द्र वर्मा ने किया। तत्पश्चात हरीशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, रवीन्द्रनाथ त्यागी, शरद जोशी मनोहरश्याम जोशी आदि बहुत से लेखकों ने लेखन के इस स्वरूप को खूब निखारा। 
             उर्दू के आरंभिक हास्य लेखकों में रतनानाथ सरशार ने फ़साना-ए-आज़ाद एक महत्वपूर्ण कृति माना जाता है। उर्दू काव्य में हास्य-व्यंग्य की परम्परा में नज़ीर अकबराबादी, दाग, अकबर इलाहाबादी, फुरकत, इस्सत देहलवी, दिलावर फ़िगार, हाजी लकलक आदि अनेक कवियों ने आला दर्जे की शायरी की। उर्दू गद्द में ख्वाजा हज़न निजामी, नियाज़ फतेहपुरी, सज्जाद हैदर, मिर्ज़ा अज़ीम बेग चुगताई, रशीद अहमद सिद्दकी, पतरस बुख़ारी, मंटो और इब्ने इंशा आदि लेखकों ने हास्य-व्यंग्य को नए तेवर दिये।  
      
             व्यंग्य को आज एक विधा का दर्ज़ा जाता है किन्तु हास्य-व्यंग्य की बात आते ही अक्सर दोनों को एक ही समझा जाता है। दोनों के बीच जो बारीक अन्तर है उसे समझना अत्यंत आवश्यक है। हास्य मनुष्य का मनोभाव है आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मनोविकार कि चर्चा में इस विषय निबंध भी लिखा। हँसना मनुष्य के जीवन की एक अनिवार्य तथा स्वाभाविक क्रिया है। हँसी-ठिठोली के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि उसका कोई लक्ष्य अथवा प्रयोजन हो ही। मन प्रसन्न करने को हास्य भी किसी उपादान का सहारा ले सकता है। व्यंग्य को इसी प्रक्रिया का अगला चरण कहा जा सकता है क्यूँकि व्यंग्य के लिए किसी लक्ष्य की आवश्यकता होती है। व्यंग्य, हास्य रूप में किया गया प्रहार है। व्यंग्य अपनी इस प्रहार अथवा तिलमिला देने की क्षमता के कारण भाषिक हथियार का रूप ले लेता है। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता इसी ओर ईशारा करती है–                                 
व्यंग्य मत बोलो।                                                                 
काटता है जूता तो क्या हुआ /पैर में ना सही
सिर पर रख डोलो। व्यंग्य मत बोलो।…                                                                
राम-राम कहो/ और माखन-मिश्री घोलो।              
व्यंग्य मत बोलो।                          (प्रतिनिधि कविताएँ  पृष्ठ-72)                
ज़ाहिर है कि व्यंग्य की मारक क्षमता का ग़लत प्रयोग भी किया जा सकता है या किया जाता है। किसी को नीचा दिखाने या उपहास का पात्र बना पाना आसान हो, इसका प्रयोग समाज के कमजोर, लाचार, बेबस या हाशिये के पात्र अथवा समूह के लिए भी किया जा सकता है। इसके अनेकों उदाहरण फब्तिओं, चुटकलों के रूप में समाज या साहित्य के पात्रों में भी देखे जा सकते हैं। अभिप्राय यह है कि उपयोगिता के स्तर पर इसका घटिया रूप भी हमारे सामने सकता है या कहें कि आता है। साहित्य में औदात्य बिना

5 thoughts on “एक-आध दिन मौसी के घर भी चले जाना चाहिए

  1. "कविता में बहुधा आश्रयदाताओं अथवा दानदाताओं के प्रति कटु व्यंग्योक्तियाँ की गयी हैं, जिन्हें हास्य रस के अंतर्गत माना जाता है।" बहुत खूब। लेकिन आजकल आश्रयदाता और दानदाता भी व्यंग लिखने लगे हैं। तिरछी नज़रों वाले।

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