तेजेंद्र शर्मा की ग़ज़लें

हिंदी प्रवासी कहानी के एक तरह से पर्याय बन चुके तेजेंद्र शर्मा ग़ज़लें भी लिखते हैं हाल में ही पता चला. उनकी गज़लों का छंद, उसकी रवानी इतनी पसंद आई कि सोचा आप लोगों से साझा किया जाए- प्रभात रंजन 
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1.
थक गया हूं अब तो मैं, दिन रात की तकरार से
गोया टूटा हो मुसाफ़िर, रास्तों की मार से।
अब तलक है आस मुझमें, क्योंकि बाक़ी सांस है
जीते जी शायद वो मुझसे, बात करले प्यार से।
जो भी आया झोलियां भर कर गया अपनी मगर
मैं ही लौटा हाथ ख़ाली, आपके दरबार से।
ऐ जहां वालो भला क्यों आपको इलज़ाम दूं
मैं परेशां हूं बहुत, ख़ुद अपने ही किरदार से।
देखते रह जाइयेगा मेरे कदमों के निशां
जब चला जाऊंगा इक दिन दूर इस संसार से।
2.
अपने को हंसता देख मैं हैरान हो गया
तुझसे ही ज़िन्दगी मैं परेशान हो गया।
हैं कैसे कैसे लोग यहां आ के बस गये
बसता हुआ जो घर था, वो वीरान हो गया।
किसका करें भरोसा, बदबख़्त ज़माने में
दिखता जो आदमी था वो शैतान हो गया।
इलज़ाम भी लगाने से वो बाज़ ना आए
बन्दा था अक़्ल वाला वो नादान हो गया।
या रब दुआ है कीजो उसपे करम तूं अपना
वो दोस्त मेरा मुझ से ही अन्जान हो गया।
मैख़ाने में हमेशा था वो साथ निभाता
क़ाफ़िर था अच्छा खासा, मुसलमान हो गया।
3.
ये जो तुम मुझको मुहब्बत में सज़ा देते हो
मेरी ख़ामोश वफ़ाओं का सिला देते हो.
मेरे जीने की जो तुम मुझको दुआ देते हो
फ़ासले लहरों के साहिल से बढा देते हो.
अपनी मगरूर निगाहों की झपक कर पलकें
मेरी नाचीज़ सी हस्ती को मिटा देते हो.
हाथ में हाथ लिए  चलते हो जब गैर का तुम
मेरी राहों में कई कांटे बिछा देते हो.
तुम जो इतराते हो माज़ी को भुलाकर अपने
मेरी मजबूर सी यादों को चिता देते हो.
ज़बकि आने ही नहीं देते  मुझे ख्वाबों में
मुश्किलें और भी तुम मेरी बढा देते हो.
राह में देख के भी, देखते तुम मुझको नहीं
दिल में कुछ जलते हुए ज़ख्म लगा देते हो.
4.
घर जिसने किसी ग़ैर का आबाद किया है
शिद्दत से आज दिल ने उसे याद किया है ।
जग सोच रहा था कि है वो मेरा तलबगार
मैं जानता हूं उसने ही बरबाद किया है।
तू ये न सोच शीशा सदा सच है बोलता
जो ख़ुश करे वो आईना ईजाद किया है।
सीने में ज़ख्म हैं मगर टपका नहीं लहू
कैसे मगर ये तुमने ऐ सय्याद किया है।
तुम चाहने वालों की सियासत में रहे गुम
सच बोलने वालों को नहीं शाद किया है।
5.
जो तुम न मानो मुझे अपना‚ हक तुम्हारा है
यहां जो आ गया इक बार‚ बस हमारा है।
कहां कहां के परिन्दे‚ बसे हैं आ के यहां
सभी का दर्द मेरा दर्द‚ बस ख़ुदारा है।
नदी की धार बहे आगे‚ मुड़ के न देखे
न समझो इसको भंवर अब यही किनारा है।
जो छोड़ आये बहुत प्यार है तुम्हें उससे
बहे बयार जो‚  समझो न तुम‚  शरारा है।
यह घर तुम्हारा है इसको न कहो बेगाना
मुझे तुम्हारा‚ तुम्हें अब मेरा सहारा है।
  

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